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क्या अर्बस्थान, अफ्रीका और यूरोप ही पौराणिक असुर लोक था?

Asur-Lok
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(एतिहासिक रिसर्च पर आधारित लेख)

क्या आप जानते हैं पौराणिक असुर और दानव कहाँ रहते थे?

आइये एतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर ढूंढने की कोशिश करते हैं. भारतवर्ष में उपलब्ध प्राचीन इतिहास के अनुसार महर्षि कश्यप की तिन प्रमुख पत्नियाँ थी दिति, अदिति और दनु जो दक्ष प्रजापति की पुत्रियाँ थी. महर्षि कश्यप की पत्नी दिति से दैत्य अथवा असुर जातियां, अदिति से देव जातियां और दनु से दानव जातियां उत्पन्न हुई. अतः असुर, दानव और देवता, आपस में भाई थे.

असुरों और सुरों में सत्ता केलिए संघर्ष और अहम की लडाई होती रहती थी. देव जातियां असुरों और दानवों के साथ निरंतर कलह से तंग आकर सम्भवतः किसी ऐसे प्रदेश में अपना लोक बसा लिए थे जहाँ मानवों का पहुंचना असम्भव (दुरूह) था पर असुर और दानव शक्तिशाली और मायावी होने के कारन सुरलोक तक पहुँच जाते थे. वैचारिक मतभेद और विपरीत प्रकृति के बाबजूद सुरों और असुरों की संस्कृति में बहुत ज्यादा अंतर नहीं था. दानवों, असुरों और देवताओं में विवाह सम्बन्ध भी होते थे. बाद में मानव जब विकास मार्ग पर आरूढ़ हो ज्ञान, विज्ञान में श्रेष्ठ हो गये तो मानवों को तुच्छ समझने वाले असुर और दानव मानवों के साथ भी वैवाहिक सम्बन्ध बनाने लगे.

असुरों और दानवों का प्रसार मुख्यतः अर्बस्थान, यूरोपीय और अफ्रीकन देशों में दिखाई पड़ता है. असुरों और दानवों का क्षेत्र काश्यपीय सागर (Caspian Sea) के निचे अरब प्रायद्वीप तक था इस बात के बहुत साक्ष्य उपलब्ध हैं. कुछ इतिहासकारों का मत है कि दिति के पुत्र दैत्यराज हिरण्यकश्यप की प्रारम्भिक राजधानी सिंध के ब्राह्मणावाद में था, काश्पीय क्षेत्र में वह दिग्विजय के बाद और दानवों दैत्यों का संयुक्त सम्राट बनने के बाद गया. दनु के पुत्र दानवों का काश्पीय क्षेत्र मूल निवास स्थान था.

मानवों का उत्थान और संस्कृतियों के मेल के बाद दानव और असुर जातियां भारतीय उपमहाद्वीप के अन्य भागों में भी बस गये. हालाँकि कुछ वामपंथी इतिहासकार हडप्पा सैन्धव सभ्यता को वैदिक युग से प्राचीन और असुरों की सभ्यता भी साबित करने की नाहक कोशिश करते रहे हैं जिसका अंत आर्यों के आक्रमण सिद्धांत पर होता है जो अब झूठ, मनगढ़ंत और सम्राज्यवादी षड्यंत्र साबित हो चूका है. अगर असुर सिंध क्षेत्र के मूल निवासी होंगे भी तो वह प्रारम्भिक वैदिक काल में होंगे, सैन्धव सभ्यता तो इन्ही इतिहासकारों के अनुसार सिर्फ दो से चार हजार ईस्वी पूर्व की है. दूसरी ओर कुछ कथाकार, धर्माचार्य भी हैं जो पूरा ब्रह्माण्ड भारतवर्ष में ही ढूंड लेते हैं.

