आधुनिक भारत

सवर्ण दलित मतभेद वामपंथी षड्यंत्र है

वामपंथी
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दलित होगा तेरा बाप. मैं तो गौरवशाली हिंदू हूँ-ज्ञान में पंडित, कर्म से क्षत्रिय, व्यवसाय से वैश्य तथा देश और समाज का सेवक हूँ इसलिए शुद्र हूँ.

भारतीय की महान सभ्यता, संस्कृति, धर्म, परम्परा, हिंदू और हिंदू धर्म विरोधी, नीच और देशद्रोही वामपंथी कैसे हम हिंदुओं को सवर्ण और दलित में बांटकर आपस में लड़ाकर हिंदुओं और हिन्दुस्तान को खत्म करने का षड्यंत्र कर रहे हैं उसका कुछ उदाहरण देखिए:

१.वामपंथी/सेकुलर एक तरफ पढ़ाते हैं हम हिंदू सिर्फ १५०० ईस्वी पूर्व मध्य एशिया से भारत आये और दूसरी तरफ कहते हैं शुद्र जो भारत के मूल निवासी थे उन्हें ब्राह्मण और क्षत्रिय गुलाम बनाकर ५००० वर्षों से शोषण कर रहे हैं. अब शेष ३५०० वर्षों में पूरा भारत लगभग १००० वर्ष आक्रमणकारी मुसलमानों और घुसपैठिये ईसाईयों (अंग्रेजों) का गुलाम रहा जिसमें सर्वाधिक शोषण और मरण क्षत्रिय और ब्राह्मणों का ही हुआ. डॉक्टर भीमराव रामजी आंबेडकर की माने तो आज के अधिकांश शूद्र कल के शोषित, पीड़ित और पतित क्षत्रिय ही हैं (शूद्र कौन, लेखक- डॉ आंबेडकर). फिर ये किस शोषण की बात करते हैं?

२.वामपंथी/सेकुलर कहते है श्रीराम और रामायण काल्पनिक हैं परन्तु रामायण के रचयिता बाल्मीकि इतिहास पुरुष थे और दलित थे, रामायण का एक पात्र शम्बर नामक असुर वास्तविक था और दलित था जिसका वध श्रीराम ने किया था. मतलब चित भी मेरी पट भी मेरी?

३.ये महर्षि बाल्मीकि को दलित अर्थात अछूत, शोषित, पीड़ित, वंचित समूह से बताते हैं परन्तु उस बाल्मीकि के चरणों में श्रीराम की वन्दना और सीता को लेकर राम के दरबार में पहुँचने पर सभी ऋषियों और महर्षियों द्वारा खड़े होकर उनका स्वागत करने की बात नहीं बताते हैं.

४.ये शम्बर नामक असुर के मारे जाने पर उस श्रीराम को जिसके अस्तित्व में ये यकीन ही नहीं रखते उन्हें दलित विरोधी साबित करते हैं, परन्तु एक धोबी (दलित, प्रजा) की संतुष्टि के लिए अपनी प्राण प्यारी राजमहिषी सीता का परित्याग करने को भी कलंकित करते हैं. एक दलित शबरी के जूठे बैर खाने की चर्चा नहीं करते. यदि श्रीराम दलित विरोधी थे तो क्या ऐसा करते? और क्या सचमुच बाल्मीकि, धोबी और शबरी दलित थे जिसका मतलब अछूत, शोषित, पीड़ित, वंचित समूह से है. नहीं, उस समय लोगों में ऐसी गंदी मानसिकता नहीं थी. दलित शब्द नीच वामपंथियों की गंदी मानसिकता की आधुनिक उपज है. इसका सनातन धर्म सभ्यता से कोई लेना देना नहीं है.

