मौर्य साम्राज्य और शुंग शासन के पतन के संक्रमण काल में बौद्ध संघों और यवन (Indo-Greek) आक्रमणकारियों के अंतर्संबंधों पर कई इतिहासकारों ने विस्तृत विवरण दिया है। ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी (185 ईसा पूर्व) में मौर्य वंश के पतन के समय भारत पर बैक्ट्रियाई यूनानियों (यवनों) के भीषण आक्रमण हुए। इस दौरान सीमावर्ती और राजधानी के बौद्ध संघों द्वारा यवनों को कूटनीतिक एवं राजनैतिक सहयोग दिया गया। और ये सब हुआ लंपट, कायर अंतिम मौर्य शासक बृहदरथ मौर्य के नाक के नीचे।
दूसरी बात उत्तर मौर्य काल में बौद्ध धर्म को अत्यधिक राजकीय संरक्षण मिला था। अशोक के शासन में मलाई खा रहे बुद्धिस्ट उसके मृत्यु के बाद से ही भारत में उपेक्षित होने लगे थे। शुंगों के शासन में वे पुरी तरह उपेक्षा के शिकार हो हिंदू विरोधी मानसिकता से ग्रस्त हो हिंदुओं से कट गए। सेनापति पुष्यमित्र शुंग द्वारा अंतिम मौर्य सम्राट बृहद्रथ की हत्या के बाद वैदिक धर्म का पुनरुत्थान हुआ, जिससे बौद्ध संघों को अपने विशेषाधिकार छिनने का डर था। इंडो-ग्रीक के यवन राजा (जैसे डेमेट्रियस और मिनेंडर) अपने राजनीतिक उद्देश्यों कि पूर्ति के लिए भारतीय संस्कृतियों, विशेषकर बौद्ध धर्म के प्रति सहिष्णु थे। बौद्ध भिक्षुओं ने उन्हें भारतीय शुंग राजाओं की तुलना में एक बेहतर विकल्प के रूप में देखा।
लंपट, कायर अंतिम मौर्य शासक बृहदरथ
अशोक की मूर्खतापूर्ण अहिंसक नीतियों ने राज्य की सुरक्षा व्यवस्था जर्जर कर दिया था। इतिहासकार हेमचन्द्र राय चौधरी लिखते हैं, “मौर्य साम्राज्य अशोक की मृत्यु के बाद छिन्न-भिन्न हो गया और उसके पुत्रों के बिच बंट गया. कुछ वाह्य प्रान्त साम्राज्य से निकल गया, राज्य के छिन्न भिन्न होने की क्रिया को सम्राट के परिवार के लोगों ने और भी द्रुतगामी बना दिया. साम्राज्य की दुरवस्था ने यवनों को पुनराक्रमण केलिए प्रोत्साहित किया. सीरिया का यवन (ग्रीक) राजा एन्टीयोकस प्रथम ने काबुल के राजा भागसेन को हराकर राज्य पर अधिकार कर लिया.”