१.    यूरोप में दैत्य या दानव वंश

आयरलैंड

आयरलैंड के ताराहिल पर स्थित प्राचीन शिवलिंग

आयरलैंड की काउंटी मीथ में एक तारा हिल है. इसी इलाके में दुनिया के सबसे रहस्यमय शिव लिंग है जिसे पत्थर के चौड़े ईंटों का घेरा बनाकर उसे स्थापित किया गया था. कब स्थापित किया गया था, इसके बारे में लोगों को सही सही अंदाज नहीं है. वहां के लोग इसे रहस्यमय पत्थर के रूप में जानते हैं. इसे लिआ फैल (भाग्य का पत्थर) कहा जाता है. लोग इसकी पूजा करते हैं.

1632 से 1636 ईसवीं के बीच फ्रांसीसी भिक्षुओं के एक प्राचीन दस्तावेज – द माइनर्स ऑफ द फोर मास्टर्स के अनुसार, कुछ खास जादुई ताकत रखने वाले एक ग्रुप के नेता “तुथा डि देनन” (किसी दानव के नाम का यूरोपीय अपभ्रंश) ने इसे स्थापित किया था. “तुथा डि देनन” का मतलब होता है देवी दनू के बच्चे. उन्होंने 1897 बीसी से 1700 बीसी तक आयरलैंड पर शासन किया था. यह इतना महत्वपूर्ण पत्थर था कि 500 ईस्वी तक सभी आयरिश राजाओं के राज्यभिषेक यहीं पर किया गया. (500 ईसवी में ईसाई आक्रमणकारियों ने आयरलैंड पर अधिकार कर लिया उसके बाद यह प्रथा बंद हो गई)

यूरोपीय परंपरा में देवी दनू एक नदी देवी थी. देन्यूब (डेन्यूब), दोन, डनीपर और डिनिएस्टर नदियां दनु अथवा दानव के नाम पर ही रखी गयी है. वैदिक परंपरा में दनू देवी का जिक्र मिलता है, जो दक्ष की बेटी और कश्यप मुनि की पत्नी थीं जो नदियों की देवी थीं. वैदिक परंपरा को मानने वालों के लिए लिआ फैल नाम शिवलिंग से बहुत मेल खाता है. (लिआ फैल शिव लिंग का यूरोपीय अपभ्रंश हो सकता है)

हाल के वर्षों में आयरलैंड के इस शिवलिंग को कई बार नुकसान पहुंचाने की कोशिश की गई. जून 2012 में एक व्यक्ति ने पत्थर पर 11 बार आक्रमण किया. फिर, मई 2014 में किसी ने सतह पर लाल और हरा रंग डालकर खराब करने की कोशिश की. स्रोत- (स्रोत:https://hindi.news18.com/news/knowledge/truth-about-shiv-ling-in-ireland-britain-2656285.html )

जर्मनी

जर्मन लोग अपने देश को Deutschland (डाइत्श लैंड) कहते हैं जो संस्कृत दैत्य स्थान का अपभ्रंश है. The German term Deutschland, originally diutisciu land (“the German lands”) is derived from deutsch, descended from Old High German diutisc “of the people” (from diot or diota “people”). स्रोत-Wikipedia-“Germany”.

Duetch, Diot, Diota आदि दैत्य शब्द के ही अपभ्रंश हैं. (स्रोत-वैदिक विश्वराष्ट्र का इतिहास और http://oldisrj.lbp.world/UploadedData/4692.pdf )

Ancient humans were present in Germany at least 600,000 years ago. Similarly dated evidence of modern humans has been found in the Swabian Jura, including 42,000-year-old flutes which are the oldest musical instruments ever found and the 40,000-year-old Lion Man. (Wikipedia “Germany”)

४०००० वर्ष पुराणी नृसिंह की मूर्ति जर्मनी में प्राप्त हुई

जर्मनी में ६ लाख वर्ष पहले मानव की उपस्थिति प्रारम्भिक मानव के वंशज को निर्देशित करता है. ४२००० वर्ष पुरानी बांसुरी जिसकी उत्पत्ति क्षेत्र भारतवर्ष निर्विवाद रूप से है तथा ४०००० वर्ष पुरानी नृसिंह भगवान की मूर्ति दोनों जर्मनी में वैदिक आर्य संस्कृति के द्योतक हैं. Tacitus नाम के एक प्राचीन ग्रीक इतिहासकार लिखता है कि जर्मन लोग प्रातः उठते ही प्रथम शौच और मुखमार्जन करते हैं जो निश्चित ही पूर्ववर्ती लोगों की प्रथा है. वे लम्बे, ढीले वस्त्र परिधान धारण करते हैं और लम्बे बाल रखकर सिर के उपर बालों की गांठ बांधते हैं जो ब्राह्मणों की प्रथा है. (पृष्ठ ६३ खंड १, Annals and antiquities of Rajsthan, by James Tod).

