मध्यकालीन भारत

बिहार का धर्मांध मुस्लिम डकैत शेरशाह सूरी

shershah-शेरशाह
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दो मुस्लिम इतिहासकार वाकयात ए मुश्वकी (पृष्ठ १०३) तथा तारीख ए दाऊदी (पृष्ठ २५३) लिखते हैं कि एक बार सारंगपुर तथा उज्जैन के बीच यात्रा में शेरशाह ने अपने साथ चलते हुए मल्लू खान को अपने जीवन की प्रारम्भिक घटनाएँ सुनाई थी. उसने बताया कि एक बार वह चोरों तथा लुटेरों के चक्कर में पड़कर उन्हीं के साथ हो लिया और चारों ओर गावों को लूटता रहा. डाकुओं के साथ इस प्रारम्भिक प्रशिक्षण ने उन सात वर्षों तक (१५३८-४५) शेरशाह को मनमानी लूट तथा बलात्कार के योग्य बना दिया.

शेरशाह का वास्तविक नाम फरीद खां था. उसका अफगानी पिता हसन खां नैतिक मूल्यों में तनिक भी विश्वास नहीं रखता था. इसलिए उसके अनेक पत्नियों और बेटों में से एक फरीद भी वैसा ही था और वह भी अपने बाप से ही तू तू मैं मैं करता रहता था (इलियड एवं डाउसन पृष्ठ ३१०, भाग-५). अपने पिता द्वारा दी गयी जागीर से वह संतुष्ट नहीं था इसलिए उसने सर्वप्रथम अपने बाप तथा भाईयों के विरुद्ध ही मोर्चा खोल दिया. उसने बिहार की परिवार-सम्पदा पर पूर्ण प्रभुत्व स्थापित करने की मांग की.

इतिहासकार पुरुषोत्तम नागेश ओक लिखते हैं, “अपने पिता से तंग आकर फरीद खां जौनपुर के विदेशी अफगानी डाकू तथा सरदार के पास गया. वहां उसे इस्लामी जन्नत प्राप्त करने का प्रशिक्षण दिया जाता था जिसमें हिन्दू मूर्तियों को तोड़ना, मन्दिरों को मस्जिद में परिवर्तन करना, हिन्दू सम्पत्ति लूटना, हिन्दू ललनाओं को भगाना, बच्चों का अपहरण, क्रूरता पूर्वक लोगों का धर्म-परिवर्तन करना आदि….और आगे फरीद खां अपना पूरा जीवन इन्ही कार्यों में लगा दिया.”

फरीद खां की बढती गुंडागर्दी से आतंकित होकर उसके पिता ने उसे हड़पी हुई हिन्दू संपत्ति जो सहस्त्रार्जुन नामक हिन्दू तीर्थस्थल था जिसे अब सहसराम या सासाराम कहा जाता है दे दिया. इन्ही प्राचीन हिन्दू महलों में शेरशाह तथा उसके अन्य विदेशी लूटेरे पूर्वज दफनाये गये हैं.”

हिन्दुओं से लुटी गयी यह सम्पत्ति फरीद का ऐसा ठिकाना बन गयी थी जहाँ से वह अधिकांश उत्तर भारत में भयानक डकैतियां डाला करता था. फरीद ने अपने पिता से इस अधिकार की मांग की कि उस क्षेत्र में रहने वाले हिन्दुओं के साथ वह जैसा चाहे व्यवहार करे. और फिर फरीद ने स्पष्ट शब्दों में कह दिया, “जब भुगतान का समय आएगा वह कोई अनुग्रह नहीं दिखायेगा तथा पूर्ण कठोरता के साथ मालगुजारी वसूल करेगा” (इलियड एवं डाउसन पृष्ठ ३१३, भाग-४)

फरीद खां हिन्दुओं से अधिक से अधिक धन चूस लेना चाहता था ताकि उसकी सहायता से वह और भी अधिक मुस्लिम लुटेरों को एकत्र कर अन्य भू-भागों पर हमला कर सके. उसने अपने लुटेरों से कहा, “इन परगनों में कुछ ऐसे जमींदार हैं जो न तो कभी गवर्नर के सामने आये और न उन्होंने पूरी मालगुजारी ही दी….उन्हें कैसे समाप्त किया जाय?”

