प्राचीन भारत

आर्य जन आक्रमणकारी थे या आक्रमित?

आर्य जन
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वैदिक ऋषि गण

यह सिद्ध करने के बाद की आर्यों के आक्रमण का सिद्धांत महज साम्राज्यवादी षड्यंत्र था आज हम इस प्रश्न पर विचार करेंगे की क्या हम भारतीयों के पूर्वज आर्य जन सचमुच असभ्य, बर्बर, खानाबदोश, हिंसक, लूटेरा और आक्रमणकारी थे? आज हम धूर्त नेहरूवादी वामपंथी इतिहासकारों के एक और झूठ का पर्दाफाश करेंगे.

क्या असुर, दानव, दैत्य, राक्षस बेचारे लोग थे?

देव और असुर का युद्ध

कभी आपने पढ़ा या सुना है की देवताओं ने असुर लोक/दानव लोक पर आक्रमण कर दिया और उसपर अधिकार कर लिया? अलवत्ता आप हर जगह यही पढते और सुनते हैं की असुरों/दानवों ने देव लोक पर आक्रमण कर अधिकार कर लिया और देवता उनके डर से इधर उधर मारे मारे फिरते रहते थे. रावण जैसे राक्षस (रक्ष संस्कृति के संस्थापक) तो देवताओं को बंदी बनाकर अपने दरबार में खड़ा रखता था. दूसरी बात, देव जातियां और असुर/दानव/राक्षस जातियां इतने शक्तिशाली होते थे की ये मानवों (हिमालय के दक्षिण में राज करने वाले ब्रह्मा के प्रपौत्र महाराज मनु के वंशज मानव कहलाते थे) को कुछ समझते ही नहीं थे. चूँकि असुर/दानव मानवों पर अत्याचार करते थे इसलिए मानव इनके विरुद्ध देव जातियों का समर्थन/सहायता प्राप्त करते थे. देव जातियां संभवतः बलि (चढावा/शुल्क) के बदले इनके विरुद्ध इनकी सहायता करते थे.

तीसरी बात सुर (देवता), असुर/दानव और मानव तीनों जातियां एक ही मूल के थे. सुर, असुर और दानव ब्रह्मा के पौत्र कश्यप ऋषि के अलग अलग पत्नियों (प्रजापति की पुत्रियों) की सन्तान थे तो मानव ब्रह्मा के प्रपौत्र महाराज मनु के सन्तान थे. अतः चौथी बात देव-असुर संग्राम सत्ता के लिए पारिवारिक लड़ाई थी कोई जातीय संघर्ष नहीं था. इसलिए जैसा की आजकल वामपंथी इतिहासकार और अम्बेडकरवादी नवबौद्ध समझाने की कोशिश करते हैं की आर्य जन (देव और मानव जातियां) असुर और दानव (तथाकथित मूलनिवासी) पर आक्रमणकारी थे और यह जातीय संघर्ष था एक सफेद झूठ है. मजे की बात यह है की ये वामपंथी इतिहासकार पहले तो आर्यजनों को हिंसक, आक्रमणकारी और विजेता घोषित करते हैं और दुसरे ही पल उन्हें विजित क्षेत्रों में और अस्त्र शस्त्र को छोड़कर पशु चारक और पशुओं के चारागाह की खोज में दर दर भटकने वाला असभ्य, बर्बर और खानाबदोश बता देते हैं. भला कोई विजेता विजित क्षेत्र को छोड़कर खानाबदोश क्यों बनेगा?