Tacitus यह भी लिखता है की “९ वीं सदी में अगस्टस के नेतृत्व में ईसाईयों के हमले के पूर्व जर्मन लोग मुख्यतः राईन और डेन्यूब नदी के किनारे बसे हुए थे.” डेन्यूब नदी के किनारे दनु के वंशज बसे हुए थे.

जर्मनी में जो स्वास्तिक प्रचलन में है वह बायीं तरफ मुड़ा होता है. हालाँकि हजारों वर्ष बाद भारतीय उपमहाद्वीप में मानवों और असुरों का घालमेल होने के कारन भारत में भी यदा कदा बायीं तरफ मुड़ा स्वास्तिक मिल जाता है पर बायीं तरफ मुड़ा स्वास्तिक मुख्य रूप से असुर और दानव ही प्रयोग करते थे क्योंकि वे वाममार्गी थे. अर्बस्थान के मक्का में भी (मुसलमान) लोग हजारों वर्षों से दाहिने से बायीं ओरवाली परिक्रमा करते आ रहे हैं क्योंकि अर्बस्थान असुरों के प्रभाव वाला प्रदेश था.

स्कैंडिनेविया

शिवपुत्र स्कन्द, मुरुगन या कार्तिकेय

एडवर्ड पोकोक अपने ग्रन्थ India in Greece के पृष्ठ ५३ पर लिखते हैं कि यूरोपीय क्षत्रिय, स्कैंडिनेविया के क्षत्रिय और भारतीय क्षत्रिय सारे एक ही वर्ग के लोग है. पी एन ओक लिखते हैं कि स्कैंडिनेविया वास्तव में “स्कन्दनावीय” है जो दैत्यों से लडाई के समय शिवपुत्र “स्कन्द की नावसेना” का बेस क्षेत्र या छावनी था.

शंड नामक दानव ने स्कैंडिनेविया बसाया था. हालैंड देश के निवासी भी डच (Deutch) यानि दैत्य कहलाते हैं. होलैंड के लोगों केलिए एक और शब्द है Demonym जो Demon अर्थात दानव से ही बना हुआ लगता है. Netherland के आगे A लगा दें तो संस्कृत शब्द अंतर्स्थान बनता है. Netherland समुद्र तल से निचे है इसलिए वहां समुद्र को स्थलीय भाग पर आने से रोकने केलिए विशेष उपाय किए गये हैं. पुराणों में कहा गया है कि नारद मुनि दैत्यलोक गये जो गुप्तस्थान (Netherworld) था. नारद मुनि ने दैत्यलोक को स्वर्ग से भी सुंदर बताया है.

पुराणों में दनु और मर्क का उल्लेख आता है. दनु दानवों की माता थी और मर्क हिरण्यकश्यप का पुरोहित और प्रह्लाद का शिक्षक था जिनकी शिव के पुत्र स्कन्द से लडाई होती रहती थी. उसी दानव मर्क की स्मृति डेनमार्क देश के नाम में है. कुछ विद्वानों का मत है कि दानव मर्क ने ही डेनमार्क बसाया था. कोलाहल युद्ध में शुक्राचार्य का पुत्र शंड एवं मर्क का वध हुआ था. (स्रोत-वैदिक विश्व राष्ट्र का इतिहास, भाग-३ और पेज ५, http://oldisrj.lbp.world/UploadedData/4692.pdf )

The etymology of the name “Denmark”, the relationship between “Danes” and “Denmark”, and the emergence of Denmark as a unified kingdom are topics of continuous scholarly debat. This is centered primarily on the prefix “Dan” and whether it refers to the Dani or a historical person Dan and the exact meaning of the -“mark” ending. (Wikipedia-“ Denmark”)

