गौरवशाली भारत, प्राचीन भारत

वैदिक स्थापत्य ही पूरे विश्व के स्थापत्य कला की जननी है

hindu architecture
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वैदिक स्थापत्य कला

विश्व में स्थापत्यकला के दर्जनों प्राचीन ग्रन्थ हैं और वे ग्रन्थ सिर्फ संस्कृत में हैं, इसलिए वे वैदिक सभ्यता के धरोहर है. वैदिक स्थापत्य यानि वास्तुकला और नगर-रचना की पूरी विधि मूल तत्व आदि विवरण जिन संस्कृत ग्रंथों में मिलता है उन्हें अगम साहित्य कहा जाता है. ये ग्रन्थ बहुत प्राचीन हैं. मानसार शिल्पशास्त्र के रचयिता महर्षि मानसार के अनुसार ब्रह्मा जी ने नगर-निर्माण और भवन-रचना विद्याओं में चार विद्वानों को प्रशिक्षण दिया. उनके नाम हैं-विश्वकर्मा, मय, तवस्तर और मनु.

शिल्पज्ञान (Engineering) की सबसे प्राचीन संस्कृत ग्रन्थ है भृगु शिल्पसन्हिता. किले, महल, स्तम्भ, भवन, प्रासाद, पूल, मन्दिर, गुरुकुल, मठ आदि बनाने की विधि बताने वाली अन्य संस्कृत ग्रन्थ हैं-मयमत, काश्यप, सारस्वत्यम, युक्ति कल्पतरु, समरांगन, सूत्रधार, आकाश भैरवकल्प, नारद शिल्पसन्हिता, विश्वकर्मा विद्याप्रकाश, बृहतसंहिता, शिल्पशास्त्र आदि.

rameshwaram
रामेश्वरम मन्दिर

वैदिक शिल्पकला नष्ट होने से बचे उत्तर भारत के एतिहासिक मन्दिरों और भवनों तथा मुख्य रूप से दक्षिण भारत के मन्दिरों में देखे जा सकते हैं. खजुराहो, एलोरा, रामेश्वरम, मीनाक्षी मन्दिर सहित सैकड़ों ऐसे मन्दिर और भवन हैं जिनकी सुन्दरता अद्भुत है और मजबूत इतना की हजारों वर्षों से ज्यों के त्यों सीना तानकर खड़े हैं. इनके आगे आधुनिक शिल्प कहीं नहीं ठहरता. मध्यप्रदेश मुरैना स्थित प्राचीन चौंसठ योगिनी मन्दिर, जिसका नकलकर एडविन लुटियंस ने भारत के संसद भवन का निर्माण किया था, से प्राप्त जानकारी के अनुसार मितावली, पदावली और बटेश्वर मन्दिरों के बीच वैदिक स्थापत्य कला के शिक्षण हेतु विश्वविद्यालय स्थित था.

chaunsath yogini mandir, Mooraina
चौंसठ योगिनी मन्दिर, मुरैना मध्य प्रदेश

रोबर्ट बर्न अपने ग्रन्थ Introduction to Rome and the Campagna में लिखते हैं, “रोमन लोग विश्व के श्रेष्ठतम भवन निर्माता रहे हैं, तथापि सुशोभित या सजी-धजी इमारतें वे बना नहीं पाए.वे कमानें तो बनाते थे तथापि स्थापत्य की उनकी कोई विशेषता नहीं है. भवनों की विशालता और ग्रीक शैली का विचित्र अनुकरण, यहीं तक उनका स्थापत्य सिमित था. भारत में सुशोभित या सजी-धजी इमारतें बृहद पैमाने पर दिखाई देती है”.

Ellora temple
पहाड़ को काटकर बनाया गया एलोरा मन्दिर

वैदिक स्थापत्य कला क्या है?

वैदिक स्थापत्य में ध्यानमग्न बैठे योगी की कल्पना की जाती है. आत्मा जैसे शरीर में गुप्त निवास करती है उसी प्रकार विशालकाय मन्दिर के अंदर एक छोटे से अँधेरे गर्भगृह में मूर्ति की प्रतिस्थापना की जाति है. जिस चबूतरे पर वह ईमारत बनी होती है वह उसकी बैठक मानी जाती है. पहली मंजिल उस वास्तुपुरुष का उदर स्थान होता है. दूसरी मंजिल छाती, कन्धों का भाग होता है. कुम्भज (गुम्बद) का निचला गोल भाग वास्तुपुरुष का गला और कुम्भज सिर होता है. कुम्भज पर उल्टा कमलपुष्प बाल का प्रतीक और उसके उपर कलशदंड शिखा का प्रतीक होता है.

