अज्ञानता बुद्धिजीवी होने की निशानी नहीं है। सनातनी संस्कार के कारण अक्सर हिन्दुओं (हिन्दू, बौद्ध, सिक्ख, जैन) के मुंह से सुनते हैं सभी धर्म एक समान है। सभी धर्म प्यार, मोहब्बत और इंसानियत की शिक्षा देते हैं। कोई भी धर्म हिंसा नहीं सिखाता, आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता। अल्लाह, ईश्वर, गॉड सब एक है आदि।
ऐसा वही लोग कहते हैं जो सच्चाई से अनभिज्ञ होते हैं। जिन्हें इसाईयत और इस्लाम का इतिहास पता नहीं होता है। जो अरब और यूरोप का इतिहास नहीं जानते हैं और जिन्होंने कुरान और हदीस नहीं पढ़ा है। अगर वे पढ़े होते कि यूरोप, अफ्रीका और अमेरिका में इसाईयत कैसे फैला; अरब, मध्य एशिया और भारतवर्ष में इस्लाम कैसे फैलाया गया या उन्हें यह बात बताया गया होता तो वे मूर्खों की तरह वैसी बातें नहीं करते। इतिहास छोड़िये, अगर उन्हें वर्तमान वैश्विक घटनाओं की जानकारी होती तो भी शायद वे ऐसा नहीं कहते। ऐसे लोगों को कम से कम इस्लाम और इसाईयत का संक्षिप्त इतिहास निचे के लिंक पर पढ़ लेना चाहिए।
मेरा मानना है ज्योतिराव गोविंदराव फुले भी ऐसे ही बुद्धिजीवी और समाज सुधारक थे जो सत्य से सर्वथा अनभिज्ञ, इसाईयत और इस्लाम की सच्चाई और इतिहास से बिलकुल अंजान, अपनी अज्ञानता को ही बुद्धिजीविता का पर्याय मानकर आत्ममुग्ध थे। वे पूर्वाग्रह से ग्रस्त अपनी सोच को ही सच्चाई और इतिहास मान बैठे थे जिसका भयानक दुष्परिणाम पाकिस्तान, बांग्लादेश सहित अवशेष भारत के दलित हिन्दुओं, बौद्धों को भी भुगतना पड़ा और अभी भी भुगत रहे हैं। इस विषय पर हम विस्तार से आगे चर्चा करेंगे पहले उनका परिचय और उनके सामाजिक, धार्मिक और राजनितिक विचारों को जानना जरुरी हैं।
ज्योतिराव गोविंदराव फुले का परिचय
ज्योतिराव गोविंदराव फुले का जन्म 11 अप्रैल सन् 1827 को पुणे में हुआ था। कोल्हापुर के पास ही एक पहाड़ी पर देवता ज्योतिबा का मंदिर है। इन्हें जोतबा भी कहते हैं। यह हिन्दू धर्मावलंबियों का पवित्र तीर्थ है। वस्तुतः भगवान शिव के तीनों स्वरूपों को ज्योतिबा (जोतिबा) देवता के नाम से अभिव्यक्त किया गया है। ये बहुत से मराठों के कुल देवता हैं।
जिस दिन फुले का जन्म हुआ उस दिन जोतबा देवता का उत्सव था इसलिए उनका नाम जोतिबा रखा गया। उनके पिता का नाम गोविंद राव फुले, माता का नाम विमला बाई एवं धर्मपत्नी का नाम सावित्री बाई फुले था। वे 19वीं सदी का महान समाज सेवक एवं सुधारक माने जाते हैं। उन्होंने तत्कालीन भारतीय समाज में व्याप्त कई विसंगतियों को दूर करने के लिए सतत् संघर्ष किया। ईसाईयों ने ज्योतिबा फुले को धर्मांतरण के लिए उकसाया और अपने साँचे में ढालने का प्रयास किया परंतु उन्होंने ईसाई मत ग्रहण किया था इसका कोई प्रमाण नहीं है।
ज्योतिबा फुले का सामाजिक और धार्मिक विचार
1. वे जाति-व्यवस्था का पूर्ण विरोध करते थे। चातुर्वर्ण्य व्यवस्था को अन्यायपूर्ण, अमानवीय और शोषणकारी मानते थे। उनका मानना था कि जाति जन्म से नहीं, बल्कि सामाजिक शोषण का उपकरण है। वे शूद्रों-अतिशूद्रों को भारत का मूल निवासी मानते थे, जिन्हें आर्य-ब्राह्मणों ने गुलाम बनाया। सभी मनुष्य जन्म से समान हैं—यह फुले का केंद्रीय सिद्धांत था। शिक्षा, सम्मान और अधिकारों पर किसी एक जाति या वर्ग का एकाधिकार नहीं होना चाहिए।
