कश्मीर के प्रसिद्ध ऐतिहासिक ग्रंथ ‘राजतरंगिणी’ (जौनराज द्वारा रचित द्वितीय राजतरंगिणी) और इतिहासकार डॉ. आर.सी. मजूमदार के शोधों के आधार पर रिंचन के इतिहास और कश्मीर के बौद्धों की वास्तविक स्थिति का प्रामाणिक विवरण मिलता है।
रिंचन (मूल नाम: ल्हाचन ग्याल्बु रिंचना) लद्दाख के एक बौद्ध राजा का बेटा (राजकुमार) था। लद्दाख में हुए तख्तापलट और कबीलाई संघर्ष में अपने पिता की हत्या के बाद, वह अपनी जान बचाकर एक शरणार्थी (Fugitive) के रूप में कश्मीर घाटी आया था। उस समय कश्मीर पर हिंदू राजा सुहदेव (Suhadeva) का शासन था। राजा सुहदेव के प्रधान सेनापति/मंत्री का नाम रामचंद्र था, जिन्होंने रिंचन को शरण दी और उसे अपनी सेना में एक ऊंचा पद दिया।
रिंचन के राजा बनने की कहानी मैसूर के हैदर अली कि तरह ही विश्वासघात और राजनीतिक महत्वाकांक्षा की कहानी है। कंदहार की तरफ से एक क्रूर मंगोल आक्रांता दलूचा (Dulacha / Zulchu) ने कश्मीर पर भीषण आक्रमण कर दिया। राजा सुहदेव मंगोलों का सामना किया किन्तु अत्यधिक घायल होने के कारण युद्ध से विरत होना पड़ा तो सेनापति रामचंद्र ने घाटी की कमान संभाली। लेकिन रिंचन ने इस संकट का फायदा उठाया। उसने कूटनीति से भेष बदलकर अपने सैनिकों को रामचंद्र के किले में घुसा दिया और रामचंद्र की हत्या कर दी। रामचंद्र की हत्या के बाद रिंचन ने स्वयं को कश्मीर का राजा घोषित कर दिया और राजनीतिक रूप से अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए उसने रामचंद्र की वीर बेटी कोटा रानी से विवाह कर लिया।
रिंचन बौद्ध से ‘सदरुद्दीन शाह’ कैसे बना?
राजा बनने के बाद रिंचन को अपनी तिब्बती-बौद्ध पहचान के कारण कश्मीर की बहुसंख्यक हिंदू जनता और सामंतों से मान्यता नहीं मिल पा रही थी। जौनराज की राजतरंगिणी के अनुसार, रिंचन कश्मीर की मुख्यधारा में शामिल होने के लिए शैव हिंदू धर्म (Shaivism) अपनाना चाहता था। उसने कश्मीर के मुख्य पुरोहित देवस्वामी से दीक्षा देने का अनुरोध किया। परंतु देवस्वामी ने यह कहते हुए उसे हिंदू धर्म में शामिल करने से मना कर दिया कि वह एक बौद्ध है, उसका कोई निश्चित वर्ण नहीं है और उसने अपने ही संरक्षक रामचंद्र की हत्या की है। सिंध मे कासिम द्वारा जबरन धर्मांतरित हिंदुओं की घर वापसी को रोकने के बाद यह इतिहास कि दूसरी सबसे बड़ी भूल साबित हुई।
हिंदू धर्म में प्रवेश न मिलने से आहत और राजनीतिक रूप से असुरक्षित रिंचन ने अंततः तुर्कमेनिस्तान से आए सूफी संत सय्यद शराफुद्दीन (बुलबुल शाह) के प्रभाव में आकर इस्लाम स्वीकार कर लिया। इस्लाम अपनाने के बाद उसका नाम सुल्तान सदरुद्दीन शाह रखा गया और वह कश्मीर का पहला मुस्लिम शासक बना। रिंचन के इस्लाम अपनाने के बाद कश्मीर का इस्लामीकरण शुरू हुआ।
कश्मीर के इस्लामीकरण का इतिहास
