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अम्बेडकर ने लिखा है शूद्र क्षत्रियों के वंशज हैं, क्या अम्बेडकर भी क्षत्रियवंशी थे?

अम्बेडकर
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मैं पिछले वर्ष शोध कर रहा था कि अंग्रेजों ने जिन हिन्दू जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल किया था क्या वे सचमुच दलित थे तथा ब्राह्मणों और क्षत्रियों द्वारा ५००० वर्षों से शोषित और पीड़ित थे! मैंने अपने शोध में पाया कि अंग्रेजों ने जिन जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल किया था अपवाद को छोड़कर बाकी सब क्षत्रिय, ब्राह्मण और वैश्य जाति से थे और उनकी दुर्गति केलिए ८०० वर्षों का अत्याचारी, हिंसक, लूटेरा मुस्लिम शासन और २०० वर्षों का लूट और अत्याचार वाला अंग्रेजों का शासन जिम्मेदार था. आश्चर्य तो मुझे इस बात पर हुआ कि डॉ भीमराव रामजी अम्बेडकर ने भी अपनी पुस्तक “शूद्र कौन थे” में लिख रखा है कि अधिकांश शूद्र क्षत्रियों के वंशज हैं पर कोई दलितवादी या अम्बेडकरवादी राजनितिक स्वार्थों के कारण इस बात कि चर्चा ही नहीं करता है. इस शोध को विस्तार से निचे के लिंक पर पढ़ सकते हैं.

उसी दौरान मेरे दिमाग में प्रश्न उठा कि क्या डॉ भीमराव रामजी अम्बेडकर भी कहीं क्षत्रियवंशी तो नहीं थे? और मैंने उनकी ‘महार जाति’ पर शोध करना शुरू कर दिया. जैसे जैसे मैं जानकारी जुटाता गया मेरा संदेह पुष्ट होता गया. मैं अपना शोध यहाँ संक्षेप में रख रहा हूँ और निर्णय पाठकों पर छोड़ रहा हूँ कि बाबा साहेब डॉ भीमराव रामजी अम्बेडकर क्षत्रियवंशी थे या नहीं.

कौन हैं महार जाति

महार रेजिमेंट के बीच बाबा साहेब अम्बेडकर

महाराष्ट्र में बहुत प्राचीन समय से एक योद्धा और सैनिक जाति थी जिसे महार कहा जाता था. ये खुद को पांडवों का वंशज मानते थे और दावा करते थे कि उनके पूर्वजों ने महाभारत के युद्ध में कौरवों के विरुद्ध पांडवों के पक्ष में युद्ध किया था. अर्थात ये खुद को क्षत्रिय मानते थे और क्षत्रियोचित सैनिक कार्य इनका मुख्य पेशा था. ये शिवाजी की सेना में अपनी वीरता और शूरता केलिए विख्यात थे.

महार जातियां पेशवाओं की सेना में भी साथ साथ रहे. इनके बड़े बड़े कारनामों से मराठा इतिहास भड़ा पड़ा है. पर अंग्रेजी शासन में जब कुछ महार लोग अंग्रेजों की सेना में भी शामिल होने लगे तो पेशवा की सेना में इनकी प्रतिष्ठा कम होने लगी जो पेशवा बाजीराव द्वितीय के समय और भी कम हो गयी.

अंग्रेज सरकार की सेना में योद्धा जातियों का महार रेजिमेंट युद्ध कौशल केलिए विख्यात था. भीमा कोरेगांव में हुए १८१८ के आंग्ल-मराठा युद्ध में मराठा सरदार पेशवा बाजीराव द्वितीय के विरुद्ध अंग्रेजों की महार सेना पूरी ताकत से लड़ी और मराठों को हरा दिया. मराठा समाज के विरुद्ध अंग्रेजों से वफ़ादारी के कारण मराठा समाज ने उन्हें बहिष्कृत कर दिया परन्तु क्षत्रिय खून महारों ने इसे स्वीकार नहीं किया और पूरी तरह अंग्रेजों के पक्ष में हो गये जिससे मराठे और कमजोर पड़ गये. परिणामतः कुछ महीनों के भीतर ही मराठा साम्राज्य लगभग खत्म हो गया और महाराष्ट्र में भी अंग्रेजों का राज हो गया.

भीमा कोरेगांव स्मारक
भीमा कोरेगांव स्मारक

मराठा समाज से बहिष्कृत होकर गाँव/शहर से बाहर बसने के बाबजूद महारों के रहन सहन में कुछ विशेष परिवर्तन नहीं आया था क्योंकि इनका मुख्य पेशा सैन्य कार्य था और गांवों में ये प्रशासक की भूमिका में होते थे.

