राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर अपनी पुस्तक ‘लोकदेव नेहरू’ मे लिखते हैं। “1946 मे जब बिहार मे सांप्रदायिक दंगे शुरू हुए तो नेहरू पटना आए थे। वह ज्यादातर अपनी ही देखरेख मे फौजियों से काम ले रहे थे। एक दिन नगरनौसा नाम के गाँव मे फौजियों ने सैकड़ों हिंदुओं को गोली मारकर मौत के घाट उतार दिया। इस समाचार से पटना मे बड़ी नाराजगी फैल गई। शाम को पण्डितजी जब नौजवानों के बीच भाषण देने को सीनेट हाल पहुंचे, तब लड़कों ने उनका कुर्ता फाड़ डाला और उनकी टोपी उड़ा ली।”
आखिर क्या था पूरा मजरा? बात 1946 की है जब जिन्ना और मुस्लिम लीग ने भारत को विभाजित कर पाकिस्तान की मांग मनवाने के लिए हिंदुओं पर प्रत्यक्ष कार्यवाही का आदेश दिया था अर्थात मुसलमानों से कहा गया कि वे सीधे हिंदुओं पर हमला करें, उनकी हत्या, रेप, लूट आगजनी, जबरन धर्मांतरण आदि करें। मुस्लिम लीग के इस आह्वान पर मुसलमानों ने हिंदुओं पर हमला कर दिया। कोलकाता, नोवाखाली और रावलपिंडी मे सबसे ज्यादा हिंदुओं का नरसंहार, बलात्कार, लूट और आगजनी हुई जिसे कोलकाता हत्या और बलात्कार कांड, नोवाखाली हत्या और बलात्कार कांड एवं रावलपिंडी हत्या और बलात्कार कांड के नाम से जाना जाता है।
कोलकाता मे बिहार के बहुत हिन्दू परिवार रहते थे जो इस हत्या और बलात्कार कांड से प्रभावित हुए थे। बिहार 16 अगस्त 1946 अर्थात कोलकाता मे हिंदुओं के भीषण नरसंहार के प्रथम दिन से ही सुलग रहा था। कोलकाता मे काम करनेवाले बहुत से मजदूर कोलकाता से जान बचाकर बिहार आ रहे थे। ये लोग अपने साथ हिंदुओं (दलित सवर्ण बौद्ध सिक्ख जैन) और उनकी स्त्रियों पर हो रहे भयानक अत्याचार और हिंसा कि कहानियाँ भी साथ लेकर आते थे। इतना ही नहीं, पटना मे मुस्लिम लीग के नेताओं ने जहरीले भाषण दिए थे। कोलकाता कि आग अभी ठीक से बुझी भी नहीं थी कि नोवाखाली से हिंदुओं का भयानक नरसंहार, बलात्कार, लूट, आगजनी और जबरन धर्मांतरण के समाचार आने लगे थे। हिंदुओं के भीषण नरसंहार, बलात्कार, लूट और आगजनी पर सत्ता मे बैठी कॉंग्रेस, नेहरू और गांधी चुप्पी मारे हुए थे जिससे बिहार मे भी मुसलमानों का हौसला बढ़ रहा था।
जस्टिस खोसला अपनी पुस्तक स्टर्न रेकनिंग मे लिखत हैं, “बिहार के कई हिस्सों मे हिंसा और तनाव पैदा करने वाले पर्चे मुसलमान घरों से पाए गए थे। इन पर्चों मे लिखा हुआ था कि अब तक हमने काफिरों (गैरमुस्लिमों) को पर्याप्त समय दिया है लेकिन अब समय या गया है कि कुफ़र के अंधकार को मिटाकर पूरे संसार मे इस्लाम कि रोशनी फैला दी जाए। इस महान मकसद को पाने के लिए हमें हर हालत मे काफिरों का कत्ल करना चाहिए।“ इस पर्चे के बँटबारे कि पुष्टि जवाहरलाल नेहरू ने भी कि थी और आचार्य कृपलानी ने भी।
आचार्य कृपलानी ने लिखा है, “हिंदुओं को ये भरोसा था कि मुसलमान बिहार मे कोई उत्पात करने कि योजना बना रहे हैं। 24 तारीख यानी दिवाली को हिंदुओं ने रोशनी न करने का फैसला किया था। वह बंगाल के पीड़ितों (कोलकाता और नोवाखाली) के लिए सुहानुभूति जताने के लिए इसे शोक दिवस के तौर पर मना रहे थे। लेकिन छपरा मे एक स्थानीय मुस्लिम नेता ने मुसलमानों से अपने घरों को रोशन करने और खुशी मनाने कि अपील कि और मुसलमानों ने खुशियां मनाई जिसका नतीजा यह हुआ कि छपरा, मुंगेर और भागलपुर मे दंगा भड़क गया। जस्टिस खोसला के अनुसार जमालपुर और भागलपुर मे मुसलमानों ने काली पूजा के जुलूस पर पत्थरबाजी कि और देवी कि मूर्तियों को नुकसान पहुंचाया। हिंदुओं को देवी कि मूर्तियों को खेत मे ही छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा।