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आगरा मथुरा के राजा परमर्दिन देव द्वारा निर्मित तेजोमहालय

अतः इस शिल्प पर बनी जितनी भी प्राचीन या मध्यकालीन इमारते भारत या भारत के बाहर हैं वे सभी हिन्दू इमारते हैं और आप उनकी पड़ताल करें, वे हिन्दू इमारतें ही साबित होगी. साथ ही याद रखें तिन कुम्भज (गुम्बद) वाले जितनी भी इमारते हैं वे हिन्दू मन्दिर हैं जैसे राम, लक्ष्मण, सीता का मन्दिर (तथाकथित बाबरी ढांचा), राधा, कृष्ण, बलराम का मन्दिर (मथुरा जन्मस्थान का मन्दिर), शिव, पार्वती, गणेश का मन्दिर (तथाकथित ज्ञानवापी मस्जिद, काशी), ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि का मन्दिर. 

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हिन्दू ईमारत, दिल्ली

वैदिक स्थापत्य पर बने राजमहल के ठीक सामने नगरदेव या इष्टदेव का मन्दिर होता था जैसे दिल्ली में लालकोट के सामने तथाकथित जामा मस्जिद (तैमूरलंग ने अपने किताब में इसे बड़ा मन्दिर लिखा है-पी एन ओक), आगरा में बादलगढ़ के किला के सामने तथाकथित जामी मस्जिद, फतेहपुर सिकड़ी के राजमहल के सामने तथाकथित सलीम चिश्ती का मकबरा (यह सीकड़ राजपूतों के परिवार केलिए शिव मन्दिर था-पी एन ओक) आदि. उन्हें साधने वाला राजमार्ग ही नगर का अक्ष होता है. इसी राजमार्ग के दाएं बाएँ गली कुचे बनाए जाते हैं. इन्हें घेरने वाली नगर की मोटी दिवार होती थी जैसे दिल्ली, आगरा, पाटलिपुत्र आदि में था.

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बादलगढ़ का किला, आगरा

वैदिक स्तम्भ (मीनार)

स्तम्भ (मीनार) में अंदर से सीढ़ी, हर मंजिल पर छज्जे, मीनार के शीर्ष पर छत्र यानि कुम्भज (गुम्बद) हो तो वे हिन्दू स्थापत्यकला का दीपस्तम्भ के लक्षण हैं. उसे एक स्तम्भ भी कहा जाता है. जैसे पीसा का झुकी मीनार, अफगानिस्तान का गजनी नगर का मीनार, दिल्ली का विष्णुस्तम्भ या ध्रुव स्तम्भ (कुतुबमीनार), ताजमहल के चारों कोनो पर स्थित स्तम्भ, अहमदाबाद का हिलता मीनार आदि-पी एन ओक

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राणा कुम्भा द्वारा निर्मित विजय स्तम्भ

तथाकथित कुतुबमीनार और अलाई दरवाजा, अलाईमस्जिद वास्तव में विष्णुमन्दिर परिसर का हिस्सा है. अलाईमस्जिद वास्तव में विष्णुमन्दिर का खंडहर है जिसे मुस्लिम आक्रमणकारियों ने नष्ट कर दिया. यहाँ शेषशय्या पर विराजमान भगवान विष्णु की विशाल मूर्ति थी. कुतुबमीनार जो वास्तव में विष्णुस्तम्भ या ध्रुव स्तम्भ है वो एक सरोवर के बिच स्थित था जो कमलनाभ का प्रतीक था. स्तम्भ के उपर कमलपुष्प पर ब्रह्मा जी विराजमान थे जिसे मुस्लिम आक्रमणकारियों ने नष्ट कर दिया. मन्दिर से स्तम्भ तक जाने केलिए पूल जैसा रास्ता बना था. खगोलशास्त्री वराहमिहिर इस स्तम्भ का उपयोग वेधशाला के रूप में करते थे. यहाँ २७ मन्दिर २७ नक्षत्र का प्रतीक थे. वराहमिहिर के नाम पर ही उस एरिया का नाम आज भी महरौली है.

