ऐतिहासिक कहानियाँ, मध्यकालीन भारत

बिहार, बंगाल का विनाशक बख्तियार खिलजी को असम के वीरों ने दौड़ा दौड़ा कर मारा

Bakhtiyar Khilji
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बख्तियार खिलजी

मोहम्मद बख्तियार खिलजी गर्मसिर प्रान्त के गोर स्थान का जन्मजात लूटेरा था. अपनी लूटेरी प्रवृति के कारन वह लूटेरों के सरदार मोहम्मद गोरी के दल में शामिल हो गया और लूटपाट में अधिक से अधिक हिस्सेदारी पाने और बड़े ओहदे केलिए मोहम्मद गोरी के काम पिपासा शांत करने हेतु औरतों की दलाली करने लगा. वह हिन्दुओं, बौद्धों, जैनों को लूटने, कत्ल करने के साथ साथ उनकी स्त्रियों, बहनों और बेटियों को सेक्स गुलाम बनाकर बेचने का धंधा भी करने लगा. शैतान बख्तियार खिलजी की पैशाचिक प्रतिभा को देखते हुए मुहम्मद गोरी के अवध का सिपहसालार मलिक हिसामुद्दीन ने उसे हिन्दुओं की हत्या और लूटने के विशेष अभियान पर लगा दिया. अब वह रात्रि में गांवों और नगरों पर हमला करता, वहां हिन्दुओं, बौद्धों को कत्ल करता, उनकी स्त्रियों का बलात्कार करता और उसे बंदी बनाकर बेच देता.

तबकाते नासिरी के लेखक मिन्हाज के अनुसार, “साहसी और उद्दमी होने के कारन मुंगेर और बिहार के जिलों पर प्रायः आक्रमणकर, वह प्रचूर लूट जमा करता रहा था. इस प्रकार उसके पास घोड़े, हथियार एवं सैनिकों की प्रचुरता हो गयी. उसकी वीरता एवं लुटेरी गतिविधियों की ख्याति दूर-दूर तक फ़ैल गयी और दूर-दूर से आकर खिलजियों के दल उसके पास जमा हो गए. उसके कारनामों का समाचार कुतुबुद्दीन ऐबक के पास पहुंचा तो उसने उसको पोषाक भेज उसे बड़ा सम्मान दिया.”

नालंदा और विक्रमशिला विश्वविद्यालय पर हमला और लूट

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नालंदा विश्वविद्यालय

इसी किताब में आगे मिन्हाज ने ११९३ ईसवी में नालंदा विश्वविद्यालय पर हमले के बारे में लिखा है, “सिर्फ दौ सौ घुड़सवारों के साथ बिहार दुर्ग (नालंदा विश्वविद्यालय) के द्वार तक गया और बेखबर शत्रुओं (यानि छात्र और शिक्षकगण) पर टूट पड़ा. उनमे दो बड़े बुद्धिमान भाई थे-एक का नाम निजामुद्दीन और दुसरे का शमसुद्दीन था. जब लड़ाई प्रारम्भ हो गयी तब इन दो भाईओं ने बहुत बहादुरी दिखाई. बख्तियार खिलजी को लूट का काफी माल हाथ लगा. महल के अधिकांश निवासी केश-मुंडित ब्राह्मण थे. उन सभी को खत्म कर दिया गया. वहां मुहम्मद ने पुस्तकों के ढेर को देखा. उसके बारे में जानकारी केलिए आदमियों को ढूंढा पर वहां सभी मारे जा चुके थे. इस विजय के बाद लूट के माल से लदा बख्तियार खिलजी कुतुबुद्दीन के पास आया जिसने उसका काफी मान और सम्मान किया. (पृष्ठ ३०९, ग्रन्थ-२, तबकाते नासिरी, लेखक मिन्हाज उल सिराज)  

कहा जाता है बख्तियार खिलजी ने उन किताबों के ढेर में आग लगा दिया जो अगले तीन महीने तक जलता रहा. नालंदा विश्वविद्यालय में करीब १०००० विद्यार्थी थे और करीब २००० शिक्षकगण थे. इस प्रकार वह शैतान सारनाथ, कुशीनारा, नालंदा आदि प्राचीन विश्वविख्यात हिन्दू, बौद्ध शिक्षा केन्द्रों को नष्ट करते हुए बंगाल की ओर बढ़ा. रस्ते में उसने आठवी सदी में पाल राजा धर्मपाल के द्वारा स्थापित विक्रमशीला विश्वविद्यालय पर हमला किया और उसे भी पूरी तरह नष्ट कर दिया.

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विक्रमशिला विश्वविद्यालय

बंगाल के गौड़ प्रदेश पर हमला और लूट

उस समय उत्तर बंगाल अथवा गौड़ प्रदेश का राजा राय लक्ष्मण सेन थे. मिन्हाज ने उनके बारे में अपने ग्रन्थ में लिखा है की “छोटा हो या बड़ा, किसी के साथ भी उसने कभी अन्याय नहीं किया. जो कोई भी उसके पास दान मांगने जाता था वह प्रत्येक को एक लाख देता था.”

