१८५७ की राष्ट्रव्यापी प्रथम स्वतंत्रता संघर्ष में जब समस्त भारतीय अंग्रेजों के विरुद्ध खड़े थे उस दौरान भी जब नव मतांतरित भारतीय ईसाई समाज पूर्ण रूप से स्वाधीनता के विरोध में और अंग्रेजों के साथ खड़े हो गए तो अंग्रेजों को भारत में अपना साम्राज्य स्थायी बनाने की उम्मीद जग गयी। इस उम्मीद को अमलीजामा पहनाने के लिए सर्वप्रथम हिंदुओं को लोभ, लालच, नौकरी में आरक्षण आदि के माध्यमों से ईसाई मतों में धर्मान्तरण को बढ़ावा दिया गया, दूसरे स्तर पर शिक्षा को मिशनरियों के सहयोग से सेकुलर यानि राष्ट्र विरोधी, हिंदू विरोधी और अंग्रेजी राज परस्त बनाया गया।
तीसरे स्तर पर हिंदू-मुस्लिमों में मतभेद पैदा करने के लिए सर सैय्यद अहमद खान के नेतृत्व में हिंदू विरोधी मुस्लिम आंदोलन चलाया गया। इसी षड्यंत्र की अगली कड़ी थी समस्त उत्तर भारतीयों और देवनागरी लिपि का प्रयोग करने वालों को विदेशी आर्य जाति का घोषित करना और दक्षिण के पठार के लोगों को द्रविड़ और मूल निवासी घोषित कर भारत राष्ट्र को कमजोर कर सत्ता को स्थायी बनाना। इसी के तहत गैर ब्राह्मणों को एकजुट करने के उद्देश्य से ब्रिटिश शासकों के संरक्षण में १९१७ में साउथ इंडियन लिबरल फेडरेशन और जस्टिस पार्टी का गठन हुआ जिसका मुखिया ई वी रामास्वामी (पेरियार) था।
यही जस्टिस पार्टी आगे चलकर द्रविड़ कड़गम और आज डीएमके के नाम से जानी जाती है जिसका मुखिया करुणानिधि था और अब एम के स्टालिन है जो तमिलनाडु का मुख्यमंत्री है। इसी का बेटा उदयनिधि स्टालिन है जो गर्व से खुद को ईसाई और सनातन को डेंगू, मलेरिया जिसे खत्म करने की जरूरत बताता है।

यह वही जस्टिस पार्टी है जिसने १३ अप्रैल १९१९ के जलियांवाला बाग हत्याकांड में अंग्रेजों द्वारा किये गए नरसंहार का पूर्ण रूप से समर्थन किया था। आजादी के पूर्व जस्टिस पार्टी अंग्रेजों के मोहरा के रूप में काम करती रही और आर्य द्रविड़ का मतभेद उत्पन्न कर अंग्रेजों के विरुद्ध स्वतंत्रता संघर्ष को कमजोर करती रही। इसी षड्यंत्र/मतभेद को और आगे बढ़ाने के लिए १९२५ में ई वी रामास्वामी नायकर जिसे पेरियार (संत) के नाम से भी जाना जाता है ने द्रविड़ आंदोलन शुरू किया जिसका मूल उद्देश्य उत्तर भारतीयों की सभ्यता, संस्कृति, धर्म, परम्परा का विरोध, हिंदी भाषा और समस्त उत्तर भारतीयों का विरोध करना था। उसने दक्षिण भारतियों के लिए अलग मूल के आधार पर अलग द्रविड़ नाडू देश की मांग की और मुसलमानों के लिए मजहब के आधार पर अलग पाकिस्तान की मांग का समर्थन किया।

