मध्यकालीन भारत

मध्य एशिया का खूबसूरत गुलाम इल्तुतमिश

Iltutmish
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मध्य एशिया के तुर्किस्तान में अलबेरी जाति के एक मुसलमान के घर एक खूबसूरत लड़का पैदा हुआ था. उसका नाम अल्तमश (या इल्तुतमिश) रखा गया था. किशोरावस्था में उसका सौन्दर्य और भी निखर गया जिससे उसके अपने भाई बन्धु ही उसके शारीरिक सौन्दर्य से जल भुनकर घोड़ों के झुण्ड दिखाने का बहाना बनाकर उसे घोड़ों के व्यापारी के हाथों बेच दिया.

इतिहासकार पुरुषोत्तम नागेश ओक लिखते हैं, “अल्तमश एक खूबसूरत लड़का था. मुस्लिम शासन में यह शारीरिक आकर्षण वरदान नहीं था; क्योंकि उसपर नर-भोगियों का आक्रमण होता रहता था. अगर कहीं वह शारीरिक सौन्दर्य क्रय-विक्रय की आंधी में पड़ जाता था तो उसके मूल्य निर्धारण का आधार नर-भोग ही होता था. इसके साथ ही उसपर घरेलू कार्यों का बोझ भी लद जाता था.”

किशोर इल्तुतमिश को भोगकर घोड़ों के सौदागर ने बुखारा में उसे एक स्थानीय निवासी के हाथ बेच दिया. फिर हाजी बुखारी ने उसे उस निवासी के पास से खरीदा. इस प्रकार बाजारू सामानों की भांति बिकता हुआ इल्तुतमिश जमालुद्दीन चश्त काबा के पास आ पहुंचा जो गुलामों का व्यापारी था. उसकी पैनी व्यापारिक नजरों ने ताड़ लिया की इस खूबसूरत छोकरे की अच्छी कीमत मिल सकती है, यदि इसे मुहम्मद गोरी जैसे विलासी, शराबी और मदक्की के हाथों बेचा जाय.

उसके सौन्दर्य को अपने कामुक आँखों से चाटते हुए मुहम्मद गोरी ने उसकी कीमत एक हजार शुद्ध सोने की दीनार लगाया मगर जमालुद्दीन उसे इस दाम पर बेचना स्वीकार नहीं किया. इस मुनाफाखोरी से क्रोधित होकर गोरी ने इल्तुतमिश की खरीद पर रोक लगा दी. निराश जमालुद्दीन को उसे साईसी (घोड़े की देखभाल) के काम में लगाना पड़ा और वह तीन वर्ष उसी काम में लगा रहा.

इस बीच जमालुद्दीन ने उसे खिला पिलाकर और मांसल बनाकर उसकी सौन्दर्य-वृद्धि का प्रयास किया और एक दिन उसे गजनी के बाजार में खड़ा कर दिया. मगर गोरी का प्रतिबन्ध लागू होने के कारण किसी ने भी उसे खरीदने की हिम्मत नहीं दिखाई. सभी दूर खड़े-खड़े कामी नजरों से उसे चाटते रहे. तब जमालुद्दीन ने इस सामान को बेचने केलिए प्रत्येक विलासी मुसलमान का दरवाजा खटखटाया पर वह नहीं बिका.

ठीक इसी समय मुहम्मद गोरी का गुलाम गुर्गा कुतुबुद्दीन भी गजनी आया हुआ था. भारत में लूट और काफिरों के कत्लेआम की जिम्मेदारी अब उसी के कंधे पर था. भारत से लूट का माल उसी के माध्यम से गोरी तक पहुँच रहा था. अपने नर और मादा हरम को ठूंसकर भरने केलिए वह मनचाही इंसानी भोग सामग्री खरीद सकता था. इसलिए जब कुतुबुद्दीन इल्तुतमिश के सौन्दर्य पर लट्टू होकर उसे खरीदने केलिए गोरी से अनुमति मांगी तो गोरी उसका निवेदन ठुकरा नहीं सका पर उसका सौदा दिल्ली जाकर करने का आदेश दिया. ज्ञातव्य है कि अपने गुलाम कुतुबुद्दीन को मुहम्मद गोरी ने गुलामों के इसी सौदागर जमालुद्दीन चश्त काबा से ही खरीदा था.