कश्मीर के इस्लामीकरण का इतिहास अत्यंत दर्दनाक, जटिल और दीर्घकालिक चरणों में विभाजित है। यह प्रक्रिया केवल राजा रिंचन के समय से शुरू होकर बाद के सुल्तानों, विशेष रूप से सुल्तान सिकंदर ‘बुतशिकन’ के शासनकाल में अपने सबसे क्रूर और हिंसक चरम पर पहुँची। कल्हण की राजतरंगिणी को आगे बढ़ाते हुए इतिहासकारों जौनराज और श्रीवर द्वारा रचित ग्रंथों, तथा आधुनिक इतिहासकार डॉ. आर.सी. मजूमदार और प्रो. सतीश गंजू के शोधों के आधार पर जम्मू-कश्मीर में हिंदुओं और बौद्धों के जबरन धर्म परिवर्तन का प्रामाणिक, चरणबद्ध और क्रमवार ऐतिहासिक विवरण मिलता है।
चरण 1: राजा रिंचन (सुल्तान सदरुद्दीन) का काल (1320–1323 ईस्वी)
लद्दाख के बौद्ध राजकुमार रिंचन ने सत्ता हथियाने के बाद जब सूफी संत (आतंकी) बुलबुल शाह के प्रभाव में आकर इस्लाम अपनाया, तो कश्मीर में राजनीतिक और धार्मिक परिवर्तन की नींव पड़ी। रिंचन के मुसलमान बनते ही कश्मीर का राजकीय धर्म इस्लाम घोषित हो गया। उसने अपनी नई धार्मिक निष्ठा साबित करने के लिए श्रीनगर में एक बड़े बौद्ध मंदिर को तुड़वाकर उस स्थान पर कश्मीर की पहली मस्जिद बनवाई, जिसे स्थानीय इतिहास में ‘बुड मसीत’ (Bud Masheed) कहा गया (जहाँ ‘बुड’ शब्द ‘बुद्ध’ या बौद्ध मंदिर का सूचक था
रिंचन ने अपने चचेरे ससुर रावणचंद्र (सेनापति रामचंद्र के पुत्र) और अपने साथ आए लद्दाखी बौद्ध सैनिकों का सबसे पहले धर्मांतरण कराया। राजकीय संरक्षण मिलने के कारण सीमावर्ती क्षेत्रों के कमजोर और असंगठित बौद्ध संघों तथा निचले सामाजिक वर्गों के हिंदुओं का इस्लाम में जबरन धर्मांतरण तेजी से शुरू हुआ, जिससे उनकी संख्या में भारी गिरावट आई।
कोटा रानी का बलिदान
राजा रिंचन की मृत्यु (1323 ईस्वी) से लेकर शाहमीर वंश की स्थापना (1339 ईस्वी) के बीच का 16 वर्षों का कालखंड कश्मीर के इतिहास का सबसे नाटकीय, साज़िशों से भरा और उतार-चढ़ाव वाला दौर था। इस पूरे संक्रमण काल की धुरी रानी कोटा रानी थीं। उन्होंने कश्मीर को मुस्लिम नियंत्रण में जाने से रोकने के लिए अदम्य साहस, राजनीतिक चतुरता और युद्ध नीति का परिचय दिया था। जौनराज की ‘द्वितीय राजतरंगिणी’ और इतिहासकार डॉ. आर.सी. मजूमदार के विवरणों के आधार पर इस 16 वर्षों के कालखंड और कोटा रानी के ऐतिहासिक संघर्ष का विस्तृत विवरण मिलता है।
1323 ईस्वी में राजा रिंचन (जो मुसलमान बन चुका था) की एक आंतरिक विद्रोह के घावों के कारण मृत्यु हो गई। रिंचन और कोटा रानी का एक छोटा बेटा था, जिसका नाम हैदर था। हैदर अभी बच्चा था और कश्मीर के सामंत (लवाण्य/डामर) एक मुस्लिम बच्चे को राजा स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे। कोटा रानी ने दूरदर्शिता दिखाते हुए अपने नाबालिग बेटे को सिंहासन पर बिठाने का जोखिम नहीं लिया। उन्होंने रिंचन के कट्टर सहयोगियों को दरकिनार किया और कश्मीर के पुराने राजवंश को पुनर्जीवित करने का फैसला किया। कहा ये भी जाता है कि रिंचन के मुसलमान बनने के बाद कश्मीरी संस्कृति और सनातन धर्म कि रक्षा के लिए कोटा रानी ने भी घायल रिंचन को मृत्युदवार तक पहुंचाने मे भूमिका निभाई थी।