उपर्युक्त से स्पष्ट है किसी यूरोपीय लोगों और खुद डेनमार्क के लोगों को डेनमार्क शब्द की उत्पत्ति के बारे में पता नहीं है. वे Danes शब्द से उत्पत्ति ढूढ़ते हैं फिर Mark (मर्क) में फंस जाते हैं. विकिपीडिया के अनुसार “The Danes were a North Germanic tribe inhabiting southern Scandinavia, including the area now comprising Denmark.” एक ग्रीक लेखक ने लिखा है Dane दानव ही थे अर्थात दानव के वंशज थे.

The Theogony of the Hindus में कौन्ट विअन्स्तिअर्ना लिखते हैं कि “महाभारतीय युद्ध से पूर्व ही हिन्दू लोग स्केंडिनेविया में जा बसे थे. स्केंडिनेविया के लोगों की पौराणिक कथाएं भी वैसी ही है जैसे हिन्दुओं की.”

हिन्दू से तात्पर्य आर्य संस्कृति के लोग जो दानव और असुर भी हो सकते हैं क्योंकि उनमे और मानवों की संस्कृति में वैचारिक मतभेद था संस्कृति लगभग समान थी. ईरान का वेद जेंदा (अवेस्ता) की तरह स्केंडिनेविया में भी पवित्र ग्रन्थ “एद्दा” है जो वेद शब्द का ही अपभ्रंश है और इसमें वेद का ही विकृत अवशेष अभी तक बचा हुआ है. इसका कारन यह है कि स्केंडिनेविया पर ईसाईयों का हमला बहुत बाद में हुआ था जो लगभग ३०० वर्षों तक चला. डेनमार्क ने १५० वर्ष, नार्वे और आईसलैंड लगभग २०० वर्ष और स्वीडन ने ३०० वर्ष ईसाई आक्रमणकारियों से कठिन संघर्ष किया था.   

Sanskrit and its kindred Literatures-Studies in Comparative Mythology ग्रन्थ में लॉरा लिखती है कि “स्केंडिनेविया के Norse लोगों को सैकड़ों वर्ष बाद ईसाई बनाया गया. अतः उनकी विश्वोत्पति सम्बन्धी धारणाएं तथा पौराणिक कथाएं आदि मूलरूप में सुरक्षित हैं. दो एद्दा उनके पवित्र ग्रन्थ हैं. एक पद्य में है और दूसरा गद्य में. वे उसी प्राचीन norse (इंडो-यूरोपियन) भाषा में लिखे हुए हैं जो स्केंडिनेविया के चारों शाखाओं में बोली जाती थी. पद्य एद्दा अधिक प्राचीन है, उसमें ३७ मंडल हैं. उनमें से कुछ आध्यात्मिक हैं जो विश्वोत्पति का वर्णन करता है अन्य अध्यायों में देव और मानवों के आपसी व्यवहार तथा प्रादेशिक ख्यात व्यक्तियों का इतिहास है.”

यूरोप के सर्वाधिक भूभाग पर बसनेवाले प्राचीन केल्टिक योद्धा, फोटो साभार गूगल सर्च

इतिहासकार पी एन ओक लिखते हैं “स्केंडिनेविया में दफन शिलाओं पर Assur नाम कई बार लिखा मिलता है. वह इस कारन की यूरोप में दानव, असुर उर्फ़ दैत्य लोगों का ही शासन था. स्वीडन में उपशाला नाम का विशाल स्वर्ण मन्दिर था. १०७० ईसवी तक उसमें त्रिमूर्ति Thor, Odin और Frey (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) की पूजा होती थी,  यज्ञ होता था, प्रसाद चढ़ाया जाता था. यहाँ प्रति नौ वर्ष पर उत्सव मनाया जाता था. उसके बाद ईसाई आक्रमणकारियों ने इस मन्दिर को नष्ट कर वहां ईसाई ध्वज फहरा दिया.”