इरान, अफगानिस्तान तक विस्तृत मौर्य साम्राज्य जब बिखरने लगी तो जनता में सत्ता और धम्म के विरुद्ध असंतोष उत्पन्न होना स्वाभाविक था। मौर्य सत्ता पूरी तरह बौद्ध संघों के जकड़ में आ गया था। स्थानीय शासन पर बौद्ध मठों का अधिकार हो गया था। अत्याचारी मौर्य राजा शालिशूक के समय हिन्दुओं विशेषकर ब्राह्मणों पर बहुत अत्याचार हुए। इस समय बौद्ध मठों ने तो सारी हदें पार कर दी थी। वे मन्दिरों से देवी देवताओं की मूर्ति हटाकर बुद्ध की प्रतिमा रख देते थे।
देवधर्मन और उनके पुत्र शतधन्वन के समय शालिशूक और बौद्धों के अत्याचार से हिंदुओं को थोड़ी राहत मिली पर साम्राज्य का विघटन तेज हो गया। कहा जाता है अपने सौतेले बड़े भाई शतधन्वन को बृहदरथ मौर्य ने ही जहर दे दिया था जिससे उसकी मृत्यु हो गई और वह शासक बना। उसके इस कार्य मे शतधन्वन के महामात्य, जो बौद्ध भिक्षु था और जिस पर कुकुट्टाराम महासंघ के महास्थविर का बड़ा प्रभाव था, ने सहयोग किया था। अतः बृहदरथ मौर्य ने उसे महामंत्री बना दिया।
पटलीपुत्र का कुकुट्टाराम महासंघ यवन जासूसों और सैनिकों का अड्डा बन चुका था और राजमहल यवन वारांगनाओं (वेश्या) और स्त्री जासूसों का अड्डा। बृहदरथ का दिन और रात यवन स्त्रियों के बाहों मे ही कटता था, राज कार्य उसकी पत्नी अनंगवती बौद्ध महामंत्री के सहयोग से ही किसी प्रकार चला रही थी।
बैक्ट्रिया के यूनानी राजा डेमेट्रियस (Demetrius) और उसके सेनापति मिनेंडर ने भारत की उत्तर-पश्चिमी सीमा पर भीषण आक्रमण कर दिया था। वे तक्षशिला और पंजाब को रौंदते हुए मगध (पाटलिपुत्र) के अत्यंत निकट आ चुके थे। पर बृहदरथ रासरंग और यवन स्त्रियों के सुखोपभोग मे ही डूबा रहता था। यवनों से युद्ध कि जगह संधि के लिए कुकुट्टाराम महासंघ के महास्थविर गए थे। उनका आग्रह था कि मगधराज और यवनराज मित्र के रूप में सारी पृथ्वी पर धर्म-शासन स्थापित करें, चारों दिशाओं में शांति तथा प्रेम का साम्राज्य स्थापित करें।
सेनापति फिलिप्स ने महास्थविर धर्मरक्षित के साथ अपने जिन दूतों को भेजा था, उनसे कहलाया था कि इस वृद्ध स्थविर से जो भी वचन ले सकें, ले लें। उसका दिया हुआ वचन मगध के शासक कभी टाल नहीं सकते। मगध के राजा को स्वयं तो इन विवादों में रुचि नहीं है, न उसे सुरा और सुंदरी से अवकाश ही मिलता है। इस स्थविर का इतना प्रभाव है कि इसके संकेत पर ही महामंत्री और राजा ने सेना के व्यय पर प्रतिबंध लगा दिया है। मुझे पूरा विश्वास है कि शीघ्र ही हम धर्म और मित्रता के नाम पर इस स्थविर और महामंत्री के सहारे मगध की सेना को इस सीमा तक निर्बल करवा सकते हैं कि देवता जुपिटर की अनुकंपा रही तो शीघ्र ही सम्राट को एक बूँद खून बहाए बिना मगध साम्राज्य ऐसे ही उपहार में दे दूँगा।
