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हिन्दू, बौद्ध राज्यों की 7 ऐतिहासिक गलतियाँ जिसके कारण भारतवर्ष का इस्लामीकरण होता गया भाग-१

हिन्दू बौद्ध
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इतिहास भविष्य का दर्पण होता है क्योंकि इतिहास की हमारी समझ ही किसी राष्ट्र और समाज का भविष्य निर्धारण करता है. इतिहास हमारे अच्छे-बुरे, सही-गलत, सफल-असफल कार्यों और उसके परिणामों का लेखा जोखा होता है. इनका समुचित विश्लेषण कर ही राष्ट्रनीति, कूटनीति, युद्धनीति, सामाजिक और प्रशासनिक नीतियाँ बनती है. उपर्युक्त नीतियों की सफलता असफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उस राज्य या राष्ट्र के इतिहास का किस हद तक समुचित विश्लेषण किया गया है.

इसलिए यह जरूरी है कि हमलोग भारतवर्ष के इतिहास काल में घटित उन गलतियों का सही सही विश्लेषण करें जिसके कारण एक समय अरब और काश्पीय (Caspian) सागर तक विस्तृत हिन्दु, बौद्ध राज्य अब एक छोटे टुकड़े में सिमटकर सेकुलर भारत बन गया है. संक्षेप में कहें तो ईसाई, इस्लाम से पूर्व एशिया के अधिकांश भागों पर शासन करनेवाले हिन्दुओं के पास आज अपना कोई हिन्दूदेश नहीं रह गया है. आखिर ऐसा क्यों हुआ?

अरब के कुशाईट, सेमेटिक, पैगन आदि वैदिक संस्कृति के लोग थे और भारतवर्ष के सम्राट विक्रमादित्य तथा उनके पौत्र शालिवाहन का साम्राज्य अर्बस्थान तक विस्तृत था इस बात के सबूत लेख: “इस्लामपूर्व अर्बस्थान का हिन्दू इतिहास” में दिया गया है जिसे आप निचे के लिंक पर पढ़ सकते हैं.

(प्राचीन भारतवर्ष मध्य एशिया तक विस्तृत था. सावित्री, सत्यवान, माद्री, कम्बोज मध्य एशिया के लोग ही थे. मध्य एशिया के मिदी, हूण, शक, कुषाण आदि वैदिक संस्कृति को माननेवाले हिन्दू लोग थे इसका प्रमाण आगामी लेख मध्य एशिया का वैदिक इतिहास: सावित्री, माद्री से लेकर बौद्ध राज्यों के उदय, प्रसार और इस्लामिक आक्रमणकारियों द्वारा सम्पूर्ण विनाश तक क्रमशः दिया जायेगा)

प्राचीन भारतवर्ष के राज्य साभार विकिपीडिया

भारतवर्ष के चक्रबर्ती सम्राट विक्रमादित्य का शासन अरब तक विस्तृत था. इन्ही विक्रमादित्य के पौत्र शालिवाहन शक या शालिवाहन परमार या इतिहासकार हेमचन्द्र राय के अनुसार शालिवाहन सातवाहन का साम्राज्य भी अरब तक विस्तृत था. इसके अतिरिक्त ललितादित्य मुक्तापीड और बाप्पा रावल का साम्राज्य भी एशिया माईनर तक पहुँच जाने के सबूत मिले हैं.

सम्राट विक्रमादित्य

अरब के पैगन लोग हिन्दू और बौद्ध लोग ही थे, इराक में इस्लाम पूर्व बौद्ध शासन था इसके भी सबूत हैं. सवाल है कि फिर अमर्त्यवीरपुत्र हिन्दुओं के साथ ऐसी क्या बात हो गयी की कहने को आज कोई हिन्दूराष्ट्र बचा ही नहीं है! इन प्रश्नों का उत्तर मैंने एतिहासिक, सामाजिक और धार्मिक-मजहबी अध्ययन के आधार पर निम्नलिखित सात बिन्दुओं में ढूंढने का प्रयत्न किया है जिसे हर हिन्दू को जानना चाहिए ताकि सौ करोड़ हिन्दुओं का यह आखिरी छोटा सा घर “हिन्दुस्थान” हिन्दुओं केलिए स्थायी रूप से बचाया जा सके.

