राहुल गांधी जैसा मंद बुद्धि, मूर्ख जिसे भारतीय सभ्यता, संस्कृति, धर्म, परंपरा का क ख ग भी पता नहीं है वह पुणे के अपने गूंज कार्यक्रम में मनुस्मृति कि आलोचना और मनुस्मृति के आधार पर सनातन धर्म मे महिलाओं कि बुरी स्थिति साबित करने का कुत्सित प्रयत्न कर रहा था। सवाल है वह अपने पिता का मुस्लिम (या पारसी) धर्म या माता के ईसाई धर्म मे महिलाओं कि दुर्गति पर चर्चा क्यों नहीं करता है? इस भारत विरोधी, हिन्दू विरोधी, सनातन धर्म विरोधी जाहिल आदमी को छोड़िए मैं दावा करता हूँ मनुस्मृति कि आलोचना करने वाले 99% कॉन्ग्रेसी, वामपंथी, जिहादी, मिशनरी, भीमटा या सिकुलरों ने कभी मनुस्मृति नहीं पढ़ा होगा। खैर, इन नीच, दोगले, बिन पेंदी के लोटे नेताओं को छोड़िए, हमलोग इस्लाम, इसाईयत और मनुस्मृति मे वर्णित स्त्रियों कि सामाजिक, धार्मिक स्थिति और अधिकारों को देखने और समझने का प्रयास करते हैं ताकि उपर्युक्त प्रकार के भारत विरोधी, हिन्दू विरोधी, सनातन धर्म विरोधी दिमागी नक्सलियों को मुंहतोड़ जबाब दे सकें।
इस्लाम मे महिलाओं कि स्थिति
इस्लाम में महिलाओं की सामाजिक, धार्मिक और पारिवारिक स्थिति, आयतों और हदीसों मे, पुरुषों को प्राथमिकता देते हैं या महिलाओं की स्वतंत्रता को सीमित करते हैं।
1. पारिवारिक स्थिति (Marital & Domestic Status)
* पुरुषों की प्रधानता और अनुशासन ([Surah An-Nisa 4:34]
“पुरुष महिलाओं पर कव्वाम (संरक्षक/प्रबंधक) हैं, क्योंकि अल्लाह ने उनमें से एक को दूसरे पर श्रेष्ठता दी है और इसलिए कि वे अपने धन में से खर्च करते हैं… और जिन महिलाओं से तुम्हें अवज्ञा (नूशूज़) का डर हो, उन्हें समझाओ, फिर उन्हें बिस्तरों पर अकेला छोड़ दो, और (यदि आवश्यक हो तो) उन्हें प्रताड़ित करो/मारो (अदरिबुहुन्ना)।”
* बहुविवाह की अनुमति ([Surah An-Nisa 4:3])
“…तो अपनी पसंद की औरतों से निकाह कर लो, दो-दो, तीन-तीन, चार-चार से; लेकिन यदि तुम्हें डर हो कि तुम न्याय नहीं कर पाओगे, तो केवल एक ही…”
* शारीरिक संबंध की अनिवार्यता ([Surah Al-Baqarah 2:223]) एवं हदीस:
“तुम्हारी पत्नियाँ तुम्हारे लिए खेती की तरह हैं, इसलिए अपनी खेती में जैसे चाहो आओ…”
* सम्बन्धित हदीस (Sahih al-Bukhari 5193): पैगंबर मुहम्मद ने कहा कि यदि कोई पुरुष अपनी पत्नी को बिस्तर पर बुलाए और वह आने से इनकार कर दे, तो फरिश्ते सुबह तक उस पर लानत (श्राप) भेजते हैं।
2. सामाजिक और कानूनी स्थिति (Social & Legal Status)
कानूनी गवाही, उत्तराधिकार (विरासत) और सामाजिक स्वतंत्रता के मामलों में महिला और पुरुष के अधिकारों में अंतर रखा गया है।
* गवाही में आधा दर्जा (Surah Al-Baqarah 2:282):
“…और अपने पुरुषों में से दो गवाह बना लो। यदि दो पुरुष न हों, तो एक पुरुष और दो महिलाएँ—जिन्हें तुम गवाह के रूप में पसंद करो—ताकि यदि उनमें से एक भूल जाए, तो दूसरी उसे याद दिला सके।”
