ऐतिहासिक कहानियाँ, नवीनतम शोध, मध्यकालीन भारत

विदेशी आक्रान्ताओं के सहयोगी भारत के बौद्ध: कासिम, राजा दाहिर और बौद्ध

Kasim-Raja-Dahir-Bauddh
शेयर करें

सन 712 ईस्वी में उमय्यद खिलाफत के सेनापति मुहम्मद बिन कासिम  द्वारा सिंध पर किए गए आक्रमण और राजा दाहिर की पराजय के समय बौद्धों की भूमिका तथा उसके बाद के परिणामों का इतिहास में बहुत गहरा और दर्दनाक विवरण मिलता है। इस पूरी घटना का सबसे प्रामाणिक और प्राथमिक ऐतिहासिक स्रोत ‘चचनामा’ (Chachnama) नामक ग्रंथ है। इसके अतिरिक्त, इतिहासकार विन्सेंट स्मिथ, डॉ. आर.सी. मजूमदार की पुस्तकें और चीनी यात्रियों के वृत्तांत भी इस पर प्रकाश डालते हैं।

‘चचनामा और ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार, सिंध के कई क्षेत्रों में बौद्धों ने राजा दाहिर के खिलाफ मुहम्मद बिन कासिम की परोक्ष या प्रत्यक्ष मदद की। इसके पीछे मुख्य कारण राजा दाहिर के पिता ‘चच’ (एक ब्राह्मण मंत्री) द्वारा बौद्ध समर्थक राजा को हटाकर सत्ता हथियाना था, जिससे कुछ बौद्ध कबीले और श्रमण असंतुष्ट थे। सिंध का मुख्य बंदरगाह देवल था। चचनामा के अनुसार, यहाँ के असंतुष्ट बौद्धों ने कासिम को गुप्त सूचना दी कि देवल के मुख्य मंदिर के गुंबद पर लगा हरे रेशम का ध्वज (तोरण) जब तक लहरा रहा है, तब तक नगर को जीता नहीं जा सकता। कासिम ने अपनी तोप (मंजनीक) से सबसे पहले उसी ध्वजस्तंभ को गिराया, जिससे स्थानीय सेना का मनोबल टूट गया।

नीलून (आधुनिक हैदराबाद, पाकिस्तान के पास) एक बौद्ध बहुल क्षेत्र था, जिसका शासक एक बौद्ध भिक्षु था। चचनामा के अनुसार, कासिम के सिंध की धरती पर कदम रखने से पहले ही नीलून के बौद्ध प्रमुख ने अरबों के साथ गुप्त कूटनीतिक पत्र-व्यवहार शुरू कर दिया था। जैसे ही कासिम नीलून पहुँचा, बौद्ध प्रमुख ने बिना लड़े आत्मसमर्पण कर दिया, कासिम का स्वागत किया और अरब सेना के लिए भोजन व रसद की आपूर्ति की।

सेहवान का गवर्नर राजा दाहिर का चचेरा भाई ‘बजहरा’ था। लेकिन वहाँ की अधिकांश जनता बौद्ध थी। जब कासिम ने सेहवान को घेरा, तो बौद्ध प्रमुखों ने बजहरा का साथ देने से इनकार कर दिया। बौद्धों के असहयोग के कारण बजहरा को किला छोड़कर भागना पड़ा और बौद्धों ने कासिम के लिए किले के द्वार खोल दिए।

चीनी और सोवियत इतिहासकारों (जैसे गनकोवस्की) के विश्लेषणों के अनुसार, जब कासिम को राजा दाहिर से लड़ने के लिए नावों की कमी के कारण सिंधु नदी पार करने में कठिनाई हो रही थी, तब कुछ स्थानीय बौद्धों ने अरब सेना को नदी पार करने के सुरक्षित गुप्त रास्तों की जानकारी दी थी।

2.    ब्राह्मण मंत्री चच के राजा बनने का इतिहास

चचनामा और ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार, जिस बौद्ध धर्म के समर्थक राजा को हटाकर राजा दाहिर के पिता ‘चच’ ने सत्ता हथियाई थी, उसे राय राजवंश कहा जाता है। इस वंश के अंतिम शासक, जिनसे चच ने सत्ता ली थी, उनका नाम राय साहसी द्वितीय था।