उसने सभी जागीरहीन (चोर, लुटेरे) अफगानों तथा जातिवालों को कहला भेजा की मैं तुम्हे खाना-कपड़ा दूंगा. इन विद्रोहियों (जागीरदारों) से जो कुछ सामान या धन ले लो वह सब तुम्हारा है. मैं स्वयं तुम्हे घोड़े दूंगा. इसमें जो अच्छा काम कर दिखायेगा उसे अच्छी जागीर दिलाऊंगा. यह सुनकर वे लोग अति प्रसन्न हुए. (वही पृष्ठ ३१४)

धर्मांध, क्रूर और बलात्कारी था शेरशाह

पुरुषोत्तम नागेश ओक लिखते हैं, “पाजी शेरशाह बड़ा धूर्त था. उसने अपने परगनों के हिन्दुओं को साज सामान समेत घोड़े छिनकर शेष हिन्दुओं को दास बनाने केलिए अपने गुंडे मुसलमानों को आदेश दिया. शीघ्र ही वे हिन्दुओं के गावों को लूट, उनके बच्चों, पशुओं तथा सम्पत्ति को ले आए. शेरशाह का जीवन इस प्रकार हिंदुस्तान की लूटपाट तथा बलात्कार से प्रारम्भ हुआ.

अपने लुटेरे सैनिकों को वह समस्त सम्पत्ति दे देता था किन्तु बच्चों तथा स्त्रियों को अपने पास रख लेता था. बच्चों को इस्लाम में दीक्षित कर देता और स्त्रियों को अपने हरम में बलात्कार केलिए ठूंस लेता तथा मुखियाओं को कहला भेजता, “मुझे मेरे हक दो; यदि नहीं दोगे तो मैं तुम्हारी पत्नियों तथा बच्चों को बेच दूंगा और फिर तुम्हे कहीं स्थापित नहीं होने दूंगा.” इस प्रकार वह शेरशाह जिसे भारतीय इतिहासों में बहुत बड़ा उपकारी चित्रित किया जाता है बहुत बड़ा नीच, डाकू, लुटेरा, चोर, बलात्कारी, अपहरणकर्ता तथा हत्यारा ठहरता है. उसने यह भी कहा, “तुम जहाँ कहीं जाओ, वहीँ मैं तुम्हारा पीछा करूंगा तथा तुम जिस गाँव में जाओगे वहां के मुखियाओं को मैं आज्ञा दूंगा की वे तुम्हे पकड़कर मेरे हवाले कर दें अन्यथा मैं उस पर भी आक्रमण करूंगा.” इस प्रकार शेरशाह ने अपने परगनों के हिन्दुओं को प्रताड़ित कर उन्हें मुसलमान बनने पर मजबूर कर दिया और जो मुसलमान नहीं बने उन्हें वहां से लूटकर भगा दिया और उनके घरों में मुसलमानों को बसा दिया.”

“बहुत तड़के फरीद खां ने (हिन्दू) जमींदारों पर आक्रमण किया, सभी विद्रोहियों (हिन्दुओं)को मार दिया और उनके सभी स्त्री-बच्चों को बंदी बनाकर अपने लोगों को आदेश दिया की वह उन्हें चाहे बेच दें चाहे दास बना लें (अर्थात हरम में डाल लें) तथा अन्य लोगों (मुसलमानों) को लाकर गावों में बसा दें (तारीख ए शेरशाही, लेखक अब्बास खां)

