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मध्य एशिया से भारत आनेवाले श्वेत हूण हिन्दू थे

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पिछले विभिन्न लेखों में साबित कर दिया गया है कि मध्य एशिया के शक/सीथियन, कुषाण/ऋषिक/यूची, तुषार/तोख़ार/यूची, कम्बोज/कुषाण, तुर्क, उइगर आदि बौद्ध बनने और परवर्ती काल में जबरन मुसलमान बनाये जाने से पहले स्थानीय परिवर्तनों के साथ वैदिक धर्म, संस्कृति को ही मानने वाले थे. बाद में ईरानी ह्खामनी सम्राटों के विजय और सत्ता के दौरान कुछ लोग जोराष्ट्र धर्म (पारसी) को मानने लगे. सिकन्दर के विजय और शासन में कुछ ग्रीक धर्म संस्कृति का प्रभाव पड़ा. अशोक का साम्राज्य जब मध्य एशिया तक विस्तृत हो गया तब बौद्ध धर्म का प्रचार प्रसार मध्य एशिया में भी हुआ और बहुत से शक हिन्दू शाक्य (शकों की एक शाखा) मुनि गौतम बुद्ध के अनुयायी हो गये. धीरे धीरे बौद्ध धर्म उईगरों के तुरान, शिनजियांग से लेकर पश्चिमी तुर्कों के राज्य काशपीय (कैस्पियन) सागर तक फ़ैल गया था. इस प्रकार ईस्वी सन के आरम्भ में शैव और बौद्ध धर्म के अनुयायी मध्य एशिया के दो सबसे बड़े समुदाय थे तथा तीसरे स्थान पर जोराष्ट्र धर्मी को रखा जा सकता है.

देशी विदेशी इतिहासकार जो सिर्फ ७०० ईसापूर्व से मध्य एशिया का इतिहास पढ़ना और लिखना प्रारम्भ करते हैं उन्हें सभी एक जैसे ही दिखाई देते हैं. कोई सभी को शक और उनकी अलग अलग शाखाएं बतलाते हैं. कोई कुषाणों और तुखारों को एक ही बताते हैं. कोई ऋषिक को कुषाण तो कोई यूची को कुषाण और महायुची को तुषार बताते हैं. परन्तु हमने पिछले लेखों में भारत के प्राचीन एतिहासिक ग्रंथों के आधार पर साबित कर दिया है कि इनमें से अधिकांश अलग अलग भारतीय मूल के या भारतीय संस्कृति के लोग थे. परन्तु चूँकि मध्य एशिया में रहनेवाले लोगों की संस्कृति हजारों वर्षों के दौरान एक निश्चित आकार ग्रहण कर ली थी जो सभी में विद्यमान दिखाई पड़ता है. इसलिए सिर्फ ७०० ईस्वीपूर्व या इसके बाद से इन जातियों के इतिहास का अध्ययन करनेवाले को सब एक जैसा दिखाई देते हैं और वे उलझे रहते हैं जबकि इनका मूल इतिहास भारतीय ग्रंथों में उपलब्ध है जिन्हें ये मिथोलोजी घोषित कर रखे हैं.

हूणों के साथ भी यही बिडम्बना है. बल्कि इससे आगे कहें तो भारत के वामपंथी इतिहासकारों ने तो पूरा षड्यंत्र कर रखा है. भारत आनेवाले ‘हूण’ (पूर्वी हूण) नहीं बल्कि ‘श्वेत हूण’ जिन्हें ‘हर हूण’ भी कहा जाता है, वे थे. परन्तु वामपंथी इतिहासकार धुर्ततापुर्वक दोनों को एक ही रूप में वर्णन करते हैं. हूण मंगोलिया, चीन की तरफ से आनेवाले खूंखार, हिंसक, बर्बर लोग थे. वामपंथी इतिहासकार इनकी बर्बरता का वर्णन करते करते भारत पर हूणों के आक्रमण दिखा देते हैं और उन्हें हूण बता देते हैं जो सरासर गलत है. जैसा की ऊपर हमने बताया है कि भारत आनेवाले हूण श्वेत हूण या हर हूण थे जिन्हें यूनानी हेफ्थालायिट्स कहते थे. ये वक्षु (Oxus) नदी घाटी में रहनेवाले लोग थे.