आजादी के बाद भी द्रविड़ कडगम अर्थात डीएमके ने अंग्रेजों के षड्यंत्र से अनजान तमिलों का राजनितिक शोषण करने और अपना राजनीतिक उल्लू सीधा करने के लिए उत्तर भारतीयों और हिंदी भाषा के प्रति अपनी घृणा की राजनीती जारी रखी। इसी के विद्रोह का परिणाम है कि भारत की अपनी कोई राष्ट्रभाषा नहीं है। आज ८०% भारतीयों द्वारा हिंदी बोलने, लिखने, पढ़ने अथवा समझने के बाबजूद हिंदी राष्ट्रभाषा नहीं बन सकी है। वैदिक धर्म का विरोध, हिंदी भाषा का विरोध, उत्तर भारतीयों का विरोध, श्रीराम का विरोध और राम विरोधी रावण का महिमामंडन तमिलनाडु में राजनीती का मुख्य आधार बन गया था। विरोध का आलम यह था कि इनके खुद का परिवार न आर्य रहे और न द्रविड़ बल्कि अंग्रेज (ईसाई) बन गए।
द्रविड़ आंदोलन के राजनितिक दर्शन ब्राह्मणवाद, हिंदी भाषा और उत्तर भारतीयों के प्रति द्वेष और वैमनस्य के बीच ही अन्नाद्रमुक की शक्तिशाली नेत्री और ब्राह्मण परिवार में जन्मी जयललिता का आचरण और जीवन द्रविड़ आंदोलन के अज्ञानियों से बिल्कुल विपरीत था। वह पूर्ण रूप से हिंदू अनुयायी थी और उससे सम्बन्धित सभी पद्धति, कर्मकांड और रीती-रिवाजों में विश्वास रखती थी। भगवान वेंकटेश्वर स्वामी के तिरुमाला मंदिर और पद्मावती मंदिर में नियमित रूप से दर्शन करने जाती थी।
द्रविड़ आंदोलन के अभिशाप से ग्रस्त तमिलनाडु में जयललिता अपने तीन दशक लम्बे राजनितिक जीवन में चार बार तमिलनाडु का विधानसभा चुनाव जीता और छः बार प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं। अपने शांत, सौम्य और सर्वधर्मसमभाव की सतत विचारधारा से नास्तिकवाद की आड़ में भारतीय सभ्यता, संस्कृति, दर्शन, परम्परा और धर्म का विरोध करनेवालों का धैर्य से मुकाबला किया और उनका शमन किया।
उनके सामने यक्ष प्रश्न था कि क्या यह विकृतियाँ केवल हिंदू समाज तक सिमित है? क्या इस्लाम और ईसाई मजहबों में इससे कहीं अधिक घृणित और खतरनाक बुराईयां नहीं है? फिर खुद को धर्म से अलग और नास्तिक कहने वाले लोग किस पूर्वाग्रह से ग्रस्त होकर केवल हिंदू दर्शन, परम्परा, संस्कार और भाषा का विरोध करते हैं? आखिर क्यों द्रविड़ आंदोलन इस्लाम और ईसाई मजहबों की कुप्रथाओं या कदाचारों की चर्चा नहीं करती? स्वदेशी उत्तर भारतीय हमारे दुश्मन है तो विदेशी ईसाई और मुसलमान हमारे अपने कैसे हुए?
इन प्रश्नों के अतिरिक्त आधुनिक एतिहासिक खोजों जिसने आर्यों के आक्रमण और विस्थापन के सिद्धांत को ध्वस्त कर दिया है। नृजातीय शोधों, डिएनए सर्वेक्षणों और भाषा विज्ञानियों के शोधों ने अंग्रेजों के द्रविड़ और आर्य के द्विराष्ट्रीय सिद्धांतों की षड्यंत्रों को उजागर कर रख दिया। संभवतः दिवंगत जयललिता ने इस चीज को बेहतर समझा और महसूस किया तथा अपने राजनितिक और निजी जीवन को द्रविड़ आंदोलन से मुक्त कर लिया।
आज तमिलनाडु में हिंदू और हिंदी भाषा का विरोध नगण्य हो चूका है। आप हिंदी बोलकर पूरा तमिलनाडु घूम सकते हैं। मेरा अनुभव तो कहता है की अंग्रेजी से कहीं बेहतर आप हिंदी भाषा के माध्यम से तमिलनाडु के ऑटो, बस ड्रायवरों और लोगों को अपनी बात समझा सकते हैं।
तमिलनाडु में हमने देखा कि प्रदेश के साधारण तमिल जन ईश्वर और कर्मकांड में उसी प्रकार आस्था रखते हैं जैसे की देश के अन्य किसी भाग में रखा जाता है और सच कहें तो मैंने इस मामले में तमिलों को उत्तर भारतीयों से कहीं अधिक धार्मिक पाया है। वे अपनी सभ्यता, संस्कृति, धर्म, परम्परा को ज्यादा सहेजकर रखे हुए हैं। द्रविड़ कड़गम के विचार गर्भ से उत्पन्न द्रमुक में भी हिंदू दर्शन और हिंदी भाषा के प्रति कोई उग्र दुर्भावना नहीं दिखाई देती जैसा की पहले था। अलबत्ता पिछले एक चुनाव में तो द्रमुक के मुखिया करूणानिधि खुद पब्लिक में हिंदी कविता शेयर करते दिखे थे।
दक्षिण भारत और तमिलनाडु के जनमानस में यह परिवर्तन भारत की बहुलतावादी संस्कृति का सम्मान और जयललिता की सतत प्रयत्न की देन है। अंग्रेजों के आर्य द्रविड़ मतभेद का सम्राज्यवादी षड्यंत्र पराजित हो चूका हैं पर अंग्रेजों के दलाल ईसाई स्टालिन परिवार नई शिक्षा नीति के तहत तीन भाषा आधारित शिक्षा के विरोध की आड़ में हिंदी भाषा के विरोध की अपनी पुरानी राजनीति को फिर पुनर्जीवित करने की कोशिस कर रहा है जो दुर्भाग्यपूर्ण और चिंताजनक है। देश के बुद्धिजीवियों और सरकार को उसके इस षडयंत्र का विरोध करने की जरूरत है।

मुख्य स्रोत दैनिक जागरण में छपे बलबीर पुंज का लेख