५.ये धूर्त आर्य/देव जाती विरोधी असुरों और दानवों को शुद्र घोषित करते हैं और शुद्र को आर्यों का गुलाम अर्थात अछूत, शोषित, पीड़ित, वंचित समूह. जबकि वास्तविकता यह है की असुरों और दानवों के लिए मानव अर्थात मनुवादी किसी गिनती में ही नहीं थे. हिरण्यकश्यप से लेकर रावण तक का इतिहास जो वामपंथियों की नजर में काल्पनिक है, पढ़ लीजिए वे मानवों को तुच्छ समझते थे और देवताओं तक को अपने वश में रखते थे. तीनों लोकों के स्वामी होते थे, मानव क्या देवता तक उससे भयभीत रहते थे. फिर वे शुद्र अर्थात अछूत, शोषित, पीड़ित, वंचित समूह कैसे हो गए? वैसे अब ये साबित हो चूका है कि आर्य कोई जाती समूह नहीं था बल्कि आर्य प्रतिष्ठा सूचक शब्द था और आर्यों का आविष्कार अंग्रेजों ने अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए सिर्फ ढाई सौ वर्ष पूर्व किया था. और यह की ये दानव, असुर किसी अलग प्रजाति समूह के नहीं बल्कि ये सब भी हमारी तरह महर्षि कश्यप के सन्तान थे जैसे देवता थे. देवता और असुरों के बिच युद्ध सत्ता संघर्ष था, जाती संघर्ष नहीं. और यह भी की महर्षि कश्यप उसी ब्रह्मा के पौत्र थे जिसे ये नीच वामपंथी नहीं मानते हैं. और यह की असुर वर्तमान भारतीय भूभाग पर शासन नहीं करते थे और ना ही देवताओं से उनका युद्ध १५०० ईस्वी पूर्व हुआ था. ये हजारों लाखों वर्ष पूर्व की एतिहासिक और/या प्राकृतिक घटना का विवरण है जो पुरानों में मिलता हैं.

६. अब देखिये इनकी धूर्तता का कुछ और नमूना. ये महात्मा बुद्ध और अशोक को मूल निवासी अर्थात दलित, शुद्र अथवा असुर वंशी जो समझिए मानते हैं परन्तु महात्मा बुद्ध जिस क्षत्रिय कुल में जन्म लिए उन क्षत्रियों को विदेशी, आक्रमणकारी, शोषक, उत्पीड़क आदि बताते हैं. उसी तरह महान अशोक जो क्षत्रिय/वैश्य कुल से था उसे भी ये मूलनिवासी बताते हैं और शूद्रों को गर्व से अशोक के वंशज बताते हैं, परन्तु भारत के सम्राट, विश्वविजेता चन्द्रगुप्त मौर्य जो अशोक का दादा था और मौर्य सम्राज्य का कर्ताधर्ता था उसे ये सम्मान की नजर से नहीं देखते. मौर्य सम्राज्य के शक्ति का स्रोत और चन्द्रगुप्त मौर्य तथा अशोक को सम्राट बनाने वाले महान आचार्य चाणक्य तो इन नीचों के लिए सिर्फ कुटिल ब्राह्मण मात्र हैं जिसे ये घृणा के पात्र के आलावा और कुछ नहीं समझते हैं.

७. ये तो इतने धूर्त हैं कि इस देश के लिए और इस देश की जनता की सुरक्षा के लिए सदैव से मर मिटने का इतिहास रखने वाले क्षत्रियों और ब्राह्मणों को घृणा की दृष्टि से देखते हैं, उन्हें आक्रमणकारी, विदेशी, शोषक, उत्पीड़क आदि घोषित करते हैं जबकि सिर्फ कुछ सौ बरसों पहले भारत पर आक्रमण करने वाले मुस्लिमों और चंद वर्ष पहले अंग्रेजों की गुलामी की उपज ईसाईयों को भी मूल निवासी घोषित करते हैं.

८. लोहार, सुनार, जुलाहा, कुम्हार, बनिक, तेली, धोबी आदि प्राचीन व्यावसायिक वर्ग थे जिनमे से कुछ आज व्यावसायिक पतन के कारन वैश्य वर्ग से तथाकथित दलित वर्ग में आ गए हैं. जैसे कुम्हार को ले लीजिए. सिर्फ कुछ सौ वर्षों पूर्व तक कुम्हार धनी व्यवसायी के रूप में जाना जाता था क्योंकि प्राचीन काल से मिट्टी का बर्तन ही खाने पीने आदि सामानों के लिए उपयोग में आनेवाली आवश्यक सामग्री के ये उत्पादक थे. ये वामपंथी इतिहासकार इतिहास के कालक्रम का निर्धारण और सभ्यता का निर्धारण प्राचीन मृदभांडों के आधार पर ही करते हैं. इतनी पहुँच थी इस व्यवसाय की, परन्तु धातु के बर्तनों के उपयोग में आने के साथ ही इस व्यवसाय और फिर इस जाती का पतन प्रारम्भ हो गया. आज जबकि दीवाली के दिए और कुल्हड भी चीन से आयात होने लगे हैं ये बेरोजगारी के कगार पर आ खड़े हुए हैं जो कभी धनिक व्यावसायिक वर्ग हुआ करते थे. ये ठीक वैसे ही है जैसे मोबाईल के आने से वाकमैन, घड़ी आदि कई उपकरण बाजार से बाहर अर्थात दलितावस्था को प्राप्त हो गए. नए मोबाईल कम्पनी के आने से पुराना नोकिया बाजार से बाहर अर्थात दलित हो गया. जिनकी व्यवसाय आजतक चमक रही है वे आजतक दलित नहीं बने हैं जैसे सुनार जबकि अतीत में ये भी उसी वर्ग समूह से थे.

