1857 की स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई ने भारत में ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिला दी थी। अंग्रेजों को अपनी सत्ता क्या जान पर भी खतरा महसूस होने लगा था। ऐसी समस्या दुबारा उत्पन्न न हो इसके लिए अंग्रेजों ने फूट डालो राज करो की नीति अपनाई। अंग्रेजों को लगा कि हिन्दू भारत में अंग्रेजों की सत्ता कभी स्वीकार नहीं करेंगे। इसलिए उन्होंने अपने जैसे ही विदेशी मुस्लिम आक्रमणकारियों के वंशज मुसलमानों को अपने पक्ष में कर 1857 की हिन्दू मुस्लिम एकता को भंग करने की रणनीति बनाई।
मुसलमानों को अपने पक्ष में करने के लिए उसने मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति अपनाई और उसने इसके लिए मोहरा सैय्यद अहमद खान को बनाया। मुस्लिम तुष्टिकरण का सबसे दुखद पहलु यह था कि ब्रिटिश सर्वेक्षकों ने मुस्लिम आक्रमणकारियों द्वारा कब्जा किये गये जिन भवनों, मंदिरों, किलों, पाठशालाओं आदि को हिन्दू ईमारत होने का रिपोर्ट सौंपा था उन सबको कनिंघम ने ख़ारिज कर मुस्लिम इमारत घोषित कर दिया।
उसके बाद सैय्यद अहमद खान ने अलीगढ़ मुस्लिम विद्यालय/विश्वविद्यालय में मुसलमानों को हिन्दुओं के विरुद्ध नफरत का बीज भरना शुरू किया। उसने हिन्दू मुसलमान को सिर्फ दो कौम ही नहीं दो अलग राष्ट्र कहना शुरू कर दिया और कहने लगा “यदि अंग्रेजों से देश आजाद हो गया तो सत्ता हिन्दुओं के हाथों में आ जायेगा और मुसलमानों को उनकी गुलामी में जीना पड़ेगा। इसलिए मुसलमानों को अंग्रेजी हुकूमत का समर्थन करना चाहिए”। इतना ही नहीं 1887 में उसने कहा कि “1857 के स्वतंत्रता संग्राम में मुसलमानों ने ब्रिटिश हुकूमत के विरुद्ध हिस्सा नहीं लिया था, यह हिन्दुओं की लड़ाई थी।“ उसके बाद 1888 में उसे ब्रिटिश हुकूमत की तरफ से ‘सर’ की उपाधि दी गई।
हिन्दू मुस्लिम के बीच खाई खोदकर अंग्रेजों ने हिन्दुओं की एकजुटता भंग करने के लिए आर्य, द्रविड़ जैसे दो फर्जी जाति समूहों का निर्माण कर भारतियों को उत्तर दक्षिण के हिन्दुओं में न केवल बांटा बल्कि अपने सत्ता को वैध ठहराने के लिए आर्यों अर्थात उत्तर भारतियों को विदेशी और अपने ही देश पर आक्रमणकारी घोषित कर दिया।
दक्षिण भारत में उत्तर भारत और दक्षिण भारत के हिन्दुओं को आपस में लड़ाने और खाई पैदा करने के लिए उसने अंग्रेज और ईसाई भक्त ई वी रामास्वामी को अपना मुहरा बनाया और वह अंग्रेजों की फूट डालो राज करो की नीति को आगे बढ़ाने के लिए उत्तर भारतियों के विरुद्ध जहर उगलने लगा। उसने सनातन धर्म को विदेशी आर्यों का धर्म बताकर नफरत फैलाया और दक्षिण भारत के लोगों को समझाया की अगर अंग्रेज भारत छोड़कर चले गये तो दक्षिण भारतीय मूलनिवासी (गैर ब्राह्मण द्रविड़) उत्तर भारतीय विदेशी आर्यों के अधीन हो जायेंगे। इसलिए उसने ब्रिटिश राज को भारत में स्थायी बनाने की बात की और भारत को आजाद करने की सूरत में दक्षिण भारतियों के लिए अलग द्रविड़स्थान बनाने की मांग की।
इतना ही नहीं अंग्रेजों ने फूट डालो राज करो की नीति के तहत मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए ही मुस्लिम लीग का स्थापना कराया, मारले मिन्टो सुधार लाया आदि। वहीँ हिन्दुओं को जाति और ऊँच नीच के आधार पर बांटकर कमजोर करने के लिए अछूत वर्ग का भी अविष्कार किया। भारतीय समाज में संक्रामक कार्य करने वाले लोगों, जैसे चमड़े का काम, मुर्दा जलाने का काम, सूअर पालने का काम, मुगलों के समय मल मूत्र साफ करने का काम आदि, को स्वास्थ्य की वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गाँव के बाहरी हिस्से में बसने की व्यवस्था थी ताकि गाँव में संक्रमण नहीं फैले। ये अछूत नहीं थे। ये गाँव के बाजार में आकर अपना चप्पल जूते का दुकान, लगाते थे, ढोल बाजे का काम करते थे; सूप, दौड़ी, बट्टा आदि बनाकर बेचते थे। इन्हीं लोगों को अंग्रेजों ने अछूत कहा।
