महाभारत में अर्जुन की दिग्विजय के प्रसंग में कम्बोज का लोह (लोहान) और ऋषिक जनपदों के साथ उल्लेख है (सभा. २७, २५). महाभारत के सभा पर्व के अनुसार ऋषिक जातियों ने लोहान, परमा कम्बोज के साथ मिलकर अर्जुन के दिग्विजय के दौरान उत्तरापथ के राज्यों के विजय में सहायता की थी.
यह ऋषिक जनपद मध्य एशिया के आमू दरिया और शिर दरिया के मध्य स्थित था. आधुनिक एतिहासिक शोधों से लगभग सभी इतिहासकार सहमत हैं कि भारतीय ग्रंथों में वर्णित ऋषिक जातियां चीनी ग्रंथों में वर्णित यूची लोग अर्थात कुषाण हैं. ऋषिक जाति और कुषाणों पर आधुनिक शोध परक इतिहास क्या कहता है यह जानने केलिए निचे लिंक पर पढ़ सकते हैं:
दिग्विजय के बाद इंद्रप्रस्थ में चक्रवर्ती सम्राट युधिष्ठिर का राजसूय यज्ञ हुआ. महाभारत के अनुसार इस यज्ञ में देश विदेश के अनेक राजा, महाराजा उनके लिए नाना प्रकार के भेंट लेकर उपस्थित हुए थे. उनकी उपस्थिति इतनी अधिक संख्या में थी कि उन्हें यज्ञ मंडप भवन में प्रवेश केलिए कई कई दिनों तक इंतजार करना पड़ा. चोल, पाण्ड्य आदि कई राज्यों के शासकों को तो युद्धिष्ठिर से मिले बिना ही लौट जाना पड़ा.
युद्धिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में उत्तर-उत्तर पश्चिम के देशी विदेशी राजाओं में शामिल प्रमुख लोग थे-तुषार, बाह्लिक, किरात, पहलव, परद, दरद, कम्बोज, शक, कंक, रोमक, यवन, क्षुद्रक, मालव, वृष्णिवंशी हरहून, केकय, सिंध, कश्मीर आदि जो नाना प्रकार के भेंट लेकर उपस्थित हुए थे जिनमे ऊंट, हाथी, गाय, घोडा, सोना, जवाहरात आदि थे. [महाभारत: सभापर्व, 2.51-2.53; 3.51 और 3:51]
रोमक क्या रोम के लोग थे?