९. ये नीच और धूर्त वामपंथी/सेकुलर मनुस्मृति की गलत व्याख्या कर हम हिंदुओं के बिच सामाजिक खाई खड़ी करते हैं जबकि मनु स्मृति जाति आधारित व्यवस्था नहीं कर्म आधारित वर्ण व्यवस्था की बात करता है. वैदिक काल में वर्ण व्यवस्था कर्म आधारित था न की जन्म आधारित. इस व्यवस्था में एक वर्ण के लोग दूसरे में अपने कर्म से स्वतः परिवर्तित हो जाते थे जैसे विश्वामित्र, अगस्त, पराशर, परशुराम दत्तात्रेय बाल्मीकि, मतंग आदि जो विभिन्न जातियों से ब्राह्मण क्षत्रिय में परिवर्तित थे. सभ्यता के विकास के साथ जब आर्थिक क्रियाकलापों में वृद्धि हुई तो आर्थिक क्रियाओं के अनुरूप धोबी, नाई, बुनकर, बनिया, तेली, सोनार, लोहार, कुम्भकार आदि कहलाने लगे, परन्तु यहाँ भी ये जातिगत नहीं थी.

उत्तर वैदिक काल के उत्तरार्द्ध से वर्ण व्यवस्था में विकृत्ति आनी शुरू हुई जो महाभारत काल पश्चात यानि कलियुग में जन्म आधारित हो गयी. मौर्य काल से पूर्व किसी के नाम के साथ सर नेम आपने नहीं देखा होगा. जैसे दशरथ सिंह, राम सिंह, कृष्ण यादव, लव सिसोदिया, कुश कुशवाहा, परशुराम पाण्डेय आदि. मौर्य काल में भी ये शुरुआत मात्र था क्योंकि अशोक और बिन्दुसार मौर्य की जगह केवल बिन्दुसार और अशोक नाम ही मिलता है. वर्ण व्यवस्था यदि आज पूर्ववत लागू होता तो भारत की दुर्गति होती ही नहीं जो जन्म आधारित जाति व्यवस्था के कारण बर्बाद हो चुकी है.

१०. महर्षि मनु वर्णव्यवस्था के समर्थक थे लेकिन वे जन्म
आधारित वर्ण व्यवस्था के नहीं बल्कि कर्म आधरित
वर्ण व्यवस्था के समर्थक थे जो की मनुस्मृति के निम्न
श्लोकों से पता चलता है :-
मनुस्मृति १०:६५- शूद्रो ब्राह्मणात् एति, ब्राह्मणश्चैति शूद्रताम्।
क्षत्रियात् जातमेवं तु विद्याद् वैश्यात्तथैव च।।
अर्थात गुण, कर्म योग्यता के आधार पर ब्राह्मण शूद्र बन
जाता है और शूद्र ब्राह्मण. इसी प्रकार क्षत्रिय और वैश्य भी अपने वर्ण बदल सकते हैं.
मनुस्मृति ९.३३५: शरीर और मन से शुद्ध- पवित्र रहने वाला, उत्कृष्ट लोगों के सानिध्य में रहने वाला, मधुरभाषी, अहंकार से रहित, अपने से उत्कृष्ट वर्ण वालों की सेवा करने वाला शूद्र भी उत्तम ब्रह्म जन्म और द्विज वर्ण को प्राप्त कर लेता है.
मनुस्मृति के अनेक श्लोक कहते हैं कि उच्च वर्ण का व्यक्ति भी यदि श्रेष्ट कर्म नहीं करता, तो शूद्र (अशिक्षित) बन जाता है. उदाहरण:


२.१०३: जो मनुष्य नित्य प्रात: और सांय ईश्वर आराधना नहीं करता उसको शूद्र समझना चाहिए.
२.१७२: जब तक व्यक्ति वेदों की शिक्षाओं में दीक्षित नहीं होता वह शूद्र के ही समान है.
४.२४५ : ब्राह्मण- वर्णस्थ व्यक्ति श्रेष्ठ-अति श्रेष्ट व्यक्तियों का संग करते हुए और नीच-नीचतर व्यक्तियों का संग छोड़कर अधिक श्रेष्ठ बनता जाता है. इसके विपरीत आचरण से पतित होकर वह शूद्र बन जाता है. अतः स्पष्ट है कि ब्राह्मण उत्तम कर्म करने वाले विद्वान व्यक्ति को कहते हैं और शूद्र का अर्थ अशिक्षित कर्म करने वाला व्यक्ति है. इसका किसी भी तरह जन्म से कोई सम्बन्ध नहीं है.