हिन्दुओं की निम्नलिखित 7 ऐतिहासिक गलतियाँ हैं जिसके कारण भारतवर्ष का चरणबद्ध इस्लामीकरण होता चला गया:

१.    दुश्मनों को जड़ से खत्म न करने की प्रवृति

ईसा पश्चात हिन्दू राज्यों की सबसे बड़ी खामियां यह थी कि वे केवल सुरक्षात्मक युद्ध लड़ने लगे. पर्याप्त शक्तिबल और सैन्यबल होते हुए भी उन्होंने आक्रमणकारी दुश्मनों को जड़ से खत्म करने की कोशिश नहीं की. हिन्दुओं में यह दोष सम्भवतः अहिंसा का विकृत दुष्प्रचार और अशोक के धम्म नीति का परिणाम था. इसका परिणाम यह हुआ की अरब में इस्लाम के उदय और भारतवर्ष के बाहर हिन्दू, बौद्ध राज्यों के इस्लामीकरण के बाद भारत भी इस्लामिक आक्रमण का शिकार होने लगा.

इसमें कोई संदेह नहीं की राजा चाच, दाहिर सेन, बाप्पा रावल, ललितादित्य मुक्तापीड, मिहिर भोज जैसे योद्धा परमवीर, महान शासक और युद्धिनीति के परम विशारद थे और उन्होंने इस्लामिक आक्रमणकारियों के छक्के छुड़ा दिए थे, उन्हें अरब तक घुस कर मारा और घुटने टेकने पर मजबूर किया था. पर मुस्लिम आक्रमणकारी तो जबतक जिन्दा थे तबतक गैरमुस्लिमों पर हमला करने केलिए कटिबद्ध थे क्योंकि काफिरों (गैरमुस्लिमों) को मारना, कुफ़्र (देव मूर्तियाँ आदि) भंग करना और दर उल हर्ब (गैर मुस्लिम राज्य) को दर उल इस्लाम (इस्लामिक राज्य) में बदलना यही उनका धर्म था. पर राष्ट्र रक्षक, धर्म रक्षक, समाज रक्षक राजा चाच, बाप्पा रावल, ललितादित्य मुक्तापीड, मिहिर भोज जैसे पराक्रमी हिन्दू योद्धाओं की तो एक दिन मृत्यु निश्चित थी. फिर जबतक इस्लामिक आक्रमण का स्थायी समाधान नहीं ढूंड लेते तबतक इनकी सफलता अधूरी कही जाएगी.

bappa rawal
बाप्पा रावल

ऐसे समझिये,

आज मोदी सरकार के नेतृत्व में भारतीय सेना पाकिस्तानियों, आतंकियों, जिहादियों, चीनियों के छक्के छुड़ा दे रही है. पर सवाल है मोदी कबतक रहेंगे और मोदी सरकार कबतक रहेगी? ऐसे प्रश्नों पर न तब विचार किया गया था न अब विचार किया जा रहा है. महापराक्रमी राजा दाहिर सेन क्या कम पराक्रमी थे? उन्होंने भी मुस्लिम आक्रमणकारियों के कई बार छक्के छुड़ा दिए थे परन्तु सत्ता विरोधी राजनीतिक बौद्धों की गद्दारी के कारण वे पराजित हो गये और फिर कैसा भयंकर विनाशकारी तांडव हुआ यह सबको पता है. ऐसे राजनीतिक गद्दारों से समय रहते न तब निपटा गया था न अभी निपटा जा रहा है.

इन भावी विनाशकारी परिणामों को टालने का सही रणनीति यह था कि मुस्लिम आक्रमणकारियों को केवल पराजित ही नहीं किया जाता बल्कि उन्हें उनके घरों में घुसकर अरब तक खदेड़कर खत्म कर देना चाहिए था. पर ऐसा नहीं हुआ जिसका परिणाम परवर्ती भारतीय भुगतने को बाध्य हुए. बारहवीं सदी का पृथ्वीराज चौहान तो इस गलती केलिए सबसे अधिक कुख्यात थे क्योंकि उन्होंने हाथ आये मुस्लिम आक्रमणकारियों को खत्म करने की जगह कई कई बार छोड़ दिया.

हाँ, मैं कुख्यात शब्द का ही प्रयोग करूंगा क्योंकि जब बात राष्ट्र की सुरक्षा और राष्ट्रहित का हो तो फिर व्यक्तिगत स्वार्थ, अहंकार और उदारता कोई मायने नहीं रखना चाहिए. यदि पृथ्वीराज चौहान ने अहंकारवश या उदारतावश यह गलती न की होती तो आज भारतवर्ष की तस्वीर इतनी घिनौनी न हो गयी होती. पृथ्वीराज चौहान इस मानक के उल्लंघन का दोषी थे और हमें भविष्य में ऐसी किसी भी गलती/उदारता से बचने का संकल्प लेना चाहिए.