वामपंथी इतिहासकारों की बेतुकी बातें

वामपंथियों की नजर में आर्य

वामपंथी इतिहासकारों की माने तो लूटेरे, असभ्य और आक्रमणकारी आर्य हिंदुकुश को पार कर सिंधु घाटी की नगर सभ्यता पर हमला कर मार काट किये और फिर नगर छोड़कर, अपने हथियार रखकर कुछ पहाड़ों पर भेड़ और गाय चराने चले गए और कुछ गांव में खेती करने लगे क्योंकि ये तो पहले ही सिद्ध कर चुके थे की आर्य तो असभ्य थे, खानाबदोश थे, कबीलाई थे तो फिर नगर में तो रह ही नहीं सकते. इसलिए आये, आक्रमण किये, नगर पर अधिकार किये और फिर कोई भेड़ बकरी चराने चले गए और कोई खेती करने. क्या आपको यह बात कहीं से भी हजम होती है? क्या गोरी, बाबर, हून आदि नगरों दिल्ली/आगरा पर आक्रमण कर खेती करने लगे? एक आक्रमणकारी हथियार डालकर गांव में और पहाड़ों पर खेती और पशुपालन करेगा? शांति शांति चिल्लाएगा, यज्ञ करेगा? तब गांव की बाकी जनता उसे क्या जिन्दा छोड़ेगी? पर जन्मजात जड़ इन वामपंथी इतिहासकारों को कौन समझाये?

और भी मजेदार बात यह है की कम्युनिष्ट इतिहासकारों और अम्बेडकरवादी नवबौद्धों ने तो आजकल इन शक्तिशाली असुरों, दानवों और राक्षसों को जिनसे देवता और मानव सदैव भयभीत रहते थे उन्हें दलित, शोषित, पीड़ित जातीय समूह घोषित कर दिया है और इनके द्वारा वास्तविक पीड़ित लोग (देव और मानव जातियां अथवा आर्य जन) को आक्रमणकारी घोषित कर दिया है जो वास्तव में इनकी मानसिक दिवालियापन अथवा भारत की गौरवशाली सभ्यता, संस्कृति और सनातन धर्म से अज्ञानता का प्रदर्शन मात्र है और सर्वथा असत्य है.  

अनार्य लोग कौन थे?

वैदिक संस्कृति, सभ्यता, धर्म, संस्कार को मानने वाले सभी लोग आर्य (श्रेष्ठ) कहलाते थे चाहे वे भारतवर्ष में रहते हों, अर्बस्थान, अफ्रीका या यूरोप में और नहीं माननेवाले अनार्य कहलाते थे. आज के संदर्भ में आर्य और संघर्ष की व्याख्या इन शब्दों में की जा सकती है: शांतिप्रिय आर्यों का देश भारत भीतरी और बाहरी अनार्य आतंकवादियों से सतत पीड़ित रहता है. भारत में आतंकी घुसपैठ कर निरंतर हमला करता रहता है, भारत के लोगों के जान माल का नुकसान करता रहता है जिससे हम भारतीय सदैव भयभीत रहते हैं, हमारा कोई भी पर्व त्यौहार आतंक के साए में ही बीतता है. इसी प्रकार हम भारतीय अनार्य नक्सलियों और अपराधियों से भी सतत परेशान रहते हैं. भारत उसका कड़ाई से मुकाबला करता है. कभी कभी आमने सामने का युद्ध भी होता है और भारत उनके नापाक हरकतों का मुंहतोड जबाब देता है, पराजित करता है. जरूरत पड़ने पर सर्जिकल स्ट्राईक भी करता है आदि.

अब आत्मरक्षा की लड़ाई लड़ने वाले आर्यों का देश भारत से अनार्य आतंकवादी, नक्सली और अपराधी हर बार पराजित होते है तो केवल इस कारण से हम भारत को हिंसक और आक्रमणकारी तथा अनार्य आतंकवादियों, नक्सलियों को मूलनिवासी नहीं कह सकते हैं. परन्तु वामपंथी इतिहासकार हमें अबतक यही समझाते रहे हैं. वामपंथियों ने भारत पर चीन के आक्रमण को भी चीन पर भारत का आक्रमण के रूप में दुष्प्रचार किया था.

वैदिक लोगों के शत्रु कौन थे?

वामपंथी इतिहासकारों की हिंदू विरोधी/भारत विरोधी षड्यंत्र को भेदने के लिए वेदों का अध्ययन जरूरी है. आइये उपर्युक्त बातों को वेदों में दिए गए विवरणों से सिद्ध करते हैं.

पहले हम वैदिक लोगों के शत्रुओं की बात करें के वे कौन लोग थे क्योंकि इनपर ही वैदिक लोगों को आक्रमणकारी सिद्ध किया गया है. वैदिक लोगों के शत्रुओं को चार भागों में बांटा जा सकता है:

१.         असमाजिक तत्व- तम, तमोवृद्ध, मायाविन, तस्कर, दस्यु, धूर्त, दू:शंस आदि.