देखते ही देखते यह दंगा छपरा और भागलपुर से निकाल कर पटना, गया, मुजफ्फरपुर, जहानाबाद और नालंदा तक फैल गया। हालत बिगड़ते देख बिहार कि कॉंग्रेस सरकार ने दंगा प्रभावित इलाकों मे सेना तैनात कर दी, जिनमें गोरखा राईफल्स, मद्रास रेजीमेंट, डोगरा रेजीमेंट के साथ साथ फर्स्ट इंडियन एंटी एयरस्ट्राइक रेजीमेंट और इंडियन एंटी-टैंक रेजीमेंट कि यूनिट शामिल थी। ज्ञातव्य है कि यह वही कॉंग्रेस सरकार थी जो बंगाल के कोलकाता और नोवाखाली मे हिंदुओं के भयानक नरसंहार बलात्कार पर चुप थी। कोलकाता और नोवाखाली मे मुस्लिमों द्वारा नरसंहार बलात्कार के मुद्दे को दबाने के लिए मुस्लिम लीग के नेतृत्व मे मुसलमान पूरे भारत मे बिहार के मुद्दे पर शोर मचाने लगे।
मजे कि बात यह थी कि तबतक मुस्लिम लीग भी केंद्र मे कॉंग्रेस कि सरकार मे शामिल हो चुका था और पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री बने लियाकत अली खान कॉंग्रेस कि केंद्र सरकार मे वित्त मंत्री बनाए जा चुके थे। अब आप सोच सकते हैं नेहरू गांधी और कॉंग्रेस मुस्लिम लीग और मुसलमानों द्वारा हिंदुओं के नरसंहार और बलात्कार पर क्यों चुप थे। परंतु नेहरू ने जो इसके बाद हिंदुओं के साथ किया वो उससे भी अधिक भयानक और नृशंस था जो हिंदुओं के प्रति नेहरू कि घृणा को प्रतिबिंबित करता है।
लगभग 50 जगह दंगे हुए या हो रहे थे। तीन जगह पुलिस को दंगायियों पर गोलियां चलानी पड़ी थी, उपर्युक्त विवरण के अनुसार सेना सहित प्रतिरोधी हिंदुओं के विरुद्ध एयरस्ट्राइक रेजीमेंट और इंडियन एंटी-टैंक रेजीमेंट भी तैयार थी परंतु नेहरू का क्रोध इससे भी शांत नहीं हुआ। बंगाल मे हिंदुओं कि नरसंहार, हत्या, बलात्कार पर मौन धारण करनेवाले नेहरू खुद बिहार पहुँच गए और दंगा प्रभावित इलाकों का तूफ़ानी दौरा शुरू कर दिया। मुसलमानों को ढाढ़स बँधाया और हिंदुओं (दलित सवर्ण बौद्ध सिक्ख जैन) को खूब खरी खोटी सुनाई। वह जहां भी गए हिंदुओं को डांटा, लताड़ा, धमकाया, उलाहने दिए और इतना से भी मन नहीं भरा तो कई बार पिटाई भी की। हरदास ने लिखा है, “एकबार जब एक हिन्दू ने नेहरू से बंगाल पर सवाल पूछ लिया तो वह उसे मारने दौड़े। नेहरू कि लात खाने के डर से वह भागते हुए नदी मे कूद गया। उतावले नेहरू ने भी उसका पीछा करते हुए नदी मे छलांग लगा दिया। किनारे पर खड़े हजारों पुलिस और हिन्दू इस हास्यास्पद दृश्य को क्रोध और अपमान के साथ देख रहे थे।”
नेहरू का क्रोध शांत नहीं हो रहा था। वे अपने देशवासी हिंदुओं पर हवाई हमला करने कि धमकी दे रहे थे। गया मे एक सार्वजनिक सभा मे साफ साफ शब्दों मे कहा, “सरकार कि तरफ से शांति बहाल करने के लिए कड़ी कदम उठाए जाएंगे। यदि जवाबी कारवाई (बंगाल मे हिंदुओं के नरसंहार, बलात्कार कि प्रतिक्रिया?) बंद नहीं होती है, तो हवाई बमबारी का सहारा लिया जाएगा। (सिलेक्टेड वर्क्स ऑफ जवाहरलाल नेहरू, भारत सरकार द्वारा प्रकाशित)“
नेहरू के आदेश पर नगरनौसा मे 400 हिंदुओं को मार दिया गया