2. उन्होंने ब्राह्मणवादी धर्म, जिसे वे आर्य धर्म कहते थे, की आलोचना की। फुले ने वेद-पुराण आधारित ब्राह्मणवादी धर्म को शोषण की व्यवस्था बताया। उनका कहना था कि धार्मिक ग्रंथों का उपयोग शूद्रों को गुलाम बनाए रखने के लिए किया गया। वे एक ऐसे ईश्वर में विश्वास करते थे जो सभी मनुष्यों का निर्माता है, किसी जाति विशेष का नहीं।
उनके अनुसार सच्चा धर्म वह है जो न्याय, करुणा और समानता सिखाए। कर्मकांड, मूर्तिपूजा, तीर्थ, यज्ञ, पुरोहितवाद—इन सबको उन्होंने अंधविश्वास और पाखंड माना। उनका नारा था: “धर्म का अर्थ मानवता है, न कि कर्मकांड।”
3. ज्योतिबा फुले के अनुसार ब्राह्मणवाद एक ऐसी सामाजिक-धार्मिक व्यवस्था थी जो शूद्रों, अतिशूद्रों और स्त्रियों को शिक्षा, ज्ञान और सत्ता से वंचित रखती थी। उन्होंने इसे असमानता और गुलामी का औज़ार कहा। “गुलामगिरी” (1873) में उन्होंने लिखा कि “ब्राह्मणों ने धर्मग्रंथों और मिथकों का प्रयोग कर बहुजन समाज को मानसिक रूप से दास बनाया”।
4. आर्यों के आक्रमण का सिद्धांत
फुले का मानना था कि “आर्य भटके हुए विदेशी थे, जिन्होंने छल से इस देश के मूल निवासियों पर अधिकार जमाया। आर्य (जिन्हें वे ब्राह्मणों से जोड़ते थे) बाहर से आए। उन्होंने मूल निवासियों (शूद्र-अतिशूद्र) को पराजित कर खुद को श्रेष्ठ और दूसरों को नीच घोषित किया। इसलिए वे ब्राह्मणों को ऐतिहासिक शासक वर्ग मानते थे, न कि ईश्वर प्रदत्त श्रेष्ठ।

5. वेद-पुराणों की आलोचना
फुले ने वेद, पुराण और मनुस्मृति को असमानता फैलाने वाले ग्रंथ कहा जो केवल ब्राह्मण प्रभुत्व को बनाए रखने के लिए रचे गए। उनके अनुसार धर्म का उपयोग नैतिकता के बजाय सत्ता बनाए रखने के लिए हुआ। उन्होंने गुलामगिरी (1873) में लिखा है, “ब्राह्मणों ने शूद्र-अतिशूद्रों को अज्ञान में रखकर धर्मग्रंथों के सहारे उनकी दासता को स्थायी बना दिया। जो ग्रंथ एक मनुष्य को श्रेष्ठ और दूसरे को नीच ठहराते हैं, वे ईश्वरकृत नहीं हो सकते।” “मनुष्य की श्रेष्ठता उसका जन्म नहीं, उसका कर्म और नैतिकता तय करती है।”

6. दैविक अवतारों पर फुले के विचार
ज्योतिबा फुले भगवान राम को आर्य सत्ता का प्रतीक और शंबूक वध को शूद्र दमन का उदाहरण मानते थे। फुले ने विष्णु को पालक ईश्वर नहीं, बल्कि आर्य/ब्राह्मण सत्ता का प्रतीक माना। उनका कहना था कि विष्णु के अवतारों की कथाएँ मूल निवासियों पर “धर्म” के नाम पर सत्ता स्थापित करने की कहानियाँ हैं।
वामन अवतार फुले की सबसे प्रसिद्ध आलोचनाओं में से एक है। फुले अपनी पुस्तक गुलामगिरी में राजा बली को मूल निवासी, न्यायप्रिय शासक और भगवान वामन को छल करने वाला आर्य/ब्राह्मण मानते हैं। तीन पग भूमि दान को धोखे से सत्ता हड़पने की कथा है। उन्होंने लिखा “जिस छल को पुराणों में देवत्व कहा गया, वह वास्तव में अन्याय और विश्वासघात था।” फुले ने वामन को नैतिक रूप से नायक मानने से इंकार किया और भगवान वामन को छल द्वारा सत्ता हथियाने वाला कहा। वामन अवतार के लिए उन्होंने “बंब्या (अज्ञानी / मूर्ख)”, “घातकी”, “लबाड (झूठा)”, “कृतघ्न” अदि अपमानजनक शब्दों का प्रयोग किया है।

नृसिंह की कथा (हिरण्यकशिपु वध) को फुले ने “असहमति और विद्रोह को हिंसा से कुचलने” की कथा कहा। नृसिंह उनके लिए धार्मिक आतंक का प्रतीक हैं। उनका मानना था “पुराणों के देवता इतिहास के नायक नहीं, विजेताओं द्वारा गढ़े गए चरित्र हैं।” उनका आरोप था कि देवताओं को सदैव आर्य पक्ष में और असुर/राक्षसों को सदैव दुष्ट दिखाया गया जबकि वे वास्तव में मूल निवासी समुदाय थे।