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विष्णु स्तम्भ या ध्रुव स्तम्भ दिल्ली

ब्रिटिश सर्वेक्षक जोसेफ बेगलर ने अपने सर्वेक्षण रिपोर्ट में पूरे कुतुबमीनार परिसर को हिन्दू ईमारत न सिर्फ घोषित किया है बल्कि उसे साबित भी किया है पर दुर्भाग्य से भारत सरकार, आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया और वामपंथी इतिहास्याकर उसे जबरन मुसलमानों का घोषित कर रखा है. जोसेफ बेगलर की रिपोर्ट Archaeological Survey of India; Report for the Year 1871-72 Delhi, Agra, Volume 4, by J. D. Beglar and A. C. L. Carlleyle की किताब में उपलब्ध है जिसे आप निचे के लिंक पर डाउनलोड कर सकते हैं, हालाँकि मुफ्त PDF पूरा नहीं है, बेहतर है खरीदकर पढ़ें.

https://www.forgottenbooks.com/en/books/ArchologicalSurveyofIndiaReportfortheYear187172_10019541

यह विशाल मन्दिर संभवतः चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य ने बनबाया था क्योंकि यहाँ पर जो लौहस्तम्भ है वो चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य का ही है ऐसा उत्खनन से प्राप्त शिलालेख से भी पता चलता है. इतिहासकार पी एन ओक ने लिखा है ऐसा ही शेषशायी भगवान विष्णु का मूर्ति और मन्दिर अरब के मक्का, रोम के वेटिकन और इंग्लैण्ड में भी था. स्पेन के म्यूजियम में आज भी शेषशायी भगवान विष्णु की मूर्ति रखा हुआ है.

सभी ऐतिहासिक ईमारतें हिन्दुओं की बनाई हुई है

इतिहासकार पुरुषोत्तम नागेश ओक लिखते हैं, “भारत से लेकर अरब तक या यूरोप तक जिन प्राचीन एतिहासिक इमारतों को इस या उस मुसलमानों के द्वारा बनाई बताई जाती है वे सब हिन्दुओं की हैं, यहाँ तक की ताजमहल और लाल किला भी”

१.        उत्तर भारत के सूर्यवंशी लोगों का विश्व-प्रसार उनके विशाल भवनों से पहचाना जा सकता है. मन्दिर, महल, किले आदि की मोटी दीवारें, सार्वजनिक सुविधाओं के विविध निर्माण-कार्य जो रोम, इटली, ग्रीक, पेरू, ईजिप्त, सीलोन आदि प्रदेशों में पाए जाते हैं, उनकी विशालता से बड़ा अचम्भा होता है. (पेज-१६३, India in Greece, By e pococke)

२.        The Celtic Druids, Writer-Godfrey Higgins, Picadilly, 1929 ग्रन्थ की भूमिका में हिगिंस ने लिखा है, “उत्तर भारत के निवासी बौद्ध (या हिन्दू) लोग, जिन्होंने पिरमिड्स, स्टोनहेंज, कोरनोक आदि (भवन) बनाए उन्होंने ही विश्व की दंतकथाएँ (पुराण आदि) लिखी जिनका स्रोत एक ही था और जिनकी प्रणाली बड़े उच्च, सुंदर, सत्य तत्वों पर आधारित थी-उन्ही की गौरवगाथा इस ग्रन्थ में वर्णित है.

Stonehenge
स्तोनेहेंज

३.        ईजिप्त में ब्रिटिश-फ़्रांस युद्ध के समय भी कृष्ण मन्दिर था-पी एन ओक

४.        Forum Romanum रोम नगर का प्राचीनतम स्थान है. वह प्रांगणम रामानम यानि भगवान राम का प्रांगण अर्थात राममन्दिर का स्थान था जिसे केंद्र मानकर रोम नगर बसाया गया. रोम भी राम नाम का ही यूरोपीय अपभ्रंश है-पी एन ओक

५.         जर्मनी में एक प्रदेश है वेदस्थान (Vaitland). वहां छः ऋषियों की प्रतिमाएं और वैदिक मन्दिर पाए गए थे.

६.         Antiquities of India (खंड ६, भाग १, पृष्ठ २४६) में रेवरेण्ड थोमस मौरिस ने लिखा है, “यह पुरोहित (ड्रुइड लोग) भारत के ब्राह्मण थे. एशिया के उत्तरी प्रदेशों में फैलते-फैलते वे साईबेरिया तक गए. मेरा निष्कर्ष यह है कि ब्रिटेन में एशियाई लोगों की सर्वप्रथम बस्ती थी.”