२.         यायावर कबीले- व्यथि, अकर्म, मृध्रवाच, वृक, अधम, पिशाच, क्रव्यद, राक्षस, यातुधान आदि

३.         सामान्य शत्रु- अमित्र, अरि, अराति, शत्रु, स्प्रुध आदि

४.         वैचारिक मतभेद रखने वाले- वाघ्रिवाच, मृध्रवाच, अयाज्यु, अनिंद्र, अकर्म, अनस, अन्याव्रत, द्विश, पनि आदि.

अब उपर के वैदिक लोगों के शत्रुओं का अगर विश्लेषण करें तो पता चलेगा की इनमे अधिकांश समाज के भीतर के शत्रु हैं न की बाहर के और इन शत्रुओं से वैदिक लोगों के बाहरी होने का तो कोई सवाल ही पैदा नहीं होता है. जैसे, इनमे से अधिकतर शब्द निन्दापरक है जो अपने समाज के लोगों के भीतर ही सामाजिक और वैचारिक मतभेद रखने वाले लोगों के विरुद्ध प्रयुक्त है. असुर, वृत्र आदि का प्रयोग मार्ग (व्यापारिक मार्ग) अवरुद्ध करने वाले या घेरा डालने वाले लोगों के विरुद्ध हुआ है. बाहरी तत्वों में दस्युओं और जंगली कबीलों के उपद्रव प्रधान हैं. सम्भवतः ये जंगली लोग न केवल समय समय पर खेती और पशुओं को नुकसान पहुंचाते हैं अपितु स्वयं इन्हें (आर्य जन को) भी अकेला या असुरक्षित पाकर यातना देते हैं. अतः वे इन शत्रुओं को कोसते हैं, मनाते हैं की इनका बुरा हो.

“हे सोम देवता, जो मुझ भले मानस को भी लूट लेते हैं, जो मेरे जैसे सज्जन को भ्रष्ट कर देते हैं, उन्हें सांप काट ले, वे मौत के मुंह में चले जाएँ (७.१०४.२). जो चोर और उचक्के शत्रु हमारे अन्न और जल को दूषित कर देते हैं, घोड़ों और गायों को यातना देते हैं, हे अग्नि, उनका नाश हो जाए, उनके पूरे खानदान का नाश हो जाए (७.१०४.१०).

वैदिक संघर्ष की प्रकृति सुरक्षात्मक है न की आक्रामक

वेद पढ़ेंगे तो आपको पता चल जायेगा की वैदिक संघर्ष की प्रकृति सुरक्षात्मक है न की आक्रामक. वास्तव में देखा जाये तो यह अपने युग और परिवेश के अनुसार कम हिंसक और अधिक सहिष्णु सभ्यता थी. युद्ध उनकी विवशता थी, आत्मरक्षा का उपाय था. अतः जो उल्लेख शौर्य और युद्ध के आते हैं उनसे कहीं अधिक प्रखर है रक्षा के लिए उनके आर्तनाद जिनपर वामपंथी इतिहासकारों ने ध्यान नहीं दिया या जानबूझकर छोड़ दिया क्योंकि इनपर ध्यान देने से वैदिक लोगों को हिंसक, लूटेरा और आक्रमणकारी आरोपित नहीं किया जा सकता था. असुरों/राक्षसों से अत्याचारों और उत्पीड़नो के विरुद्ध त्राहि माम, त्राहि माम की यह पुकार वैदिक काल से लेकर परवर्ती साहित्य तक में गूंजती रहती है. वे सभी देवताओं के शौर्य की याद दिलाकर उनसे रक्षा की मांग करते हैं.