कोटा रानी ने किश्तवाड़ में छुपे हुए पूर्व राजा सुहदेव के भाई उदयनदेव को वापस बुलाया। कोटा रानी ने उदयनदेव से विवाह कर लिया और उन्हें कश्मीर का वैध राजा घोषित कर दिया। राजा उदयनदेव कमजोर और डरपोक स्वभाव के थे। इसलिए शासन की वास्तविक बागडोर कोटा रानी के हाथों में ही रही।
इसी दौरान शाहमीर नामक एक स्वामिभक्त मुस्लिम दरबारी, जो स्वात (आधुनिक पाकिस्तान) से आकर सुहदेव की सेना में भर्ती हुआ था, अपनी प्रशासनिक क्षमता के कारण तेजी से ऊपर उठा। कोटा रानी ने शाहमीर की वफादारी को देखते हुए उसे अपने बेटों का संरक्षक और सेना का एक बड़ा पद सौंप दिया। यह आगे चलकर एक बहुत बड़ी रणनीतिक भूल साबित हुई।
1331 ईस्वी में कश्मीर पर एक बार फिर से अचला (Achala) के नेतृत्व में भीषण मंगोल/तुर्क आक्रमण हुआ। इस आक्रमण ने इतिहास का रुख बदल दिया। मंगोलों के डर से राजा उदयनदेव डरकर लद्दाख की ओर भाग गए। पूरी कश्मीर घाटी में अराजकता फैल गई। इस संकट में कोटा रानी ने भागने के बजाय डटकर मुकाबला करने की नीति अपनाई। उन्होंने भागती हुई कश्मीरी सेना को इकट्ठा किया और शाहमीर के सैन्य सहयोग से मंगोलों के खिलाफ मोर्चा संभाला।
जब कोटा रानी को लगा कि वे सैन्य बल से मंगोलों को पूरी तरह नहीं हरा सकतीं, तो उन्होंने कूटनीति का सहारा लिया। उन्होंने आक्रांता अचला के पास गुप्त संदेश भिजवाया कि राजा तो भाग चुका है, इसलिए वे अचला को ही कश्मीर का राजा स्वीकार करने के लिए तैयार हैं। अचला इस झांसे में आ गया और उसने अपनी सेना का एक बड़ा हिस्सा वापस भेज दिया। जैसे ही मंगोल सेना कमजोर हुई, कोटा रानी और शाहमीर ने अचानक हमला करके अचला का वध कर दिया और मंगोल सेना को खदेड़ दिया।
इस महान विजय के बाद राजा उदयनदेव लज्जित होकर वापस लौटे, लेकिन कश्मीर की जनता की नजरों में अब असली नायक कोटा रानी थीं। शाहमीर की लोकप्रियता भी सेना में बहुत बढ़ चुकी थी। राजा उदयनदेव की मृत्यु के बाद कोटा रानी ने स्वयं को स्वतंत्र शासिका घोषित कर दिया। उन्होंने अपनी राजधानी श्रीनगर से हटाकर सुरक्षित अंधकोट के किले में स्थानांतरित कर ली।
शाहमीर की राजनीतिक महत्वाकांक्षा अब चरम पर थी। उसने देखा कि सिंहासन खाली है और राजा के वफादार सामंत बिखरे हुए हैं। उसने कोटा रानी के मुख्य प्रधानमंत्री भिक्षु भट की हत्या करवा दी और अंधकोट के किले को चारों तरफ से घेर लिया। शाहमीर ने कोटा रानी के सामने प्रस्ताव रखा कि यदि वे उससे विवाह कर लें और सत्ता उसके साथ साझा करें, तो वह उन्हें रानी बनाए रखेगा। किले के भीतर रसद खत्म होने और अपने सरदारों के विश्वासघात के कारण कोटा रानी को आत्मसमर्पण करना पड़ा।