Mahar castes were socio-economically well above most other groups of dalit because their traditional role had been important in the village administrative system, had necessitated that they had at least a rudimentary education and frequently brought them into contact with upper-caste Hindus. https://en.wikipedia.org/wiki/Mahar

ऐसी जानकारी मिलती है कि महार लोग खुद घोड़े पर शान से चलते थे पर गाँव के सीमा पर पहले से बसे मंग/मंगी जातियों को उनके शादी ब्याह में भी उन्हें घोड़े पर चढ़ने के योग्य नहीं मानते थे या नहीं चढ़ने देते थे. मंग के हाथ का भोजन भी नहीं खाते थे.

‘महार’ और ‘महाराष्ट्र’ शब्द कि उत्पत्ति

श्री विजय सोनकर शास्त्री जी जो खुद दलित वर्ग से हैं उन्होंने अपनी पुस्तक “हिन्दू चर्मकार जाति का गौरवशाली राजवंशीय इतिहास” में साबित कर चुके हैं कि महार जाति क्षत्रिय वंशी है और पांडवों कि ओर से महाभारत युद्ध में भाग ले चुके हैं.

अपने शोध के समर्थन में और भी दस्तावेज ढूंढने के क्रम में मुझे “आर वी रसेल और हीरालाल” का लिखा एक और किताब मिला जिसमें लिखा है कि महार जातियां खुद को महाभारतकालीन पांडवों के वंशज मानते हैं. उन्होंने लिखा है, “Various opinions and theories have been existing in among the Mahars. The popular one is that Somavanshi mahars trace their descent from the five Pandavas. They claimed to have taken part with Pandavas against the Kauravas in the war of the Mahabharata and subsequently settled in Maharashtra. (The Tribes And Castes Of The Central Provinces Of India Vol IV p. 132-133, Writer- R.V. Russell and Hira Lal)

मेरा मानना है कि प्राचीन समय में ये पांडववंशी गर्व से खुद को ‘महारथी’ कहते होंगे. समय के साथ ‘महारथी’ शब्द इनकी जातिय पहचान बन गयी परन्तु उच्चारण दोष के कारण कालान्तर में महारथी जाति महार (थी) जाति बन गयी. महाराष्ट्र शब्द कि उत्पत्ति भी कई विद्वान इन्ही महार जातियों से मानते हैं. महाभारत युद्ध कि समाप्ति के बाद पांडवों के इन्ही वंशजों ने भारत कि इस भूमि पर अपना राज्य स्थापित किया था और यह महारों का राष्ट्र होने के कारण ही महार राष्ट्र अर्थात महाराष्ट्र कहलाया.

महार(थी) जातियां पांडुपुत्र भीम के वंशज हैं

उन्नीसवी शताब्दी तक महार(थी) जाति मराठा और अंग्रेज सरकार कि सेना में क्षत्रिय लड़ाकू जाति के रूप में ही काम करते थे. आपको जानकर आश्चर्य होगा कि महारों में सबसे बड़ा वर्ग जो सोमवंशी महारों का है वो महाभारतकाल के पांडूपुत्र भीम के वंशज हैं. पांडुपुत्र भीमसेन की यक्ष पत्नी हिडिम्बा से घटोत्कच पैदा हुआ था. हिडिम्बा कक्षारी राजा हिडिम्ब की बहन थी. घटोत्कच के तिन पुत्र थे-अंजनपर्वा, बर्बरीक और मेघवाहन. इनसे सेन, राना, मघ, मेघ, बाहन, घरुका (सोमवंशी), राजवंशी, ठाकुर, कूच क्षत्रिय, बनाफर, कुरबंशी, राना कुरबंशी, घरवाल व घरोवाल, पांडवंशी, सोमवंशी, शूरवंशी आदि क्षत्रिय जातियां हुई. स्वयम भगवान श्रीकृष्ण ने घटोत्कच से कहा था तुम क्षत्रिय पुत्र हो और तुम्हारे वंशज भी क्षत्रिय कहलायेंगे. http://oldisrj.lbp.world/UploadedData/4692.pdf

भीमा नदी के किनारे भीमा कोरेगांव महारों की सबसे प्राचीन बस्ती है. “भीमा नदी” और “भीमा कोरेगांव” के “भीमा” शब्द में शायद नहीं निश्चित रूप से पांडुपुत्र “भीम” की स्मृति छुपी हुई है जिनके ये वंशज हैं. डॉ भीमराव रामजी अम्बेडकर में “भीम” शब्द भी उनके पूर्वज महाबली “भीम” की ही प्रतिध्वनि है.