ड्रुइडो के कई मन्दिरों के भग्नावशेष अभी आयिजल ऑफ़ मैन और अंग्लसी द्वीपों (Isle of Angelsey, ब्रिटेन के वेल्स में) पर हैं. उनमे से कई महान शिलाओं के हैं जैसी शिलाएं अबीरी और स्टोनहेंज नामक प्राचीन स्थानों में हैं. (वही पेज ३६)

Temple on Isle of Anglesey
Isle of Anglesey द्वीप पर ड्रुइड मन्दिर

मन्दिर का वह भग्नावशेष विष्णु मन्दिर का है. वहां शेषशय्या पर भगवान विष्णु विराजमान थे-पी एन ओक

७.         हिगिंस के ग्रन्थ के पृष्ठ ४३ से ५९ पर उल्लेख है कि “भारत के नगरकोट, कश्मीर और वाराणसी नगरों में, रशिया के समरकंद नगर में बड़े विद्याकेंद्र थे जहाँ विपुल संस्कृत साहित्य था.” वैसा ही वैदिक साहित्य और धर्मकेंद्र इजिप्त के अलेक्जेंड्रिया, इटली के रोम और तुर्की के इस्ताम्बुल नगरों में भी था. वहां की जनता जैसे जैसे ईसाई और इस्लामी बनती गयी वहां के मन्दिर, ग्रन्थ आदि सब जला दिए गये.

८.        लन्दन का संत पॉल कैथेड्रल चर्च प्राचीन समय में गोपाल कृष्ण का मन्दिर था. सन १६४४ के आसपास आग लगने से प्राचीन मन्दिर की इमारत को काफी क्षति हुई थी. मन्दिर का नवीनीकरण होने के बाबजूद कृष्ण परम्परा के कई चिन्ह अभी भी दिखाई देते हैं-पी एन ओक

९.        जेरुसलम का तथाकथित Dome on the Rock मस्जिद प्राचीन अष्टकोणीय मन्दिर है. उसके गुम्बद के निचे अंदर जो रॉक अथवा चट्टान है वह स्वयम्भू महादेव थे. वही वहां के देवता हैं. भक्तगण उन्ही की पूजा और परिक्रमा करते हैं. परवर्ती काल में कुछ भावुक लोग उस पवित्र चट्टान के टुकड़े पूजा केलिए घर ले जाने लगे इसलिए उसे जाली से बंद कर दिया गया है. अब लोग जाली के बाहर से चट्टान की परिक्रमा करते हैं. जाहिर है चट्टान की पूजा और परिक्रमा अतीत के मन्दिर की यादें है इस्लामिक पूजा पद्धति नहीं-पी एन ओक

dome on rock, Jerusalem
अष्टकोणीय Dome on Rock मन्दिर, जेरूसलम

सागदियाना राजकुल प्राचीन शुद्धोधन शब्द है. समरकंद पर मुस्लिमों के अधिकार करने से पूर्व समरकंद बौद्ध नगर था और यहाँ का राजा भी बौद्ध था. अंतिम बौद्ध राजा का राजमहल अब तैमूर लंग का मकबरा कहा जाता है-पी एन ओक

१०.     जापान में सरस्वती, गणेश, कृष्ण आदि वैदिक देवताओं के हजारों मन्दिर हैं. जापानी डाक-विभाग द्वारा भी मुरलीधर कृष्ण का टिकट श्रद्धा भाव से प्रकाशित किया गया है. कृष्ण की मूर्तियाँ यूरोप अफ्रीका आदि देशों के मन्दिरों में होती थी और उन्हें रधमंथस, हेराक्लिज, हरक्यूलीज, हिरम, हर्मिस, कृष्ण, कृष्ट, इशस आदि नामों से जाना जाता था-पी एन ओक

११.     चीन के जन्जिओंगचोंग शहर में चार फूट ऊँची विष्णु भगवान की मूर्ति, करीब ७१ नृसिंह भगवान की मूर्ति मिली. वहां विष्णु पुराण की कथाएं, कैलाश पर शिव पार्वती आदि कथाएं चित्रित मिली. वहां के म्यूजियम के अधिकारी डॉ Yang Qin Zhang के अनुसार वहां का एक मन्दिर भारत के मदुरई के मीनाक्षी मन्दिर शैली का बना हुआ है-पी एन ओक