फुले ने ब्राह्मणों की गायत्री-कथा को आर्य/विदेशी प्रभाव से जोड़ा और गायत्री को “यावनी” (यवन स्त्री / बाहरी स्त्री) के रूप में वर्णित किया।

- सन्दर्भ:
- Jyotirao Phule, Gulamgiri, 1873
- Eleanor Zelliot, From Untouchable to Dalit, Manohar
- Dhananjay Keer, Mahatma Jyotiba Phule
- G P Deshpande (ed), Selected Writings of Jotirao Phule, OUP, 2002
7. ज्योतिबा फुले की नजर में मोहम्मद पैगम्बर और इस्लाम कैसा है
ज्योतिबा फुले ने पैग़म्बर मुहम्मद को एकेश्वरवाद का प्रवर्तक, समानता का संदेश देने वाला, पाखंड और पुरोहितवाद का विरोधी बताया है। उन्होंने लिखा है, “पैग़म्बर मुहम्मद ने एक ईश्वर का उपदेश देकर मनुष्यों के बीच की ऊँच-नीच को नष्ट करने का प्रयास किया।”
फुले ने इस्लाम को जाति-विहीन धार्मिक व्यवस्था, एकेश्वरवादी जबकि पुरोहितवादी और ब्राह्मणवाद के विपरीत के रूप में वर्णित किया। उन्होंने लिखा है, “इस्लाम में मनुष्य-मनुष्य में जन्म से भेद नहीं माना गया, इसलिए शूद्र-अतिशूद्र समाज ने उसे अपनाया।” “जहाँ ब्राह्मण धर्म जन्म से दास बनाता है, वहाँ इस्लाम मनुष्य को मनुष्य मानता है।”
- स्रोत: Jyotirao Phule, Gulamgiri, 1873
- Rosalind O’Hanlon, Caste, Conflict and Ideology, Cambridge University Press
- Jyotirao Phule, Sarvajanik Satyadharma, 1891 G.P. Deshpande (ed।), Selected Writings of Jotirao Phule, Oxford University Press
8. ज्योतिबा फुले का ईसाई धर्म और ईसाई मिशनरियों के बारे में क्या राय था?
इतिहासकारों और शोधों के अनुसार फुले ने ईसाई मिशनरियों का सकारात्मक उल्लेख किया क्योंकि उन्होंने जातिवादी रूढ़ियों और अंधविश्वास के खिलाफ काम किया और शिक्षा को बढ़ावा दिया। फुले ने पंडिता रामाबाई के ईसाई धर्म अपनाने के अधिकार का खुलकर समर्थन किया। यह उन्होंने अपनी रचना Satsar (The Essence of Truth) में किया है।
फुले ने देखा कि ईसाई धर्म जाति-आधारित भेदभाव का समर्थन नहीं करता और सभी मनुष्यों में बराबरी पर ज़ोर देता है। शोधकर्ता Nseeb Benjamin कहते हैं कि, “ज्योतिबा फुले ईसाई धर्म के बारे में सहानुभूतिपूर्ण थे और उन्होंने मिशनरियों के काम को सराहा, लेकिन ब्राह्मणों की आलोचना की वजह से ईसाई बनने की बात मिथ्या है।“ फुले ने स्वयं ईसाई धर्म अपनाया नहीं। उनका कोई बपतिस्मा, चर्च सदस्यता या स्वयं की धर्म-परिवर्तन घोषणा का इतिहास नहीं मिलता।
ज्योतिबा फुले ने लिखा है, “ईसाई धर्म में मनुष्य को जन्म से नीच-ऊँच नहीं माना गया है। वहाँ सभी को एक ईश्वर की संतान कहा गया है।” “जिस धर्म में किसी मनुष्य को जन्म से दास नहीं बनाया जाता, वही धर्म मानवता के अधिक निकट होता है।” “मिशनरी लोग शूद्र-अतिशूद्रों को पढ़ाते हैं, जबकि ब्राह्मण धर्म उन्हें अज्ञान में रखना चाहता है।”
- स्रोत: Jyotirao Phule, Sarvajanik Satyadharma, 1891
- G. P. Deshpande (ed.), Selected Writings of Jotirao Phule, Oxford University Press
- Rosalind O’Hanlon, Caste, Conflict and Ideology, Cambridge University Press
- Dhananjay Keer, Mahatma Jyotiba Phule Eleanor Zelliot, From Untouchable to Dalit, Manohar
9. ज्योतिबा फुले का भारत में अंग्रेजी शासन के प्रति क्या विचार थे?