डॉ भीमराव रामजी अम्बेडकर का जन्म

डॉ भीमराव रामजी अम्बेडकर का जन्म इन्ही महार(थी) परिवार में १४ अप्रैल, १८९१ को इंदौर के महो कैंटोनमेंट में हुआ था. उनके पिता रामजी मालोजी सकपाल अंग्रेज सरकार की सेना में सूबेदार मेजर के पद पर थे और आर्मी स्कूल के हेडमास्टर थे अर्थात परिवार शिक्षित, सुखी और सम्पन्न था. परन्तु अगले ही साल महारों के सिर पर अंग्रेजों का गाज गिरा गया. जिन महारों ने अंग्रेजों केलिए अपने मराठा समाज से दुश्मनी मोल ले ली थी उन महारों को अंग्रेजों ने धोखा दे दिया.

महार(थी) समाज को मराठों द्वारा अपने समाज से बहिष्कृत कर देने के ७५ वर्ष बाद १८९२ में धूर्त अंग्रेजों ने उन्हें अछूत (untouchable) जाति कहकर सेना में भर्ती से यह कहते हुए मना कर दिया कि तुमलोग सैनिक/लड़ाकू जाति के नहीं हो. यहाँ यह ध्यान देने कि बात है कि अंग्रेजों ने इन्हें “अछूत” कहा जो सच नहीं था क्योंकि ये अछूत नहीं बल्कि अंग्रेजों केलिए मराठों के विरुद्ध लड़ने के कारण समाज से “बहिष्कृत” कर दिए गये थे.

जब महारों को अछूत जाति बताकर अंग्रेज सरकार १८९२ में सेना में भर्ती करने से इंकार कर दिया था तब महारों ने अपने लिखित आवेदन में कहा कि वे क्षत्रियवंशी है अछूत जाति नहीं. पर अंग्रेजों ने इन्हें सेना में भर्ती करने से इंकार कर दिया जिससे इनकी दशा और खराब होती चली गयी और यहीं से इनका सामाजिक-आर्थिक पतन प्रारम्भ हो गया.

Philip Constable’s article examines the exclusion of Mahar soldiers from the Bombay Army and demonstrates that this recategorization was the expression of a long-term indigenous trend of social differentiation in “kshatryia identity” in nineteenth-century western India. https://www.jstor.org/stable/2659700

क्या डॉ भीमराव रामजी अम्बेडकर अपने पूर्वजों का इतिहास जानते थे

क्षत्रिय और ब्राह्मणों के बीच बैठे डॉ भीमराव रामजी अम्बेडकर

अपने जाति कि सच्चाई और इतिहास बाबा साहेब डॉ भीमराव रामजी अम्बेडकर भी शायद जानते थे इसीलिए उन्होंने लिखा है कि अधिकांश शूद्र जातियां क्षत्रियों कि सन्तान है. Ambedkar viewed Shudras as originally being “part of the Kshatriya Varna in the Indo-Aryan society”, but became socially degraded after they inflicted many tyrannies on Brahmins.

डॉ भीमराव रामजी अम्बेडकर शूद्रों को आर्य और आर्यों को भारतवर्ष के मूलनिवासी मानते थे तथा आर्यों के आक्रमण के सिद्धांत के विरोधी थे. Ambedkar viewed the Shudras as Aryan and adamantly rejected the Aryan invasion theory, describing it as “so absurd that it ought to have been dead long ago” in his 1946 book Who Were the Shudras? (Bryant, Edwin (2001). The Quest for the Origins of Vedic Culture, Oxford: Oxford University Press. pp. 50–51. ISBN 9780195169478)

दलित जातियां क्षत्रिय ब्राह्मणों की सन्तान है

डॉ सुब्रमण्यम स्वामी लिखते हैं, ”अनुसूचित जाति उन्हीं बहादुर ब्राह्मण व क्षत्रियों के वंशज है, जिन्होंने जाति से बाहर होना स्वीकार किया, लेकिन मुगलों के जबरन धर्म परिवर्तन को स्वीकार नहीं किया. आज के हिंदू समाज को उनका शुक्रगुजार होना चाहिए, उन्हें कोटिशः प्रणाम करना चाहिए क्योंकि उन लोगों ने हिंदू के भगवा ध्वज को कभी झुकने नहीं दिया भले ही स्वयं अपमान व दमन झेला.

प्रोफेसर शेरिंग ने भी अपनी पुस्तक हिंदू कास्ट एंड ट्राईब्स’ में स्पष्ट रूप से लिखा है कि  ”भारत के निम्न जाति के लोग कोई और नहीं, बल्कि ब्राहमण और क्षत्रिय ही हैं.” स्टेनले राइस ने अपनी पुस्तक कस्टम्स एंड देयर ओरिजिंस में लिखा है कि दलित जातियों में वे जातियां भी हैं, जो मुगलों से हारीं तथा उन्हें अपमानित करने के लिए मुसलमानों ने अपने मनमाने काम करवाए थे.

१, २, ३ का स्रोत https://www.opindia.com/2018/01/battle-of-koregaon-lessons-in-unity/

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