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विदेशी आक्रान्ताओं के सहयोगी भारत के बौद्ध: हूण, स्कंदगुप्त और बौद्ध संघ

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महान इतिहासकार डॉ. काशी प्रसाद जायसवाल ने बौद्ध धर्मग्रंथ ‘आर्य मंजुश्रीमूलकल्प’ और तत्कालीन ऐतिहासिक परिस्थितियों का गहरा अध्ययन किया था। उन्होंने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘An Imperial History of India’ (In a Sanskrit Text) में गुप्त काल, बौद्ध संघों और हूणों के त्रिकोणीय समीकरण पर विस्तार से लिखा है।

डॉ. जायसवाल का मानना था कि समुद्रगुप्त और चंद्रगुप्त द्वितीय के समय सनातन धर्म का पुनरुत्थान बहुत तेजी से हुआ। इसके कारण पश्चिमोत्तर सीमा (गंधार, कपिशा और पंजाब) के कुछ बौद्ध संघों में यह असुरक्षा की भावना पैदा हो गई थी कि गुप्त साम्राज्य के तहत उनका प्रभाव कम हो रहा है। अपनी पुस्तक में उन्होंने लिखा है कि जब हूणों के शुरुआती आक्रमण हुए, तो सीमावर्ती क्षेत्रों के बौद्ध संघों ने गुप्त सेना का सक्रिय रूप से साथ देने के बजाय एक तरह की कूटनीतिक उदासीनता या तटस्थता दिखाई। कुछ असंतुष्ट बौद्ध तत्व यह मान बैठे थे कि हूण केवल एक राजनीतिक सत्ता परिवर्तन करेंगे और शायद वे बौद्ध धर्म के प्रति अधिक उदार होंगे।

डॉ. जायसवाल ने बौद्ध ग्रंथ के संदर्भों का हवाला देते हुए लिखा है कि बौद्ध संघों की यह सोच पूरी तरह गलत और आत्मघाती साबित हुई। हूण कोई धार्मिक या दार्शनिक लोग नहीं थे; वे विशुद्ध रूप से बर्बर लुटेरे थे। भारत की सीमा में प्रवेश करते ही हूणों ने बौद्धों के पूजनीय मठों, विहारों और चैत्यों को सबसे पहले निशाना बनाया क्योंकि वहाँ अकूत संपत्ति और सोना जमा था। उन्होंने भिक्षुओं का कत्लेआम शुरू कर दिया।

जायसवाल जी ने अपनी पुस्तक में चंद्रगोमिन के व्याकरण सूत्र “अजयद् गुप्तो हूणान्” (गुप्त ने हूणों को जीता) की व्याख्या करते हुए स्कंदगुप्त के पराक्रम की सराहना की है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि  जब सम्राट स्कंदगुप्त (455 से 467 ईस्वी) ने अपने सीमित संसाधनों और आंतरिक गृह-कलह के बावजूद हूणों को मटियामेट कर दिया, तो सीमावर्ती बौद्ध संघों और भारत के संलिप्त बौद्ध भिक्षुओं का भ्रम पूरी तरह टूट गया। उन्हें समझ आ गया कि विदेशी क्रूर हूणों की तुलना में गुप्त सम्राट (भले ही वे सनातन धर्म के अनुयायी थे) कहीं अधिक सहिष्णु, न्यायप्रिय और कला-संस्कृति के रक्षक थे।

जयशंकर प्रसाद ने अपने प्रसिद्ध नाटक ‘स्कंदगुप्त’ के परिशिष्ट में नाटक की ऐतिहासिकता को सिद्ध करने के लिए कई ऐतिहासिक स्रोतों, अभिलेखों और विद्वानों के मतों का विश्लेषण किया है।  उन्होंने नाटक के परिशिष्ट में उस समय (1920 के दशक) के प्रसिद्ध इतिहासकारों जैसे डॉ. काशी प्रसाद जायसवाल और विन्सेंट स्मिथ के शोधों का हवाला दिया है।