फिर मुस्लिम और अंग्रेजी शासन में लूट, अत्याचार से दरिद्र बने ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र जातियों को अनुसूचित जाति में सूचित कर ऊँच नीच जातियों का अविष्कार किया। इससे भी घृणित बात यह हुई कि इन सभी अनुसूचित जातियों को क्षत्रियों और ब्राह्मण द्वारा शोषित, पीड़ित और वंचित घोषित कर हिन्दुओं को आपस में लड़ाने लगे।
मध्य भारत और उत्तर भारत के हिन्दुओं को आपस में लड़ाने के लिए अंग्रेजों का मोहरा क्रमशः वैसे ही अंग्रेजी पढ़े लिखे अंग्रेज, ब्रिटिश शासन और ईसाई धर्म के दीवाने, सनातन धर्म के घोर विरोधी ज्योतिराव गोविंदराव फुले और डॉ भीमराव रामजी आंबेडकर बने। वे हिन्दुओं को शूद्र, ब्राह्मण, दलित सवर्ण के नाम पर मतभेद पैदा कर, कमजोर कर ब्रिटिश साम्राज्य को मजबूत करने लगे। पूरा भारत जब अंग्रेजों के कम्युनल अवार्ड का विरोध कर रहे थे तब ब्रिटिश सरकार के राजनिष्ठ अधिकारी डॉ आंबेडकर कम्युनल अवार्ड का समर्थन कर रहे थे।
ये दोनों भी भारत में ब्रिटिश राज के समर्थक थे। इन दोनों ने समस्त अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों को ही ब्रिटिश षडयंत्र के तहत अछूत और दलित घोषित कर दिया। इन्होंने भी उन तथाकथित अछूतों और दलितों को समझाया कि ब्रिटिश शासन उनके लिए अच्छा है। अगर ब्रिटिश शासन नहीं रहेगा तो वे हिन्दुओं के गुलाम बनकर रहने को बाध्य हो जायेंगे। आंबेडकर ने तो दावा किया की भारत में ब्रिटिश सरकार को सत्ता में लाने में दलितों का बहुत बड़ा योगदान है। उन्होंने भी आजादी का विरोध किया था और आजादी की सूरत में दलितों के लिए अलग दलितस्थान की मांग की।
उपर्युक्त तो केवल झलक है। गम्भीरता से तुलनात्मक अध्यययन करेंगे तो पाएंगे कि सैय्यद अहमद खान, दक्षिण में ई वी रामास्वामी पेरियार, मध्य भारत में ज्योतिबा फुले और उत्तर भारत में डॉ भीमराव आंबेडकर चारों अंग्रेजों के एक ही टूलकिट पर काम कर रहे थे, चारों का कार्यप्रणाली एक सा था, चारों का लक्ष्य और उद्देश्य भी एक था। सबसे दुखद और आश्चर्य की बात यह है कि रामास्वामी पेरियार, ज्योतिबा फुले और भीमराव आंबेडकर ने ब्रिटिश शासन में अंग्रेजों की लूट, हिंसा, अत्याचार और भारतियों के नरसंहार पर एक शब्द भी नहीं कहा (फुले ने सिर्फ दुर्भिक्ष के समय अंग्रेजों की नीति की आलोचना की थी)।

200 वर्षों के अंग्रेजी सरकार के लूट और कुशासन ने भारत की अर्थव्यवस्था चौपट कर दिया था. लघु उद्योग, कुटीर उद्योग, बुनकर उद्योग, रेशम उद्योग, कॉटन उद्योग, सिलाई उद्योग आदि तमाम उद्योग धंधे बंद करवा दिए और भारत को विदेशी माल का बाजार मात्र बनाकर रख दिया गया। लोगों का धंधा चौपट हो गया, लोग बेरोजगार हो गये, लोग खाने पीने को मुहताज हो गये।

अंग्रेज सरकार किसानों से 50-70% अनाज लगान के रूप में वसूल लेती थी। सूर्यास्त कानून लागू कर तो उन्होंने जमींदारों को वसूली भाई ही बना दिया था। और जो अंग्रेजों का लगान नहीं वसूल कर पाते और जो अंग्रेजों का लगान नहीं दे पाते थे उन्हें जेल में मरने केलिए ठूंस दिया जाता था। परिणाम यह था कि लोग अपना जमीन, घर द्वार, खेती बाड़ी सब छोड़कर भाग जाते थे और दूसरे जगह छिपकर मेहनत मजदूरी कर किसी प्रकार अपना पेट भरते थे।