राय राजवंश ने लगभग 489 ईस्वी से 632 ईस्वी तक सिंधु घाटी (आधुनिक सिंध, पाकिस्तान और उसके आसपास के क्षेत्रों) पर शासन किया। इनकी राजधानी आलौर थी। इस राजवंश के राजा बौद्ध धर्म के महान संरक्षक थे। चीनी यात्री ह्वेनसांग जब 7वीं शताब्दी में सिंध आया था, तब उसने भी अपनी पुस्तक में लिखा था कि सिंध का शासक बौद्ध धर्म का संरक्षक था, वहां सैकड़ों बौद्ध भिक्षु व मठ थे तथा राज्य में बौद्ध और हिंदू धर्म दोनों शांतिपूर्वक सह-अस्तित्व में थे

राय साहसी द्वितीय के दरबार में ‘राम’ नाम के एक मुख्य मंत्री थे। राम के अधीन एक युवा, बुद्धिमान और महत्वाकांक्षी ब्राह्मण ‘चच’ (Silaij का पुत्र) ने सचिव के रूप में काम करना शुरू किया। चच की बुद्धिमत्ता और कार्यकुशलता से प्रभावित होकर राजा राय साहसी द्वितीय ने उसे धीरे-धीरे प्रशासन में बहुत ऊंचे पद (मंत्री) पर नियुक्त कर दिया।

चचनामा के अनुसार, राय साहसी द्वितीय की कोई संतान (उत्तराधिकारी) नहीं थी। इसी दौरान राजा की पत्नी, रानी सुहांदी (Sohman Devi / Suhandi), चच के प्रभाव और व्यक्तित्व से प्रभावित हो गईं। जब राजा राय साहसी द्वितीय अत्यधिक बीमार पड़े और उनकी मृत्यु होने वाली थी, तब रानी सुहांदी और चच ने एक गुप्त योजना बनाई। उन्हें डर था कि राजा की मृत्यु की खबर फैलते ही राय राजवंश के अन्य संबंधी (जैसे चित्तौड़ के राजा और राजा के भाई राणा महरत) सत्ता पर दावा कर देंगे। इसलिए राजा की मृत्यु की खबर को काफी समय तक महल के भीतर ही गुप्त रखा गया।

इस गोपनीयता के दौरान, चच ने राजमहल के भीतर अपने सभी संभावित राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी दावेदारों को एक-एक करके रास्ते से हटा दिया या कैद कर लिया। जब चच की स्थिति मजबूत हो गई, तब राजा की मृत्यु की घोषणा की गई और चच ने खुद को सिंध का नया राजा घोषित कर दिया। बाद में चच ने रानी सुहांदी से विवाह भी कर लिया।

राय साहसी द्वितीय के भाई राणा महरत ने इस धोखे और अवैध तख्तापलट को चुनौती दी और चच को युद्ध के लिए ललकारा, लेकिन चच ने राणा महरत को भी युद्ध में मार गिराया। चच द्वारा स्थापित इस नए राजवंश को ‘ब्राह्मण राजवंश’ कहा गया। चच और उसके बाद उसके पुत्र राजा दाहिर ने सत्ता संभाली। सत्ता परिवर्तन के बाद सिंध की पुरानी बौद्ध प्रजा, जाट और लोहाना कबीले, जो राय राजवंश के प्रति वफादार थे, वे इस तख्तापलट को पचा नहीं पाए। उन्हें लगा कि उनके बौद्ध समर्थक या उनके प्रिय राजा के वंश को धोखे से समाप्त कर दिया गया है।