यद्यपि सेन वंशी अपनी वीरता केलिए विख्यात थे परन्तु बिहार-बंगाल के बौद्ध समर्थक पाल वंश के कारन बाद में सेन वंशी हिन्दू भी अहिंसा वायरस के शिकार हो गये थे. उसी में से थे राजा लक्ष्मणसेन. नदिया उनकी राजधानी थी. बड़े आश्चर्य की बात है कि पूरा बिहार इस्लामिक आतंक, लूट, हत्या और बलात्कार से जल रहा था और उसी से सटे बंगाल के सेन और पाल वंशी शासक निष्क्रिय बैठे थे. इससे भी अधिक दुर्भाग्यपूर्ण तो यह था कि बख्तियार खिलजी अपनी सेना सहित १२०४ ईसवी में नदिया के समीप पहुँच गया और अपने सैनिकों सहित व्यापारी के वेश में राजमहल तक पहुंच गया पर न लक्ष्मणसेन के सैनिकों को और न ही लक्ष्मणसेन के गुप्तचरों को इस बात की भनक लगी.

मिन्हाज तबकाते नासिरी में लिखता है, “बख्तियार नदिया में कपट माया से प्रवेश किया, वह किसी से छेड़छाड़ किये वगैर आगे बढ़ता रहा. लोगों को लगा ये सब व्यापारी लोग हैं. इसी प्रकार वह राय लखमीनिया के महल द्वार तक चला आया. तब अपनी तलवार खिंच उसने आक्रमण कर दिया. इस समय राजा भोजन पर बैठे हुए थे. एकाएक महल द्वार एवं शहर से जोर जोर से चीखने और चिलाने की आवाजें आने लगी. इससे पहले की उन्हें माजरा मालूम हो, महल में घुस बख्तियार खिलजी ने कई लोगों को तलवार के घात उतार दिया. महल के पिछवाड़े से राय नंगे पांव भाग गए. उनका सारा खजाना, उनकी सारी पत्नियाँ, दासियाँ और नौकरानियां उसके कब्जे में आ गयी. अनेक हाथियों को भी उसने अपने अधिकार में कर लिया. लूट का इतना माल हाथ लगा की उसकी गिनती नहीं हो सकी….बख्तियार खिलजी ने नदिया को नष्ट कर लखनौती को अपने शासन-क्षेत्र का केंद्र बनाया.

उत्तर बंगाल के सभी मन्दिर, पाठ शालाओं को मस्जिद-मकबरा बना दिया

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मन्दिर अब है अदीना मस्जिद

समीपवर्ती महलों को अपने कब्जे में कर उन्हें अपना महल घोषित करवा दिया और उसे सिक्कों पर छपवा दिया. चारों ओर मस्जिद, मकबरे और मदरसे खड़े कर दिए गये….अपनी लूट का एक बड़ा भाग उसने कुतुबुद्दीन ऐबक के पास भिजवा दिया”

इतिहासकार पुरुषोत्तम नागेश ओक लिखते हैं, “मिन्हाज साफ-साफ स्वीकार करता है कि बंगाल के सारे मध्यकालीन मकबरे, मदरसे और मस्जिदें हिन्दू मन्दिर, महल और पाठशालाएँ ही हैं. मुसलमानों के लम्बे शासन समय के दौरान लोग इन अपहर्ताओं और विध्वंसकारियों को ही इन भवनों के निर्माता मानने की भूल कर बैठे हैं.”

आसामी वीरों ने बख्तियार खिलजी के छक्के छुड़ा दिए

बख्तियार खिलजी अब तिब्बत पर हमला कर उसे नष्ट करना चाहता था इसके लिए उसने कूचबिहार के स्थानीय व्यक्ति अली मिच जिसे वह हाल ही में मुसलमान बनाया था को पहाड़ी क्षेत्रों में मार्गदर्शन केलिए चुना और सेना ले कूच कर दिया. अली मिच उसे ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे बसा नगर वर्धानकोट (प्राचीन नाम बंगमती) तक ले गया. यहाँ नदी पार करने केलिए २० खम्भों वाला एक प्राचीन पूल बना हुआ था. खिलजी अपने कुछ सैनिकों को पुल की सुरक्षा केलिए वहीँ छोड़ सेना सहित पूल पार कर आसाम में घुस गया और तिब्बत की ओर बढ़ा. १२४३ ईसवी की एक रात उसने बनगांव और देवकोट के बीच अपना पड़ाव डाला. एकदिन एकाएक आसामी शासक की हिन्दू सेना ने उसपर चढ़ाई कर दी.