लंपट बृहदरथ मौर्य वासना मे इतना नीचे गिर चुका था कि वह अपने बड़े भाई शतधन्वन कि खूबसूरत विधवा पत्नी पर भी बुरी नजर रखता था। जिस दिन सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने सेना का शौर्य प्रदर्शन देखने के लिए उसे आमंत्रित किया था उसी दिन वह अपने यवन सैनिकों द्वारा उस बेचारी विधवा को जबरन उठा कर अपने शयनकक्ष मे लाने भेज दिया था जिससे बचने के लिए उस विधवा ने जहर खा लिया। उसकी पत्नी अनंगवती अपने पति कि घृणित कुकृत्य से आहत होकर आत्महत्या कर ली।
बृहदरथ मौर्य से सेना और प्रजा पहले ही परेशान थी, खून से लथपथ अनंगवती का शव और बृहदरथ के कुकृत्य का पता चला तो और क्रोधित हो गए। पुष्यमित्र द्वारा उसकी कायरता उजागर करने पर जब वह पुष्यमित्र को मारने का आदेश दिया तो सेना और प्रजा भड़क गई और पुष्यमित्र शुंग को उसकी हत्या करने के लिए ललकारने लगी जिससे डरकर बृहदरथ भागने लगा, पर पुष्यमित्र शुंग ने उसे ललकार कर वध कर दिया। इसी दौरान उसका बौद्ध महामंत्री भी मारा गया। इस प्रकार मगध कि सेना और प्रजा के अनुरोध पर पुष्यमित्र ने सेनानी के रूप मे मगध का शासन भार अपने ऊपर ले लिया।
प्रमुख बौद्ध संघों की भूमिका
1 . तक्षशिला बौद्ध संघ (उत्तर-पश्चिम सीमा) – तक्षशिला तत्कालीन भारत का सबसे बड़ा बौद्ध और शिक्षा का केंद्र था, जो सीधे यवन आक्रमण के मार्ग में पड़ता था। इतिहास में यह माना जाता है कि यहाँ के बौद्धों ने गुप्त सूचनाएं, रसद (सप्लाई) और मार्ग दर्शन देकर यवन सेना की भारत में पैठ आसान की। पुस्तक ‘An Imperial History of India’ (In a Sanskrit Text) मे डॉ. जायसवाल ने स्पष्ट किया है कि उत्तर-पश्चिम सीमा के बौद्धों का झुकाव विदेशी शक्तियों की तरफ था, जिसे रोकने के लिए मगध में सैन्य तख्तापलट अनिवार्य हो गया था। बौद्ध ग्रंथ ‘आर्य मंजुश्रीमूलकल्प’ में मौर्य साम्राज्य के अंत और उत्तर-पश्चिम में उत्पन्न अराजकता व बौद्धों की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं का अप्रत्यक्ष विवरण मिलता है।
2. कुक्कुटाराम विहार (पाटलिपुत्र) – पाटलिपुत्र (मगध की राजधानी) में स्थित कुक्कुटाराम विहार बौद्ध भिक्षुओं का मुख्य गढ़ था। जब यवन राजा मिनेंडर और डेमेट्रियस साकेत (अयोध्या) और मध्यमा (चित्तौड़गढ़) को जीतते हुए पाटलिपुत्र के द्वारों तक पहुँच गए, तब कुक्कुटाराम के असंतुष्ट भिक्षुओं पर यवनों के साथ गुप्त कूटनीतिक संपर्क साधने और नगर के द्वार खोलने के षड्यंत्र का आरोप लगा।
बौद्ध ग्रंथ ‘दिव्यावदान’ का एक खंड ‘अशोकवदान’ मे वर्णन है कि पुष्यमित्र शुंग ने पाटलिपुत्र के कुक्कुटाराम विहार को नष्ट करने का प्रयास किया था। आधुनिक इतिहासकार इसकी व्याख्या करते हुए लिखते हैं कि पुष्यमित्र का यह कदम धार्मिक द्वेष नहीं, बल्कि कुक्कुटाराम के भिक्षुओं द्वारा यवन आक्रमणकारियों को परोक्ष समर्थन देने के कारण किया गया एक राजनीतिक और सैन्य दमन था।