१२.     शिव देवता ईजिप्त के जिस मन्दिर में हैं उसके दर्शनार्थ सिकन्दर ने जिस नगर की यात्रा की थी उस नगर से अभी भी उसका नाम जुड़ा हुआ है. वह नगर Alexandria है. गंगा-तट पर के मन्दिरों में जैसा शिवलिंग है वैसा ईजिप्त के Ammon मन्दिर में भी है. (The Theogony of Hindus, Count Biornstierna)

१३.     सिद्दीकी के लेख में उल्लेख है की बगदाद नगर स्वयं संस्कृत नाम है. भग और दाद का मतलब ईश्वर का दिया हुआ अर्थात भगवददत नगर है. अर्थात बगदाद हिन्दुओं का बसाया हुआ नगर है. इतिहासकार पी एन ओक लिखते हैं, “बगदाद नगर का निर्माण खलीफा अल मंसूर ने ७६२-६३ में भारतीय स्थपति (इंजिनियर) और नगर-निर्माताओं के सहायता से करवाया था इस बात में सच्चाई नहीं है”.

१४.     सीरिया के पामीरा (Palmyra) स्थित मन्दिर के अंदर दुर्भाग्यवश तोड़-फोड़ दिखती है. धर्मान्ध मूर्ति भंजक मुसलमानों को सुंदर कलाकृतियों को छिन्न-भिन्न करने में एसा आसुरी आनंद होता था की मानो वे अल्लाह की बड़ी सेवा कर रहे हैं. वहां का मन्दिर मस्जिद के रूप में प्रयोग किए जाने से उसकी और भी दुर्दशा हो गयी थी. वहां की नक्काशी, मूर्ति आदि पर कीचड़ का लेप चढ़ा दिया गया है. वहां के विशाल केन्द्रीय दालान में टहनियों, घास-फूस आदि से एक छत बना दी गयी है और उसके निचे पशु बांध दिए जाते हैं. (Remains of Lost Empires, Writer P.V.N. Myers, Page-34)

Palmyra Syria temple
वैदिक मन्दिर, पामीरा, सीरिया

१५.     इस्लामी ज्ञानकोष में लिखा है कि पैगम्बर मोहम्मद के दादा काबा मन्दिर के पुरोहित थे. मन्दिर के प्रांगण के पास ही उनके घर में या आँगन में खटिया पर बैठा करते. उनके उस मन्दिर में ३६० देव मूर्तियाँ हुआ करती थी.

विश्व में कहीं भी मस्जिद का रुख मक्का की दिशा में होना अनिवार्य है. परन्तु विश्व भर में एतिहासिक मस्जिद कहलाने वाली लगभग किसी भी इमारत का रुख मक्का की दिशा में नहीं है. काबा स्वयं ज्योतिषीय आधार पर इस प्रकार बना है की उसकी चौडाई की मध्य रेखा की एक नोक ग्रीष्म ऋतू के सूर्योदय क्षितिज बिंदु की सीध में है और दूसरी शरद ऋतू के सूर्यास्त बिंदु की सीध में है. महम्मद के समय उसमे ३६० मूर्तियाँ होती थी. वह सूर्यपूजा का स्थान था. वायु के प्रचलन की आठ दिशाओं से उसके आठ कोने सम्बन्धित हैं. David A King, Prof. HKCES, Newyork City.

१६.     स्वीडन में उपशाला नाम का विशाल स्वर्ण मन्दिर था. १०७० ईसवी तक उसमें त्रिमूर्ति Thor, Odin और Frey (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) की पूजा होती थी, यज्ञ होता था, प्रसाद चढ़ाया जाता था. यहाँ प्रति नौ वर्ष पर उत्सव मनाया जाता था. उसके बाद ईसाई आक्रमणकारियों ने इस मन्दिर को नष्ट कर वहां ईसाई ध्वज फहरा दिया.”