इतिहासकार पुरुषोत्तम नागेश ओक लिखते हैं, “अपने जीवन के अंतिम दिनों में मुहम्मद गोरी अन्दखुद के संग्राम में हिन्दुओं से बुरी तरह हारा था. गक्खर जाति ने उसकी पीठ तोड़ दी थी. उसका गुलाम कुतुबुद्दीन की संयुक्त सेना भी कुछ नहीं कर सकी. इन विपन्न दिनों में जब पुनर्गठित हिन्दू सेनाओं से भयभीत होकर गोरी एक पागल कुत्ते की तरह, एक छोर से दूसरे छोर तक भाग-दौड़ कर रहा था, उसे अल्तमश (इल्तुतमिश) के साहचर्य का आनंद-भोग प्राप्त हुआ. उसने सम्भवतः गोरी से कुतुबुद्दीन की कामुकता की शिकायत की थी, क्योंकि उसने कुतुबुद्दीन को अल्तमश से अच्छा व्यवहार करने को कहा और फिर दासता से मुक्त करने की आज्ञा दे दिया.” 

कुतुबुद्दीन ने इल्तुतमिश को अंगरक्षकों का नायक बना दिया. तबकात-ए-नासिरी के अनुसार कुतुबुद्दीन उसे हमेशा अपने पास ही रखता था. बाद में हिन्दुओं के विरुद्ध विभिन्न अभियानों और मन्दिरों के विध्वंस और लूट में भी इल्तुतमिश साथ रहने लगा जिसके कारण लूट के हिस्से में उसे भाग और जागीर मिलने लगा.

पुरुषोत्तम नागेश ओक लिखते हैं, “पुनर्गठित हिन्दू शक्तियों ने बड़ी सफलता से एक ही साथ दो इंसानी राक्षस गोरी और बख्तियार खिलजी की पीठ तोड़, उनका सफाया कर पृथ्वी का भार हल्का कर दिया था. उन दोनों के विषाक्त जिहादी सांसों ने अहिनस्थान (अफगानिस्तान) से वाराणसी और बंगाल तक भारतवर्ष को तबाह और बर्बाद कर दिया था. दुर्भाग्य से फिर भी काफी देर हो चुकी थी. मुस्लिम दुष्ट दल का सरदार गोरी अपने पीछे अनेक पापी मुस्लिम गुलामों को छोड़ गया था. इनकी जड़ें भारत की पवित्र धरती में गहरी गड़ चुकी थी. इन्ही पापी गुलामों में से एक गुलाम कुतुबुद्दीन अभी (१२१० ईस्वी) मरा ही था कि उसका गुलाम और दामाद इल्तुतमिश मुसलमानों द्वारा अपवित्र दिल्ली के हिन्दू राजसिंहासन पर चढ़ बैठा.”

तबकाते नासीरी के अनुसार दिल्ली और उसके आस-पास के हिन्दू सरदारों ने उसका विरोध किया और दिल्ली से बाहर आकर और गोलाकार रूप में एकत्रित होकर उनलोगों ने बगाबत का झंडा बुलंद कर दिया. इल्तुतमिश और संयुक्त हिन्दू शक्तियों के बीच यमुना तट पर संग्राम हुआ जिसमें न तो इल्तुतमिश को ही विजय मिली और न ही हिन्दू शक्ति उसे पदच्युत कर सकी.

१२२५ ईस्वी में जब इल्तुतमिश ने बंगाल के लखनौती पर हमला कर संघर्षों में घिरा था, उसे राजपूतों द्वारा उनकी अनुपस्थिति का लाभ उठाकर दिल्ली पर कब्जा करने के प्रयास की सूचना मिली तो वह घबरा गया और जैसे तैसे वहाँ संधि समझौता कर दिल्ली चल पड़ा.

१२२६ ईस्वी में उसने रणथम्भोर दुर्ग पर आक्रमण किया और मुंह की खाकर वापस लौटा. १२२७ ईस्वी में उसने मान्डूर दुर्ग पर हमला किया पर यहाँ भी उसे सफलता नहीं मिली. यह दोनों निष्कर्ष इतिहासकार पुरुषोतम नागेश ओक ने तबकाते नासीरी के आधार पर निकाला है. उनका तर्क है कि जब भी मुस्लिम विजय का वर्णन मुस्लिम इतिहासकार करते हैं तो अनिवार्य रूप से (१) मार-काट और लूट-हरण का ब्योरेवार वर्णन पेश करते हैं, (२) ताजा कटी गायों के खून से सारे मन्दिरों को पाक और साफ़ करने का चित्र खींचते हैं, तथा (३) दुर्ग पर मुस्लिम अधिकारी नियुक्त करते हैं. परन्तु इन दोनों युद्धों के बाद के वर्णनों में इस प्रकार का वर्णन इतिहासकार मिन्हाज-उल-सिराज ने नहीं किया है.

