मध्यकालीन भारत

दिल्ली में मध्य एशिया का खूंखार शैतान गुलाम बलबन

balban
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बलबन का जीवन लड़ाई-झगड़े और दंगा-फसाद से भरा हुआ है. वह क्रूर मानव हत्यारा था. दिल्ली के आसपास बार-बार उठने वाली विरोध की आवाज को दबाने केलिए उसने एक लाख मानवों की हत्या की. प्रत्येक शहर में मरी-कटी लाशों का ढेर लग गया, जिसकी सड़ांध से सारे वातावरण में असहनीय दुर्गन्ध व्याप्त हो गई थी. (महाराष्ट्रिय ज्ञानकोष पृष्ठ जी-१९१, भाग-१२)

बलबन तुर्किस्तान की अलबारी का खाकान था. बचपन में ही मुगल लुटेरों ने उसे पकड़ लिया. इन्ही मुगलों से उसने बलात्कार का पाठ पढ़ा, जिसका उपयोग उसने बाद में हिंदुस्तान में लूट, बलात्कार और हत्या का चक्र चलाकर किया. बाद में इसे एक थोक गुलाम व्यापारी ख्वाजा जमालुद्दीन को बेच दिया गया. वह कई अन्य गुलामों को लेकर दिल्ली आया और इल्तुतमिश के हाथों बेच दिया.

इतिहासकार पुरुषोतम नागेश ओक लिखते हैं, “संसार के इतिहास में, गुलामों को बटोरकर, मोटा-ताजा करके मुस्लिम शासकों के हाथों बेच देना मुस्लिम-युग में सबसे लाभदायक धंधा था. इन गुलामों से छोटे-मोटे घरेलू कामों के आलावा, गुदाभोग तथा अंतर्राष्ट्रीय गुंडागर्दी का कार्य भी लिया जाता था ताकि लूट, नरसंहार, विध्वंस और धर्म-परिवर्तन के खम्भों पर टिका मुस्लिम शासन फलता-फूलता रहे.”

इतिहास से सीख नहीं लेने का परिणाम

हिन्दुओं की मुस्लिम आक्रमणकारियों के प्रति अनावश्यक उदारता ने कितनी बड़ी तबाही और बर्बादी लाया इस बात के प्रमाण हम पिछले लेखों में बार बार देते रहे हैं और उनमें से एक सम्राट पृथ्वीराज चौहान द्वारा मोहम्मद गोरी के प्रति प्रकट की गई अनावश्यक उदारता का दुष्परिणाम से भलीभांति सभी लोग परिचित भी हैं. परन्तु दुर्भाग्य से हिन्दुओं ने न पहले और ना ही बाद में अपनी इस मुर्खता से सीख ली थी.

खूंखार नरभक्षी शैतान गुलाम बलबन भी सुल्तान रक्नुद्दीन के समय ही हिन्दुओं के गिरफ्त में फंस गया था और उसे उसके दुराचारों का दंड भी मिला था परन्तु स्वाभाव से उदार होने के कारण हिन्दू लोगों ने इसकी कपटी कसमों पर विश्वास कर की अब वह बुराई से तौबा करेगा और अच्छा मार्ग पर चलेगा, इसे मुक्त कर दिया जिसका परिणाम भयानक हुआ. इसकी बानगी हम पिछले लेख “वामपंथी इतिहासकारों के मुस्लिम प्रेम का भंडाफोड़” में प्रस्तुत कर चुके हैं कि सुल्तान नासिरुद्दीन महमूद का गुलाम सेनापति रहते हुए इसने बीस बरसों तक किस प्रकार पूरे देश में हिंसा, लूट, बलात्कार, अत्याचार, मन्दिर और मूर्तियों के विध्वंस का तांडव मचा रखा था. आगे इस नरपिशाच के सुल्तान बनने पर किये गये वीभत्स कुकृत्यों का ब्यौरा प्रस्तुत कर रहे हैं.

दिल्ली सल्तनत के कर्मचारियों की वेतन उगाही

इतिहासकार पुरुषोत्तम नागेश ओक लिखते हैं, “दिल्ली के मुस्लिम सुल्तान शायद ही कभी अपने कर्मचारियों को वेतन देते थे. मुस्लिम सुल्तान और उनके इस्लामी कर्मचारी हिन्दुओं की लूट से ही अपना पेट पालते थे. दरबारियों को छिना-झपटी केलिए हिन्दू क्षेत्रों की जागीरें मिलती थी. इसे वे अपनी इच्छानुसार दुहते थे, हर्जाना वसूल करते थे या सबकुछ नोच लेते थे. छोटे तबके के सिपाही आवश्यकतानुसार समय समय पर हिन्दू घरों और खेतों पर झपटते और अपना खर्चा चलाते थे. इस लूट के माल में एक हिस्सा सुल्तान का भी होता था, जिससे उसका खर्च चलता था.”

यही हाल गियासुद्दीन बलबन के समय भी था.

सुल्तान बलबन के हिन्दू विरोधी अभियान

पुरुषोत्तम नागेश ओक लिखते हैं, “एक वर्ष तक दिल्ली को बर्बाद करने के बाद, अपने शासन के दूसरे वर्ष बलबन ने दोआब और अवध की ओर अपनी कुल्हाड़ी घुमाई. सारे क्षेत्र को कई भागों में विभक्त कर उसने प्रत्येक भाग के लिए एक एक सैन्य टुकड़ी नियुक्त कर दी. उसने हिन्दू सरदारों और नागरिकों को काट फेंकने का आदेश दे दिया. धर्मान्ध मुसलमानों को चुन-चुनकर इन सैन्य-टुकड़ियों में भरा गया था. इन लोगों को बार बार तोते की तरह रटा-रटाकर विश्वास दिलाया गया था कि हिन्दुओं को हलाल करना सबसे पहला धार्मिक कार्य है और इस्लामी जन्नत को प्राप्त करने केलिए हिन्दुओं की स्त्रियों से बलात्कार कर उनके बच्चों का अपहरण करना एकदम जरुरी है.”