२.१६८: जो ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य वेदों का अध्ययन और पालन छोड़कर अन्य विषयों में ही परिश्रम करता है, वह शूद्र बन जाता है. अतः मनुस्मृति के अनुसार आज भारत में वे सारे लोग जो भ्रष्टाचार, जातिवाद, स्वार्थ साधना, अन्धविश्वास, विवेकहीनता, लिंग-भेद, चापलूसी, अनैतिकता इत्यादि में लिप्त हैं, वे सभी शूद्र हैं.


२ .१२६: भले ही कोई ब्राह्मण हो, लेकिन अगर वह अभिवादन का शिष्टता से उत्तर देना नहीं जानता तो वह शूद्र (अशिक्षित व्यक्ति) है.
शूद्र भी पढ़ा सकते हैं :
शूद्र भले ही अशिक्षित हों तब भी उनसे कौशल और उनका विशेष ज्ञान प्राप्त किया जाना चाहिए.


२.२३८: अपने से न्यून व्यक्ति से भी विद्या को ग्रहण करना चाहिए और नीच कुल में जन्मी उत्तम स्त्री को भी पत्नी के रूप में स्वीकार कर लेना चाहिए.


२.२४१ : आवश्यकता पड़ने पर अ-ब्राह्मण से भी विद्या प्राप्त की जा सकती है और शिष्यों को पढ़ाने के दायित्व का पालन वह गुरु जब तक निर्देश दिया गया हो तब तक करे.

११. दरअसल इन धूर्त वामपंथियों/सेकुलरों का सारा प्रपंच मनुस्मृति के कुटिल विश्लेषण जैसा की अभी हाल ही में इतिहासकार इरफ़ान हबीब ने सच्चाई उजागर किया था पर आधारित है और एक दो ब्राह्मण ग्रन्थ जैसे शतपथ ब्राह्मण, एतरेय ब्राह्मण आदि जिसका हिंदू धर्म से कोई स्पष्ट लेना देना नहीं है, उसमे निहित छुआछूत के एक दो उद्धरण को आधार बनाकर दुष्प्रचार करते हैं और नीचता पूर्वक पूरे सनातन धर्म पर ही प्रश्न चिन्ह खड़ा करते हैं. इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि चंद चांडाल आज भी ब्राह्मण के भेष में समाज में उपस्थित है परन्तु हिंदू समाज आज पुरी तरह उनके विरोध में खड़ा है. बिहार में हाल ही में ऐसे एक पंडे की जमकर पिटाई पूरी जनता ने की थी.

दरअसल वामपंथी हम हिंदू, हिंदू धर्म, हमारा घर हिन्दुस्तान की सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा है क्योंकि १. वामपंथी हिन्दुस्तान और हिंदुओं के उस प्रत्येक चीज से नफरत करते है जो हमें विरासत में मिला है. इसलिए वे  हमारी गौरवशाली सभ्यता, संस्कृति, धर्म, परम्परा, ज्ञान, विज्ञान से नफरत करते हैं और इसके विरुद्ध घृणा फैलाते हैं. २. वामपंथी बेहद डरपोक होते हैं इसलिए ये मुस्लिम परस्त होते हैं और आपने कभी नहीं सुना होगा की ये इस्लामिक आतंकवाद, हिंसा, दंगा, बलात्कार के विरुद्ध बोले होंगे. बोलना तो दूर ये तो भारत में उनके संरक्षक और ढाल बनकर खड़े हैं और कतई मानने को तैयार नहीं है कि इनका इस्लाम से कोई लेना देना है. दूसरी ओर लाखों वर्ष पुरानी सनातन सभ्यता में आये चंद सामाजिक बुराई को वामपंथी सीधे हिंदू धर्म की बुराई घोषित कर हिंदू धर्म को ही बदनाम करते हैं. अगर इन धूर्तों की मक्कारीपूर्ण तर्क को मान भी ले की हिंदू धर्म में चंद बुराई है तो भी क्या यह उस धर्म से लाख गुना बेहतर नहीं है जो आतंकवाद, हिंसा, दंगा, बलात्कार, लूट को धार्मिक जामा पहनाता हो? परन्तु इनके विरुद्ध इन धूर्तों के मुंह से एक शब्द नहीं निकलता है. यह इनके गद्दारी और नीचता का प्रमाण है.

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