3. बौद्धों कि ब्राह्मण विरोधी मानसिकता और हिंदुओं कि खतरनाक आपसी फूट

यही कारण था कि जब 712 ईस्वी में उमय्यद खिलाफत के सेनापति मुहम्मद बिन कासिम ने राजा दाहिर पर आक्रमण किया, तो सिंध के कई बौद्ध भिक्षुओं, जाटों और स्थानीय सामंतों ने राजा दाहिर का साथ देने के बजाय कासिम का परोक्ष या प्रत्यक्ष समर्थन किया, क्योंकि वे इस तख्तापलट का बदला लेना चाहते थे। राजा दाहिर का साथ न देने और अरबों का समर्थन करने के पीछे गहरे सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक कारण थे।

चचनामा और अल-बिलादुरी जैसे इतिहासकारों के वृत्तांतों के आधार पर इस विषय की विस्तृत जानकारी मिलती है। राजा चच और दाहिर के शासनकाल में ब्राह्मण धर्म को राजकीय संरक्षण मिला, जिससे बौद्ध भिक्षु खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे थे। बौद्ध भिक्षुओं का मानना था कि युद्ध और रक्तपात उनके धर्म के खिलाफ है। चचनामा के अनुसार, जब कासिम ने सिविस्तान (Sehwan) पर घेरा डाला, तो वहां के बौद्धों ने राजा दाहिर के गवर्नर बजहरा (जो दाहिर का भतीजा था) से कहा: “हम भिक्षु हैं, हमारा धर्म शांति का है। हमारी निष्ठा उस राजा के प्रति होती है जो शांति बनाए रखे। अरब सेना मजबूत है, इसलिए हम युद्ध नहीं करेंगे।” इसके बाद उन्होंने कासिम के साथ शांति संधि कर ली।

जब मुहम्मद बिन कासिम सिंध आया, तो उसने जाटों को राजा दाहिर से मुक्ति दिलाने का वादा किया। परिणामस्वरूप, हजारों जाट सैनिक राजा दाहिर की सेना छोड़कर कासिम के मार्गदर्शक और लड़ाके बन गए।

चच के तख्तापलट के बाद से ही कई स्थानीय सामंत अंदर ही अंदर सुलग रहे थे। नेरुन का गवर्नर एक बौद्ध (भंडारकर या भंडारी) था। जब कासिम नेरुन पहुंचा, तो बौद्ध गवर्नर ने शहर के दरवाजे खोल दिए और अरब सेना के लिए रसद (भोजन और पानी) की व्यवस्था की।

मोका बसैया सिंध के एक शक्तिशाली क्षेत्र का प्रमुख था। राजा दाहिर द्वारा उसके साथ किए गए किसी पुराने विवाद के कारण वह दाहिर से नाराज था। उसने कासिम की अधीनता स्वीकार कर ली। मोका ने न केवल अरब सेना को सिंधु नदी पार करने के लिए नावें और पुल बनाने में मदद की, बल्कि दाहिर की सैन्य रणनीतियों की गुप्त जानकारी भी लीक कर दी।

4. मुस्लिम आक्रमणकारियों द्वारा बौद्धों की दुर्दशा और विद्रोहियों का भयानक अंत

बौद्ध संघों और भिक्षुओं तथा सत्ता परिवर्तन से दुखी अन्य हिंदुओं का यह मानना था कि अरब आक्रमणकारी केवल एक राजनीतिक बदलाव करेंगे और उन्हें धार्मिक स्वतंत्रता देंगे, लेकिन यह उनकी सबसे बड़ी और आत्मघाती भूल साबित हुई। ‘चचनामा’ और अल-बलाधुरी के ग्रंथों के अनुसार, जीत दर्ज करने के बाद कासिम और उसकी सेना ने सभी बौद्धों और हिंदुओं के साथ बिना किसी भेदभाव के क्रूर व्यवहार किया।

सिंध के बौद्ध विहार और स्तूप सोने, जवाहरात और अकूत संपत्ति के केंद्र थे। कासिम की सेना ने देवल, नीलून और मुल्तान के बौद्ध विहारों को बर्बरतापूर्वक लूटा। बहुमूल्य मूर्तियों को तोड़ दिया गया और विहारों को तहस-नहस कर दिया गया। जिन बौद्धों ने स्वेच्छा से इस्लाम स्वीकार नहीं किया, उन पर भारी ‘जज़िया कर’ थोप दिया गया। कई क्षेत्रों में बौद्ध भिक्षुओं को बंदी बनाया गया और जिन्होंने कर देने में असमर्थता जताई, उनका कत्लेआम किया गया। सिंध में बौद्ध धर्म का ताना-बाना इस कदर टूटा कि वह क्षेत्र कभी बौद्ध संस्कृति का केंद्र दोबारा नहीं बन पाया।