“अपने अश्वारोहियों को उसने आज्ञा दी कि वे गावों के चारों ओर घूमें, सब आदमियों को मार दें तथा स्त्री-बच्चों को बंदी बना लें, किसी को कृषि न करने दें तथा पहले की बोई हुई फसल नष्ट कर दें, किसी को पड़ोस से कुछ न लाने दें और गाँव से बाहर कुछ न ले जाने दें. ….अपने पियादों को वह सभी जंगल काट डालने का आदेश देता. जब वह पूरी तरह कट जाता वह पुराने स्थान से आगे बढ़ जाता और अन्य गाँव का घेरा डालकर उस पर अधिकार कर लेता. (वही पृष्ठ ३१६, भाग ४)

“इस प्रकार अधिक खेती करने के स्थान पर शेरशाह ने सभी वन काटकर, सभी आदमियों को कत्ल कर, स्त्रियों के साथ बलात्कार कर, कृषि भूमि जलाकर, अनेक डकैतियां डाल भारत को वीरान कर दिया.”

महाधूर्त शेरशाह सूरी

फरीद खां के इन आतंकी कारनामों से विचलित होकर उसके पिता ने उसे अपने दिए गये जागीरों से उसे वंचित कर दिया. तब फरीद खां ने आगरा पहुंचकर दौलत खां की सरपरस्ती की और अपने पिता के विरुद्ध उसका सहयोग माँगा. दौलत खान ने जब इब्राहीम लोदी से इस बाबत आज्ञा मांगी तो इब्राहीम लोदी ने यह कहकर नकार दिया की “वह बहुत बुरा आदमी है, अपने ही पिता के विरुद्ध शिकायतें करता है.”

कुछ दिनों बाद जब फरीद के पिता की मृत्यु हो गयी तो उसने लड़ झगड़कर अपनी पुराणी जागीर हासिल कर ली. जब बाबर से इब्राहीम लोदी पानीपत की लड़ाई में हार गया और मारा गया तो बिहार का जागीरदार बिहार खां खुद को बिहार का स्वतंत्र शासक घोषित कर दिया. तब धूर्त फरीद खां ने उससे दोस्ती कर ली. एक बार बिहार खां के साथ शिकार करते समय कहा जाता है उसने एक शेर को मार गिराया था, तभी से फरीद शेर खां कहा जाने लगा.

पुरुषोत्तम नागेश ओक लिखते हैं, “शेरशाह ने यह जानने केलिए आगरे में बाबर की सेवा की कि मुगल लुटेरे हिंदुस्तान को किस प्रकार नष्ट-भ्रष्ट करते हैं. बाबर को यह समझते देर न लगी की शेरशाह की चालें संदेह से भरी हुई है तथा उसके कार्य अपराधपूर्ण हैं. बाबर ने शेरशाह की गिरफ्तारी के आदेश दे दिए, किन्तु उसे पहले से ही पता लग गया था अतः वह बिहार भाग गया. ठीक इसी समय बिहार का सुल्तान मुहम्मद मर गया…उसने लोहानी मुसलमानों से सुलह कर ली और बंगाल के मुस्लिम शासक पर आक्रमण कर दिया. शेरशाह की विजय हुई….स्पष्ट है कि वह कठोरता तथा प्रवंचना, क्रूरता तथा डाकुपन का मिश्रण था और फिर भी इस कमीने, पाशविक पाजी शेरशाह को भारतीय इतिहास में सिंह का रूप दे दिया गया है.”

शेरशाह ने धोखे से चुनार गढ़ पर अधिकार कर लिया और कुसैन नामक विधवा जिसका पति नासिर खां मर चुका था उसके महल पर आक्रमण कर उसे अपने हरम में डाल लिया और उसके पति ने हिन्दू घरों से जिस ६० मन सोने को लुटा था, उस पर अधिकार कर लिया. इसी तरह एक अन्य निस्सहाय यवन विधवा फतह मलिका को भी अपने हरम में डाल लिया था उस के पास से तिन सौ मन स्वर्ण जो उसके लूटेरे पिता और पति ने हिन्दू घरों से लूटा था उस पर अधिकार कर लिया.