नेहरू के जनता पर हवाई हमले कि धमकी के बाद पुलिस और सेना का हौसला बुलंद थे। हर रोज दंगाइयों को गोली मारी जा रही थी। लेकिन पटना से 40 किलोमीटर दूर नगरनौसा मे जो हुआ वह देश के इतिहास मे पहले कभी नहीं हुआ था। 5 नवंबर, 1946 को मद्रास रेजीमेंट कि एक टुकड़ी ने यहाँ हिंदुओं की उत्तेजित भीड़ पर फायरिंग कर दी थी जिसमें करीब 400 हिन्दू (दलित सवर्ण बौद्ध सिक्ख जैन) मारे गए थे जो मुख्य रूप से कृषक वर्ग से आते थे। इस खूनी घटना के बाद पूरे बिहार मे जबरदस्त आक्रोश फैल गया था। कुछ लोगों का कहना था कि मृतकों कि संख्या हजार से ऊपर थी। लोगों का कहना था कि फायरिंग नेहरू के आदेश पर हुई थी। हिंदुओं का इस भयानक नरसंहार करवाने के बाद नेहरू ने अपनी तथाकथित प्रेमिका पद्मजा नाईडु को पत्र मे लिखा:
“… भागलपुर से हवाई मार्ग से लौटते समय मुझे पता चला कि सेना यहाँ से कुछ मील कि दूरी पर ग्रामीण इलाकों मे किसानों कि भीड़ पर गोलियां चलाई, जिसमें करीब 400 लोग मारे गए। आमतौर पर इस तरह कि खबर ने मुझे डरा दिया होता, लेकिन क्या तुम इस बात पर विश्वास करोगी कि यह सुनकर मुझे बहुत राहत मिली।
हिन्दू किसानों कि भीड़ ने ऐसा बर्ताव किया है जो क्रूरता और अमानवीयता कि चरम सीमा है। मैं नहीं जनता कि इन किसानों ने कितने लोगों को मौत के घाट उतारा है, लेकिन तय है कि ये एक बड़ी संख्या होगी। इन किसानों ने पिछले कुछ दिन तक बिना किसी रुकावट के अपने तरीके से हिंसा की। इसलिए जब ये खबर आई कि इन्हें रोक दिया गया है और उनमें से 400 कि मौत हो गई है, तो मुझे लगता है कि ये बैलेंस बहुत कम है।“
नेहरू द्वारा बिहारी हिंदुओं के इस नरसंहार से देश मे नेहरू के विरुद्ध आवाज उठने लगी। नेहरू अपने झूठ और मक्कारी से इससे पल्ला झाड़ने कि कोशिश कर रहे थे पर उनकी हिन्दू विरोधी सांप्रदायिक छवि साफ नहीं हो रही थी। इसलिए उन्होंने 19 नवंबर को बिहार के कॉन्ग्रेसी मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह को पत्र लिखकर इस नरसंहार की जिम्मेदारी बिहार प्रशासन पर डालने का दबाब बनाया और उनसे कहा कि आप बयान दें कि मेरा इस नरसंहार से कोई लेना देना नहीं है। इसमें उन्होंने मृतकों कि संख्या घटाकर 400 से 250 कर दी थी। लेकिन आश्चर्य कि बात है कि सिर्फ 6 दिन बाद 25 नवंबर को मेरठ कॉंग्रेस के अधिवेशन मे नेहरू ने मरने वालों कि संख्या और भी घटाकर 50-60 कर दी। हालांकि सरदार पटेल के सामने उनकी झूठ नहीं चलती थी इसलिए उनको लिखे पत्र मे मृतकों कि संख्या 400 ही लिखी थी।
नेहरू द्वारा हिंदुओं के इस नरसंहार से बिहार के युवा और छात्र बहुत आक्रोशित थे और जब नेहरू पटना के सीनेट हाल मे भाषण देने आए तो युवाओं और छात्रों ने उन्हें पीट दिया, उनके कपड़े फाड़ दिए और टोपी उतारकर फेंक दिया था। बिहार मे लोग नेहरू से इसलिए भी नाराज थे कि वह मुसलमानों को बचाने बिहार तो आ गए, लेकिन कोलकाता और नोवाखाली जहां हिंदुओं पर बिहार कि तुलना बहुत ज्यादा अत्याचार, हिंसा, लूट, आगजनी तथा बलात्कार और जबरन धर्मांतरण कि भी घटनाएं हुई थी वहाँ नहीं गए।
इधर कोलकाता और नोवाखाली मे हिंदुओं के नरसंहार और बलात्कार पर मौन गांधी जी ने भी बिहार मे प्रतिक्रिया स्वरूप मुसलमानों पर हुए छिटपुट हमले के विरोध मे 6 नवंबर को अर्द्ध अनशन का ऐलान करते हुए बकरी का दूध और अन्न त्याग कर दिया। इतना ही नहीं उन्होंने पूरे बिहार के हिंदुओं को पापी घोषित कर दिया। यह वही महात्मा थे जिन्होंने बंगाल मे मुसलमानों द्वारा हिंदुओं के भीषण नरसंहार, बलात्कार, लूट, आगजनी और बलात धर्म परिवर्तन के लिए दोषी मुसलमानों को भी पापी कहने कि हिम्मत नहीं जुटा पाए थे।
मुख्य स्रोत: हे राम, लेखक प्रखर श्रीवास्तव