उनके अनुसार स्कंदगुप्त कि विमाता अनंतदेवी, पुरुगुप्त और कुछ असंतुष्ट बौद्ध तत्वों का हूणों के साथ परोक्ष संपर्क या कूटनीतिक तालमेल था, ताकि स्कंदगुप्त को पराजित किया जा सके। लेकिन  हूण किसी भी प्रकार की धार्मिक या दार्शनिक विचारधारा से परे, केवल एक बर्बर लुटेरी जनजाति थी।

जब वे भारत की सीमा में घुसे, तो उन्होंने यह अंतर नहीं किया कि कौन उनका समर्थक है और कौन विरोधी। जब सम्राट स्कंदगुप्त ने हूणों को पूरी तरह पराजित करके देश से बाहर खदेड़ दिया, तो इसके दूरगामी राजनीतिक और धार्मिक परिणाम हुए। बौद्ध संघों को अपनी भूल का अहसास हुआ। उन्हें समझ आया कि आंतरिक राजनीतिक सत्ता की ललक में एक महान और सहिष्णु राष्ट्र (गुप्त साम्राज्य) को कमजोर करना उनके अपने ही विनाश का कारण बन गया था।

हाल के वर्षों (2006 में प्रकाशित) में खोजी गई ‘शॉयेन कॉपर स्क्रॉल’ (या तलगान कॉपर स्क्रॉल) इस बहस में सबसे बड़ा और वास्तविक पुरातात्विक साक्ष्य माना जाता है: 492/493 ईस्वी के इस संस्कृत-ब्राह्मी ताम्रपत्र में चार प्रसिद्ध अल्कॉन हूण राजाओं—खिंगिल (Khingila), तोरमाण (Toramana), जवुख (Javukha), और मेहामा (Mehama) का नाम दर्ज है। इस अभिलेख में इन हूण राजाओं को एक बौद्ध स्तूप और धातु-मंजूषा के निर्माण के लिए दानदाता के रूप में दिखाया गया है।

इतिहासकारों का एक वर्ग (जैसे हैंस टी. बैकर) इस आधार पर तर्क देता है कि भारत पर बड़े पैमाने पर विनाशकारी युद्ध शुरू करने से पहले, हूणों ने उत्तर-पश्चिम के बौद्ध बहुल क्षेत्रों पर प्रशासनिक नियंत्रण स्थापित कर लिया था और वे बौद्ध धर्म को संरक्षण दे रहे थे। इसी संरक्षण के बदले स्थानीय बौद्ध संघों ने हूणों के प्रारंभिक शासन को स्वीकार किया और उन्हें अपनी जड़े जमाने में मदद की।

पश्चिमोत्तर भारत और अफगानिस्तान के क्षेत्रों से अल्कॉन हूणों के प्रारंभिक काल के ऐसे अनेक सिक्के मिले हैं, जिन पर राजा के चित्र के साथ-साथ ‘त्रिरत्न’ या बौद्ध प्रतीकों का अंकन है। इसके अतिरिक्त, हड्डा (अफगानिस्तान) के ‘तोपे कलान’ स्तूप की खुदाई में हूणों के सिक्कों का एक बड़ा जत्था मिला है।

यह सिक्का-विज्ञान (Numismatics) यह दर्शाता है कि हूण शुरुआत में बौद्ध संस्कृति में भाग ले रहे थे और उनके प्रति क्रूर नहीं थे। समर्थकों का तर्क है कि बौद्ध संघों के सक्रिय सहयोग और वित्तीय कूटनीति के बिना कोई भी विदेशी खानाबदोश कबीला इतने कम समय में भारतीय मुद्राओं पर अपनी धार्मिक और प्रशासनिक पहचान स्थापित नहीं कर सकता था।

आधुनिक शोधों के अनुसार, बामियान की छोटी बुद्ध प्रतिमा (38 मीटर) का निर्माण लगभग 507 ईस्वी में और बड़ी बुद्ध प्रतिमा (55 मीटर) का निर्माण लगभग 551 ईस्वी में हूणों ने ही कराया था, जिसका वर्णन हवेनसांग ने किया और जिनका विध्वंस 2001 मे तालिबनियों ने किया था।  