दुर्भाग्य से हिन्दू इस बीमारी से आगे भी ग्रस्त रहा

दिल्ली सल्तनत का सिपाहसालार १२९७ ईस्वी में जब हूगली के सप्तग्राम पर हमला किया और वहां की जनता और राजा मान नृपति पर अत्याचार किया तो हूगली के राजा भूदेव ने जफर खान गाजी को ललकार कर हमला किया और जफर खान गाजी का सिर भुट्टे की तरह काटकर फेंक दिया, जफर खान गाजी की सेना दुम दबाकर भाग गयी. आवश्यकता इस बात की थी कि वे जफर खान गाजी के भागते हुए सेना का पीछा कर उसे बंगाल की पवित्र धरती से जड़ मूल सहित खत्म कर देते पर ऐसा करने से चूक गये जिसका परिणाम यह हुआ की बाद में उसके पुत्र उघवान खान से भूदेव हार गये और पूरा हूगली पर मुसलमानों का अधिकार हो गया. कुछ दिन पहले तक वहां जो त्रिवेणी, हूगली का विश्वप्रसिद्ध विष्णु मन्दिर था वह “जफर खान गाजी मस्जिद और दरगाह” बन गया.

vishnu mandir
विष्णुमन्दिर जो अब जफर खान गाजी मस्जिद और मकबरा है

२.    जबरन मुसलमान बनाये गये हिन्दुओं के वापस हिन्दू बनाये जाने का विरोध

जिस तरह अलेक्जेंडर महान का विश्वविजय का सपना भारत के आगे घुटने टेक दिया था उसी तरह इस्लाम का विजय रथ भी भारतवर्ष के वीरों के आगे घुटने टेक दिया था. अरब आक्रमणकारियों ने कुछ समय तक सिंध, मुल्तान और वर्तमान अफगानिस्तान के कुछ हिस्सों पर जो अधिकार किया था उसे भी कुछ ही वर्षों में रघुवंशी सिसोदिया वंश के राजा बप्पा रावल और श्रीराम के अनुज लक्ष्मण के वंशज गुर्जर प्रतिहार के वीरों ने अरबों को खदेड़कर पुनः अपने कब्जे में कर लिया था. कश्मीर मे करकोटक वंश के ललितादित्य मुक्तपीड ने अरबों को वो धूल चटाई की सदियो तक कश्मीर की तरफ आँख नहीं उठा सके. उन्होंने अरबों को अरब तक खदेड़ कर मारा था. सम्पूर्ण भारतवर्ष एकबार फिर भगवामय हो गया परन्तु एक समस्या रह गयी थी.

वह समस्या थी अरब आक्रमणकारियों द्वारा सिंध और मुल्तान के हिन्दुओं को हिंसा, नरसंहार और बलात्कार के द्वारा जबरन बनाये गए मुसलमान. इस्लामिक आतंक से मुक्त होकर वे भी राहत की साँस ले रहे थे, उन्हें भी इस्लाम से घृणा था क्योंकि उन्हें जबरन मुसलमान बनाया गया था. वे वापस अपने पूर्वजों के सनातन धर्म में शामिल होना चाहते थे पर धर्म के कुछ ठेकेदार सनातन धर्म और उनके बीच दीवार बनकर खड़े हो गये. कुछ हिन्दुओं की मुर्खता ने उनके वापसी का मार्ग ही बंद कर दिया. इतिहासकार पी एन ओक लिखते हैं “वे विदेशी मुस्लिम बर्बरता के शिकार थे. उन्हें सुहानुभूति और सहारे की आवश्यकता थी पर उन्हें दुत्कार दिया गया. विवश होकर उन्हें भारत के शत्रुओं का पक्ष लेना पड़ा.”

यह वही समय था जब ईसाई और मुसलमान तलवार के जोर पर गैरधर्मियों को जबरन अपने धर्म में शामिल कर रहे थे. पर यहाँ अपने ही भाई बन्धु जो कुछ काल केलिए मजबूरी में मौत और बहन बेटियों के बलात्कार के डर से मुसलमान बन गये थे और अब खुद हिन्दू धर्म में वापस आना चाहते थे पर कुछ मुर्ख हिन्दू उन्हें अपने में शामिल करने केलिए तैयार नहीं थे. आखिर जबरन मुसलमान बनाये गये हिन्दुओं का क्या दोष था?