राजा दाहिर की पराजय (रावड़ के युद्ध) के बाद सिंध की महिलाओं, जिनमें हिंदू और बौद्ध दोनों शामिल थीं, को अकल्पनीय यातनाओं का सामना करना पड़ा। राजा दाहिर की मृत्यु के बाद उनकी पत्नी रानी बाई ने रावल के किले में अरब सेना का सामना किया। जब लगा कि किला जीत लिया जाएगा, तो अपनी अस्मत की रक्षा के लिए रानी बाई ने किले की अन्य स्त्रियों (जिनमें दासी और स्थानीय बौद्ध/हिंदू स्त्रियाँ शामिल थीं) के साथ अग्नि कुंड में कूदकर जौहर कर लिया, ताकि वे अरब सैनिकों के हाथ न लग सकें।

‘चचनामा’ और मुस्लिम इतिहासकार अल-बलाधुरी (किताब फुतुह अल-बुलदान) के अनुसार, देवल (कराची) पर विजय के बाद जो भीषण त्रासदी हुई। 700 बौद्ध महिलाओं का बलात्कार कर बंदी बना लिया गया। चचनामा, डॉ. आर.सी. मजूमदार और अन्य आधुनिक इतिहासकारों के विवरणों के अनुसार, जब कासिम की सेना ने देवल के किले की दीवारों को लांघा, तो कासिम ने अपने सर्वोच्च कमांडर अल-हज्जाज के आदेश पर नगर में तीन दिनों तक क्रूर और अंधाधुंध कत्लेआम का आदेश दिया। इस दौरान वहाँ के मुख्य मंदिर/विहार परिसर को अपवित्र किया गया। उस परिसर के भीतर शरण लेने वाली सैकड़ों अत्यंत सुंदर महिलाओं (कुलीन हिंदू और बौद्ध स्त्रियों) को अरब सैनिकों द्वारा बलात्कार करने के बाद बंदी (Sex Slave) बना लिया गया।

इन सभी महिलाओं को ‘माल-ए-गनीमत’ (युद्ध की लूट) घोषित कर दिया गया। चचनामा के अनुसार, इन महिलाओं के साथ अरब सैनिकों द्वारा अमानवीय व्यवहार किया गया, उन्हें जबरन दास (Sex Slaves) बनाया गया और उनमें से एक-तिहाई हिस्से को खलीफा के पास दमिश्क के बाजारों में दासी के रूप में बेचने और हरम के लिए भेज दिया गया।

इतिहास गवाह है कि जिन बौद्ध संघों ने राजनीतिक असंतोष के कारण अरबों का रास्ता आसान किया था, देवल की इस क्रूरता और बौद्ध विहारों की लूट को देखने के बाद उनका वह भ्रम बहुत जल्दी टूट गया। देवल का यह नरसंहार और महिलाओं को दास (Sex Slave) बनाने की घटना सिंध के इतिहास के सबसे काले अध्यायों में गिनी जाती है।

उपसंहार

बौद्ध धर्म को व्यक्ति समूहों और क्षेत्रीय धर्म से राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाने वाला सम्राट अशोक की  मृत्यु के बाद ही बौद्ध दो अनिश्चित समूहों में बंटे नजर आते हैं। एक समूह उनका था जो महात्मा बुद्ध के आदर्शों और विचारों पर चलकर अपना जीवन सफल करना चाहते थे तो दूसरा समूह उन बौद्धों का था जो परिधान तो महात्मा बुद्ध का धारण करते थे, मुखौटा तो बौद्ध का रखते थे परंतु वे लोभ, मोह, स्वार्थ, और अशोक के समय मिल रहे सुखोपभोग कि कामना मे अंधे और वंचना से पीड़ित थे।