हूणों के पक्ष में तर्क देने वाले विद्वान इतिहास के एक पुराने ढर्रे का हवाला भी देते हैं। उनके अनुसार, जिस प्रकार पुष्यमित्र शुंग के वैदिक पुनरुत्थान से असंतुष्ट होकर पश्चिमोत्तर के बौद्धों ने यवन (Indo-Greek) राजा मिनेंडर का स्वागत और सहयोग किया था, ठीक वैसी ही राजनीतिक कूटनीति 5वीं शताब्दी में गुप्तों के खिलाफ हूणों के आगमन के समय भी दोहराई गई थी।

हूण आक्रमण और भारत में बौद्ध धर्म का समूल विनाश

विभिन्न पुरातात्विक साक्ष्यों, चीनी यात्रियों के विवरणों और मध्यकालीन ग्रंथों के आधार पर हूणों द्वारा किए गए बौद्ध विनाश का विस्तृत विवरण मिलता है जिसका दोष मुस्लिम, वामपंथी, कॉन्ग्रेसी और अंबेडकरवादी एजेंडाधारी इतिहासकार पुष्यमित्र शुंग पर मढ़ देता है।

भारत में बौद्ध धर्म के विनाश की प्रक्रिया मुख्य रूप से दो बर्बर हूण शासकों के काल में घटित हुई:

1.   तोरमाण (लगभग 490–515 ईस्वी): इसने उत्तर-पश्चिमी भारत को जीतते हुए मध्य भारत (एरण, मालवा) तक अपने साम्राज्य का विस्तार किया। तोरमाण के सैन्य अभियानों ने गांधार के शांतिपूर्ण बौद्ध केंद्रों को भारी क्षति पहुँचाई।

2.         मिहिरकुल (लगभग 515–540 ईस्वी): यह तोरमाण का अत्यंत क्रूर और बर्बर पुत्र था। इतिहासकार इसे “भारत का अटिला” या “बौद्ध धर्म का काल” कहते हैं। मिहिरकुल शैव मत का कट्टर अनुयायी बन चुका था और बौद्ध धर्म के प्रति अत्यधिक नफरत रखता था। उसने अपने पूरे साम्राज्य में बौद्ध धर्म के समूल नाश का राजकीय अभियान चलाया था।

तक्षशिला तत्कालीन विश्व में ज्ञान और बौद्ध दर्शन का सबसे बड़ा केंद्र था। हूणों की बर्बर सेना ने तक्षशिला के महान विश्वविद्यालयों, चैत्यों और जौलियां व भामला जैसे समृद्ध बौद्ध मठों को बेरहमी से लूटा और अंततः उनमें आग लगा दी।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के पूर्व महानिदेशक सर जॉन मार्शल ने तक्षशिला की खुदाई के दौरान पाया कि वहाँ के भव्य बौद्ध विहारों के स्तंभ और दीवारें जलकर काली पड़ चुकी थीं। मठों के मलबे और राख के नीचे बौद्ध भिक्षुओं के कंकाल और हूण राजाओं के सिक्के दबे मिले, जो यह साबित करते हैं कि भिक्षुओं का कत्लेआम करते हुए मठों को जलाया गया था। इस हमले के बाद तक्षशिला कभी दोबारा नहीं उबर सका।

मिहिरकुल के आदेश पर उत्तर-पश्चिम भारत, पंजाब और काश्मीर घाटी में बौद्ध भिक्षुओं को चुन-चुनकर मौत के घाट उतारा गया। भिक्षुओं के सिर काटने वाले सैनिकों को राजकीय पुरस्कार दिए जाते थे। बौद्ध विहारों में रहने वाली महिला भिक्षुणियों और उपासिकाओं पर अकल्पनीय अत्याचार किए गए। उन्हें बंदी बनाकर दासी के रूप में कबीलों में बांट दिया गया या मार दिया गया।