महाभारत में इन्हें वृष्णिवंशी हर हूण कहा गया है जो बहुत मायने रखता है क्योंकि भगवान श्रीकृष्ण भी वृष्णिवंशी यादव क्षत्रिय थे.

श्वेत हूणों की भारतीय उत्पत्ति

महाभारत के सभापर्व के अनुसार पांडु पुत्र नकुल का युद्ध पश्चिम दिशा में हरहूणों से हुआ था. युधिष्ठिर द्वारा इन्द्रप्रस्थ में किये गए राजसूय यज्ञ में हरहूण भी उपहार लेकर आये थे.

युद्धिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में उत्तर-उत्तर पश्चिम के देशी विदेशी राजाओं में शामिल प्रमुख लोग थे-तुषार, बाह्लिक, किरात, पहलव, परद, दरद, कम्बोज, शक, कंक, रोमक, यवन, क्षुद्रक, मालव, वृष्णिवंशी हरहूण, केकय, सिंध, कश्मीर आदि जो नाना प्रकार के भेंट लेकर उपस्थित हुए थे जिनमे ऊंट, हाथी, गाय, घोड़ा, गदहा, सोना, जवाहरात आदि थे. [महाभारत: सभापर्व, 2.51-2.53; 3.51 और 3:51]

महाभारत के आदि पर्व, अध्याय 177 में ऋषि वशिष्ठ की कामधेनु गाय पर अधिकार के प्रश्न पर उनके और विश्वामित्र के बीच हुए युद्ध का उल्लेख हैं. आदि पर्व के उक्त अध्याय में बताया गया हैं कि वशिष्ठ मुनि की कामधेनु गाय की रक्षा के लिए हूण, पुलिंद, केरल आदि योद्धा सैनिक कामधेनु गाय के विभिन्न अंगो से उत्पन्न हुए. जिसका सीधा सा मतलब है उसकी रक्षा केलिए ये लोग आगे आये.

कालिदास द्वारा लिखित संस्कृत महाकाव्य ‘रघुवंश’ के अनुसार अपनी दिग्विजय अभियान के अंतर्गत रघु ने सिन्धु नदी के किनारे रहने वाले हूणों को पराजित किया. कालिदास की जानकारी और विश्वास में रघुवंश के संस्थापक राजा रघु के शासनकाल में श्वेत हूण भारत में सिन्धु नदी के क्षेत्र में भी निवास करते थे.

विष्णु पुराण के अनुसार भारतवर्ष के मध्य में कुरु पंचाल, पूर्व में कामरूप (आसाम), दक्षिण में पंडूआ, कलिंग और मगध, पश्चिम में सौराष्ट्र, सूर, आभीर, अर्बुद, करुष, मालव, सौवीर और सैन्धव तथा उत्तर में हूण, साल्व, शाकल, अम्बष्ट और पारसीक स्थित हैं. प्राचीन पुराणों के अनुसार हूण प्रदेश भारत के उत्तर खण्ड में पड़ता था.

कल्हण ने अपनी पुस्तक राजतरंगिनी में नवी शताब्दी में पंजाब के शासक अलखान गुर्जर का उल्लेख किया हैं. हूणराज तोरमाण और उसके पुत्र मिहिरकुल के सिक्को पर उनके वंश का नाम अलखान (अलखोनो) लिखा हैं. इसलिए इन्हें अलखान हूण भी कहते हैं. डॉ सुशील भाटी के अनुसार नवी शताब्दी में हूणों का राजसी कुल ‘अलखान’ गुर्जर कहलाता था. अर्थात गुर्जरों की एक शाखा हूण थी.

