महान इतिहासकार डॉ. काशी प्रसाद जायसवाल ने बौद्ध धर्मग्रंथ ‘आर्य मंजुश्रीमूलकल्प’ और तत्कालीन ऐतिहासिक परिस्थितियों का गहरा अध्ययन किया था। उन्होंने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘An Imperial History of India’ (In a Sanskrit Text) में गुप्त काल, बौद्ध संघों और हूणों के त्रिकोणीय समीकरण पर विस्तार से लिखा है। डॉ. जायसवाल का मानना था कि समुद्रगुप्त और चंद्रगुप्त द्वितीय के समय सनातन धर्म का पुनरुत्थान बहुत तेजी से हुआ। इसके कारण पश्चिमोत्तर सीमा (गंधार, कपिशा और पंजाब) के कुछ बौद्ध संघों में यह असुरक्षा की भावना पैदा हो गई थी कि गुप्त साम्राज्य के तहत उनका प्रभाव कम हो रहा है।…
Tag: सम्राट
विदेशी आक्रान्ताओं के सहयोगी भारत के बौद्ध: यवन, पुष्यमित्र शुंग और बौद्ध संघ
मौर्य साम्राज्य और शुंग शासन के पतन के संक्रमण काल में बौद्ध संघों और यवन (Indo-Greek) आक्रमणकारियों के अंतर्संबंधों पर कई इतिहासकारों ने विस्तृत विवरण दिया है। ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी (185 ईसा पूर्व) में मौर्य वंश के पतन के समय भारत पर बैक्ट्रियाई यूनानियों (यवनों) के भीषण आक्रमण हुए। इस दौरान सीमावर्ती और राजधानी के बौद्ध संघों द्वारा यवनों को कूटनीतिक एवं राजनैतिक सहयोग दिया गया। और ये सब हुआ लंपट, कायर अंतिम मौर्य शासक बृहदरथ मौर्य के नाक के नीचे। दूसरी बात उत्तर मौर्य काल में बौद्ध धर्म को अत्यधिक राजकीय संरक्षण मिला था। अशोक के शासन में…
राणा सांगा एक महान योद्धा
समाजवादी हरा आमी ने भारत के जिस महानायक, महान योद्धा को “गद्दार” कहकर राज्यसभा में संबोधित किया, आईये जानते हैं कि वे कौन थे! महाराणा सांगा अर्थात महाराणा संग्राम सिंह। इस महान योद्धा के बारे में आप जितना पढ़ेंगे, उतना ही आश्चर्य में डूबते चले जायेंगे। लगभग सौ युद्ध और अधिकांश में विजय! शरीर के हर अंग पर युद्ध के चिन्ह सजाए इस रणकेसरी को खंडहर, सैनिकों का भग्नावशेष आदि कहा गया है … जैसे रणचंडी ने उन्हें अपने हाथों से पुरस्कार स्वरूप घावों के आभूषण पहनाए हो। एक योद्धा की एक आँख चली गयी..किसी दूसरे युद्ध में एक पैर…
संभल के हरिहर मंदिर, अब जामी मस्जिद, का इतिहास
भगवान कल्कि को समर्पित श्री हरिहर मंदिर के बारे में माना जाता है कि इसका निर्माण सृष्टि के आरंभ में भगवान विश्वकर्मा ने किया था। हिन्दू धर्मशास्त्रों में इस मंदिर का विशेष महत्व है। शास्त्रों में इसे भगवान विष्णु और भगवान शिव की एकता का प्रतीक बताया गया है। हिन्दू ग्रंथों में लिखा है, ““यथा शिवस्तथा विष्णु, यथा विष्णुस्तथा शिवः” जिसका अर्थ है ‘जैसे शिव हैं, वैसे ही विष्णु हैं; जैसे विष्णु हैं, वैसे ही शिव हैं।’ संभल महात्म्य में जामा मस्जिद को तीर्थों का केंद्र बिंदु दर्शाया है संभल नगर धार्मिक नजरिये से भी ऐतिहासिक है। संभल महात्म्य पुस्तक…
मध्य एशिया से भारत आनेवाले श्वेत हूण हिन्दू थे
पिछले विभिन्न लेखों में साबित कर दिया गया है कि मध्य एशिया के शक/सीथियन, कुषाण/ऋषिक/यूची, तुषार/तोख़ार/यूची, कम्बोज/कुषाण, तुर्क, उइगर आदि बौद्ध बनने और परवर्ती काल में जबरन मुसलमान बनाये जाने से पहले स्थानीय परिवर्तनों के साथ वैदिक धर्म, संस्कृति को ही मानने वाले थे. बाद में ईरानी ह्खामनी सम्राटों के विजय और सत्ता के दौरान कुछ लोग जोराष्ट्र धर्म (पारसी) को मानने लगे. सिकन्दर के विजय और शासन में कुछ ग्रीक धर्म संस्कृति का प्रभाव पड़ा. अशोक का साम्राज्य जब मध्य एशिया तक विस्तृत हो गया तब बौद्ध धर्म का प्रचार प्रसार मध्य एशिया में भी हुआ और बहुत से…