* सम्बन्धित हदीस (Sahih al-Bukhari 304): एक विमर्श के दौरान पैगंबर ने महिलाओं की गवाही के इसी आधे दर्जे का उल्लेख करते हुए इसे उनके “अक्ल (बुद्धि) की कमी” का संकेत कहा था।
* विरासत (उत्तराधिकार) में आधा हिस्सा ([Surah An-Nisa 4:11])
“अल्लाह तुम्हें तुम्हारी औलाद के बारे में वसीयत करता है: लड़के का हिस्सा दो लड़कियों के बराबर होगा…”
* नेतृत्व और शासन (Sahih al-Bukhari 4425):
पैगंबर मुहम्मद ने कहा: “वह कौम (राष्ट्र) कभी कामयाब नहीं हो सकती जिसने अपने मामलों की बागडोर किसी महिला के हाथ में सौंप दी हो।”
3. धार्मिक और जैविक स्थिति (Religious & Spiritual Status)
* मासिक धर्म के दौरान प्रतिबंध (Surah Al-Baqarah 2:222) एवं हदीस:
“वे आपसे मासिक धर्म के बारे में पूछते हैं। कहो, ‘यह एक अशुद्धता/कष्ट है, इसलिए मासिक धर्म के दौरान महिलाओं से अलग रहें और जब तक वे पवित्र न हो जाएं, उनके पास न जाएं…'”
* सम्बन्धित हदीस (Sahih al-Bukhari 304): इसी संदर्भ में हदीस उल्लेख करती है कि मासिक धर्म के दिनों में महिलाओं की नमाज और रोजे छूट जाने के कारण पैगंबर ने इसे उनके “दीन (धार्मिकता) की कमी” कहा था।
## तीन तलाक (Triple Talaq / Talaq-e-Biddat) यह मुस्लिम औरतों पर हमेशा तलवार कि तरह लटकता रहता है ताकि औरतें हमेशा पुरुषों का गुलाम बना रहे और उनके ऊपर होने वाले शारीरिक, मानसिक और यौन उत्पीड़न का विरोध नहीं कर सके। सबसे दुखद पहलू तो यह है कि सब्जी मे नमक ज्यादा होने, सोशल मीडिया पर फोटो डालने आदि जैसे छोटे छोटे मुद्दे पर तलाक जैसे गुनाह शौहर करता है पर पुनर्निकाह हेतु हलाला के नाम पर बलात्कार कि सजा भुगतना पड़ता है खातूनों को जो सभ्य समाज मे कलंक है। ऐसी सकड़ों खातूने हलाला के दर्द को बयान करती मिल जाएगी। परिवरिक माहौल तो बहुत ही खराब है। कौन बेटी कब बहु बन जाए, बहु बेगम, बेगम माँ और माँ बेगम बन जाए कहना मुश्किल है। ऐसे दर्जनों उदाहरण भरे पड़े हैं परंतु धर्म और इस्लामिक समाज से बहिष्कार और अत्याचार के भय से खातूने खामोश रहती है।
## निकाह हलाला (Nikah Halala)
यदि कोई पुरुष अपनी पत्नी को तलाक दे देता है, तो वे सीधे दोबारा निकाह नहीं कर सकते।
* कुरान की आयत (सूरह अल-बकरा, 2:230):
“फिर यदि वह उसे (तीसरी बार) तलाक दे दे, तो वह उसके लिए तब तक वैध (हलाल) नहीं होगी जब तक कि वह किसी दूसरे पुरुष से निकाह न कर ले। फिर यदि वह (दूसरा पति) उसे तलाक दे दे, तो उन दोनों (पहले पति-पत्नी) पर कोई गुनाह नहीं कि वे आपस में फिर मिल जाएँ…”
## निकाह मुताह (Nikah Mut’ah / Temporary Marriage)
मुताह एक ऐसा निकाह है जो एक निश्चित समय (जैसे कुछ दिन या महीने) के लिए महर (धन) तय करके किया जाता है और समय पूरा होते ही वह स्वतः समाप्त हो जाता है।