अंग्रेज सरकार ने अनाज की जगह व्यापारिक फसलों को लगाने का आदेश दिया और उपज का ७०% से भी ज्यादा भाग लगान में वसूल लेते थे और किसानों के हिस्से का भाग भी कौड़ियों के दाम खरीद लेते थे। परिणामतः किसान दाने दाने को मोहताज हो भूखे मर रहे थे।

उपर्युक्त तिन कारणों और दुर्भिक्ष के कारण लगभग 2 करोड़ 66 लाख भारतीय 1769-1900 इस्वी के बीच मारे गये जो भारतवर्ष कि कुल आबादी का लगभग 9% था और जो विश्व इतिहास में चौथा सबसे बड़ा नरसंहार था (The Great Big Book of Horrible Things: The Definitive Chronicle of History’s 100 Worst Atrocities, Writer-Mathew White)।
सोचिये इन परिस्थितियों में जो बचे होंगे उनकी क्या दुर्दशा होगी? उनकी उस दुर्दशा केलिए कोई ब्राह्मण, क्षत्रिय, ठाकुर नहीं बल्कि ईसाई अंग्रेज सरकार जिम्मेदार थी। परन्तु उनके द्वारा किये गये कुकर्मों के सभी दुष्परिणामों का ठीकरा ब्राह्मणों के माथे मढ़कर अपने मालिक को क्लीनचिट दे दिया। आधुनिक शोधों से साबित हो चूका है कि अधिकांश अनुसूचित जाति और जनजाति के लोग मुस्लिम और ब्रिटिश शासन के लूट, हिंसा, अत्याचार और कुनीतियों के कारण दरिद्र बने ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य लोग हैं। खुद आंबेडकर ने माना है कि अधिकांश शूद्र जातियां क्षत्रियों के वंशज हैं।
ब्रिटिश सरकार के फूट डालो राज करो के इन और इनके जैसे अन्य मुहरों और टूलकिट को ढूंढ़कर उजागर करने की आवश्यकता है जिन्हें भारत विरोधी, सनातन विरोधी अंग्रेजों के दलाल मिशनरियों, वामपंथियों, जिहादियों और नेहरुवादियों ने अपने अपने निहीत स्वार्थों के लिए षड्यंत्रपूर्वक महान घोषित कर रखा है। मैं भारत के समस्त इतिहासकारों और बुद्धिजीवियों से अनुरोध करता हूँ कि वे इस विषय पर गहन अध्ययन और शोध करें और लोगों को सच्चाई बताएं।
मैं इस विषय पर भी गहन शोध की आवश्यकता महसूस करता हूँ कि जीवन भर ईसाई मिशनरियों और अंग्रेजों के निकट रहनेवाले आंबेडकर ने मृत्यु से सिर्फ कुछ सप्ताह पूर्व बौद्ध धर्म को अपनाने की घोषणा क्यों कि जबकि उन्होंने भगवान बुद्ध के उपदेशों, बौद्ध धर्म के आचार, विचार और संस्कार को उसी सभा में सिरे से ख़ारिज कर अपने आचार, विचार और नवाचार को थोप दिया था। वह कौन सा बौद्ध धर्म था जो भगवान बुद्ध के उपदेशों, निर्देशों और दिखाए मार्ग के सर्वथा विरुद्ध और 100% राजनीतिक उद्देश्य से प्रेरित था?
आजादी के बाद अंग्रेज अपने जिन विश्वस्त लोगों को सत्ता सौंपकर गये, वे भी सत्ता पर स्थायी पकड़ बनाने के लिए मुस्लिम तुष्टिकरण और हिन्दुओं को बाँटने का काम जारी रखा। इसी के तहत हिन्दुओं को और कमजोर करने के लिए उन्हें एससी, एसटी, जेनेरल, ओबीसी, दलित, सवर्ण, अगड़ी, पिछड़ी आदि जातियों और वर्गों में बांटा गया और जाति के आधार पर आरक्षण के दस वर्ष के अस्थायी प्रावधान को स्थायी बनाने का षडयंत्र किया गया। भारतीय समाज के विघटन का यह षडयंत्र अब राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए अधिक विकृत और खतरनाक रूप लेता जा रहा है। महादलित, अतिपिछड़ा जैसे नये नये वर्ग और नये नये कानून बनाये जा रहे हैं जो राष्ट्र की एकता, अखंडता और सुरक्षा के लिए खतरनाक है। और इन सबकी जड़ में है फूट डालो राज करो के अंग्रेजों के मुहरे और टूलकिट का दुष्प्रभाव।
लेखक: मुकेश कुमार वर्मा
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