१२२९-३० में इल्तुतमिश ने पुनः बंगाल पर हमला किया पर सम्भवतः इसबार भी उसे सफलता नहीं मिली थी. इसके बाद वह ग्वालियर पर धावा बोला और असफल रहा. ग्वालियर विजय के प्रयास से हताश होकर इल्तुतमिश ने अन्य शिकारों की ओर नजरें दौडाई. उसने भोपाल के समीप भिलसा नगर पर हमला किया. मिन्हाज-उल-सिराज लिखता है, “वहाँ एक मन्दिर था जिसे बनाने में तीन सौ वर्ष लगे थे. इल्तुतमिश ने उसे चूर-चूर कर दिया.”

भिलसा को लूटकर और तबाह करने के बाद इल्तुतमिश उज्जैन की ओर बढ़ा. वहाँ उसने भगवान महाकाल के मन्दिर को नष्ट भ्रष्ट कर दिया. मिन्हाज-उल-सिराज लिखता है, “उज्जैन में राजा विक्रमादित्य की एक भव्य मूर्ति थी, जिन्होंने इल्तुतमिश के (१२३४ ईस्वी के) उज्जैन पर आक्रमण के १३१९ वर्ष पूर्व राज किया था और इन्ही राजा विक्रम ने हिन्दू संवत् चलाया था.”

ज्ञातव्य है कि मिन्हाज-उल-सिराज उन्ही उज्जैन के राजा विक्रमादित्य की बात यहाँ कर रहा है जिसे साम्राज्यवादी और उनके गुलाम वामपंथी इतिहासकार मिथकीय चरित्र घोषित कर रखा है.

पुरुषोत्तम नागेश ओक लिखते हैं, “इल्तुतमिश महाकाल के शिवलिंग को उखाड़कर दिल्ली ले आया. साथ ही कुछ ताम्र प्रतिमाएं भी थीं. इन सभी का उसने क्या किया, यह अज्ञात है. मगर मध्यकालीन मुस्लिम जिहादियों के काले कारनामों को देखकर यह अनुमान सहज में ही किया जा सकता है कि उसने उन्हें मस्जिदों में परिवर्तित हिन्दू मन्दिरों की सीढियों में जड़वा दिया होगा.

अपने जन्मस्थान में प्रतिष्ठित भगवान श्री कृष्ण की मूर्ति को भी औरंगजेब ने आगरा की केन्द्रीय मस्जिद की सीढ़ियों में जड़वा रक्खा है. यह मस्जिद भी एक प्राचीन राजपूत महल था. भगवान श्रीकृष्ण के शिक्षा निकेतन संदीपनी आश्रम एवं भक्त कवि भर्तृहरि के मठ आदि उज्जैन के धार्मिक स्थानों को भी मुसलमानों ने अपने हथौड़ों से चूर-चूर कर दिया.”

१२३६ ईस्वी में इल्तुतमिश बीमार पड़ा और अप्रैल में मर गया. उसे महरौली के ध्रुव स्तम्भ परिसर में जहाँ शैतान कुतुबुद्दीन ने विष्णुमन्दिर सहित २७ मन्दिरों को नष्ट कर दिया था उन्ही मन्दिरों के एक तहखाने में गाड़ दिया गया.

इतिहासकार पुरुषोत्तम नागेश ओक लिखते हैं, “पुरातत्व विभाग को इस कक्ष की सारी गंदगी साफ कर तहखाने में प्रकाश की व्यवस्था कर देनी चाहिए ताकि पर्यटक स्वयं यह देख लें की ये मुस्लिम आक्रमणकारी और लुटेरे अपने बनाये मकबरों में नहीं वरन हिन्दू प्रसादों और मन्दिरों के तहखानों में बड़े आराम से सोए हुए हैं.”

आधार ग्रन्थ: भारत में मुस्लिम सुल्तान, खंड-१, लेखक-पुरुषोत्तम नागेश ओक

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