शेरशाह ने रोहतास गढ़ पर छल से कब्जा किया

डाकू शेरशाह सूरी का मकबरा

चुनार गढ़ को जब हुमायूँ ने घेर लिया तो वह अपने पत्नियों, रखैलों, बच्चों सहित दुर्ग छोड़कर बिहार भाग आया और रोहतास दुर्ग के हिन्दू सरदार से शरण की मांग की. भावुक हिन्दू मुर्ख बन गये और प्रवंचित हिन्दू वजीर ने उन्हें शरण दे दी. शेरशाह की गतिविधियों से राजा हरिकृष्ण राय को उस पर संदेह हुआ किन्तु उसके मंत्री जिसे शेरशाह ने ६ मन स्वर्ण घूस में दिया था अपने वचन की आन रखने पर अड़ गया. शेरशाह जानता था की एक बार दुर्ग में प्रवेश कर जाने पर वह उसे ही वापस नहीं छीन लेगा अपितु सम्पूर्ण हिन्दू कोष एवं उनकी स्त्रियों पर भी अधिकार कर लेगा. और हुआ भी ऐसा ही.

तारीख ए खां जहान लोदी में वर्णन है कि किस प्रकार अपने सभी अफगानी पूर्वजों की भांति कृतघ्न शेरशाह ने हिन्दू आतिथ्य का दुरूपयोग किया. उसने यवन स्त्रियों को बिठाकर कुछ पालकियां भेजी. हिन्दू रक्षकों ने उन्हें देखा-भाला और जाने की आज्ञा दे दी. फिर मक्कार शेरशाह ने कहा की उसे यह अच्छा नहीं लगता कि उसकी सभी स्त्रियों को उघारकर देखा जाय, अतः शेष पालकियों को बिना जांच किए ही घुसने दिया जाय. उनके अंदर सशस्त्र अफगान विश्वासघाती थे. जब सभी पालकियां अंदर पहुंच गयी, बुर्काधारी अफगान सैनिकों ने चुपके से रात में निकलकर हिन्दू द्वार रक्षक को वश में करके समीप ही तैयार खड़ी शेरशाह की सेना केलिए द्वार खोल दिया. विश्वासघाती अफगान सेना ने हिन्दू सेना काट डाली, समस्त हिन्दू ललनाओं तथा सम्पत्ति को हथिया लिया एवं भीतर के सभी मन्दिर मस्जिदों में परिवर्तित कर दिए.

शेरशाह का वाराणसी की लूट

हुमायूँ ने जब शेरशाह पर आक्रमण किया तो उसने आत्मसमर्पण का स्वांग किया और हुमायूँ को विलासिता और लुटी हुई स्त्रियों के भोग में लगाकर वह खुद वाराणसी पर हमला कर दिया और वहां भयानक नरसंहार, लूटपाट तथा मन्दिरों का अपवित्रीकरण किया. फिर शेरशाह की सेना कन्नौज तथा सम्भल में मुगलों से भीड़ गयी और उन्हें पराजित किया. तब जाकर हुमायूँ का नशा उतरा और शेरशाह के विरुद्ध सैन्य अभियान शुरू किया.

हुमायूँ केलिए विनाशकारी निर्णायक युद्ध १५३८ ईस्वी के चौसा तथा बक्सर के बीच शातय गाँव में हुआ जिसमें हुमायूँ पराजित हुआ और शेरशाह विजयी हुआ. यह सोचकर की ४००० बंदी स्त्रियों को भोगने में ही उसकी सेना न लग जाये और सुरक्षा कमजोर पड़ जाए उसने सभी बंदी स्त्रियों को रात होने तक शेरशाह के शिविर में रखने का आदेश दिया. इस विजय के बाद डाकू शेर खां बादशाह शेरशाह घोषित कर दिया गया.