उपर के उदहारण से स्पष्ट है कि समय के साथ असुर, दानव और देवताओं की लडाई खत्म हो गयी थी. और सभी वैदिक आर्य संस्कृति को मानने लगे थे जो सर्वश्रेष्ठ था. तथापि अपने अतीत के स्थानीय इतिहास को भी संजोकर रखे हुए थे. संस्कृतियों का यह मेल परवर्ती भारतवर्ष में भी दिखाई पड़ता है. हालाँकि यहाँ यह भी हो सकता है कि भारतवर्ष से ही कुछ लोग स्केंडिनेविया में जाकर बसे हों जो दनु के वंशजों के साथ घुलमिल गये हों.

२.    अरब और अफ्रीका में असुर दानव

अर्बस्थान

कैस्पियन सागर के दक्षिणपूर्व में एस्ट्राबाद नामक आधुनिक नगर के पास प्राचीन नगर हिरकेनिया था. इसका प्राचीन नाम हिरण्यपुर था. यह नाम कश्यप ऋषि और दिति के पुत्र हिरण्यकश्यप के नाम पर पड़ा माना जाता है. राजा बलि का महल ‘सुतल’ सम्भवतः ट्रांसकैस्पियन जनपद में था. (page-5, http://oldisrj.lbp.world/UploadedData/4692.pdf)

असुर बनिपाल

कश्यप ऋषि का आश्रम काश्यपीय सागर के कहीं निकट ही था. काश्यपीय सागर के आसपास ही असीरिया (असुर प्रदेश) है. महाभारत काल में एक मितन्नी वंश का भी वर्णन आता है जो बाद में अरब की और पलायन कर गया था. अरब में लगभग 500 वर्ष तक मितन्नी वंश के राजाओं का शासन रहा जो की अहुर (असुर) वंश के थे. इनके नाम है:

तुष्यरथ (दशरथ)

असुर निराही II

असुर दान I

असुर नसिरपाल I

असुर बानिपाल I

असीरिया का ही एक राजा असुर बेनीपाल इराक तक के क्षेत्र पर कब्जा कर लिया था. असुर बेनीपाल की मूर्ति आज भी इराक के एक संग्रहालय में रखा हुआ है. सीरिया, इराक, जॉर्डन, इजिप्त के आसपास असुर राज करते थे.

दनु के पुत्र दानव भी आस पास ही रहते थे. हयग्रीव उसमें सबसे शक्तिशाली था. हयग्रीव का मतलब होता है घोड़े जैसा मुख या गर्दन वाला. दनु के अन्य चार पुत्रों के नाम भी घोड़ा शब्द से शुरू होता है-अश्वगिरी, अश्वपति, अश्वसंकू और अश्वसिरास. अर्ब का मतलब भी घोड़ा होता है. अतः यह सम्भव है कि अरब प्रदेश का अर्बस्थान नाम इन दानवों के नाम पर ही पड़ा हो. हालाँकि कुछ विद्वान अर्बस्थान के नामकरण का इतिहास असुरों और दानवों के गुरु शुक्राचार्य की कहानियों से भी जोड़ते हैं.

सन २०० ईसापूर्व के इतिहासकार बेरोसस ने लिखा कि दैत्यों का एक दल पूर्व की ओर से समुद्र-मार्ग से फारस की खाड़ी में पहुंचा. इसका नेता ओएनस (उषनस अर्थात शुक्राचार्य) था. अपने साथ उन्नत तकनीक लेकर आनेवाले इन लोगों के प्रति सुमेरियनों की कृतज्ञता इस स्वीकारोक्ति में देखी जा सकती है कि इन आनेवाले विलक्षणलोगों ने ही धातुविद्या, कृषि और लेखन आदि का प्रसार किया और उन सभी चीजों का आरम्भ किया जो उन्नत जीवन केलिए आवश्यक है. (The Sumerians, Oxford, Writer-Wooley, C Leonard, Page-189)