अहिंसा परमोधर्म: की मुर्खता के बाद हिन्दुओं की यह दूसरी सबसे भयानक और घातक मुर्खता थी. इसका परिणाम यह हुआ की उन मुस्लिमों के वंशज हताश होकर अपना इतिहास उन्ही बर्बर आक्रमणकारी मुसलमानों में ढूंढने लगे. परिणाम यह हुआ की भारत के भीतर ही भारत विरोधी शक्ति पनपने लगा जिन्हें सनातन संस्कार के कारन हिन्दू खत्म नहीं कर सके. यही कारन है कि जब ढाई सौ वर्षों बाद तुर्कों ने सिंध पर हमला किया तो सिंध के धर्मान्तरित मुसलमान आक्रमणकारियों का स्वागत और सहयोग किया जिसके कारण सिंध पर तुर्कों का स्थायी अधिकार हो गया.

हिन्दुओं ने यही गलती कश्मीर में भी दुहराया

कश्मीर के इस्लामीकरण का कारण बना रिनचिन बौद्ध भी हिन्दुओं के इसी मुर्खता का शिकार था. रिनचिन जब बौद्ध धर्म छोड़कर वापस हिन्दू धर्म अपनाना चाहा तो कुछ मुर्ख ब्राह्मणों ने उसका विरोध किया और गुस्से में वह मुसलमान बन गया और कश्मीर पर मुस्लिम आक्रमण केलिए अफगानी मुसलमानों का मार्ग प्रशस्त किया. जिसकी परिणति अंततः धरती का स्वर्ग, ब्राह्मणों का देश कश्मीर के इस्लामीकरण में हुआ.

फिर, १८४८ में जम्मू-कश्मीर के महाराज गुलाब सिंह के दरबार में हजारों की संख्या में मुस्लिम स्त्री पुरुष बड़ी उम्मीद लेकर अपने एवं अपने परिवारवालों पर मुस्लिम आक्रमणकारियों, आततायियों द्वारा हुए अत्याचार एवं जबरन धर्म परिवर्तन कराए जाने का हवाला देते हुए उन्हें शुद्ध कर फिर से अपने प्यारे हिंदू धर्म में वापस लेने की प्रार्थना की, परन्तु मुर्ख पुरोहित की मूर्खता के कारन यह समाज उद्धारक कार्य नही हो सका. परिणाम यह हुआ की धर्मान्तरित हिन्दू अब खुद को मुसलमान मानने को मजबूर हो गये और जैसे जैसे धर्मान्तरित कश्मीरी मुसलमान अपना हिंदू इतिहास भूलते गए हिंदू-मुस्लिम भाईचारे की नीव कमजोर पड़ने लगी.

१९३१ में हिन्दू बालमुकुन्द कौल का परपोता जिहादी शेख अब्दुल्ला के नेतृत्व में कुछ लोग सत्ता के लिए हिंदुओं की हत्या, लूट-मार करने लगे और फिर धरती का स्वर्ग, भारत का मुकुट, ब्राह्मणों का देश कश्मीर हिन्दू विरोधी, भारत विरोधी इस्लामिक जिहादियों का गढ़ बन गया.

अब धर्मान्तरित हिन्दू, बौद्ध ही आतंक मचाने लगे

भारतवर्ष के खुरासान में ऐसे ही धर्मान्तरित हिन्दुओं का एक मुस्लिम शासक बना अलप्तगीन. उसका पूर्वज हिंदुत्व पर गर्व करनेवाला समानिद क्षत्रिय था और वह खुरासान में उनके अधीन ही एक शासक था. उसने सुबुक्तगिन को सेनापति बनाया. अब मुसलमान बने हिन्दू ही भारतवर्ष को इस्लामिक राज्य बनाने केलिए लगातार अफगानिस्तान और भारत के हिस्सों पर आक्रमण करने लगे. उसी सुबुक्तगिन का नरपिशाच बेटा था मोहम्मद गजनवी जिसने भारत पर कई बार हमला कर मन्दिरों को लूटा, नष्ट किया, हिन्दुओं, बौद्धों का कत्लेआम किया, यहाँ के स्त्रियों और बच्चियों को बंदी बनाकर गजनी ले गया और उन्हें दो दो रूपये में सेक्स गुलाम के रूप में बेच दिया.