ज्योतिबा फुले ने अंग्रेज़ी शासन को राजनीतिक रूप से विदेशी सत्ता माना, लेकिन सामाजिक रूप से उसे ब्राह्मणवादी, पेशवाकालीन शासन से कम दमनकारी बताया। इसलिए वे भारत में अंग्रेजी राज का समर्थन करते थे। उन्होंने लिखा है, “पेशवाओं के राज्य में शूद्र-अतिशूद्र पशु से भी नीच समझे जाते थे, जबकि अंग्रेज़ी शासन में उन्हें कम से कम मनुष्य तो माना गया।” यह तुलना फुले ने बार-बार की है। “अंग्रेज़ों की शिक्षा ने शूद्रों की आँखें खोल दीं, जिन्हें ब्राह्मण धर्म ने सदियों से बंद रखा था।”
फुले ने माना कि अंग्रेज़ी कानून जातिवादी धार्मिक ग्रंथों से स्वतंत्र हैं। इससे शूद्र और अतिशूद्र वर्ग को न्याय मिलने की संभावना बढ़ी।
- स्रोत: Jyotirao Phule, Sarvajanik Satyadharma (1891);
- G. P. Deshpande, Selected Writings of Jotirao Phule
- Dhananjay Keer, Mahatma Jyotiba Phule
- गुलामगिरी (1873), शेतकऱ्याचा आसूड (किसानों का कोड़ा, 1883)
- Eleanor Zelliot, From Untouchable to Dalit
10. क्या ज्योतिबा फुले भी डॉ आंबेडकर और रामास्वामी पेरियार की तरह भारत में अंग्रेजी शासन का समर्थन करते थे?
ज्योतिबा फुले ने स्वराज्य/राजनीतिक स्वतंत्रता को प्राथमिक मुद्दा नहीं माना। उनका केंद्र सामाजिक समानता, जाति‑दमन उन्मूलन, स्त्री शिक्षा था। अंग्रेज़ी शासन को उन्होंने ब्राह्मणवादी पेशवाकालीन दमन की तुलना में सामाजिक सुधार का अवसर माना। उन्होंने राष्ट्रवादी आंदोलन/स्वराज का मुख्य लक्ष्य नहीं अपनाया। उनका प्राथमिक लक्ष्य सामाजिक मुक्ति था, राजनीतिक स्वतंत्रता बाद में भी संभव थी।
स्रोत: Jyotirao Phule, Gulamgiri (1873), Jyotirao Phule, Shetkaryacha Asud (1883), Rosalind O’Hanlon, Caste, Conflict and Ideology, Eleanor Zelliot, From Untouchable to Dalit
कोई भी सामान्य पढ़ा लिखा व्यक्ति भी ज्योतिबा फुले के उपर्युक्त दस बिन्दुओं में वर्णित सामाजिक, धार्मिक और राजनितिक विचारों को पढ़कर आसानी से समझ जायेगा की तथाकथित बुद्धिजीवी और समाज सुधारक का ज्ञान कितना सतही, अज्ञानतापूर्ण से लेकर मूर्खतापूर्ण, सच्चाई से परे से लेकर सच्चाई के विपरीत, पूर्वाग्रह से ग्रस्त और काल्पनिक है. अगर मैं सभी दस बिन्दुओं की खामियों को विस्तार से बखिया उधेड़ना शुरू करूँगा तो एक किताब भी कम पर जायेगा, इसलिए, एक एक कर संक्षेप में बात रखता हूँ…



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