बेबिलोनिया में नरसिंह अवतार हुआ था और बाइबिल के Genesis यानि जन्म अथवा आरम्भ XI-7 नाम के भाग में इसका उल्लेख है. एसा थॉमस मॉरिस का मानना है. उन्होंने अपने ग्रन्थ में लिखा है कि इसमें कोई संदेह नहीं की जब मानवजाति तितर-बितर हुई तब जो लोग ईजिप्त में गए वे उस भयंकर (नरसिंह अवतार की) इतिहास की स्मृतियाँ साथ ले गए. उनका वही (नरसिंह) नाम था जो भारतीय परम्परा में है. (The History of Hindustan, its arts and its sciences as connected with the history of the other great empires. Writer-Thomas Maurice, Republished by Navrang, New delhi, 1974)

नृसिंह अवतार असुर हिरण्यकश्यप के वध केलिए उसके राजभवन या महल में हुआ था. बेबिलोनिया अर्बस्थान में ही मोसेपेटेमिया का नगर था जो आज इराक कहा जाता है. अतः अगर उपर्युक्त बातें सत्य है तो असुरों का राज्य इससे भी अरब प्रदेश में सिद्ध होता है.

अफ्रीका

पुराणों में वर्णन है कि राजा बलि से वामन भगवान ने तिन पग जमीन माँगा था और दो पग में ही तीनों लोक-देवलोक, मानव लोक और असुर लोक नाप लिए थे. अतः तीसरा पग उन्होंने राजा बलि के सिर पर रख दिया और उन्हें असुर लोक से पाताल लोक भेज दिया. बहुत से विद्वानों का मानना है कि पाताल लोक शंखद्वीप (अफ्रीका) का आधुनिक अबीसीनिया (इथोपिया) है.

अबीसीनिया के निवासी भी खुद को सिन्धु नदी के किनारे से आकर बसे हुए मानते हैं. आप-सिन्धु का अपभ्रंश ही आबसिन है. इसी से अफ्रीका का अबीसीनिया देश का नाम पड़ा है. Eusebius नाम के ग्रीक इतिहासकार ने India as seen and known by Foreigners पुस्तक में लिखा है कि सिन्धु नदी के किनारे रहनेवाले लोग ईजिप्त के समीप इथिओपिया (अबीसीनिया) प्रदेश में आकर बसे.

इससे लगता है सिन्ध क्षेत्र के जो दैत्य (दिति के पुत्र) लोग हिरण्यकश्यप या शुक्राचार्य के साथ आकर काश्पीय क्षेत्र में बसे वही लोग हिरण्यकश्यप के पौत्र राजा बलि के समय में वामन भगवान के शर्तों के अनुसार अबीसीनिया में जाकर बस गये होंगे.

इन्ही दैत्यों के वंशज थे रावण के नाना और मामा माली और सुमाली जिनके नाम पर अफ्रीका में माली और सोमालिया देश है. ये श्रीलंका में रहते थे परन्तु कुबेर द्वारा श्रीलंका पर अधिकार करने के कारन ये भागकर वापस पाताल लोक आ गये थे. यह वह समय था जब मानव अपनी तपस्या (मेहनत) और वैज्ञानिक अनुसन्धान के बल पर दैत्यों और दानवों से टक्कर लेने लगे थे. वैसे तो दैत्य और दानव भी आर्य (श्रेष्ठ) खून ही थे परन्तु अपने कर्मों से पतित हो गये थे. इसलिए पुनः आर्य रक्त से उत्पन्न पुत्र की प्राप्ति केलिए माली और सुमाली ने अपनी पुत्री और बहन कैकसी को महर्षि पुलस्त्य के पुत्र वृश्रवा के पास पुत्र प्राप्ति केलिए भेजा.

महर्षि पुलस्त्य का कार्यक्षेत्र वर्तमान पेलेस्टाईन (फिलिस्तीन) में था. वहीँ उनका आश्रम था और वृश्रवा वहीँ रहते थे. कैकसी से उनके तिन पुत्र रावण, कुम्भकरण और विभीषण तथा पुत्री सूर्पनखा हुई. रावण की मृत्यु के बाद शंखद्वीप (अफ्रीका) का समस्त उपरी भाग श्रीराम के पुत्र कुश के अधीन आ गया. इथियोपिया के पाठ्यपुस्तकों में कुछ सौ वर्ष पहले तक इथियोपिया के लोगों को कुशाईट अर्थात कुश की प्रजाजन पढ़ाया जाता था और कुश के पिता को हाम (राम का अपभ्रंश) बताया जाता था.