मर्त्य अघायु (शत्रु) चाहे वे पास हों या दूर, उनसे रक्षा करो, हमारी जान बचाए रखो, (१.२७.३) अग्नि, धूर्त हिंसकों से हमारी रक्षा करो. (१.३६.१५) जो हमारी जान लेना चाहते हैं, हमारे उपर क्रुद्ध रहते हैं, उनसे रक्षा करो. हे यज्ञ युप, इन नरभक्षी राक्षसों को जला डालो, इन पापियों से हमे बचाओ. (१.३६.१४) अग्नि अपने अदम्य रक्षा-उपायों से हमारी रक्षा करो. (१.९५.९) वरुण, जो चोर और उठाईगिरी हमे मारता हैं उससे हमे बचाओ. (२.२८.१०) हम कभी इन द्रोही हिंसकों के सम्पर्क में न आयें. (२.३५.६) अग्नि हमारी यज्ञ से प्रसन्न होकर इन निरंतर बढते हुए राक्षसों को मार डालो, और हमे बचाओ. (२.२३.१४) बृहस्पति इन चोरों, उचक्कों, द्रोहियों, दूसरों के माल पर नजर रखने वाले देव विरोधियों के हाथ में कहीं मुझ भक्त को न सौंप देना. (२.२३.१६) इन्द्र तुम्हारे साख के भरोसे रहने वाले हमलोगों को डर न लगे, हे अपराजिते जेता, हम तुम्हे नमस्कार करते हैं. (२.२८.१०) इन्द्र हमारे भय को दूर करे. (२.४०.१०) हे यज्ञ के देवता, हमारी ओर नजर करो, तुम्हारी रक्षा से हमारा भय दूर हो जाए. देवताओं, हमे नृशंस हिंसकों से बचाओ, इन अपकारियों से हमारी रक्षा करो.

यह खीज और विवशता अक्सर बद्दुआओं का रूप ले लेती है. शत्रुओं के जीवित सदस्य और गर्भस्थ शिशु तक मर जाएँ. जो हमें सताता है वो नरक में चला जाये (४.४.५, ६.४४.१७). अग्नि, चोरों और तस्करों को मैं तुम्हारे मुंह में झोंकता हूँ, इन्हें चबा चबा कर खा जाना, इन चोरों का मुंह नोच नोचकर खा जाना (१.७९.११). यहाँ इन शत्रुओं की स्थिति भी स्पष्ट है, ये वनचर या जंगली और कक्ष या नदी के कछार में छुपे रहकर प्रहार करने वाले या चारा लूटने वाले लोग हैं (२७.११.७७-७९). 

ऐसे डरे सहमे लोग जिनकी विवशता और कातरता की गूंज पूरे वेदों में सुनाई देती है वे भला आक्रमणकारी हो सकते हैं? वास्तव में वैदिक संघर्ष सभ्यता और उत्पादकता के अपेक्षाकृत उच्च स्तर पर पहुंचे हुए और खुशहाल लोगों का बर्बर, लूटेरे, हिंसक, घुमक्कड कबीलों, असभ्य चोरों, डाकुओं, गिरिजनों, धन-दौलत और मवेशी चुराकर भागने वालों के विरुद्ध सतत संघर्ष की कहानी है जिसे हिंदू विरोधी, धूर्त वामपंथी इतिहासकारों ने षड्यंत्र पूर्वक उपर्युक्त हिंसक, लूटेरे और बर्बर लोगों के विरुद्ध आर्य (श्रेष्ठ) जनों के आक्रमण की कहानी के रूप में पड़ोस दिया है.

जैसे आज अपेक्षाकृत समृद्ध और विकसित हिन्दू समाज आतंकवादियों, नक्सलियों, अपराधियों से अपनी रक्षा केलिए सरकार से गुहार लगाता रहता है. अपेक्षित समृद्धि और वैभव में जीते हुए, अपनी सुरक्षा के लिए चिंतित इन जनों की कामना युद्ध की नहीं शांति और व्यवस्था की है. “सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया, सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःखभाग् भवेत्“ की यही कामना वैदिक काल से आजतक भारत में और हिंदु समाज में काव्यों, मंगलाचारणों, पूजा पाठों के बाद शांति पाठों में गूंजता रहता है. शांति की इतनी उत्कट कामना तत्कालीन जगत में कहीं अन्यत्र नहीं पाया गया है. यह शांतिपाठ उसी प्राचीन ऋग्वैदिक अंश हैं जिसके आधार पर वैदिक लोगों को धूर्तता पूर्वक असभ्य, बर्बर, आक्रमणकारी सिद्ध किया जाता है.