हूणों (अल्कॉन हूण) द्वारा भारत में बौद्ध धर्म, उनके भिक्षुओं और तक्षशिला जैसे महान मठों के संपूर्ण विनाश का इतिहास प्राचीन भारतीय इतिहास के सबसे रक्तरंजित और विनाशकारी अध्यायों में से एक है। 5वीं शताब्दी के उत्तरार्ध से 6ठी शताब्दी के मध्य तक हुए हूण आक्रमणों ने उत्तर-पश्चिम भारत (गांधार, पंजाब, कश्मीर) में बौद्ध संस्कृति की रीढ़ पूरी तरह तोड़ दी थी।

चीनी बौद्ध भिक्षु और यात्री ह्वेनसांग (Xuanzang), जो 7वीं शताब्दी (लगभग 630–645 ईस्वी) में सम्राट हर्षवर्धन के काल में भारत आए थे, हूण आक्रमणों के बाद भारत में बौद्ध धर्म की स्थिति के सबसे बड़े और प्रामाणिक चश्मदीद गवाह हैं। उन्होंने अपनी प्रसिद्ध यात्रा विवरण पुस्तक ‘सी-यू-की’ (Si-Yu-Ki: Buddhist Records of the Western World) में हूणों—विशेषकर क्रूर हूण राजा मिहिरकुल द्वारा भारत में मचाई गई तबाही, बौद्ध धर्म के विनाश और भिक्षुओं के नरसंहार का अत्यंत हृदयविदारक और विस्तृत विवरण दर्ज किया है।

ह्वेनसांग लिखता है कि मिहिरकुल शुरुआत में बौद्ध दर्शन के बारे में जानने का इच्छुक था। उसने बौद्ध संघों से किसी प्रबुद्ध भिक्षु को उसे शिक्षित करने के लिए भेजने को कहा। लेकिन भिक्षुओं ने उसकी क्रूरता के डर से किसी बड़े विद्वान को भेजने के बजाय राजा के ही एक पूर्व घरेलू दास (जो भिक्षु बन चुका था) को भेज दिया। मिहिरकुल ने इसे अपना भारी अपमान माना और उसी क्षण से संपूर्ण भारत से बौद्ध धर्म के समूल नाश की प्रतिज्ञा ले ली।

ह्वेनसांग लिखता है मिहिरकुल एक ऐसा शासक था जिसे निर्दोषों के रक्तपात में आनंद आता था और वह बौद्ध भिक्षुओं को अपना सबसे बड़ा शत्रु मानता था। जब वह उत्तर-पश्चिम भारत (गांधार और पंजाब) के क्षेत्रों में पहुँचा, तो उसने हूणों के हमलों से मची तबाही को स्वयं अपनी आँखों से देखा। ‘सी-यू-की’ में स्पष्ट रूप से लिखा है कि मिहिरकुल ने केवल गांधार और उसके आसपास के क्षेत्रों में 1,600 बौद्ध स्तूपों, चैत्यों और भव्य मठों को पूरी तरह मिट्टी में मिला दिया।

ह्वेनसांग जब विद्या के महान केंद्र तक्षशिला पहुँचा, तो उसने पाया कि वहाँ के कभी जीवंत रहने वाले विश्वविद्यालय और मठ पूरी तरह उजाड़, खंडहर और निर्जन हो चुके थे। जिन मठों में हजारों भिक्षु रहते थे, वहाँ केवल जंगली घास उगी हुई थी और चारों तरफ बर्बादी के निशान थे। मिहिरकुल के आदेश पर राजकीय सैनिकों ने बौद्ध भिक्षुओं को ढूंढ-ढूंढकर मारना शुरू किया। राजा ने शाही फरमान जारी किया था कि जो कोई भी बौद्ध भिक्षुओं को शरण देगा या उनके प्रति सहानुभूति दिखाएगा, उसे परिवार सहित मार दिया जाएगा।

ह्वेनसांग एक अत्यंत दर्दनाक घटना का भी उल्लेख करता है जिसके अनुसार, मिहिरकुल ने गांधार के हजारों बौद्ध भिक्षुओं को बंदी बनाकर उनके हाथ-पैर बंधवाए और उन्हें सिंधु नदी के गहरे पानी में जीवित ही फेंकवा दिया। इस क्रूर नरसंहार से नदी का पानी भिक्षुओं के रक्त से लाल हो गया था।