मध्यकालीन भारतीय ग्रंथो में हूण राजसी क्षत्रिय माने जाते थे. हेमचन्द्र द्वारा लिखित कुमारपाल प्रबंध/कुमारपाल चरित में क्षत्रियो के ३६ राजकुलो का उल्लेख किया गया हैं। इस ग्रन्थ में हूण ३६ राजकुलो की सूची में शामिल हैं. कर्नल जेम्स टॉड ने अपनी पुस्तक एनाल्स एंड एंटीक्विटीज़ ऑफ़ राजस्थान (१८२९ ई.) में क्षत्रियो के ३६ राजकुलो की सूची तैयार की हैं, इस सूची में भी हूण ३६ राजकुलो में शामिल हैं.

श्वेत हूणों की अन्य विशेषताएँ

प्रोकोपियस लिखता है कि श्वेत हूण लम्बे, ज्यादा खूबसूरत थे और वे एशियन हूणों से अधिक गोरे थे (Procopius: “De bello Persico”, I. p.3). कुछ विद्वानों का मानना है कि हूण कुषाणों के वंशज थे क्योंकि वे अपने सिक्कों पर कुषाणों की तरह ही राजाधिराज लिखते थे जैसे इलाहाबाद (अब प्रयागराज) से प्राप्त एक खम्भे पर लिखा है, “उत्तर भारत की सीमा पर राजाओं के राजा, देवपुत्र एक राजकुमार रहता है.” वे खुद को इस प्रकार भारत में कुषाणों के उत्तराधिकारी साबित करना चाहते थे (A. Stein: “White Huns and Kindred Tribes in the History of India”, IA 1905, pp.83-84 और Sircar: “Selected Inscriptions” No.41 and 54.).

शायद यही कारण है कुछ इतिहासकार और विद्वान जो कुषाणों को गुर्जरों के पूर्वज मानते हैं वे हूणों को भी गुर्जर मानते हैं. परन्तु भारत के प्राचीन इतिहास के अध्ययन से ये सब अलग अलग भारतीय क्षत्रियों के वंशज साबित होते हैं. परन्तु चूँकि मध्य एशिया के लगभग सभी हिन्दुओं या हिन्दू से बौद्ध बने लोगों की भाषा, संस्कृति, परम्परा, धर्म, आध्यात्म, उपासना पद्धति, संस्कार और दाह संस्कार पद्धति आपस में मिलती जुलती है इसलिए भारतीय प्राचीन एतिहासिक ग्रंथों को दरकिनार कर कुछ सौ या कुछ हजार वर्ष पूर्व से इतिहास पढ़ने और लिखने वाले इतिहासकारों को शक, कुषाण, तुषार, श्वेत हूण आदि एक ही प्रतीत होते हैं और वे इनका घालमेल करते रहते हैं.

ऐसे ही इतिहासकारों का मानना है कि कुषाणों और हूणों के उपलब्ध पुरातात्विक साक्ष्यों से स्पष्ट है कि वे एशिया के सभी धर्मों को मानते थे और वे जिस देश पर अधिकार करते थे वहां के रीती रिवाज, भाषा और धर्म को अपना लेते थे. हमलोग उनके सिक्कों पर जोरास्त्र, बौद्ध और शैव धर्मों के चिन्ह पाते हैं. उनके सिक्कों के एक तरफ राजा के नाम ग्रीक अक्षर और बैक्ट्रियन बोली में लिखा रहता था जबकि दूसरी तरफ खरोष्ठी लिपि और प्राकृत भाषा में या ब्राह्मी लिपि और संस्कृत भाषा में लिखा रहता था.

“It is a remarkable feature of the Central Asian  invaders  that wherever  they went, they adopted  the  local  customs,  beliefs  and  traditions,  even  the  languages  and  changed  themselves  according  to  their  new environments. This strong quality of assimilation persisted when they entered India.” (Atreyi Biswas: “The Political History of the Hunas in India”, Munshiram Manoharlal Pbl. 1971. p. 59.)