Thor, Odin, Fray temple in Sweden
स्वीडन के उपशाला में ब्रह्मा, विष्णु, महेश का मन्दिर, फोटो साभार

स्वीडेन के उपशाला मन्दिर के बारे में विस्तार से जानने केलिए निचे लिंक पर क्लिक करें:

https://en.wikipedia.org/wiki/Temple_at_Uppsala

१७.      स्ट्रैबो लिखता है हरक्यूलिस तथा Bacchus यानि त्रयम्बकेश का अनुसरण करते हुए अलेक्जेंडर ने भी भारतवर्ष के जीते हुए निजी प्रदेश के सीमाओं पर देवमंदिर उर्फ़ वेदियाँ स्थापित की थी. वहां १२ देवी देवताओं के १२ मन्दिर थे और प्रत्येक मन्दिर ५० हाथ लम्बा-चौड़ा था-स्ट्रैबो, खंड-३, पृष्ठ २५७

१८.      ग्रीस के कई स्थानों पर सूर्य मन्दिर और सुर्यपुर होते थे. सूर्य केलिए संस्कृत में एक शब्द हेली भी है. उसी हेली नाम से Helipolis अर्थात हेलीपुर नाम का नगर ग्रीस में बसा है-पी एन ओक

Heliopolis, Greece
सूर्यमंदिर, हेलिपोलिस, ग्रीस

१९.      रामनगर (रोम) के सामने पूर्ववर्ती एड्रियाटिक सागर तट पर रावण (Revenna) नगर है. एडवर्ड पोकोक अपने ग्रन्थ के पृष्ठ १७२ पर लिखते हैं, “Behold the memory of …Ravan still preserved in the city of Ravenna, and see on the western coast, its great rival Rama or Rom”

२०.      St. Augustine नाम के एक ईसाई पादरी ने ईसापूर्व यूरोप में पूजे जानेवाले देवी देवताओं कि खिल्ली उड़ाने वाली एक पुस्तक लिखी है. उस पुस्तक का शीर्षक है The City of God’s. इस पुस्तक से रोम नगर में पूजे जानेवाले देवी देवताओं कि जानकारी मिलती है. Studio Pontica नामक पुस्तक में पृष्ठ ३६८ पर लिखा है कि किस तरह Trapezus के समीप के एक भुगर्भस्थ सूर्य मन्दिर को गिरजाघर बना दिया गया.

२१.      क्युमौंट के ग्रन्थ में पृष्ठ ८५-८६ पर उल्लेख है कि रोम नगर के जिस विभाग में Concord (शंकर) का मन्दिर था उसे Area Concordae (C का उच्चारण श करने पर “शंकरदेव परिसर”) कहा जाता था. कहते हैं Romulus ने वहां चार घोड़ों के रथ में आरूढ़ कुछ पीतल कि मूर्तियाँ प्रतिष्ठित कि थी और वहां एक कमल का पौधा लगाया था. रोम में तो कई मन्दिर थे किन्तु उनमे Jauns (यानि गणेश, ग्रीस में Ganus) का मन्दिर बड़ा ही प्रख्यात था.

ग्रीस और रोम में गणेश पूजन होता था. इसका इतिहास में उल्लेख है. ईसापूर्व काल में वही ग्रीस और रोम वाली सभ्यता पूरे यूरोप में था. “Ganesh..is depicted on a carving at Rheims in France with a rat above his head-Dorothea Chaplin, Matter, Myth and Spirit or Keltic and Hindu Links, Page-36

२२.      Rome and the Compagna नाम का Robert Burn के ग्रन्थ के पृष्ठ ६०३ पर उल्लेख है कि विष्टु (अर्थात विष्णु जैसे कृष्ण का कृष्ट) का मन्दिर एक वर्तुलाकार इमारत होती थी. वह पृथ्वी के आकार कि इस कारण बनाई गयी थी कि उसमें स्थित विष्टु भगवान समस्त संसार के द्योतक थे.

बर्न एक सर्प मन्दिर का भी उल्लेख करता है और लिखता है कि “नगर के आश्चर्यकारी बातों में सर्प मन्दिर का उल्लेख तो मिलता है किन्तु यह कहाँ था इसका पता नहीं चलता है.” मेरा मत है कि सर्प मन्दिर भी इस विष्णु मन्दिर को ही कहा जाता होगा क्योंकि विष्णु भगवान कि कई मूर्तियाँ पूरे यूरेशिया में शेषशय्या पर मिली है-पी एन ओक

बर्न ने अपने ग्रन्थ के पृष्ठ २८८ पर लिखा है कि रोम नगर में एक बड़ा नाला है. उसके समीप डोलिओला नाम का स्थान है. सन ३८७ के गोट लोगों द्वारा किये गये आक्रमण के समय उस डोलिओला स्थान में विष्टु के मन्दिर के पवित्र अवशेष काष्ठ पात्रों में भर भर कर संरक्षणार्थ दबा दिए गए थे. पृष्ठ २९१ पर बर्न ने विष्टु के वर्तुलाकार मन्दिर का चित्र दिया है. उसे Hercules का मन्दिर भी कहा जाता था अर्थ वही विष्णु का मन्दिर.