1339 ईस्वी में शाहमीर ने स्वयं को सुल्तान शम्सुद्दीन घोषित किया और कश्मीर में शाहमीर वंश की नींव रखी। विवाह की रात कोटा रानी ने जो किया, वह भारतीय इतिहास में गौरव और स्वाभिमान का प्रतीक माना जाता है। जौनराज की राजतरंगिणी के अनुसार, कोटा रानी विवाह के मंडप/कक्ष में सज-धज कर बैठी थीं। जैसे ही शाहमीर राजा की पोशाक में कक्ष के भीतर प्रविष्ट हुआ, कोटा रानी ने अपनी चोली में छुपाया हुआ तीक्ष्ण खंजर निकाला और स्वयं के पेट में घोपकर आत्महत्या कर ली। मरने से पहले उन्होंने शाहमीर को धिक्कारते हुए कहा कि उसने विश्वासघात से सत्ता पाई है और वह कभी एक कश्मीरी रानी की अस्मत को नहीं छू सकेगा।
1323 से 1339 ईस्वी का यह कालखंड विशुद्ध रूप से कोटा रानी के राजनीतिक चातुर्य और शाहमीर की बढ़ती महत्वाकांक्षा के बीच का संघर्ष था। कोटा रानी की मृत्यु के साथ ही कश्मीर का आखिरी स्वतंत्र हिंदू राजवंश समाप्त हो गया और शाहमीर वंश के सत्ता में आते ही अगले चरणों में सूफियों का प्रभाव बढ़ा, जिसने आगे चलकर सुल्तान सिकंदर बुतशिकन के समय हिंदुओं और बौद्धों के भयानक उत्पीड़न का मार्ग प्रशस्त किया।
चरण 2: शाहमीर वंश का उदय और ईरान/मध्य एशिया से सूफियों (आतंकियों) का आगमन (1339–1389 ईस्वी)
रिंचन की मृत्यु और हिंदू रानी कोटा रानी के बलिदान के बाद शाहमीर (सुल्तान शम्सुद्दीन) ने 1339 ईस्वी में कश्मीर में स्थायी मुस्लिम शासन की स्थापना की। इस काल में धर्मांतरण वैचारिक और रणनीतिक रूप से अधिक आक्रामक हो गया। इस दौरान ईरान और मध्य एशिया (विशेषकर हमदान) से बड़ी संख्या में कट्टरपंथी (आतंकी) सूफी और धर्म प्रचारक कश्मीर आए। इनमें सबसे प्रमुख मीर सय्यद अली हमदानी थे, जो अपने साथ 700 अरबी और ईरानी अनुयायियों को लेकर आए थे। इन बाहरी प्रचारकों ने कश्मीर की पारंपरिक शैव हिंदू और बौद्ध श्रमण संस्कृति को पूरी तरह समाप्त करने के लिए ईरानी-अरबी संस्कृति, शरिया कानून और अरबी लिपि को थोपना शुरू किया। स्थानीय रीति-रिवाजों पर प्रतिबंध लगाए गए ताकि गैर-मुसलमानों पर मानसिक और सामाजिक दबाव बनाया जा सके।
कश्मीर के इतिहास में हिंदुओं और बौद्धों का सबसे भयानक, हिंसक और समूल विनाश सुल्तान सिकंदर के समय हुआ। सूफी (आतंकी) मीर मोहम्मद हमदानी के उकसावे पर सिकंदर ने खुद को ‘बुतशिकन’ (मूर्तियों को तोड़ने वाला आक्रांता) घोषित कर दिया। उसने गैर-मुसलमानों के सामने तीन कुख्यात विकल्प रखे: धर्मांतरण (इस्लाम स्वीकार करो), निर्वासन (कश्मीर छोड़ भाग जाओ) या मृत्यु (तलवार के घाट उतर जाओ)। सिकंदर ने कश्मीर की वास्तुकला के गौरव, ललितादित्य मुक्तापीड़ द्वारा निर्मित मार्तंड सूर्य मंदिर और विजेशवर मंदिर को बारूद, छैनी और आग लगाकर हफ़्तों की मशक्कत के बाद खंडहर में तब्दील कर दिया। श्रीनगर में स्थित बुद्ध की एक विशालकाय ऐतिहासिक कांस्य प्रतिमा को पिघलाकर आक्रांताओं ने कूटनीतिक सिक्के बनवाए.