ऐतिहासिक ग्रंथ ‘युग पुराण’ (गार्गी संहिता का एक भाग) में स्पष्ट उल्लेख है कि दुष्ट यवनों (ग्रीकों) ने साकेत और पंचाल को जीतकर पाटलिपुत्र पर आक्रमण किया और वहाँ भीषण अराजकता फैली। इतिहासकारों के अनुसार, इस अराजकता में आंतरिक असंतुष्ट बौद्धों की भूमिका थी। पुष्यमित्र शुंग ने विदेशी आक्रमणकारियों और उनके आंतरिक सहयोगियों को कुचलने के लिए एक राष्ट्रव्यापी सैन्य अभियान चलाया। उन्होंने यवनों को पराजित किया और उनके मुख्य केंद्रों पर कार्रवाई की।
ऐतिहासिक पुस्तक ‘Early History of India’ में विन्सेंट स्मिथ ने लिखा है कि यवनों के भारतीयकरण और मिनेंडर के बौद्ध बनने के बाद बौद्ध संघों का राजनीतिक मोहभंग हो गया। उन्हें समझ आ गया कि राजनीतिक सत्ता के खेल में शामिल होना विनाशकारी है। इसके बाद उन्होंने राजनीति छोड़ दी और पूरी तरह कला और अध्यात्म में लग गए। इसका प्रमाण शुंग काल में ही भरहुत और सांची स्तूपों के तोरण द्वारों का बौद्ध भिक्षुओं और स्थानीय जनता द्वारा (शुंग राजाओं की देखरेख में) किया गया शांतिपूर्ण निर्माण है।
अंतिम मौर्य सम्राट बृहद्रथ उनके बौद्ध महामात्य (महामंत्री) और कुक्कुटाराम बौद्ध संघ की राष्ट्रविरोधी कूटनीति के कारण सेनापति पुष्यमित्र शुंग को जो सैन्य तख्तापलट करना पड़ा, वह प्राचीन भारत के इतिहास का एक अत्यंत महत्वपूर्ण राष्ट्रवादी मोड़ था। इतिहासकार डॉ. काशी प्रसाद जायसवाल, विन्सेंट स्मिथ और समकालीन पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर इस घटनाक्रम और बौद्ध संघों की संदिग्ध व राष्ट्रविरोधी गतिविधियों का विस्तृत विवरण मिलता है:
प्राचीन ऐतिहासिक विवरणों और आधुनिक इतिहासकारों के विश्लेषणों के अनुसार, साम्राज्य के भीतर एक बड़ा कूटनीतिक षड्यंत्र चल रहा था। बृहद्रथ का महामंत्री बौद्ध मत का परम अनुयायी था (कई ऐतिहासिक और साहित्यिक व्याख्याओं में इस प्रशासनिक गुट का उल्लेख मिलता है)। इस गुट का झुकाव पाटलिपुत्र के सबसे बड़े बौद्ध केंद्र कुक्कुटाराम विहार (Kukkutarama Monastery) और उसके महास्थविर (मुख्य भिक्षु) की ओर था।
जब यवन सेना भारत में अंदर तक घुस आई, तब तक्षशिला और कुक्कुटाराम के बौद्ध संघों ने कूटनीति के तहत यवन शासकों का स्वागत किया। वे यवनों को शुंग सेना के विरुद्ध एक हथियार के रूप में देख रहे थे। बौद्ध संघों ने यवन सेना को भारत के आंतरिक मार्गों की गुप्त सूचनाएँ, रसद (सप्लाई) और कूटनीतिक समर्थन पहुँचाया, ताकि मगध की सत्ता पर उनका परोक्ष नियंत्रण बना रहे। जब सेनापति पुष्यमित्र शुंग को यह स्पष्ट हो गया कि राजा बृहद्रथ और उनका प्रशासनिक अमला विदेशी आक्रमण को रोकने में पूरी तरह अक्षम है और आंतरिक रूप से देशद्रोहियों को संरक्षण मिल रहा है, तब उन्होंने राष्ट्ररक्षा में कठोर कदम उठाया।
बाणभट्ट द्वारा रचित ‘हर्षचरित’ के अनुसार, पुष्यमित्र शुंग ने राजा बृहद्रथ को पूरी मौर्य सेना का शौर्य प्रदर्शन देखने के बहाने बुलाया और पूरी सेना के सामने उसका वध कर दिया। इस तख्तापलट के दौरान मौर्य सेना के किसी भी सैनिक या अधिकारी ने राजा को बचाने का प्रयास नहीं किया। यह प्रमाणित करता है कि संपूर्ण सेना सम्राट की रीढ़विहीन और राष्ट्रविरोधी तत्वों को संरक्षण देने वाली नीतियों से अत्यंत त्रस्त थी।