सवाल है फिर पूरे मध्य एशिया के शकों, कुषाणों, तुषारों, हूणों आदि में जो समान सभ्यता, संस्कृति, धर्म, परम्परा, संस्कार, विश्वास आदि देखते हैं और पुरातात्विक शोधों से प्राप्त करते हैं उनके बारे में ये क्या कहेंगे? और यदि मध्य एशिया के आक्रमणकारियों का ये सामान्य लक्षण रहा है कि वे जिस देश पर आक्रमण करते थे उसी का धर्म, परम्परा अपना लेते थे तो फिर मध्य एशिया से आने वाले उजबेक, तुर्क, अफगानी, खाकान, मंगोल आदि जो आक्रमणकारी भारत आये वे भारतीय सभ्यता संस्कृति धर्म परम्परा क्यों नहीं अपना लिए? वास्तविकता यह है कि वे भारतवर्ष और भारतियों में इसलिए घुल मिल गये क्योंकि वे खुद हिन्दू सभ्यता, संस्कृति, धर्म, परम्परा से जुड़े हुए थे.

भारतवर्ष में श्वेत हूण वंश के संस्थापक

भारतवर्ष में हूण वंश के संस्थापक तोरमाण को माना जाता है इसलिए सबसे पहले हमें तोरमान के शासनकाल और उसकी विजयों को साबित करने वाले भारतीय अभिलेखों का उल्लेख करना चाहिए. उनमे से एक है एरण प्रतिमा शिलालेख जो भारत के मध्य भाग आधुनिक मध्य प्रदेश में था. ऐसा लगता है कि श्वेत हूण शासक ने पहले ही उत्तरी और पश्चिमी भारत पर विजय प्राप्त कर ली थी. मूर्ति संभवत: विष्णु के लिए बने एक मंदिर के सामने खड़ी थी और निम्नलिखित पाठ ब्राह्मी लिपि में उसके आसन पर लिखा गया है:

     “महाराजाधिराज (राजाओं के राजा) के शासन के पहले वर्ष में: श्री तोरमन जो महान प्रसिद्धि और तेज के साथ पृथ्वी पर शासन कर रहे हैं।” (D.C. Sircar: “Select Inscriptions”, I. p.396, No. 55.)

उत्तरी पंजाब स्थित कुरा का मुख्य खम्भा जो अब पाकिस्तान में है पर निम्नलिखित अभिलेख खुदा है:

यह महाराजाधिराज तोरमाण के शासन में टंकित किया है जो महान जावला शाह (Saha Javlah) हैं. D.C. Sircar: ibid. I. p.398, No. 56.

विरुद “राजाओं का राजा” – संस्कृत महाराजाधिराज – दोनों पत्थर के अभिलेखों पर उत्कीर्ण है, लेकिन कुरा स्तंभ पर शीर्षक: साहा को भी देखा जा सकता है. कुषाणों ने कुषाण राजाओं के रूप में इस नाम का प्रयोग किया था. हालांकि तोरमाण ने कुछ हद तक अपनी हूण पहचान को बनाए रखा, जैसा कि स्तंभ शिलालेख पर “जावला” शब्द दिखाई देता है. शोधकर्ता इस शब्द की अलग-अलग व्याख्या करते हैं. एक ओर इसका अर्थ है तोरमान का जन्मस्थान. यह शहर फारसी और गांधारियन, अर्थात् काबुल के बाद से उनका मुख्यालय रहा है. उन्होंने इस शहर को अपनी भाषा में जौला, जवला, ज़बुला या ज़बोला कहा, ये नाम उनके अलग-अलग सिक्कों पर पाए जा सकते हैं. तो साहा जव्ला शीर्षक का अर्थ है: “काबुल का शासक”। (Karabacek: “Epigraphia Indica” I. p. 239)

ऊपर Javlah, Zabula, Zabola शब्द की अधूरी व्याख्या है. पूर्वी ईरान की सीमा से काबुल तक का प्रदेश कभी जाबुल (Zabul) कहा जाता था जिसका अर्थ है “भगवा प्रदेश”. भगवा शब्द वैदिक सभ्यता, संस्कृति से जुड़ा हुआ अभिन्न शब्द है. इसी प्रदेश का वासी होने का गर्व हूणों में व्याप्त दिखाई देता है. उनके नामों के साथ जुड़ा यह शब्द ही उनके वैदिक संस्कृति से जुड़े होने का प्रमाण है न की भारत आने के बाद वे वैदिक धर्म और संस्कृति जुड़े.