यह एक प्रकार से मुस्लिम बच्चियों से वेश्यावृत्ति कराना है। हैदराबाद के मुसलमान अपनी छोटी छोटी बेटियों को अरबी शेखों से मोटे मोटे पैसे लेकर उन्हें कुछ घंटे, कुछ दिन, कुछ सप्ताह यहाँ तक कुछ महीनों तक भोगने के लिए भेज देते हैं। कश्मीर पर लिखे गए कई पुस्तकों से पता चलता है कि वहाँ के मुसलमान अपनी बेटियों और बहनों को मुतह निकाह कर छह छह महीनों तक आतंकवादियों द्वारा भोगने के लिए भेज देते थे। यह मुस्लिम बच्चियों पर खुला अत्याचार है जिसे धर्म कि आड़ मे डरा धमकाकर कराया जाता है।
## बुर्का / परदा (Hijab and Veil)
कुरान में ‘बुर्का’ शब्द का उल्लेख नहीं है, लेकिन महिलाओं और पुरुषों दोनों के लिए ‘हिजाब’ (परदा/शालीनता) और ‘जिलबाब’ (चादर/लंबा पहनावा) के स्पष्ट आदेश हैं।
* शालीनता और नजरें नीची रखने का आदेश (सूरह अन-नूर, 24:31):
“और मोमिन औरतों से कहो कि वे अपनी नजरें नीची रखें और अपने गुप्तांगों की रक्षा करें, और अपनी सुंदरता को प्रकट न करें, सिवाय उसके जो स्वतः प्रकट हो जाए (जैसे चेहरा और हाथ)… और वे अपने सीनों पर अपनी ओढ़नियाँ (खिमर) डाले रहें…”
* बाहर निकलते समय बड़ी चादर ओढ़ना (सूरह अल-अहजाब, 33:59):
“हे पैगंबर! अपनी पत्नियों, अपनी बेटियों और मोमिनों की औरतों से कह दो कि वे अपने ऊपर अपनी चादरों (जिलबाब) का कुछ हिस्सा लटका लिया करें। यह अधिक उपयुक्त है ताकि वे पहचान ली जाएँ और उन्हें सताया न जाए…”
कुरान, हदीस और शरिया के अनुसार मुस्लिम स्त्रियों कि वास्तविक स्थति जानना हो तो अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान शासन मे महिलाओं कि स्थति देखें जहां महिलाओं के अधिकारों को पूरी तरह से समाप्त करने के लिए 100 से अधिक कठोर फरमान जारी किए हैं। वैश्विक मानवाधिकार संगठनों, संयुक्त राष्ट्र (UN), और सभ्य समाज ने इन कड़े कानूनों को “जेंडर अपार्थाइड” (लैंगिक रंगभेद) और “मानवता के खिलाफ अपराध” की संज्ञा दी है।
तालिबान द्वारा महिलाओं के खिलाफ जारी किए गए मुख्य तानाशाही फरमानों का विवरण इस प्रकार है: 1. सार्वजनिक रूप से आवाज और चेहरे पर प्रतिबंध (Morality Laws & Erasure of Voice)
* आवाज उठाने पर प्रतिबंध: तालिबान के सदाचार मंत्रालय (PVPV) के नियमों के अनुसार, महिलाओं की आवाज को ‘अशुद्ध या छुपाने योग्य’ (औराह) माना गया है। महिलाएँ सार्वजनिक स्थानों पर न तो ज़ोर से बात कर सकती हैं, न कोई धार्मिक पाठ पढ़ सकती हैं और न ही गाना गा सकती हैं।
* पूर्ण बुर्का और चेहरा ढकना अनिवार्य: घर से बाहर निकलने पर महिलाओं के लिए ऐसा बुर्का या हिजाब पहनना अनिवार्य है जो सिर से पैर तक उनके पूरे शरीर और चेहरे को पूरी तरह ढक दे। कपड़े पतले, तंग या छोटे नहीं होने चाहिए।
2. शिक्षा पर पूर्ण प्रतिबंध (Education Ban)
* छठी कक्षा के बाद पढ़ाई बंद: अफ़ग़ानिस्तान दुनिया का इकलौता ऐसा देश है जहाँ लड़कियों को कक्षा 6 (12 वर्ष की आयु) के बाद स्कूल जाने की अनुमति नहीं है। हालांकि यह भी उदारता है। इस्लाम तो औरतों के शिक्षा की पूरी तरह मुखालफत करता है।