कुक्कुटाराम और शाकल के बौद्ध संघों पर दंडात्मक सैन्य कार्रवाई
सत्ता हाथ में लेने के बाद पुष्यमित्र शुंग ने देशद्रोही तत्वों के खिलाफ कठोर दंडात्मक अभियान चलाया। बौद्ध ग्रंथों (‘दिव्यावदान’ और ‘अशोकवदान’) में उल्लेख है कि पुष्यमित्र शुंग अपनी चतुरंगिणी सेना लेकर पाटलिपुत्र के कुक्कुटाराम विहार को नष्ट करने पहुँचे थे। इतिहासकार डॉ. आर.सी. मजूमदार और डॉ. के.पी. जायसवाल स्पष्ट करते हैं कि पुष्यमित्र का यह गुस्सा धार्मिक नहीं था; उन्होंने कुक्कुटाराम को इसलिए निशाना बनाया क्योंकि वह यवन आक्रांताओं के साथ गुप्त कूटनीतिक संचार और देशद्रोह का मुख्य केंद्र बन चुका था।
दिव्यावदान में एक प्रसिद्ध श्लोक है जिसमें पुष्यमित्र शुंग घोषणा करता है— “यो मे श्रमणशिरो दास्यति तस्याहं दीनारशतं दास्यामि” (जो मुझे एक बौद्ध श्रमण का सिर देगा, मैं उसे 100 दीनार दूँगा)।
अपनी पुस्तक ‘Political History of Ancient India’ में डॉ. हेमचन्द्र रायचौधरी और अन्य इतिहासकारों ने इस श्लोक का विश्लेषण करते हुए लिखा है कि पुष्यमित्र ने यह घोषणा ‘शाकल’ (सियोलकोट) में जाकर की थी। शाकल (पंजाब) उस समय यवन राजा मिनेंडर (विदेशी शत्रु) की मुख्य राजधानी थी। इससे यह अकाट्य रूप से सिद्ध होता है कि पुष्यमित्र केवल उन बौद्धों को दंडित कर रहे थे जो स्वेच्छा से यवन साम्राज्य की राजधानी में रहकर भारत के खिलाफ युद्ध में उनका साथ दे रहे थे।
प्रामाणिक ऐतिहासिक एवं साहित्यिक स्रोत:
1. बाणभट्ट का ‘हर्षचरित’ (7वीं शताब्दी ईस्वी): इस ग्रंथ के छठे उच्छवास में स्पष्ट उल्लेख है कि “सेनानी पुष्यमित्र ने प्रतिज्ञा-दुर्बल (कमजोर प्रतिज्ञा वाले) मौर्य राजा बृहद्रथ को सेना प्रदर्शन के बहाने कुचल दिया।”
2. ‘दिव्यावदान’ और ‘अशोकवदान’ (बौद्ध संस्कृत ग्रंथ): इन ग्रंथों में पुष्यमित्र शुंग द्वारा कुक्कुटाराम विहार को नष्ट करने की कोशिश और शाकल (सियोलकोट) में बौद्धों के दमन का विवरण दर्ज है (भले ही बौद्ध लेखकों ने इसे धार्मिक रंग देने का प्रयास किया हो, पर यह राजनीतिक दमन का साक्ष्य है)।
3. ‘गार्गी संहिता’ का ‘युग पुराण’: इस प्राचीन ज्योतिष-ऐतिहासिक ग्रंथ में स्पष्ट लिखा है कि दुष्ट यवनों (यूनानियों) ने साकेत और पंचाल को जीतते हुए पाटलिपुत्र पर आक्रमण किया, जिसमें आंतरिक अराजकता और महलों के भीतर के षड्यंत्रों ने उनकी मदद की थी।
4. ‘An Imperial History of India’ (डॉ. काशी प्रसाद जायसवाल): डॉ. जायसवाल ने अपने ऐतिहासिक शोध में स्पष्ट किया है कि शुंग क्रांति वास्तव में विदेशी यवन आक्रमण और उनके आंतरिक सहयोगियों (बौद्ध संघों) के विरुद्ध एक ‘राष्ट्रवादी सैन्य क्रांति’ थी।
2. ‘Political History of Ancient India’: डॉ. हेमचंद्र रायचौधरी 3. ‘The History and Culture of the Indian People’ (Vol. 2: The Age of Imperial Unity): डॉ. आर.सी. मजूमदार