बौद्ध ग्रंथ ‘आर्य मंजुश्रीमूलकल्प’ में मिहिरकुल को एक “क्रूर राक्षस और विनाशक” के रूप में चित्रित किया गया है, जिसने उत्तर भारत के विहारों को नष्ट किया और भिक्षुओं का बड़े पैमाने पर कत्लेआम किया। 6ठी शताब्दी के एक अलेक्जेंड्रियन भिक्षु कॉस्मास ने अपनी पुस्तक ‘क्रिश्चियन टोपोग्राफी’ में लिखा है कि हूण राजा (मिहिरकुल) जब भी किसी नगर को जीतता था, तो वह बौद्ध मठों को सबसे पहले पूरी तरह नष्ट कर देता था और उसकी सेना रक्तपात की शौकीन थी।

बौद्ध राजा बालादित्य द्वारा बदला और हूणों का दमन

ह्वेनसांग के यात्रा विवरण ‘सी-यू-की’ में गुप्त वंश के मगध नरेश नरसिंहगुप्त बालादित्य द्वारा क्रूर हूण राजा मिहिरकुल को बंदी बनाने और फिर उसे मुक्त करने की कहानी का अत्यंत विस्तृत और नाटकीय विवरण मिलता है।

6ठी शताब्दी की शुरुआत में हूण राजा मिहिरकुल ने उत्तर-पश्चिम भारत और पंजाब को रौंदने के बाद मध्य भारत और मगध (गुप्त साम्राज्य के पूर्वी हिस्से) की ओर रुख किया। मगध के राजा नरसिंहगुप्त बालादित्य को जब पता चला कि मिहिरकुल ने गंधार में हजारों बौद्ध भिक्षुओं की हत्या की है और स्तूप तोड़े हैं, तो बालादित्य क्रोध से भर गए और उसे सबक सिखाने कि ठानी। जब मिहिरकुल एक विशाल सेना लेकर मगध पर आक्रमण करने बढ़ा, तो बालादित्य ने सीधे युद्ध लड़ने के बजाय एक खास युद्ध नीति अपनाई।

वे अपनी सेना और अपनी प्रजा के हजारों लोगों को लेकर बंगाल की खाड़ी के पास स्थित एक दुर्गम द्वीप (संभवतः सुंदरबन) में चले गए। मिहिरकुल अहंकार में अंधा था। उसने मगध को खाली पाकर राजा बालादित्य का पीछा करने का फैसला किया और अपनी भारी सेना को लेकर उस अज्ञात द्वीप और जंगली क्षेत्र में घुस गया। बालादित्य की सेना को उस भौगोलिक क्षेत्र का पूरा ज्ञान था, जबकि हूण सेना इसके लिए अजनबी थी। जैसे ही हूण सेना द्वीप के भीतर संकीर्ण रास्तों और दलदली इलाकों में आगे बढ़ी, बालादित्य के सैनिकों ने उन्हें चारों तरफ से घेर लिया। हूणों की प्रसिद्ध घुड़सवार सेना उस कीचड़ और घने जंगलों में पूरी तरह बेकार साबित हुई। भीषण युद्ध के बाद हूण सेना तितर-बितर हो गई और गुप्त सैनिकों ने मिहिरकुल को जीवित बंदी बना लिया।

बंदी होने के बाद भी मिहिरकुल का घमंड कम नहीं हुआ था। उसने अपना चेहरा एक कपड़े से ढक लिया था। जब राजा बालादित्य ने इसका कारण पूछा, तो मिहिरकुल ने गरज कर कहा— “एक राजा का चेहरा केवल अपने बराबर के राजाओं को देखने के लिए होता है। आज मैं एक कैदी हूँ और तुम्हारा दास हूँ, इसलिए मैं तुम्हें अपना चेहरा नहीं दिखाना चाहता।”