* विश्वविद्यालयों पर ताला: महिलाओं के उच्च शिक्षा और यूनिवर्सिटी जाने पर पूरी तरह से रोक लगा दी गई है। चिकित्सा और मिडवाइफरी (दाइयों की पढ़ाई) जैसे क्षेत्रों में भी महिलाओं के पढ़ने पर प्रतिबंध है।
3. आवाजाही की स्वतंत्रता का अंत (Restrictions on Movement)
* ‘महरम’ (पुरुष अभिभावक) की अनिवार्यता: कोई भी महिला अपने घर से अकेले दूर (70 किमी से अधिक) यात्रा नहीं कर सकती। बाहर निकलने के लिए उनके साथ उनके पति, पिता या भाई जैसे किसी पुरुष रिश्तेदार का होना कानूनी रूप से अनिवार्य है।
* पार्क, जिम और सैलून पर प्रतिबंध: महिलाओं के सार्वजनिक पार्कों, जिमों, मनोरंजन स्थलों और ब्यूटी पार्लरों में जाने पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया है।
4. रोजगार और आजीविका छीनना (Employment Ban)
* नौकरियों से बेदखल: महिलाओं को सरकारी दफ्तरों, निजी कंपनियों, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) में काम करने से रोक दिया गया है।
* आर्थिक निर्भरता: ब्यूटी सैलून बंद होने और काम के अधिकार छिनने से लाखों महिलाएँ पूरी तरह पुरुषों पर आश्रित हो गई हैं।
5. कानूनी और पारिवारिक असमानता (Legal Oppression & Child Marriage)
* घरेलू हिंसा को छूट: 2026 में जारी नए पीनल कोड (Decree No. 12) के तहत पतियों को अपनी पत्नियों को शारीरिक दंड देने की कानूनी अनुमति दी गई है, बशर्ते उससे हड्डियां न टूटें। घरेलू हिंसा के खिलाफ महिलाओं के कानूनी संरक्षण को खत्म कर दिया गया है।
* बाल विवाह को बढ़ावा (Decree No. 18): नए कानूनी फरमानों के तहत विवाह के लिए सहमति की न्यूनतम आयु को समाप्त कर दिया गया है। यदि कोई नाबालिग लड़की शादी के प्रस्ताव पर चुप रहती है, तो कानूनन उसे उसकी “सहमति” मान लिया जाता है, जिससे बाल विवाह और जबरन विवाह के मामले तेज़ी से बढ़े हैं।
* तलाक के अधिकारों का खात्मा: महिलाओं के लिए शादी से अलग होना (तलाक लेना) लगभग असंभव बना दिया गया है, जबकि पुरुषों को एकतरफा तलाक के असीमित अधिकार दिए गए हैं।
6. स्वास्थ्य सेवाओं में संकट (Healthcare Crisis)
* पुरुष डॉक्टरों से इलाज पर रोक: सांस्कृतिक और प्रशासनिक पाबंदियों के कारण महिलाएँ पुरुष डॉक्टरों से अपना इलाज नहीं करवा सकतीं। दूसरी ओर, महिलाओं की पढ़ाई पर रोक के कारण महिला डॉक्टरों की संख्या लगातार घट रही है। यहाँ तक कि अस्पतालों के ऑपरेशन थिएटरों में भी मॉरलिटी पुलिस यह जांचने पहुँच जाती है कि महिला स्वास्थ्यकर्मी के साथ ‘महरम’ है या नहीं।
## सभ्य समाज और वैश्विक मंचों पर आलोचना
संयुक्त राष्ट्र (UN) और अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों (जैसे Amnesty International और Human Rights Watch) ने तालिबान के इन कदमों की तीखी आलोचना करते हुए इसे “अफ़ग़ान महिलाओं को सार्वजनिक जीवन से पूरी तरह मिटा देने” (Political and Social Erasure) की साज़िश कहा है।