इतिहासकार पी एन ओक लिखते हैं “वहां के क्रिश्चयन, हब्शी सम्राट स्वर्गीय हेल सलासी को भारत के एक स्वामी कृष्णानंद ने एक अनोखी पवित्र वस्तु कहकर जब रामायण की प्रति भेंट की तो हेल सलासी ने यह कहकर कृष्णानंद को चकित किया की “हम अफ़्रीकी लोगों को राम की जानकारी कोई नई बात थोड़े ही है. हम सारे कुशाईट हैं.” उस भेंट के पश्चात स्वामी कृष्णानंद ने बाजार से शालेय इतिहास की कुछ पुस्तकें खरीदकर उन्हें बड़ी उत्कंठा से पढ़ा तो उसमे स्पष्ट लिखा था की अफ़्रीकी लोग कुशाईट हैं.”

Origin of the Pagan idols नाम के ग्रन्थ के भाग ४, अध्याय ५, पृष्ठ ३८० पर Rev. Faber लिखते हैं कि “गाल प्रदेश (फ़्रांस, स्पेन, पुर्तगाल और स्विटजरलैंड) और ब्रिटेन के सेल्ट उर्फ़ केल्ट लोगों का धर्म वही था जो हिन्दुओं का या ईजिप्त के लोगों का था. Cananites, Phrygians Greeks तथा रोमन लोगों का भी वही धर्म था. Phoenicians, Anakim, Philistine, Palli तथा इजिप्तिशियन लोगों के राजा लोग सारे कुश के वंशज होने से कुशाईट कहलाते थे. उन्ही को Septuagent के अनुवादकों ने इथियोपियंस भी कहा है. ग्रीक भाषा में इथियोपियंस का अर्थ होता है काले किन्तु हब्शी नहीं.”

मेरा मानना है इटली के Etruscan, यूरोप के Druids, केल्ट या सेल्ट, अरब के असीरिया, मेसोपोटामिया, सऊदी अरब के पैगन, अफ्रीका के कुशायिट्स आदि वैदिक आर्य संस्कृति के लोग दानवों या असुरों के वंशज वहां मूलनिवासी भी हो सकते हैं, हालाँकि, मैं इस मत का खंडन नहीं करता हूँ कि वे लोग भारत से निकलकर उन क्षेत्रों में बसे भारतीय लोगों के वंशज थे.

इटली के Etruscan लोगों की एक देवी

दानवों और असुरों के देव महादेव

महादेव असुरों और दानवों के सबसे प्रिय देवता थे और शिवलिंग यूरोप और अरब के देशों में कई स्थानों पर स्थापित थे. दुनियाभर में शिव की पूजा का प्रचलन था, इस बात के हजारों सबूत बिखरे पड़े हैं. हाल ही में इस्लामिक स्टेट द्वारा नष्ट कर दिए गए प्राचीन शहर पलमायरा, नीमरूद आदि नगरों में भी शिव की पूजा के प्रचलन के अवशेष मिलते हैं. इसके अतिरिक्त इन जगहों में भी शिवलिंग हैं:

– तुर्किस्तान के शहर में बारह सौ फुट ऊंचा शिवलिंग है.

– हेड्रोपोलिस शहर में तीन सौ फुट ऊंचा शिवलिंग है.

– कारिथ,ग्रीस में पार्वती का मंदिर है.

– इजिप्ट का सुप्रसिद्ध स्थल और आयरलैंड का धर्मस्थल शंकर का स्मारक लिंग ही है.

– अलेक्जेंड्रिया में अंतर्राष्ट्रीय शिव तीर्थस्थल था. यूरोपीय इतिहासकारों के अनुसार अलेक्जेंडर भारत की ओर बढने से पहले इस शिव तीर्थस्थल का दर्शन किया था.

-मक्का में मक्केश्वर महादेव की पूजा जगत प्रसिद्ध है.

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83 thoughts on “क्या अर्बस्थान, अफ्रीका और यूरोप ही पौराणिक असुर लोक था?

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