हिंदुओं के माथे पर तिलक लगाने, शंख बजाने, मंदिरों की घंटियाँ नाद करने और धार्मिक उत्सवों पर पूर्ण रोक लगा दी गई। मूर्तिशिल्प, संगीत, नृत्य और नाट्य कलाओं को पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया गया। जो हिंदू और बौद्ध कश्मीर छोड़कर नहीं गए, उन पर अत्यधिक भारी ‘जज़िया कर’ थोपा गया। यहाँ तक कि मृतकों का पारंपरिक रीति-रिवाजों से दाह-संस्कार करने के लिए हिंदुओं को 4 तोला चांदी का कर चुकाना पड़ता था।
जौनराज की राजतरंगिणी के अनुसार, हज़ारों कश्मीरी ब्राह्मणों ने इस्लाम स्वीकार करने से मना कर दिया, जिसके कारण उन्हें मौत के घाट उतार दिया गया। मारे गए हिंदुओं के शरीर से उतारे गए जनेऊओं (Yajnopavita) के ढेरों को सुल्तान के आदेश पर सरेआम आग लगा दी गई, जिसका वजन कई मनों में था। इस खौफनाक दमन के कारण अधिकांश आबादी ने जान बचाने के लिए जबरन इस्लाम स्वीकार कर लिया और कश्मीरी पंडितों का पहला बड़ा पलायन (Exodus) हुआ।
चरण 3 : सुहा भट्ट (सैफुद्दीन) और मूसा रैना जैसे नव-धर्मान्तरितों की अति-कट्टरता
इतिहास गवाह है कि जो स्थानीय लोग डर या लालच में धर्म परिवर्तन कर मुसलमान बने, उन्होंने मुस्लिम शासकों का विश्वास जीतने के लिए अपने ही पूर्व भाइयों (हिंदुओं-बौद्धों) पर आक्रांताओं से भी अधिक क्रूर अत्याचार किए। सुहा भट्ट मूल रूप से एक कश्मीरी ब्राह्मण था जो सुल्तान सिकंदर का प्रधानमंत्री बना और बाद में मुसलमान बनकर अपना नाम ‘सैफुद्दीन’ रख लिया। कश्मीरी हिंदुओं की बची-खुची जड़ों को खोदने का काम इसी ने किया। उसने चुन-चुनकर हिंदू पुस्तकालयों के अमूल्य प्राचीन ग्रंथों और पांडुलिपियों को डल झील में फिंकवा दिया या जलवा दिया।
इसी तरह 15वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में एक अन्य नव-धर्मान्तरित अधिकारी मूसा रैना ने सूफी (आतंकी) शम्सुद्दीन इराकी के साथ मिलकर बचे-खुचे बौद्धों और हिंदुओं का बड़े पैमाने पर जबरन धर्मांतरण और कत्लेआम कराया। जिसने विरोध किया, उसे सूफी खानकाहों के सामने सरेआम कत्ल कर दिया गया।
चरण 4: अफगान शासन का अंधकार युग (1753–1819 AD)