* लैंगिक रंगभेद (Gender Apartheid): संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों का मानना है कि यह महिलाओं के खिलाफ संस्थागत और कानूनी स्तर पर किया जा रहा उत्पीड़न है।
* मानसिक स्वास्थ्य का संकट: इन पाबंदियों के कारण अफ़ग़ान महिलाओं में अवसाद, आत्महत्या के मामलों और मातृ मृत्यु दर (Maternal Mortality) में भयानक वृद्धि देखी गई है।
बाईबल के अनुसार महिलाओं कि स्थति
सामाजिक, धार्मिक और पारिवारिक स्तर पर 20वीं सदी के सुधारों से पहले महिलाओं की स्थिति अत्यधिक पितृसत्तात्मक, अधीनस्थ और सीमित थी। बाइबिल के विभिन्न अध्यायों, आयतों और ऐतिहासिक परंपराओं के आधार पर ईसाई समाज (कैथोलिक, प्रोटेस्टेंट आदि) में महिलाओं की पूर्व स्थिति का विस्तृत विवरण नीचे दिया गया है:
1. पारिवारिक स्थिति (Familial Status)
पारंपरिक ईसाई परिवार संरचना में पति को ‘परिवार का मुखिया’ और पत्नी को उसके ‘अधीन’ (Subordinate) रहने का स्पष्ट आदेश दिया गया था।
* पति के अधीन रहने का आदेश: इफिसियों (Ephesians) 5:22–24:
“हे पत्नियों, अपने-अपने पति के ऐसे आधीन रहो जैसे प्रभु के। क्योंकि पति पत्नी का सिर है जैसे कि मसीह कलीसिया का सिर है… इसलिए जैसे कलीसिया मसीह के आधीन है, वैसे ही पत्नियाँ भी हर बात में अपने पति के आधीन रहें।”
* कुलुस्सियों (Colossians) 3:18:
“हे पत्नियों, जैसा प्रभु में उचित है, अपने-अपने पति के आधीन रहो।”
* 1 पतरस (1 Peter) 3:1–6: इसमें महिलाओं को सारा (इब्राहीम की पत्नी) का उदाहरण देकर बिना किसी तड़क-भड़क के अपने पति की आज्ञा मानने और उसे ‘स्वामी’ कहने की सीख दी गई है।
* विवाह और तलाक के नियम:
* कैथोलिक परंपरा में विवाह को एक ‘संस्कार’ (Sacrament) माना गया, जिसे तोड़ा नहीं जा सकता था। घरेलू हिंसा या प्रताड़ना की स्थिति में भी महिलाओं के लिए कानूनी तलाक लेना लगभग असंभव था। सदियों तक यूरोप और अमेरिका में “कवरचर” (Coverture) का कानून लागू रहा, जिसके तहत शादी के बाद महिला की कानूनी और आर्थिक पहचान पूरी तरह पति में विलीन हो जाती थी और उसकी अपनी संपत्ति पर कोई स्वतंत्र अधिकार नहीं होता था।
2. धार्मिक और चर्च में स्थिति (Religious Status in Church)
ईसाई धर्म के प्रमुख संप्रदायों (कैथोलिक, ईस्टर्न ऑर्थोडॉक्स और शुरुआती प्रोटेस्टेंट) में महिलाओं को पादरी बनने (Priesthood/Ordination), उपदेश देने और चर्च के नेतृत्व से पूरी तरह बाहर रखा गया था।
* चर्च में मौन रहने और उपदेश न देने का आदेश:
## तीमुथियुस (1 Timothy) 2:11–14:
“स्त्री को चुपचाप पूरी अधीनता के साथ सीखना चाहिए। मैं किसी स्त्री को उपदेश देने या पुरुष पर अधिकार जताने की अनुमति नहीं देता, बल्कि उसे शांत रहना चाहिए। क्योंकि आदम पहले रचा गया, उसके बाद हव्वा। और आदम बहकाया नहीं गया, बल्कि स्त्री बहककर अपराध में पड़ गई।”