खूंखार लूटेरा शेरशाह सूरी

इस विजय के बाद डाकू शेरशाह और भी खूंखार हो गया. इलियड एवं डाउसन अपने ग्रन्थ के छठे भाग के पृष्ठ ३७८ पर लिखते हैं, “कुछ भी भला करने के स्थान पर शेरशाह ने दिल्ली तथा आगरे को उजाड़ देने का आदेश दिया.”

पुरुषोत्तम नागेश ओक लिखते हैं, “१५४० ईस्वी के युद्ध में हारने के बाद हुमायूँ हिंदुस्तान से बाहर भाग गया. अब शेरशाह ने हिंदुस्तान के सिंहासन पर उसके स्थान पर महान लुटेरे के रूप में अधिकार कर लिया तथा जिन भूखंडों को जीता था वहां से हिन्दुओं को निष्कासित कर अफगानों को बसाने लगा.”

शेरशाह ने हिन्दू राजपूत गक्खरों (खोक्खरों) के भूभाग को बुरी तरह लूटा. इतना ही नहीं, हिन्दू गक्खर बादशाह सारंग की युवा कन्या का अपहरण कर खवास खां को बलात्कार केलिए सौंप दिया गया. शेरशाह की अफगानी सेना ने रायसेन के हिन्दू राजा पूरनमल की प्रजा पर अभूतपूर्व अत्याचार करके उसे मजबूर कर दिया की वह जंगली तथा डाकू शेरशाह की अधीनता स्वीकार करे. अपने पति की सुरक्षा के प्रति चिंतित उसकी एकनिष्ठ, स्वामिभक्त, सुंदर पत्नी रतनावली अपने प्रिय हिन्दू पति की वापसी तक दुर्ग के बुर्ज पर बैठे रहने का निश्चय कर उठी. उसे तभी वापस जाने दिया जब उसने शेरशाह की सेवा केलिए ६००० अश्व देने तथा अपने अनुज चतुर्भुज को प्रतिभू के रूप में छोड़ने की सहमती दी.

पुरुषोत्तम नागेश ओक लिखते हैं, “उसके बाद शेरशाह ने मांडू, धार, उज्जैन की जो लूटपाट की तथा मन्दिरों को मस्जिदों में परिवर्तित करते समय विनाश का जो तांडव नृत्य किया उसकी उपमा नहीं है.” इतिहासकार अहमद यादगार लिखता है कि इस संघर्ष के बीच चंदेरी के राजा के विरुद्ध चढ़ाई करने केलिए वली दाद खां के अधीन सेना भेजी गयी. राजा के भतीजे को अपनी ओर मिलाकर राज्य जीत लिया गया. शेरशाह की सेना के हाथ उसके हाथी, घोड़े तथा अन्य सम्पत्ति लगी. राजा की सुंदर पुत्री के साथ शेरशाह ने बलात्कार किया.

लम्पट शेरशाह ने राजा पूरनमल के साथ विश्वासघात किया

शेरशाह बहुत दिनों से रायसेन के हिन्दू राजा पूरनमल की सुगृहिणी रत्नावली का सतीत्व भ्रष्ट करना चाहता था. उसने रायसेन को घेर लिया. पूरनमल की वीर हिन्दू सेना ने उन घिराव करनेवाले अफगान लुटेरों को इस सफलता पूर्वक काट डाला की वे  उससे बहुत डर गये. दुर्ग पर अधिकार करने तथा हिन्दू दुर्ग रक्षकों को पराजित न कर सकने पर शेरशाह ने वही पुराणी म्लेच्छ युक्तियाँ अपनायीं-हिन्दू जनता को कष्ट देना, उनकी स्त्रियों के साथ बलात्कार करना, उनकी फसल तथा घरों को जला देना एवं उनके बच्चों को बहुत कष्ट देना. इन रोंगटे खड़े कर देनेवाले अत्याचारों से द्रवित हो पूरनमल ने दुर्ग खाली कर देने का वचन दिया. इस शर्त पर की उसके परिवार तथा दुर्ग रक्षकों को सुरक्षापूर्वक चले जाने दिया जायेगा.