पुरुषोत्तम नागेश ओक लिखते हैं की पहली बार एक हिन्दू राजा ने अपनी सूझ बुझ का परिचय दिया था और आगे बढ़कर घुसपैठिये आक्रमणकारियों पर हमला किया था. उषाकाल में हिन्दुओं ने आक्रमण किया था और दोपहर होते होते बड़ी संख्यां में मुसलमानों को मार दिया और घायल कर दिया. मिन्हाज लिखता है, “हिन्दुओं के पास बांस के भाले थे जो आपस में एक दूसरे से बंधे और सिले हुए थे. सभी के पास लम्बे लम्बे धनुष और बाण थे.”

इसके बाबजूद असम के वीर हिन्दुओं ने बख्तियार खिलजी के शैतानी सेना के छक्के छुड़ा दिए. भयभीत, आतंकित और पराजित बख्तियार को उसके जासूसों ने खबर दी की निकट ही हिन्दू शहर कुर्मपट्टन में ३५००० वीर हिन्दुओं की सेना धनुष-बाण लिए खड़ी है और तिब्बत की ओर से तिब्बती सेना भी आगे बढ़ रही है. तब उसने सलाह मशविरा कर लौट जाना ही ठीक समझा.

असामी वीरों की विकट रणनीति

इधर मुस्लिम लूटेरों को पराजित करने के बाद भी हिन्दू सेना इस बात का पूरा ख्याल रक्खा की वापिस भागते मुस्लिम आक्रमणकारियों को एक दाना भी न मिले और उनके जानवरों को घास का एक तिनका भी न मिले. इस पर मजबूर होकर वे लोग अपने घोड़ों को ही मार कर खाने लगे.

बख्तियार सेना सहित भागता हुआ पूल तक आया और यह देखकर सन्न रह गया की पुल की सुरक्षा केलिए छोड़ गये उसके सेना को हिन्दुओं ने सफाया कर पूल पूरी तरह ध्वस्त कर उसके भागने के सारे रस्ते बंद कर दिए थे. मार्ग की खोज में भटकते हुए उसे एक मजबूत गगनचुम्बी मन्दिर दिखाई पड़ा जिसमे सोने चांदी की विशाल प्रतिमाएं थी. बख्तियार ने उस पर कब्जा कर उसी में शरण लिया और नदी पार करने केलिए बेड़े और रस्सी के प्रबंध में लग गया.

इतिहासकार पुरुषोत्तम नागेश ओक लिखते हैं, “यह बताना अब जरूरी नहीं है कि मुसलमानों ने उस मन्दिर को अपवित्र कर सोने चांदी की प्रतिमाएं गलाकर रख लिए और मन्दिर को मस्जिद बना दिया क्योंकि यह एक एसी कहानी है जिसे हजार वर्ष के इतिहास में इतनी बार दोहराया गया है कि लोग पढ़ते-पढ़ते उब जाते हैं.”

शैतान का शैतानी अंत

इधर आसामी वीरों ने भी चैन की साँस नहीं ली थी. आसामी राजा ने अपने क्षेत्र के सारे हिन्दुओं को एकत्रित होने की आज्ञा दी और लोग उस हिन्दू मन्दिर के चारों ओर एकत्रित होने लगे. वे चारों ओर आड़े तिरछे बांस के भाले गाड़ने लगे ताकि चारों ओर एक प्रकार की दीवार बन जाए. पिंजरे में घिर जाने के डर से वह सेना सहित जंगलों में भाग गया पर वीर असामी सेना उसके पीछे पीछे वहां भी पहुँच गयी. हडबडाहट और घबराहट में वे ब्रह्मपुत्र की तीव्र धारा में कूद पड़े. पीछा करनेवाले हिन्दुओं ने नदी तट पर अपना अधिकार कर लिया.

शत्रु धारा के बीच में पहुँच गये जहाँ पानी बहुत गहरा था और प्रायः सभी डूब गये. कुछ घोड़े, जिनकी संख्यां १०० के आस पास होगी और मुहम्मद बख्तियार खिलजी बड़ी कठिनाई से अपने साथी मुसलमानों की लाश का सहारा लेकर नदी पार कर इस पर आ सके. वह देवकोट पहुंचकर बीमार पड़ गया. वह डर से बाहर नहीं निकलता था. १२०५ ईसवी में जबकि शैतान बख्तियार खिलजी शर्म से मुंह छुपाये एकांत में पड़ा था अली मरदान के रूप में उसकी मौत चुपके से उसके पास पहुँच गया और गालियाँ देते हुए ताबड़तोड़ चाकुओं से उसे तबतक गोदता रहा जबतक उसके शरीर से प्राण नहीं निकल गये.

इस्लामी शैतान बख्तियार खिलजी को मौत के दरवाजे तक पहुँचाने वाले असम के उन बहादुर वीरों को शत शत नमन!

मुख्य स्रोत-

1. तबकाते नासिरी, लेखक मिन्हाज उल सिराज

2. भारत में मुस्लिम सुल्तान, लेखक-पुरुषोत्तम नागेश ओक

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