महाभारत के सभा पर्व में लिखा है:
शकास तुखाराः कङ्काश च रॊमशाः शृङ्गिणॊ नराः
महागमान थूरगमान गणितान अर्बुदं हयान. (महाभारत: २:५१:२६-२९)
अर्थात, And the Sakas and Tukharas and Kankas and Romas (or Romkas) and men with horns bringing with them as tribute numerous large elephants and ten thousand horses, and hundreds and hundreds of millions of gold waited at the gate.
अर्थात, शक, तुषार (Tukhar), कंक, रोमक और सिंग पहिरे लोग विशालकाय हाथियों का झुण्ड, हजारों घोड़े, हजारों लाखों सोने के सिक्के आदि नाना प्रकार के भेंट लिए हुए द्वार पर खड़े थे.
उपर्युक्त में से अधिकांश तो उत्तर-उत्तर-पश्चिम भारत, और मध्य एशिया के विभिन्न जातियां या उनके राज्य हैं. पर सवाल है उपर्युक्त में से रोमक, यवन और सिंग पहिरे लोग कौन थे?
इतिहासकार वी एस अग्रवाल मानते हैं कि पाणिनि के अष्टाध्यायी में आये रोमक शब्द किसी देश या रोमक देश के लोगों के लिए प्रयुक्त हुआ है. (V. S. Agrawala: India as Known to Panini, 1953, p.510)
अब जरा देखिए, इनकी हिम्मत रोमक को रोमन कहने की नहीं हो रही है. अंग्रेजी दासता के प्रभाव के कारन इनकी प्रज्ञा स्वतंत्र भ्रमण नहीं कर पाती है. महाभारत के सभा पर्व में ही “रोम” शब्द का प्रयोग नगर के रूप में हुआ है.
अन्ताखीं चैव रॊमां च यवनानां पुरं तदा ।
दूतैर एव वशे चक्रे करं चैनान अथापयत (II.28.49)
उपर्युक्त से स्पष्ट है महाभारत में उल्लिखित ‘रोम’ इटली की राजधानी वाला रोम ही है और ‘रोमक’ रोम के लोगों केलिए ही प्रयोग हुआ है और यवन भी टर्की/ग्रीस वाला ही हैं जिनसे संदेश भेजकर कर वसूलने की बात है. दरअसल छोटे छोटे कमजोर राज्यों को दिग्विजय पर निकले योद्धा संदेश भेजकर ही कर चुकाकर अधीनता स्वीकार कर लेने का विकल्प देते थे.
परन्तु अंग्रेजी इतिहासकारों के दिमाग में तो ईसाईयत बैठा हुआ था जो मानते थे सृष्टि का निर्माण सिर्फ ४००४ ईस्वीपूर्व हुआ था और ईसा के जन्म के पूर्व तो सारा दुनिया असभ्य, बर्बर और यायावर थे. फिर उसके गुलाम भारत के अतीत में विकास के उच्च शिखर पर पहुंचा साम्राज्य, सम्राट और विश्विजेता कहाँ से हो सकता है. इसलिए उन्होंने रामायण, महाभारत को काल्पनिक करार दे दिया और अंग्रेजों के गुलाम भारत के वामपंथी इतिहासकारों ने उनके इस अलौकिक ज्ञान को ही परम सत्य मान लिया.
परन्तु तस्वीर की दूसरी पहलु देखिए. वराहमिहिर द्वारा दिए गये पांच सिद्धांतों में से एक सिद्धांत है “रोमक सिद्धांत” और यहाँ सभी इतिहासकार एकमत से सहमत हैं कि यहाँ रोमक सिद्धांत का मतलब रोमन सिद्धांत है, वराहमिहिर ने रोमनों से यह सिद्धांत लिया था इसलिए इसका नाम रोमक सिद्धांत रखा.
क्यों? क्योंकि अंग्रेजों ने तो इनके दिमाग में ठूंस ठूंस कर भर दिया है कि भारत में जो कुछ भी अच्छा है सब विदेशों से आयातित है यहाँ तक कि भारत के मूल निवासी हिन्दू भी. हालाँकि आधुनिक शोधार्थियों का दाबा है कि रोमनों ने यह सिद्धांत लोमश सिद्धांत से लिया है अर्थात रोमक सिद्धांत वास्तव में लोमश सिद्धांत ही है.
खैर, एम आर सिंह का मानना है कि रोमकों ने सिंध के डेल्टा क्षेत्र में रोमनों की एक बस्ती भी बसा रखी थी.
The Romakas formed a colony of the Romans near the port of Barbaricum in Sindhu Delta. [See comments: M. R. Singh in The Geographical Data of Early Purana, 1972, p. 26]
यवन क्या ग्रीस के लोग थे?