उसने कुरान की शपथ खाकर वचन दिया. पर स्वाभाविक विश्वासघात के अनुसार “रात में इंसा खां हबीब को आदेश दिया गया की एक निश्चित स्थान पर हाथियों सहित अपनी सेना एकत्र करे. उसने हसीब खां को पूरनमल पर नजर रखने का आदेश दिया की वह भागने न पाए. (वही, पृष्ठ ४०२, भाग ४).”

राजा पूरनमल को जब शेरशाह के इस विश्वासघात की खबर लगी की कुरान की शपथ ताक पर रखकर शेरशाह लोगों को जान से मारने और स्त्रियों को भ्रष्ट करने की ठान ली है, “अपनी प्राणप्रिय पत्नी रत्नावली के शिविर में जा उनका सिर काट दिया. तथा बाहर आकर अपने साथियों से कहा, मैंने यह किया है, क्या आप भी अपनी पत्नियों एवं परिवारों का यही करेंगे? फिर सभी अपने स्त्रियों, बहनों, बेटियों का खुद गर्दन काटकर महान वीरता एवं शौर्य का प्रदर्शन करते हुए शेरशाह के सैनिकों से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए. जो अपनी स्त्रियों के गर्दने नहीं काट सके उनकी स्त्रियों को पकड़ लिया गया. पूरनमल की एक कन्या एवं उसके अग्रज के तिन पुत्र जीवित पकड़ लिए गये. शेष को मार डाला गया. शेरशाह ने पूरनमल की कन्या को कुछ अफगानों को दे दिया ताकि वे उसे बाजारों में नचायें तथा बच्चों को नपुंसक बना देने का आदेश दे दिया गया ताकि अत्याचारियों (यानि हिन्दुओं) की वंश-वृद्धि न हो पाए. राय सेन के दुर्ग को उसने मुंशी शाहबाज खां को दे दिया. (अब्बास खां की तारीख ए शेरशाही, पृष्ठ ४०२-४०३, भाग-४, इलियट एवं डाउसन)

शेरशाह को सबसे बड़ा दुःख इस बात का था की उसकी पूरनमल की पत्नी रत्नावली का सतितत्व भंग करने की इच्छा पूर्ण नहीं हुई. राजपूत सरदार वासुदेव तथा राज कुंवर राजपूत जाति के विरुद्ध भी शेरशाह ने ऐसे ही घोर क्रूर कृत्या किये.

हिन्दुओं का कट्टर दुश्मन शेरशाह

शेरशाह को कुछ दरबारियों ने दक्षिण भारत पर आक्रमण करने की सलाह दिया तो उसने कहा कि “तुम्हारी बातें सही है पर इधर सुल्तान इब्राहीम लोदी के समय मूर्तिपूजकों ने इस्लाम के देश (भारत) को काफिरों (हिन्दुओं) से भर दिया है तथा मस्जिदों (मन्दिर को भ्रष्ट कर बनाये गये) में पुनः मूर्तियाँ रख दी है. दिल्ली एवं मालवा प्रान्त पर अधिकार कर लिया है. इन काफिरों (हिन्दुओं) से देश को जबतक मैं साफ नहीं कर लेता, मैं अन्य किसी ओर नहीं जाऊंगा….सर्वप्रथम मैं इस पतित (हिन्दुओं) को निर्मूल करूंगा.” (वही, पृष्ठ ४०३-४०४)