ग्वालियर शिलालेख पर भी तोरमाण का उल्लेख है, लेकिन शिलालेख उनके पुत्र और उत्तराधिकारी मिहिरकुल के शासनकाल के दौरान ५३० ईस्वी में बनाया गया था. यह सूर्य भगवान और शिव की पूजा के लिए बनाए गए मंदिर पोस्ट पर उत्कीर्ण किया गया था.

         “उनमें से, जिनके परिवार की ख्याति बढ़ी है, पृथ्वी के स्वामी तोरमाण के पुत्र, जो मिहिरकुल के नाम से प्रसिद्ध हैं, जो अखंड पशुपति की पूजा करते हैं”.

पशुपति शिव के विभिन्न नामों में से एक है. अभिलेख से पता चलता है कि मिहिरकुल और तोरमन दोनों ही शिव के अनुयायी थे. मिहिरकुल का मतलब ही सूर्यवंश होता है.

तोरमान के सिक्के 18वीं शताब्दी में भी कश्मीर के बाजारों में मौजूद थे. उनके सिक्कों पर “साही ज़बुला” या “साही जौवला” नाम लिखे हुए हैं और पीछे की तरफ शिव और उनकी सवारी: नंदी बैल, या सूर्य भगवान का प्रतीक: सूर्य-चक्र दिखाई दे रहे हैं. स्पष्ट है कि सूर्य देव और शिव की उपासना ही उनका मूल स्वभाव-धर्म था.

श्वेत हूण मिहिरकुल

राजतरंगिणी के अनुसार मिहिरकुल का जन्म कश्मीर के गौनंद क्षत्रिय वंश में हुआ था. इस वंश का संस्थापक गोनंद महाभारत में वर्णित राजा जरासंध का सम्बंधी था. मिहिरकुल हूण के शासन काल के पंद्रहवे वर्ष का एक अभिलेख ग्वालियर के एक सूर्य मंदिर से प्राप्त हुआ हैं. उसने उत्तर भारत की विजय को पूर्ण किया और गुप्तो से भी नजराना वसूल किया. मिहिरकुल ने पंजाब स्थित स्यालकोट को अपनी राजधानी बनाया.

मिहिरकुल हूण एक कट्टर शैव था. उसने अपने शासन काल में हजारों शिव मंदिर बनवाये. मंदसोर अभिलेख के अनुसार यशोधर्मन से युद्ध होने से पूर्व उसने भगवान शिव के अलावा किसी अन्य के सामने अपना सर नहीं झुकाया था. मिहिरकुल को ग्वालियर अभिलेख में भी शिव भक्त कहा गया हैं. मिहिरकुल के सिक्कों पर जयतु वृष लिखा हैं जिसका अर्थ हैं- जय नंदी.

मंदसौर के अभिलेख संख्यां २७ सम्भवतः ५३३ ईस्वी का है. यह यशोधर्मन द्वारा उसके पराजय का वर्णन करता है:

“लौहित्य (ब्रह्मपुत्र) नदी से पश्चिमी महासागर तक और हिमालय से महेंद्र पर्वत तक पृथ्वी पर कब्जा करने वाले यशोधर्मन की महिमा को समर्पित जिन्होंने प्रसिद्ध हूण राजा मिहिरकुल को यशोधर्मन के बल के सामने माथा झुकाने के लिए मजबूर किया. मिहिरकुल के सिर को पहले कभी भी भगवान स्थाणु (शिव) के अलावा किसी अन्य की आज्ञाकारिता की विनम्रता में नहीं लाया गया था.”