रोमनों की चर्चा महाभारत में साबित होने के बाद यवन लोग क्या ग्रीस के लोग ही थे यह प्रश्न बहुत उत्सुकता पैदा करनेवाला नहीं रह जाता है फिर भी बता दें प्राचीन ग्रंथों में पश्चिम या पश्चिमोत्तर यवनों की चर्चा जहाँ कहीं भी है वह तुर्की और ग्रीस के लोगों केलिए है. हालाँकि महाभारत में यवनों की चर्चा को देखकर ही साम्राज्यवादी और वामपंथी इतिहासकारों ने इसे दूसरी, तीसरी शताब्दी ईस्वीपूर्व का लिखा हुआ काल्पनिक काव्य घोषित कर दिया था जो अब झूठ साबित हो चूका है क्योंकि अब पश्चिमी इतिहासकारों सहित वामपंथी इतिहासकार भी महाभारत की घटना को सत्य मानने लगे हैं, हालाँकि, काल निर्धारण पर उनमें मतैक्य नहीं है.
मैंने अपने एक शोधपत्र में साबित किया है कि ग्रीस (यूनान) की प्राचीन सभ्यता, संस्कृति, धर्म, भाषा, देवी-देवता यहाँ तक की वेश भूषा भी स्थानीय परिवर्तनों के साथ भारतीय अर्थात वैदिक संस्कृति, धर्म और भाषा के ही थे न की यूरोपियन जिसे आप निचे लिंक पर पढ़ सकते हैं:
इसके अतिरिक्त कुछ नई जानकारी निचे दे रहे हैं:
महाभारत के सभापर्व में लिखा है, पश्चिम दिशा में शाकल देश के मद्र राज्य पर अपने मामा शाल्व को प्रेम से जीतकर नकुल ने समुद्र के टापुओं में रहनेवाले पहलव, यवन और शकों को हराया (महाभारत ३२:१५-१७). एक ही श्लोक में लिख देने पर स्पष्ट नहीं होता की समुद्री टापुओं पर कौन रहते थे पर हमलोग जानते हैं ग्रीस देश वस्तुतः समुद्री टापुओं पर ही बसा है जो प्रारम्भ में अलग अलग शहरों के नाम से जाने जाते थे. और शाकल देश कहाँ था? जबाब है शाकल देश या शकद्वीप मध्य एशिया को कहा जाता था क्योंकि अतिप्राचीन काल में इन समस्त क्षेत्रों पर शक बसे हुए थे. शल्य का मद्र उत्तर मद्र था और वे शाल्व के भी राजा थे जो उत्तरमद्र के पश्चिम में कैस्पियन सागर और महाभारत के अनुसार आधुनिक सीरिया की सीमा तक विस्तृत था.
महाभारत युद्ध में तुषारों, शकों और यवनों ने कम्बोज के राजा सुदक्षिना के नेत्रित्व में पांडवों के विरुद्ध कौरवों के पक्ष में युद्ध किये थे. (महाभारत: ६.६.१७-२१; ८.८८.१७)
महाभारत के आदि पर्व से जानकारी मिलती है कि यवन महाराज ययाति के पुत्र थे. महाराज ययाति ने उन्हें तुर्की का राज्य दिया था. अतः तुर्की यवन लोग ही थे. अन्यत्र उल्लेख है कि यवन वास्तव में ययाति के पुत्र तुर्वशु का ही नाम था. यवनों के देश को नकुल ने विजित किया था. श्रीमद्भागवत महापुराण में यवनों द्वारा कलियुग में भारत पर आक्रमण की भविष्यवाणी (२.४.१८) की गयी है जो सम्भवतः ३२७-३२४ ईस्वीपूर्व अलक्षेन्द्र के आक्रमण में पूरी हो गयी है. वैदिक संस्कृति और धर्म का सही से पालन नहीं करने के कारन ये म्लेच्छ कहे जाते थे.
सिंग पहने हुए लोग कौन थे?

युद्धिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में शक, तुषार (Tukhar), कंक, रोमक और सिंग पहने हुए लोग विशालकाय हाथियों का झुण्ड, हजारों घोड़े, हजारों लाखों सोने के सिक्के आदि नाना प्रकार के भेंट लिए हुए द्वार पर खड़े थे. आखिर ये सिंग पहने हुए लोग कौन थे?
पौराणिक कथाओं में दैत्यों और दानवों को सिंगवाला मुकुट पहने हुए बताया जाता है. क्या युद्धिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में शकों, तुषारों, कंकों, रोमकों, यवनों आदि के साथ दैत्य और दानव भी चक्रवर्ती सम्राट युद्धिष्ठिर केलिए भेंट लेकर आये थे? आखिर ये लोग कौन थे और कहाँ के रहनेवाले थे?
आपको जानकर आश्चर्य होगा कि यूरोप के अधिकांश लोग Dan/Dane और Diot/Diota को अपना पूर्वज मानते हैं. Dan/Dane दानव शब्द है और Diot/Diota दैत्य शब्द है. Duetsch/Duetch/Dutch शब्द दैत्य शब्द ही है और यह सर्वमान्य सत्य है. इस सम्बन्ध में विस्तार से जानने केलिए विदेशों में हमारा सबसे चर्चित शोधपत्र “अर्बस्थान, अफ्रीका और यूरोप ही पौराणिक असुर लोक था” निचे के लिंक पर पढ़िए.

आपको यह भी जानकार आश्चर्य होगा कि यूरोप के सेल्टिक अथवा केल्टिक लोग सिंग वाले टोपी पहनते थे. साथ ही प्राचीन गॉल प्रदेश (स्पेन, पुर्तगाल, फ़्रांस आदि) के लोग जो गैलिक कहे जाते थे वे भी सिंगवाला टोपी पहनते थे. इतना ही नहीं, प्राचीन रोमनों की एक देवी Uni के माथे पर भी सिंग हैं.

इससे निष्कर्ष निकलता है कि प्राचीन यूरोप के लोग सिंगवाला टोपी पहनते थे. अतः रोमनों और यवनों के साथ युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में शामिल सिंगवाले लोग निश्चय ही यूरोपियन थे. एक चक्रवर्ती सम्राट के राजसूय यज्ञ में भाग लेना या किसी सम्राट के राज्याभिषेक में भाग लेना राजनीती और कूटनीति का हिस्सा है कोई बड़ी बात नहीं. आज भी ऐसा होता है.



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