बालादित्य उसकी क्रूरता और बौद्धों के नरसंहार से अत्यंत क्रोधित थे। उन्होंने मिहिरकुल को मृत्युदंड देने का आदेश जारी कर दिया। यहीं पर कहानी में फिर रणनीतिक विध्वंसकारी मोड़ आता है। जब राजा बालादित्य की माता (राजमाता) जो बौद्ध मत की थी, को पता चला कि मिहिरकुल नामक एक अत्यंत शक्तिशाली और क्रूर राजा को बंदी बनाया गया है और उसे मार दिया जाएगा, तो उसे बचाने दरबार में आ गई।

राजमाता ने मिहिरकुल को देखा और राजा बालादित्य से कहा— “पुत्र, बौद्ध धर्म हमें करुणा और अहिंसा सिखाता है। यह हूण राजा भले ही दुष्ट है, लेकिन इसकी बुद्धिमत्ता और पराक्रम अद्वितीय है। यदि तुम एक बंदी और पराजित राजा की हत्या करोगे, तो यह बुद्ध के सिद्धांतों के विरुद्ध होगा। इसे जीवनदान देना ही बौद्ध संस्कृति की महानता होगी।”

अपनी माता की आज्ञा के कारण राजा बालादित्य ने अपना निर्णय बदल दिया। उन्होंने मिहिरकुल के घावों का इलाज करवाया, उसे शाही वस्त्र दिए और उसे ससम्मान मुक्त कर दिया।

बौद्ध राजा की यह करुणा मिहिरकुल जैसे क्रूर आक्रांता के लिए केवल एक कमजोरी साबित हुई। रिहा होने के बाद उसने जो किया, उसने इस दयालुता को इतिहास की एक बड़ी भूल बना दिया। मगध से छूटने के बाद जब मिहिरकुल वापस अपनी राजधानी पहुँचा, तो वहाँ उसके छोटे भाई ने सत्ता पर कब्जा कर लिया था। लाचार होकर मिहिरकुल काश्मीर भाग गया, जहाँ के राजा ने उसे शरण दी।

मिहिरकुल ने कुछ ही समय में काश्मीर के राजा के खिलाफ षड्यंत्र रचा, उसकी हत्या कर दी और स्वयं काश्मीर का राजा बन बैठा। राजा बनते ही उसने राजा बालादित्य से मिले जीवनदान का बदला लेने के लिए काश्मीर और गंधार के बचे-खुचे बौद्ध मठों और स्तूपों पर पहले से भी अधिक भयानक और क्रूर हमले किए।

ह्वेनसांग की यह कहानी दर्शाती है कि गुप्त सम्राट बालादित्य ने सैन्य रूप से हूणों पर एक ऐतिहासिक और निर्णायक विजय प्राप्त की थी, लेकिन उनकी अत्यधिक धार्मिक सहिष्णुता और अहिंसक कूटनीति के कारण मिहिरकुल बच निकला, जिसने बाद में काश्मीर के बौद्धों का समूल नाश कर दिया।

ह्वेनसांग के अनुसार, हूणों के इन क्रूर अभियानों ने भारत में बौद्ध धर्म के इतिहास को अपूरणीय क्षति पहुँचाई। उत्तर-पश्चिम भारत से बौद्ध श्रमण संस्कृति लगभग पूरी तरह लुप्त हो गई। हूणों के डर से बचे हुए भिक्षु पश्चिमोत्तर भारत छोड़कर नालंदा (बिहार) और बंगाल के क्षेत्रों की ओर भाग गए, जिससे बौद्ध धर्म भारत के केवल एक कोने में सिमट कर रह गया।

अन्य प्रमुख संदर्भ पुस्तकें

1. ‘Taxila’ (Vol. I-III) — सर जॉन मार्शल (Sir John Marshall – पुरातात्विक साक्ष्य)

2. ‘The History and Culture of the Indian People’ (Vol. 3: The Classical Age) — डॉ. आर.सी. मजूमदार

3. ‘Si-Yu-Ki: Buddhist Records of the Western World’ — ह्वेनसांग (Samuel Beal द्वारा अनुवादित) 4. ‘The Alchon Huns in Central and South Asia’ — हैंस टी. बैकर (Hans T. Bakker)

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