मिहिरकुल हूण कश्मीर में मिहिरपुर नामक नगर बसाया. कल्हण के अनुसार मिहिरकुल ने कश्मीर में श्रीनगर के पास मिहिरेशवर नामक भव्य शिव मंदिर बनवाया था. उसने गांधार इलाके में ब्राह्मणों को १००० अग्रहार ग्राम दान में दिए थे. कल्हण मिहिरकुल हूण को ब्राह्मणों के समर्थक शिव भक्त के रूप में प्रस्तुत करता हैं.

मिहिरकुल ही नहीं वरन सभी हूण शिव भक्त थे. हनोल, उत्तराखंड स्थित महासु देवता (महादेव) का मंदिर हूण स्थापत्य शैली का शानदार नमूना हैं, कहा जाता हैं कि इसे हूण भट ने बनवाया था. भट का अर्थ योद्धा होता हैं.

“उनके चांदी के सिक्कों के एक तरफ फारसी भाषा में एक लेखन के साथ राजा का आधा लंबा चित्र देखा जा सकता है और दूसरी तरफ सूर्य-डिस्क और चंद्रमा अर्धचंद्राकार, कभी-कभी अग्नि-वेदी, एक अन्य अवसर पर धनुष और बाण या शिव का प्रतीक: त्रिशूल प्रकट होता है. दूसरी तरफ महाप्रतापी राजा जाबुल के मिहिरकुल लिखा मिलता है”.

अन्य श्वेत हूण शासक

प्रवरसेन तोरमाण का छोटा बेटा था. मिहिरकुल की मृत्यु के बाद उसका सबसे छोटा भाई (सौतेला भाई): प्रवरसेन, उसके पुत्र के बाद: गोकर्ण, बाद का पुत्र खिनखिला और उसका पुत्र युधिष्ठिर, अंत में उसका पोता लखन ने भारत के उत्तरी भाग पर शासन किया.

कल्हण के अनुसार, प्रवरसेन, हालांकि वह मिहिरकुल का सौतेला भाई था, अपने पूर्ववर्ती के विपरीत एक दयालु और बुद्धिमान शासक था, जिसे उसके लंबे शासनकाल के दौरान उसके अधीनस्थों द्वारा स्वीकार किया गया था. कश्मीर में हूण शासकों में, पुराणों में वर्णित, प्रवरसेन के बाद उनके पुत्र गोकर्ण थे, जिन्होंने थोड़े समय के लिए शासन किया था. उनके कुछ सिक्के उत्तर भारत में पाए गए. उनके पुत्र खिनखिला ने कश्मीर में शिव के लिए एक मंदिर समर्पित किया और ३६ वर्षों तक शासन किया, जैसा कि राजतरंगिणी ने कहा है. (Sircar: EI. 1963 p. 44.)

जब हुआन-त्सांग, अपने लंबे भारतीय प्रवास के बाद, कश्मीर में फिर से घर लौटा और उस समय खिनखिला का पुत्र: जुधिष्ठिर सिंहासन पर बैठा. चीनी भिक्षु ने उनके बारे में बहुत लिखा. राजतरंगिणी के अनुसार जुधिष्ठिर ने ६३३ से ५५७ ई. तक २४ वर्षों तक शासन किया, (Rajatarangini, Bk. III. 383)

वराह उपासक श्वेत हूण

भारत में वराह पूजा की शुरुआत मालवा और ग्वालियर इलाके में लगभग ५०० ई. में उस समय हुई जब हूणों ने यहाँ प्रवेश किया. यही पर हमें हूणों के प्रारभिक सिक्के और अभिलेख मिलते हैं. भारत में हूण शक्ति को स्थापित करने वाले उनके नेता तोरमाण के शासनकाल में इसी इलाके के एरण, जिला सागर, मध्य प्रदेश में वराह की विशालकाय मूर्ति स्थापित कराई थी जो कि भारत में प्राप्त सबसे पहली वराह मूर्ति हैं. तोरमाण के शासन काल के प्रथम वर्ष का अभिलेख इसी मूर्ति से मिला हैं. जोकि इस बात का प्रमाण हैं कि हूण और उनका नेता तोरमाण भारत प्रवेश के समय से ही वाराह के उपासक थे.

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