रोम के प्रमुख देवता विष्टु अर्थात विष्णु ही थे इस बात पर जोर देते हुए बर्न महोदय पृष्ठ ३९७ पर लिखते हैं कि “टाईबर नदी के प्रमुख देव Hercules यानि हरि कुल ईश अर्थात विष्णु ही थे. इसी कारण लैटिन कवियों ने कई बार रोम नगर का ही Hercules कहकर उल्लेख किया है.” स्ट्रैबो ने भी लिखा है कि “उसके समय में टाईबर नदी दो बातों केलिए प्रसिद्द थी-एक उसका Herculeum अर्थात हरि ईशालयम (C का श उच्चारण) और दूसरा उस नदी का प्रपात. उस मन्दिर का एक ग्रंथालय भी था. जिस स्थान पर हरि ईशालयम सम्बन्धी अनेक शिलालेख पाए गए हैं वहीँ पर वह मन्दिर रहा होगा.”

२३.      पहली शताब्दी ईसा पूर्व तक इटली के शासक Etruscan थे जो वैदिक संस्कृति के लोग थे. इन्ही Etruscan का वेटिकन में शिव और विष्णु का विशाल मन्दिर था जहाँ पापहर्ता पीठाधीश होते थे. वेटिकन पर जब इसाइयों ने हमला कर नष्ट कर दिया तो वहां के कुछ अवशेष जैसे कई शिवलिंग, पेंटिंग आदि म्यूजियम में सुरक्षित हैं. उन पेंटिंग में रामायण कि कथाओं के कई प्रसंगों के चित्र भी हैं जो वैदिक विश्व राष्ट्र का इतिहास भाग-३ में विभिन्न ग्रन्थों से लेकर दिए गये हैं.

Shivling, Etruscan
वेटिकेन के Etruscan संग्रहालय में वेटिकन का शिवलिंग फोटो साभार BooksFact

२४.     स्पेन के सागरतट पर कैडिज नगर है. इसके समीप एक लम्बा, सुकड़ा भू-खंड सागर में दूर तक फैला दीखता है. स्पेन की परम्परा में वह पवित्र भूमि कहलाता है. हेरोडोटस ने लिखा है कि उस भूखंड में विशाल आकार का कृष्ण मन्दिर होता था. वह सदियों तक दूर से खलासी लोगों को स्पेन के किनारे का पहचान स्तम्भ हुआ करता था-पी एन ओक, वैदिक विश्व राष्ट्र का इतिहास, भाग-३

२५.     स्ट्रैबो के ग्रन्थ के खंड १ में पृष्ठ २८१ पर लिखा है कि फ़्रांस के टुलूज (Toulouse) नगर में एक बड़ा प्रख्यात देवालय था जिसकी देवमूर्ति के दर्शन करने आस पास के प्रदेश के निवासी बड़ी संख्या में आया करते थे.

इतिहासकार पी एन ओक का मानना है कि वह देवालय तुलजा भवानी का मन्दिर हो सकता है और उन्ही के नाम पर उस नगर का नाम तुलजा नगर होगा जिसका फ्रेंच उच्चार Toulouse नगर है. ईसापूर्व समय में जब विश्व भर में क्षत्रियों का शासन था तब और आज भी भारत के अधिकांश क्षत्रियों की कुलदेवी तुलजा भवानी है.  छत्रपति शिवाजी की कुलस्वामिनी तुलजापुर की तुलजा भवानी ही थी जो शोलापुर से 15 मील की दूरी पर स्थित है.

पेरिस का Notre Dame चर्च परमेश्वरी (जगदम्बा) का मन्दिर था. Notre Dame का अर्थ है हमारी देवी. संस्कृत में न: = हमारी, त्र= तारण करनेवाली और दाम-यह जगदम्बा का टुटा हिस्सा है अर्थात हमारी तारण करनेवाली देवी. मन्दिर को चर्च में बदलने के बाबजूद अभी भी दीवारों पर चौकोण, षट्कोण, अष्टकोण आदि देवी पूजन की यांत्रिक आकृतियाँ तथा सिंह वृश्चिक आदि बारह राशियों के चिन्ह अंकित हैं. परमेश्वरी देवी के मन्दिर के नाम पर ही फ़्रांस की राजधानी का नाम परमेश्वरीयम नगर था जिसका लैटिन अपभ्रंश पैरिसोरियम हुआ और संक्षिप्त पेरिस. वहां कुछ लोग अब पेरिस को पारि भी कहने लगे हैं. (वैदिक विश्वराष्ट्र का इतिहास, भाग-३)