फतेहपुर सिकड़ी पर हमला

अब शैतान शेरशाह ने फतेहपुर सिकड़ी पर हमला किया. इससे पहले की वे गाँव वालों का कत्लेआम करते और स्त्रियों को भ्रष्ट करते दो वीर राजपूत योद्धा अपने दल बल के साथ उसके सामने आ डटे-एक थे जय चन्देल और दूसरा गोहा. इन्होने अपने अपने शौर्य से शेरशाह के ३००००० की समुद्री सेना को तहस नहस कर दिया परन्तु संख्यां बल में अत्यधिक कम होने के कारण वे वीरगति को प्राप्त हुए. शेरशाह ने कहा, “एक बाजरे के दाने केलिए हम दिल्ली की सल्तनत ही खो दिए होते” और वह आगरा लौट गया.

कालिंजर का युद्ध और शैतान शेरशाह की मौत

कालिंजर हिन्दुओं का बहुत बड़ा गढ़ था. इसका वीर हिन्दू राजा कीरतसिंह था. शेरशाह ने कालिंजर दुर्ग का घेरा डाला. घेरा डालने वाले अफगानों ने खोदी हुई मिट्टी का टीला बना लिया और उस पर चढ़कर कालिंजर के घरों तथा सड़कों पर हिन्दुओं पर बाणों तथा बन्दूकों से हमला कर दिया. अब्बास खां की तारीख ए शेरशाही में लिखा है कि “कीरतसिंह की स्त्रियों में एक बालिका थी. शेरशाह ने उसकी अत्यधिक प्रशंसा सुनी थी; वह उसे प्राप्त करने की ही सोचता रहा क्योंकि उसे भय था की ऐसा न हो की वह जौहर कर ले.”

नाश्ता करते वक्त शेख निजाम ने शेरशाह से कहा, “इन काफिरों (हिन्दुओं) के विरुद्ध जिहाद छेड़ने के सामान और कुछ नहीं है. यदि आप मर जाते हैं तो शहीद कहलायेंगे, यदि जीवित रहते हैं तो गाजी.” (वही पृष्ठ ४०८)

शेख की बातों से उत्तेजित होकर शेरशाह ने दरया खां को गोले लाने के लिए आदेश दिया तथा टीले के ऊपर चढ़कर स्वयम अनेक बाण छोड़ते हुए दरया खां को आवाज लगाया. दरया खां गोला ले आया. शेरशाह टीले से निचे उतरकर गोलों के समीप ही खड़ा हो गया. जब वे लोग गोले दाग रहे थे दीवार से टकराकर आये एक गोले ने शेरशाह के समीप रखे गोले के ढेर में ही आग लगा दिया. गोले के ढेर में बिस्फोट हो गया और वह निर्दयी डाकू शेरशाह, जिसने अपना समूचा जीवन विश्वासघातों एवं व्यभिचारों में व्यतीत किया, जीवित ही झुलस गया. उसका चेहरा अत्यंत विकृत हो गया था. वह एंठने और बुरी तरह चिल्लाने लगा. इस परिस्थिति में भी वो हिन्दुओं के कत्लेआम का ही आदेश देता रहा और उसी अवस्था में मर गया.

इतिहासकार पुरुषोत्तम नागेश ओक लिखते हैं, “मई १५४५ की भरी दोपहरी में गोलों के बिस्फोट के तुरंत पश्चात शेरशाह का शरीर भुनकर समाप्त हो गया था. इस प्रकार अफगान लुटेरे तथा डाकू शेरशाह, जो अपने कुकृत्यों के करण मानवता पर बहुत बड़ा कलंक था, के जीवन का समुचित अंत हुआ….सत्य की मांग है कि शेरशाह को नर-संहारक, महिला सतीत्वहर्ता, लुटेरा तथा डाकू एवं पाशविक अपराधी से न्यूनाधिक कुछ न समझना चाहिए.”

मुख्य स्रोत: भारत में मुस्लिम सुल्तान, लेखक पुरुषोत्तम नागेश ओक

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