“बलबन के दुराचारी सिपाही बे-लगाम लूट और बलात्कार के खूनी कारनामों को अंजाम देते हुए पवित्र गंगा, यमुना और अवध के चारों ओर पागलों की तरह विचरण करने लगे. भोजपुरी, पटियाली, कम्पिल और जलाली की सैन्य-टुकड़ियों का संचालन अर्द्ध-बर्बर अफगान कर रहे थे.”

“बलबन स्वयं कटिहार (रुहेलखण्ड) की ओर बढ़ा. इस्लामी जन्नत पाने के उपाय में वह प्रत्येक नगर और ग्राम के घरों को जला, भवनों को गिरा, खड़ी फसलों को रौंद, हर आदमी की हत्या करने लगा, हर स्त्री एवं बच्चे को गुलाम बनाने लगा. सारे क्षेत्रों में इस हत्याकांड से क्षत विक्षत शरीर पड़े सड़-गल रहे थे. इतिहासकार बरनी कहता है कि इस भयकारी नाटक का ऐसा आतंक विद्रोही हिन्दुओं के दिल पर बैठ गया कि हमेशा-हमेशा केलिए उनका साहस टूट गया. अगर सभी हिन्दू पुरुषों को मारकर उनकी स्त्रियों एवं बच्चों को मुसलमान बनाने के लिए बटोर लिया गया हो तो उस क्षेत्र में हिन्दू-विरोध जीवित ही कैसे रह सकता है.”

दिल्ली सल्तनत के समय पकड़ी गई हिन्दू, बौद्ध, जैन स्त्रियों के क्रय-बिक्रय का बाजार

बुंदेलखंड और राजपुताना को भी शैतान बलबन ने रौंदने की कोशिश की पर बुंदेलों और राजपूतों ने उन्हें छठी का दूध याद करा दिया.

बंगाल विजय पर भयानक नरसंहार

बलबन ने बंगाल विजय केलिए अवध के शासक अमिन खान को भेजा पर वह हारकर वापस आ गया तो बलबन ने उसे मारकर उसकी लाश को अयोध्या के द्वार पर लटकवा दिया और खुद सेना लेकर बंगाल पर चढ़ गया. उसने लखनौती के शासक को खदेड़ते हुए ढाका में जाकर पकड़ा और फिर उसे हाजी नगर लाकर मार दिया.

इसके बाद राजधानी लखनौती पहुंचकर उसने भयानक इंतकाम लिया. पुरुषोत्तम नागेश ओक लिखते हैं, “शहर के बीच में दो मिल लम्बे बाजार की सड़क के दोनों ओर लोगों को शूल की नोक में भोंककर, शूल का दूसरा हिस्सा जमीन में गाड़ दिया गया. शूल में धंसी, सूली पर चढ़ी और अधर में लटकी लाशों से बंदनबार से बंध गई. सड़क के दोनों ओर खड़े लैम्प-पोस्टों सा दृश्य हो गया. इस खौफनाक दृश्य को देखकर ही कुछ लोग बेहोश हो जमीन पर गिर गये.”

बरनी कहता है, “इससे पहले लोगों ने ऐसा खौफनाक दृश्य कभी भी नहीं देखा था.” बलबन ने अपने बेटे बुगरा खान को बंगाल का शासन भार सौंप दिल्ली लौट गया. मुस्लिम अत्याचार के बलबन नामक हैजे से अन्य अछूते हिन्दू क्षेत्र भी बर्बाद हो जाते अगर मंगोल आक्रमणकारियों की नंगी तलवार बलबन-राज्य के पश्चिमी छोर पर लटकती न होती. लाहौर तक भारत का उत्तरी क्षेत्र मुस्लिम हाथों से निकलकर मंगोलों के हाथों में चला गया था. मंगोलों से लड़ते हुए ही बलबन का बड़ा बेटा मुहम्मद मारा गया था जिसके गम ने बलबन को पागल बना दिया.

५२ वर्ष बाद शैतान के शासन का अंत

मृत शैतान बलबन

पुरुषोत्तम नागेश ओक लिखते हैं, “बड़े पुत्र की मृत्यु से संतप्त बलबन को एक दूसरा रोग लग गया. जिन लाखों लोगों को उसने सताया, भोगा और मारा था उनकी भायानक यादों ने उसे घेर लिया. अपने नारकीय जीवन के अंतिम कुछ महीनों में वह सोते-सोते ही एकाएक बड़े जोरों से प्रलाप करने, गला फाड़कर चीख उठने या दहाड़ें मार-मारकर रोने लगता था.”

“अपने अंत को समीप जानकर उसने छोटे बेटे बुग्रा खान को बंगाल से अपने पास रहने केलिए बुलाया पर एक शैतान का बेटा भला पितृभक्त हो सकता है? वह कुछ दिन रहकर वापस बंगाल चला गया. क्षुब्ध होकर बलबन ने मुहम्मद के बेटे कैखुसरो को अपना उत्तराधिकारी बनाकर १२८७ ईस्वी के मध्य मर गया. १२३५ से १२८७ ईस्वी तक का बलबन का शासन सचमुच एक शैतान का नंगा खूनी नाच था, जिसके एक हाथ में मशाल थी और दूसरे में नंगी तलवार.”

मुख्य स्रोत: भारत में मुस्लिम सुल्तान, भाग-१, लेखक: पुरुषोत्तम नागेश ओक

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