वेदों में शांति का पाठ

इन्द्र और पूषा अन्न लाभ के लिए शांतिकारक हों, धन-धान्य सकुशल रहे, वर्षा सुखकर हो, अतिवृष्टि या अनावृष्टि न हो, खेत के मालिक आराम से रहें, फसल अच्छी हो, हवा कल्याणकारक हो, आंधी तूफान न आए, धरती और आकाश शांतिकारक हों, मौसम खराब न हो और भूचाल आदि न आये, भेषजदाता और व्याधि कारक देव रूद्र शांतिकर हों, बीमारी महामारी न आए, उत्पादन कर्म से जुड़े लोग और दान पर जीने वाले चैन से रहें, कलाकार और शिल्पी सुख शांति से रहें, नदियाँ कल्याणकारक हों बाढ़ न आये, समुद्र कल्याणकारी हों, समुद्री यात्राओं के समय तूफान आदि न आये आदि कल्पना और कामना क्या किसी असभ्य, बर्बर, पिछड़े अर्थतन्त्र से जुड़े लोगों की हो सकती है?

अथर्ववेद में इन्द्र को वणिक कहा गया है. ऋग्वेद में भी इन्द्र को बार बार मधवा अर्थात महा धनी कहा गया है. सबसे बडी बात यह है की वैश्य वर्ण की उत्पत्ति ऋग्वेद से मानी गयी है. ऋग्वेद के रचनाकारों के आश्रयदाता ये वणिक लोग ही थे. ऋग्वेद के कई सूक्त व्यापार वाणिज्य के मार्ग के बाधाओं और व्यक्तियों की सुरक्षा के गुहार से सम्बन्धित है और वैदिक लोगों के अधिकांश शत्रु वास्तव में आर्यों के व्यापार वाणिज्य के शत्रु ही प्रतीत होते हैं. सम्भव है कई सूक्त वणिकों द्वारा कराये जाने वाले यज्ञ को ध्यान में रखकर ही रचना किये गए हों. यह भी सम्भव है की आर्य शब्द का प्रयोग तब उसी अर्थ में होता हो जिस अर्थ में उत्तर वैदिक काल में श्रेष्ठि शब्द का और आज महाजन शब्द का प्रयोग होता है जो कालांतर में सम्मान सूचक शब्द के रूप में रूढ़ हो गया हो.

वेदों में जातीय संघर्ष नहीं है

वास्तव में वैदिक लोगों के शत्रु वैसे ही थे जैसे आज के संदर्भ में हमारे शत्रु हैं:

१.         व्यावसायिक शत्रु- चोर, डाकू, लूटेरे, अपहरणकर्ता, तस्कर आदि

२.         सामाजिक शत्रु- अपराधी, आतंकवादी, नक्सलवादी आदि

३.         वैचारिक शत्रु- जैसे देशभक्त, राष्ट्रवादियों और हिन्दुओं के विरोधी जिहादी, मिशनरी, देशद्रोही, वामपंथी, अर्बन नक्सली, छद्मसेकुलर आदि

४.         भू-भौतिक शत्रु- असुरों का देश पाकिस्तान के संदर्भ में देवों का देश भारत  

जैसे उपर्युक्त जातीय संघर्ष नहीं है वैसे ही वैदिक संघर्ष जातीय संघर्ष नहीं था. हम सबके पूर्वज वैदिक आर्य लोग महान थे. वैदिक सभ्यता विश्व की सबसे महान सभ्यता संस्कृति थी और वैदिक लोग भारतवर्ष के मूल निवासी और हमारे महान पूर्वज थे (पढ़ें हमारा लेख-आर्यों के आक्रमण का सिद्धांत ब्रिटिश सम्राज्यवादी षड्यंत्र था). सत्य, अहिंसा, प्रेम, बंधुत्व, शांति और विश्वबन्धुत्व उनका आशीर्वचन था. परन्तु वे अहिंसा परमोधर्मः के साथ धर्म हिंसा तथैवच के नीति का कड़ाई से पालन करते थे जो सत्य, न्याय, धर्म और खुद के अस्तित्व की रक्षा के लिए आवश्यक था.

सहायक ग्रन्थ-इतिहास, पुराण, ऋग्वेद एवं “हडप्पा सभ्यता और वैदिक साहित्य”

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