Notre Dam, Paris
पेरिस का नोट्रे डैम मन्दिर

फिर भारत की ऐतिहासिक इमारतें किसने बनाया

उपर्युक्त से स्पष्ट हो जाता है कि कम से कम यूरेशिया में जो भी प्राचीन स्थापत्य के उदाहरण हैं वे सभी हिन्दुओं के द्वारा निर्मित हैं चाहे उन्होंने अपने लिए बनाया हो या स्थापत्यकला के वैश्विक व्यवसायी वर्ग समूह के रूप में हो. सवाल है जो हिन्दू पूरे विश्व में बड़े बड़े किले, भवन, मन्दिर आदि का निर्माण करते थे वे क्या भारत में निर्माण केलिए मुस्लिम आक्रमणकारियों के इंतजार में थे?

इतिहासकार पी एन ओक लिखते हैं, “भारत के ऐतिहासिक इमारतों को मुस्लिम इमारतें, मस्जिदें, मकबरे आदि होने का झूठ अलेक्जेंडर कनिंघम नाम के लुच्चे अंग्रेज जो दुर्भाग्य से भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग का प्रथम अध्यक्ष था ने जानबूझकर फैलाया था. यहाँ तक की उनके सर्वेक्षकों ने जिन इमारतों को हिन्दू इमारतें पाया उन्हें भी डांटकर चुप करा दिया. जैसे की सर्वेक्षक जोसेफ बैगलर ने कुतुबमीनार और उसके आस पास के इमारतों को हिन्दू इमारतें घोषित किया तो धूर्त कनिंघम ने उसे चुप करा दिया”

कनिंघम के फैलाये उस झूठ को ही हिन्दूविरोधी वामपंथी इतिहासकार ज्यों के त्यों फ़ैलाने लगे. जब उनसे पूछा गया की उन इमारतों में जो शंख, चक्र, कमल, घंटी, स्वास्तिक आदि हिन्दू चिन्ह तथा हिन्दू इमारतों में स्तम्भों पर चारों ओर बनाये गये मानवाकृति, पशुआकृति; प्रवेश द्वारों पर हाथी आदि पशु क्यों बने हुए मिलते हैं जिन्हें मुसलमान हराम मानते हैं, जिनसे घृणा करते हैं तो उन्होंने कुतर्क किया की मुसलमान हिन्दू इमारतों को तोड़कर उनके मलवों से नई इमारते बना देते थे इसलिए ये चिन्ह रह जाते थे. जब यह साबित हो गया की तोड़कर गिराए गये मलबों से उच्च कोटि के बेहतरीन नई इमारतें नहीं बनाई जा सकती है तो कहने लगे चूँकि इमारत बनाने वाले कारीगर हिन्दू होते थे इसलिए उनमे हिन्दू प्रतीक चिन्ह होता है.

vishnu mandir, hooghly
विष्णु मन्दिर त्रिवेणी हूगली

सवाल है, अंग्रेजों ने भी तो बड़े बड़े गिरजाघर बनाएं हैं और वे हिन्दू कारीगरों ने ही बनाया है. उनमे हिन्दू चिन्ह क्यों नहीं है? आज भी मुसलमान मस्जिदें बनाते हैं और बनाने वाले हिन्दू या हिंदुस्थानी कारीगर ही होते हैं तो वे मस्जिदों में पवित्र हिन्दू चिन्ह क्यों नहीं बनबाते? आक्रमणकारी मुस्लिम शासक आक्रमित काफिरों के पवित्र चिन्ह मस्जिद और मकबरों में क्यों बनबायेगा? वास्तविकता तो इसके ठीक विपरीत यह है कि तमाम अधिग्रहित हिन्दू इमारतें जो आज मुस्लिम इमारतें कही जाती है उनमे हिन्दू प्रतीक चिन्हों और मानव-पशुआकृतियों को यथासंभव तोड़ दिया गया है, उन्हें घिसकर मिटा दिया गया है या मिटाने की पूरी कोशिश की गयी है जो खुद उनकी चोरी को बयाँ करते हैं.

स्रोत: वैदिक विश्वराष्ट्र का इतिहास भाग-१,२,३ और ४

लेखक: पी एन ओक

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