महापराक्रमी पृथ्वीराज चौहान की अक्षम्य गलतियाँ
पृथ्वीराज चौहान राजा सोमेश्वर और कलचुरी की राजकुमारी रानी कर्पुरदेवी के पुत्र थे. पृथ्वीराज विजय के अनुसार उनका जन्म ज्येष्ठ माह के बारहवीं तिथि को हुआ था. वे बहुत सी भाषाओँ के जानकार थे. धनुर्विद्या में महारत हासिल कर रखा था. शब्दभेदी बाण के वे सिद्धहस्त थे. उन्होंने बचपन में शेर का जबड़ा अपने हाथों से फाड़ दिया था. जब उनके पिता राजा सोमेश्वर का देहांत विक्रमी संवत १२३४ में हुआ था उस समय पृथवीराज मात्र ग्यारह वर्ष के थे. अपनी माँ के संरक्षण में उन्होंने राजगद्दी सम्भाली. हालाँकि हम्मीर महाकाव्य दावा करता है कि राजा सोमेश्वर ने खुद पृथ्वीराज…
विदेशी मुस्लिम आक्रमणकारियों का काल जशरथ खोक्खर
गक्खर (या खोक्खर) राजपूत भारत के इतिहास में अपनी वीरता और शूरता के लिए जाने जाते हैं. खासकर विदेशी मुस्लिम आक्रमणकारियों के विरुद्ध लडाई में इन्होने अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया. इन्होने आक्रमणकारी मोहम्मद गोरी को खत्म किया, कुतुबुद्दीन, इल्तुतमिश, बलबन और मोहम्मद बिन तुगलक जैसे नरपिशाचों को धूल चटाया. परन्तु लड़ते लड़ते ये धीरे धीरे कम और कमजोर होते गए और एक दिन ऐसा भी आया की विदेशी मुस्लिम आक्रमणकारियों से अपनी प्रजा की जान माल और अस्मत की सुरक्षा केलिए इस्लाम का ढोल भी गले में बांधना पड़ गए. इन्ही लोगों में से एक थे शेख खोक्खर (या…
क्या वैदिक लोग घुमन्तु, कबीलाई और कबीले के सरदार मात्र थे?
पश्चिमी इतिहासकारों की मानें तो मुट्ठी भर द्वीपों पर बसे और छोटे सा यूरोपीय राज्य ग्रीक और रोम में ही केवल विकसित सभ्यता थी, ग्रीक, रोमन साम्राज्य था और वहां सम्राट होते थे बाकी सब तो असभ्य (barbaric), घुमंतू (nomad), कबीले (tribe) और कबीले के सरदार (Chieftain) मात्र होते थे. पश्चिमी इतिहासकारों की नजर में कैसे कैसे असभ्य, घुमन्तु, कबीले और कबीले के सरदार होते थे उसका कुछ उदाहरन देखिए: छठी शताब्दी ईस्वी पूर्व के ईरान का अखामानी (Achamanid) साम्राज्य जो, इन्ही इतिहासकारों के शब्दों में, मध्य एशिया से लेकर तुर्की, मिस्र और ग्रीस तक विस्तृत था; पर, तीन महाद्वीपों…
युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में आनेवाले रोमक, यवन और सिंगवाले लोग कौन थे
महाभारत में अर्जुन की दिग्विजय के प्रसंग में कम्बोज का लोह (लोहान) और ऋषिक जनपदों के साथ उल्लेख है (सभा. २७, २५). महाभारत के सभा पर्व के अनुसार ऋषिक जातियों ने लोहान, परमा कम्बोज के साथ मिलकर अर्जुन के दिग्विजय के दौरान उत्तरापथ के राज्यों के विजय में सहायता की थी. यह ऋषिक जनपद मध्य एशिया के आमू दरिया और शिर दरिया के मध्य स्थित था. आधुनिक एतिहासिक शोधों से लगभग सभी इतिहासकार सहमत हैं कि भारतीय ग्रंथों में वर्णित ऋषिक जातियां चीनी ग्रंथों में वर्णित यूची लोग अर्थात कुषाण हैं. ऋषिक जाति और कुषाणों पर आधुनिक शोध परक इतिहास…
मध्य एशिया के कुषाण हिन्दू थे
ग्रियर्सन के अनुसार (मध्य एशिया के) मिदिया के लोग आर्य थे और २५०० ईस्वीपूर्व में यहाँ थे. मिदिया में आर्यों की धाक थी. उनके देवता वे ही थे जिनके नाम बाद में हम भारत में पाते हैं और यह कि वे सतेम भाषी थे, जो प्राचीन संस्कृत से अधिक निकटता रखती है. ग्रियर्सन के इस बात से लगभग सभी साम्राज्यवादी और वामपंथी इतिहासकार सहमत हैं क्योंकि ये लोग भारत के हिन्दुओं को मध्यएशिया से भारत में आये हुए साबित करने केलिए ही नाना प्रकार के झूठ और मनगढ़ंत इतिहास फैला रखें हैं. सवाल यह उठता है कि जब सिर्फ २५००…