ऐसे राजनीतिक बौद्धों का बुद्ध के उपदेशों, आदर्शों और बौद्ध धर्म से कोई मतलब नहीं था। वे अपनी राजनीतिक और भौतिक वंचना के लिए ब्राह्मणों और सनातनी शासकों को जिम्मेवार मानते थे तथा ब्राह्मणों और हिन्दू घृणा से भरते जा रहे थे। वे अपनी राजनीतिक प्रभाव और सुखोपभोग की पुनर्प्राप्ति के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार थे जिसका घृणित प्रदर्शन वे बृहदरथ मौर्य, शुंग काल, गुप्त काल और राजा दाहिर के समय उन्होंने किया जिसके कारण भारत, भारतवासियों और सनातन धर्म संस्कृति का अपूर्णीय क्षति हुई और अंततः मुस्लिम आक्रमणकारियों द्वारा इराक से शिंजियांग और तूरान तक तथा उज्बेकिस्तान से सम्पूर्ण भारतवर्ष तक बौद्धों और बौद्ध धर्म का सम्पूर्ण विनाश हो गया।

कहा जाता है इतिहास अपने को दुहराता है। अवशेष भारत में फिर राजनीतिक बौद्धों (नवबौद्ध) का उभार तेजी से हो रहा है जिनका महात्मा बुद्ध, उनके विचारों, आदर्शों और बौद्ध धर्म से दूर दूर तक कोई संबंध नहीं है। राजनीतिक स्वार्थ मे अंधे ये नवबौद्ध हिंदुओं, ब्राह्मणों और सनातन धर्म के विरुद्ध उसी तरह घृणा से भरे हुए हैं और आक्रमणकारी विदेशी विधर्मियों के हाथों का खिलौना बनते जा रहे हैं। क्षुद्र राजनीतिक स्वार्थ मे ये इतने अंधे हो चुके हैं कि ये नवबौद्धवाद (अम्बेडकरवाद) के प्रणेता डॉ भीमराव रामजी अंबेडकर के विचारों और चेतावनी की स्पष्ट अवहेलना कर रहे हैं। इससे पहले कि इतिहास फिर दुहराए और भारत तथा भारतीयों को एकबार फिर अपूर्णीय क्षति और पीड़ा से गुजरना पड़े इन नव बौद्धों से निपटना हर भारतीय का कर्तव्य होना चाहिए।   

मुख्य ऐतिहासिक स्रोत और संदर्भ:

1. ‘चचनामा’ (Chachnama – अली कूफी द्वारा 1216 ईस्वी में फारसी अनुवाद): यह सिंध के इतिहास और अरब विजय का सबसे विस्तृत समकालीन विवरण देता है। इसमें नीलून और सेहवान के बौद्धों के सहयोग और आत्मसमर्पण के स्पष्ट अध्याय हैं।

2. ‘किताब फुतुह अल-बुलदान’ (Kitab Futuh al-Buldan) – अल-बलाधुरी (9वीं शताब्दी): इस अरबी ग्रंथ में सिंध की विजय, देवल के मंदिर/विहार को तोड़े जाने और वहां की धन-संपत्ति तथा महिलाओं को बंदी बनाकर दमिश्क भेजने का आधिकारिक विवरण है।

3. ‘The History and Culture of the Indian People’ (Vol. 3: The Classical Age) – डॉ. आर.सी. मजूमदार: डॉ. मजूमदार ने विस्तार से लिखा है कि किस प्रकार सिंध के बौद्धों की कूटनीतिक अदूरदर्शिता (Short-sightedness) ने उन्हें ही बर्बरता के कुएं में धकेल दिया। 4. ‘History of India’ – विन्सेंट स्मिथ (Vincent Smith): स्मिथ ने अरबों द्वारा सिंध की महिलाओं को दास बनाने और खलीफा के दरबार में भेजने की घटनाओं को चचनामा के आधार पर प्रमाणित किया है।

Tagged , , , ,

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *