गौरवशाली भारत

गौरवशाली भारत-२

Bharat mata-2
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26.         चतुर्युग अर्थात सतयुग, त्रेतायुग, द्वापर और कलियुग कुल ४३२०००० वर्षों का होता है जिसे एक चक्र कहते हैं. १००० चक्र अर्थात ४३२००००००० वर्ष को एक कल्प कहते हैं जो बिगबैंग सिद्धांत के अनुरूप सृष्टि निर्माण काल और विरामकाल के अनुरूप है. एक कल्प में १४ मन्वन्तर होते हैं. प्रत्येक मन्वन्तर के शासक को मनु कहते हैं. वर्तमान मनुस्मृति चालू मन्वन्तर की आचारसंहिता है. वर्तमान विश्व सातवें मन्वन्तर में है जो सौर्यमंडल सिद्धांत और सूर्य के वैज्ञानिक आयु के समकक्ष है.

27.         ईश्वरः सर्व भूतेषु हृदेशे अर्जुन तिष्ठति

भ्राम्यन सर्वभूतानि यंत्ररुढ़ानि मायया.

अर्थात समूचा विश्व एक यंत्र है जिस पर आरूढ़ जीवों सहित वह घूम रहा है. ईश्वर अपनी माया (शक्ति) से उन्हें घुमा रहा है. (श्रीमद्भागवत गीता)

28.         प्राचीन काल से भारतीय लोग सागर पार जाते रहे हैं. विभिन्न देशों में भारतियों के धार्मिक प्रणाली के चिन्ह उसके साक्ष्य है.(Annals and Antiquities of Rajsthan by colonal jems Tod)

हिन्दुस्थान के लोग प्राचीन समय में सागर संचार में बड़े कुशल माने जाते थे. (India in Greece by Edward Pococke)

व्यापारी विभिन्न देशों से माल लाकर भारतीय राजाओं को भेंट दिया करते थे-मनुस्मृति

(नोट-धूर्त वामपंथी इतिहास्याकर बताते हैं की आर्यजन समुद्र देखे नहीं थे और हिन्दू विदेश यात्रा को अशुभ मानते थे इसलिए समुद्र यात्रा नहीं करते थे. ये दोनों बात गलत है. दरअसल आधुनिक ईसायत और इस्लाम के उत्थान के बाद इन हिंसक धर्मान्धों के द्वारा अरब और यूरोप के हिन्दुओं (वैदिक संस्कृति के अनुयायी) के प्रति हिंसा से सशंकित हो या इन देशों में जाकर कहीं वे भी विधर्मी न बन जाये इस डर से वे विदेश गमन और समुद्र यात्रा करने से मना करने लगे जो कालान्तर में अशुभ मान लिया गया.)

२९.   परशुराम ने इक्कीस बार विश्व में संचार कर उत्पातशील क्षत्रियों का दमन किया था. उनमे से एक बार उन्होंने भारतवर्ष का वह हिस्सा जिसे आज ईरान कहा जाता है पर चढ़ाई की. पोकोक ने अपने ग्रन्थ इण्डिया इन ग्रीस पुस्तक के पृष्ठ ४५ पर लिखा है की परशुधारी परशुराम ने ईरान को जीतने पर उस देश का परशु से पारसिक उर्फ़ पर्शिय एसा नाम पड़ा.

30.         ईरान, कोलचिस और आर्मेनिया के प्राचीन नक्शे से उन प्रदेशों में भारतीय बसे थे इसके स्पष्ट और आश्चर्यकारी प्रमाण मिलते हैं. और रामायण तथा महाभारत के अनेक तथ्यों के वहां प्रमाण मिलते हैं. उन सारे नक्शे में बड़ी मात्रा में उन प्रदेशों में भारतियों के बस्ती का विपुल ब्यौरा मिलता है. (Page 47, India in Greece by Edward Pococke)

31.         एडवर्ड पोकोक अपने उसी ग्रन्थ के पृष्ठ ५३ पर लिखते हैं की यूरोपीय क्षत्रिय, स्कैंडिनेविया के क्षत्रिय और भारतीय क्षत्रिय सारे एक ही वर्ग के लोग है. पी एन ओक लिखते हैं की उत्तरी यूरोप के डेनमार्क, नार्वे, स्वीडन आदि देशों में शिवपुत्र स्कन्द की पूजा होती थी इसलिए उस क्षेत्र को संस्कृत शब्द स्कंदनावीय अपभ्रंश स्कैंडिनेविया नाम पड़ा है.

32.         ग्रीक लोग स्वर्ग को Koilon कहते हैं और रोमन Coelum. ये दोनों संस्कृत शब्द कैलास के अपभ्रंश हैं. (पृष्ठ ६८, पोकाक के ग्रन्थ इंडिया इन ग्रीस)

स्वयं ग्रीस (Greece) संस्कृत शब्द गिरीश का अपभ्रंश है. ग्रीक नाम Cassopoi वस्तुतः संस्कृत शब्द काश्यपीय है जिसका अर्थ होता है काश्यप के अनुयायी या वंशज.

33.         रोम के ईसापूर्व जीतने मूर्तिपूजक पैगन पंथ (हिन्दू, बौद्ध आदि) थे उनके सिद्धांत ईसाई पंथ के सिधान्तों से कहीं अधिक शरीर, मन, बुद्धि, चेतना आदि सभी का समाधान करनेवाले होते थे. उनकी परम्परा बहुत प्राचीन थी. विज्ञान और सभ्यता पर वे आधारित थी. उनकी देवताए बड़ी दयालु कही जाति थी. वह धार्मिक प्रणाली तर्क पर आधारित थी. अगले जन्म में अधिक शुद्धभाव और पुन्य प्राप्ति हो यह ध्येय रखा जाता था. ईसाई पंथ ने उस विरोधी परम्परा से ही अपने तथ्य बनाकर उन पंथों का खंडन करना आरम्भ किया. (Preface of Oriental Religious by Grant Showerman, the prof. of Visconsis University)

34.         इसमें कोई संदेह नहीं की ईसाईपंथ के कुछ विधि और त्यौहार मूर्तिपूजकों की प्रणाली का अनुकरण करते हैं. चौथी शताब्दी में क्रिसमस का त्यौहार २५ दिसम्बर को इसलिए माना गया की इस दिन प्राचीन परम्परानुसार सूर्यजन्म का उत्सव होता था. पूर्ववर्ती देशों में और विशेषतः उनकी प्राचीन धर्म-प्रणाली में हमें उनके व्यवसाय और सम्पत्ति, तांत्रिक क्षमता, कला, बुद्धि और विज्ञान का परिचय प्राप्त होता है.(Preface of Oriental Religious by क्युमोंट)

35.         हिन्दू प्रणाली की प्राचीनता की कोई बराबरी नहीं कर सकता. वहीँ (आर्यावर्त में) हमें न केवल ब्राह्मण धर्म अपितु समस्त हिन्दू प्रणाली का आरम्भ प्रतीत होगा. वहां से वह धर्म पश्चिम में इथिओपिया से इजिप्त और फिनिशिया तक बढ़ा; पूर्व में स्याम से होते हुए चीन और जापान तक फैला; दक्षिण में सीलोन और जावा सुमात्रा तक प्रसारित हुआ और उत्तर में ईरान से खाल्डइय, कोलचिस और हायपरबोरिया तक फैला. वहीं से वैदिक धर्म ग्रीस और रोम में भी उतर आया. (पृष्ठ १६८, The Theogony of the Hindus by कौन्ट विअन्स्तिअर्ना)

36.         इजिप्त का धर्म भी प्राचीन भारत का ही धर्म था. इसका प्रमाण हमें मोझेस (यहूदी लोगों का नेता) के कथन से मिलता है. मोझेस के धर्मतत्व एक ईश्वर की कल्पना पर ही आधारित थे. वेदों का तात्पर्य भी वही है. मोझेस की धर्म-प्रणाली और सृष्टि-उत्पत्ति की धारणाएँ कुछ मात्रा में उसी हिन्दू वैदिक स्रोत की दिखती है. (पृष्ठ १४४, The Theogony of the Hindus by कौन्ट विअन्स्तिअर्ना)

37.         Pantheism, Spinogism, Hegelianism आदि जो आध्यात्मिक धारणाएँ हैं वह कहती है की चराचर में ईश्वर सर्वव्यापी है; उसी परमात्मा का अंश मानव में भी है; मृत्यु के पश्चात जिव की आत्मा परमात्मा में विलीन होती है; जन्म-मृत्यु का चक्र अखण्ड घूमता रहता है-यह सारी कल्पनाएँ हिन्दू परम्परा की ही तो है. (पृष्ठ २९-30, Bharat-India as seen and known by foreigners)

38.         बारीकी से जांच करने पर किसी शुद्ध भाव के व्यक्ति को यह मानना पड़ेगा की हिन्दू ही विश्व-साहित्य और ईश्वरज्ञान के जनक हैं-W. D. Brown

कुछ पाश्चात्य श्रेष्ठियों को अभी इस बात का पता नहीं है की हिन्दू ही विश्व के प्राचीनतम शासक हैं-Sir James Coird

39.         इस बात का संदेह नहीं हो सकता की हिन्दू जाति कला और क्षात्रबल में श्रेष्ठ थी, उनका शासन बड़ा अच्छा था, उनका नीतिशास्त्र बड़ी बुद्धिमानी से बनाया गया था और उनका ज्ञान बड़ा श्रेष्ठ था. प्राचीनकाल में हिन्दू व्यापारी लोग थे इसके विपुल प्रमाण हैं. ग्रीक लेखकों का निष्कर्ष है की हिन्दू बुद्धिमान और सर्वश्रेष्ठ थे. खगोल ज्योतिष और गणित में वे अग्रगण्य थे. (Culcutta Review, दिसम्बर, १९६१)

40.         हिन्दू जाति सर्वप्रथम सागर पार कर अपना माल अज्ञात प्रदेशों में पहुँचाया. उन्होंने ही आकाशस्य नक्षत्रादीयों का प्रगाढ़ अध्ययन कर ग्रह आदि के भ्रमण गतियों का अध्ययन किया, उनका स्थान जाना और उनका नामकरण किया. अनादिकाल से भारत ही निजी अग्रसरत्व केलिए ख्यात है और उसमें प्राकृतिक तथा हस्तकला की सुंदर कृतियों की सर्वदा विपुलता रही है-Dionysius (पृष्ठ १४-१५ देशपांडे जी की पुस्तक)

41.         पृथ्वी पर यदि एसा कोई देश है जहाँ मानव का लालन-पालन सर्वप्रथम हुआ या उस आद्यतम सभ्यता का गठन हुआ जो अन्य प्रदेशों में फैली और मानव को नवजीवन प्रदान करने वाले ज्ञान का प्रसार जहाँ से सारे विश्व में हुआ तो वह देश है भारत-Cruiser, French writer

42.         भारत के दार्शनिक साहित्य में इतने ओतप्रोत तथ्य मिलते हैं और वे इतने श्रेष्ठ हैं की उनकी तुलना में यूरोपियों के तथ्य अति हिन प्रतीत होते हैं. उससे हमें भारत के सामने नतमस्तक होकर यह मानना पड़ता है की मानव के उच्चतम दर्शनशास्त्र की जननी भारत है भारत-Victor Cousin

43.         हिन्दू लोग गिनती में विश्व के अन्य सभी प्रदेशों के लोगों के इतने थे-Ctesias (पृष्ठ २२०,  Volum II Historical Researches)

विश्व के केवल आधे लोग हिन्दू नहीं थे बल्कि अधिकतम लोग हिन्दू ही थे भले ही उनका पंथ अलग अलग हो-पी एन ओक

44.         जिस जीवन प्रणाली का आविष्कार भारत में हजारों वर्ष पूर्व हुआ वह हमारे जीवन का एक अंग बन गयी है और हमारे आसमंत में सर्वत्र हमें उसकी अनुभूति होती है. सभी जगत के कोने-कोने तक वह प्रणाली पहुंची है. चाहे अमेरिका हो या यूरोप हर प्रदेश में गंगाप्रदेश से आई हुई उस सभ्यता का प्रभाव दीखता है-Delbos, फ्रेंच विद्वान, Bharat-India as seen and known by foreigners

45.         जिस प्राचीनतम सभ्यता के अवशेष हमें प्राप्य है वह हिन्दू सभ्यता है. कार्यकुशलता और सभ्यता में वह बेजोड़ रही है. जिन सभ्यताओं का नामनिर्देशन इतिहास में है उनका उदय भी उस समय नहीं हुआ था जब हिन्दू सभ्यता चरम उत्कर्ष पर पहुँच चुकी थी. हम उसकी जितनी अधिक खोज करें उतना ही उसका विशाल और विस्तृत स्वरूप सामने आता है. (The Edinburgh Review, October 1872, England)

46.         विश्व में स्वतंत्र विचार-प्रणाली केवल हिंदुत्व की छत्रछाया में ही रह सकती है-पी एन ओक

47.         विश्व के विविध धर्मों का अध्ययन लगभग चालीस वर्ष तक करने के पश्चात मुझे हिन्दुधर्म के इतना सर्वगुणसंपन्न और आध्यात्मिक धर्म अन्य कोई नहीं दिखा. उस धर्म के बाबत जितना अधिक ज्ञान बढ़ता है उतना ही उसके प्रति प्रेम बढ़ता है. उसे अधिकाधिक जानने का यत्न करने पर वह अधिकाधिक अमोल-सा प्रतीत होता है. एक बात पक्की ध्यान में रखें की हिंदुत्व के बिना हिन्दुस्थान का कोई अस्तित्व नहीं है. हिंदुत्व ही हिन्दुस्थान की जड़ है. यदि हिंदुत्व से हिन्दुस्थान बिछड़ गया तो हिन्दुस्थान उसी तरह निष्प्राण होगा जैसे कोई वृक्ष उसकी जड़ें काटने से होता है- श्रीमती एनी बेसेंट, Hindus, Life Line of India by G.M. Jagtian

48.         भारत में कई धर्म और कई जातियां हैं तथापि उनमे से कोई भी हिन्दुधर्म के इतने प्राचीन नहीं है और भारत के राष्ट्रीयत्व के लिए वे आवश्यक नहीं है. वे जैसे आए हैं वैसे चले भी जायेंगे किन्तु हिन्दुस्थान बना रहेगा. यदि हिंदुत्व ही नष्ट हो गया तो भारत में रह ही क्या जाएगा केवल एक भूमि. यदि हिन्दू ही हिंदुत्व को सुरक्षित नहीं रखेंगे तो और कौन रखेगा? यदि भारत के सन्तान ही हिंदुत्व को नहीं अपनाएँगे तो हिंदुत्व का रक्षण कौन करेगा? भारत और हिंदुत्व एक ही व्यक्तित्व है-श्रीमती एनी बेसेंट, Hindus, Life Line of India by G.M. Jagtian

49.         निःसंदेह सारे विश्व में हिन्दुराष्ट्र प्राचीनतम है. वह आद्यतम और सर्वाधिक तेजी से प्रगत हुआ. जब नीलगंगा की दर्रें पर पिरैमिड खड़ी भी नहीं हुई थी, जब आधुनिक सभ्यता के स्रोत समझे जाने वाले ग्रीस और इटली के प्रदेशों में जंगली जानवर ही निवास करते थे उस समय भारत एक धनी और वैभवसम्पन्न राष्ट्र था. (History of British India by Thornton)

50.         यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत

अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम (श्रीमद्भगवत गीता)

यही भविष्यवाणी यहूदी लोगों में भी प्रचलित है. यहूदी लोग वास्तव में भगवान कृष्ण के यदु लोग ही हैं जो द्वारिका के समुद्रमग्न होने के पश्चात पश्चिम चले गये. ईसाई लोगों के बाइबिल के प्राचीन धर्मवाणी (ओल्ड टेस्टामेंट) भाग में भी इस भविष्यवाणी का उल्लेख है. जीसस क्राइस्ट (Jesus Christ) वास्तव में इशस (ईश्वर का संस्कृत) कृष्ण का ही विकृत उच्चारण है. अतः ईश्वरावतार सम्बन्धी मूल भविष्यवाणी वैदिक परम्परा की है-पी एन ओक

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