## कुरिन्थियों (1 Corinthians) 14:34–35:
“स्त्रियाँ कलीसिया की सभाओं में चुप रहें, क्योंकि उन्हें बोलने की आज्ञा नहीं है, बल्कि वे आधीन रहें जैसा व्यवस्था में भी लिखा है। यदि वे कुछ सीखना चाहें, तो घर पर अपने पतियों से पूछें; क्योंकि स्त्री का कलीसिया में बोलना लज्जा की बात है।
* सिर ढकने की बाध्यता (Veil/Head Covering):
## कुरिन्थियों (1 Corinthians) 11:5–9:
“परन्तु जो स्त्री बिना सिर ढके प्रार्थना या भविष्यवाणी करती है, वह अपने सिर का अनादर करती है… क्योंकि पुरुष को अपना सिर नहीं ढकना चाहिए, वह ईश्वर का स्वरूप और महिमा है; परन्तु स्त्री पुरुष की महिमा है। क्योंकि पुरुष स्त्री से नहीं, बल्कि स्त्री पुरुष से उत्पन्न हुई; और न तो पुरुष स्त्री के लिए बनाया गया, बल्कि स्त्री पुरुष के लिए।”
3. सामाजिक और कानूनी स्थिति (Social & Legal Status)
समाज में महिलाओं की स्थिति को ‘उत्पत्ति की कथा’ (Creation Fall) से जोड़कर देखा जाता था, जहाँ ‘मूल पाप’ (Original Sin) का मुख्य कारण महिला (हव्वा/Eve) को माना गया।
* मूल पाप और पीड़ा का दैवीय दंड:
## उत्पत्ति (Genesis) 3:16:
“(ईश्वर ने) स्त्री से कहा: ‘मैं तेरी गर्भ-पीड़ा को बहुत बढ़ाऊँगा; तू दर्द के साथ संतान जनेगी। तेरी लालसा तेरे पति की ओर होगी, और वह तुझ पर शासन करेगा।'”
* चर्च फादर्स के विचार: शुरुआती चर्च विद्वानों जैसे टर्टुलियन (Tertullian) ने महिलाओं को “शैतान का प्रवेश द्वार” (The Devil’s Gateway) कहा था, जिन्होंने मानव जाति को ईश्वर के प्रकोप का भागीदार बनाया।
* सामाजिक अधिकार:
## 19वीं और 20वीं सदी की शुरुआत तक अधिकांश ईसाई बहुल देशों में महिलाओं को मताधिकार (Right to Vote), उच्च धर्मशास्त्रीय शिक्षा (Theological Education), और अदालतों में पुरुषों के समान कानूनी अधिकार प्राप्त नहीं थे।
## 16वीं और 17वीं सदी के ‘डायन शिकार’ (Witch Hunts) के दौर में रूढ़िवादी धार्मिक मान्यताओं के तहत हजारों महिलाओं को डायन के आरोप में प्रताड़ित किया गया। वास्तविकता तो यह है कि डायन शब्द इसाईयत के प्रसार के दौर मे महिलाओं के लिए अभिशाप बन गया था। ईसाई नहीं बनने पर, इसाईयत के अत्याचारों का विरोध करने पर या पादरियों द्वारा बलात्कार के लिए स्वतः समर्पण नहीं करने पर औरतों को डायन बताकर जिंदा जला देना सामान्य बात हो गई थी। इस स्थिति से निपटने के लिए पादरियों के लिए ननों के रूप मे वेश्यालय कि व्यवस्था कि गई जो कई देशों मे आज भी चल रहा है।
मनुस्मृति, वेद और विभिन्न भारतीय ग्रंथों के आधार पर भारत मे नारियों कि सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक और पारिवारिक स्थिति का विस्तृत वर्णन अगले भाग में अवश्य पढ़ें ।