मुगल काल में कुछ समय के लिए ज़ैन-उल-आबिदीन (जिन्होंने कुछ नरमी दिखाई थी) और मुगलों की नीतियों के कारण शांति रही, लेकिन 1753 ईस्वी में जब कश्मीर अफगान शासक अहमद शाह अब्दाली के नियंत्रण में गया, तो दमन का आखिरी और सबसे क्रूर अध्याय शुरू हुआ। अफगान गवर्नरों (जैसे असद खान, मीर हजार खान) के समय हिंदुओं को बोरे में बंद करके झेलम नदी में डुबोकर मार दिया जाता था। कश्मीरी महिलाओं की अस्मत लूटी गई और जो भी कश्मीरी हिंदू या बौद्ध परिवार बचे थे, उन्हें पूरी तरह से घाटी छोड़ने या पूरी तरह समाप्त होने पर विवश कर दिया गया। 1819 ईस्वी में महाराजा रणजीत सिंह द्वारा सिखों की विजय से पहले तक कश्मीर का जनसांख्यिकीय ढांचा पूरी तरह बदल चुका था और बौद्ध व हिंदू आबादी नाममात्र की रह गई थी।
उपसंहार
काश्मीर में हिंदू और बौद्ध संस्कृतियों के दमन, जबरन धर्मांतरण और क्रूर नरसंहार की प्रक्रिया मध्यकाल (विशेष रूप से 14वीं से 18वीं शताब्दी के बीच) के इतिहास का एक अत्यंत दुखद अध्याय है। यह धार्मिक बदलाव केवल सैन्य सुल्तानों के बल पर नहीं हुआ, बल्कि मध्य एशिया से आए कट्टरपंथी (आतंकी) सूफियों और सुल्तानों के प्रशासनिक तंत्र के गठजोड़ का परिणाम था।
सूफी (आतंकी) शम्सुद्दीन इराकी ने सुल्तान फतह शाह और अपने नव-धर्मान्तरित अधिकारी मूसा रैना के साथ मिलकर एक अत्यंत आक्रामक अभियान चलाया। इतिहासकार मिर्जा हैदर दुगलत ने अपनी पुस्तक ‘तारीख-ए-रशीदी’ में लिखा है कि इराकी के आदेश पर बचे-खुचे बौद्धों और हिंदुओं का प्रतिदिन सामूहिक धर्मांतरण कराया जाता था। जिन्होंने विरोध किया, उन्हें सूफी खानकाहों के सामने बेरहमी से मार दिया जाता था। इस काल के बाद काश्मीर घाटी में बौद्ध धर्म लगभग पूरी तरह समाप्त हो गया। युद्ध और दमन के दौरान बंदी बनाई गई गैर-मुस्लिम महिलाओं को गुलाम (Sex Slave) बनाकर मध्य एशिया के बाजारों में भेजने या हरम में रखने के साक्ष्य फारसी ग्रंथों में मिलते हैं।
प्रामाणिक ऐतिहासिक स्रोत:
1. ‘द्वितीय राजतरंगिणी’ — जौनराज (Sanskrit Text): 14वीं-15वीं शताब्दी का समकालीन कश्मीरी ग्रंथ, जो रिंचन के धर्म परिवर्तन और सिकंदर बुतशिनक की क्रूरताओं का चश्मदीद गवाह है।
2. ‘तारीख-ए-रशीदी’ — मिर्जा हैदर दुगलत: मध्यकालीन फारसी ग्रंथ जो कश्मीर के धार्मिक बदलावों का सैन्य विवरण देता है।
3. ‘Kashmir: The Indigenous Struggle Against Immigrant Encroachment’ — प्रो. सतीश गंजू: आधुनिक ऐतिहासिक शोध ग्रंथ जो सूफियों के आगमन और कश्मीरी संस्कृति के विनाश को रेखांकित करता है।
4. ‘तारीख-ए-काश्मीर’ — सय्यद अली: मध्यकालीन फारसी स्रोत जो सुल्तानों और सूफियों द्वारा मंदिरों को तोड़े जाने की घटनाओं को धार्मिक विजय के रूप में दर्ज करता है।