३.    अहिंसक बौद्ध राज्यों का बिना प्रतिरोध आत्मसमर्पण कर देना

“अहिंसा परमोद्धर्मः” यह वाक्यांश महाभारत का है और यह घोषणा महाबली भीम की है. आप कहेंगे हजारों लोगों की हत्या और दुशासन के छाती को फाड़कर उसका लहू पीने वाला भीम अहिंसा को सबसे बड़ा धर्म कैसे घोषित कर रहा है? दरअसल सनातन संस्कृति में अहिंसा का मतलब होता है अनावश्यक हिंसा न करना और निर्दोष प्राणी को कष्ट न पहुँचाना या हत्या न करना. महात्मा बुद्ध की अहिंसा का भी यही मतलब था परन्तु अशोक की मूर्खतापूर्ण धम्म नीति और उसके अनुयायीयों ने अहिंसा को कायरता, नपुंसकता जैसे अभिशाप में बदल दिया जिसके कारण वे इस्लामिक हिंसा के शिकार हो अरब से पाकिस्तान, कश्मीर तक पूरा का पूरा और इस भारत और बांग्लादेश में भी खत्म हो गये.

अहिंसक बौद्ध राज्य इस्लामिक हिंसा का मुकाबला करने में बिलकुल असक्षम साबित हुए. वे अरब, इराक, समरकंद, कुर्गान, तुरफान, काबुल, बामियान, काफिरिस्तान, स्वात, बाजूर, कश्मीर आदि में इस्लामिक आक्रमणकारियों के द्वारा आसानी से खत्म कर दिए गए या आत्मसमर्पण कर मुसलमान बनने को बाध्य हो गये. उनकी शांतिप्रिय, अहिंसक स्त्रियाँ मुसलमानों द्वारा हिंसक जिहादी पैदा करने की मशीन बन गयी. परिणामतः बौद्ध राज्य तो इस्लामिक आक्रमणकारियों द्वारा नष्ट हुए ही उसका दुष्प्रभाव हिन्दू राज्यों पर भी पड़ा. और जिन राज्यों में बौद्ध जनता बहुतायत में थी वहां की स्थिति तो और भी विकट हो गयी क्योंकि अहिंसक बौद्ध न केवल आसानी से मारे जाते थे बल्कि डर से मुसलमान बनकर हिन्दू राज्यों और हिन्दुओं के विरुद्ध मुसलमानों का साथ भी दिए जिससे हिन्दू राज्य भी पराजित होते गये.

इस बिंदु को विस्तार से समझने केलिए निचे के लिंक पर लेख पढ़े-“इस्लाम के उदय ने अरब से लेकर बांग्लादेश तक बौद्ध धर्म और बुद्धिष्टों को कैसे खत्म कर दिया.”

४.     हिन्दुओं का धर्मयुद्ध बनाम इस्लामिक छल युद्ध

भारतवर्ष के राज्य आपस में लड़ते भी थे तो वे धर्मयुद्ध के मानकों का पालन करते थे. वे निर्दोष जनता की हत्या नहीं करते थे, स्त्रियों का अपहरण और बलात्कार नहीं करते थे, बच्चों का कत्लेआम नहीं करते थे, खेत खलिहान नष्ट नहीं करते थे, नदी, सरोवर, कुआँ तालाबों में जहर नहीं मिलाते थे, रात्रि में सोये हुए सैनिकों पर अचानक हमला नहीं करते थे, युद्ध जीतने केलिए छल कपट का सहारा नहीं लेते थे  आदि.

पर मुस्लिम आक्रमणकारी उपर्युक्त सभी कुकर्म करते थे और इससे भी अधिक हिंसा, नीचता का परिचय देते थे. वे निर्दोष आम नागरिकों का कत्लेआम कर उनके सिरों का पहाड़ बना उत्सव मनाते थे, स्त्रियों और बच्चियों का बलात्कार करते थे, उनकी छातियाँ नोच डालते, उनका अपहरण कर सेक्स गुलाम बनाकर जिहादी पैदा करते थे या सेक्स गुलाम के रूप में बेच देते थे. वे हिन्दुओं, बौद्धों का सिर्फ कत्ल नहीं करते थे बल्कि तड़पा तड़पाकर मारते या बलात्कार करते थे ताकि आम नागरिक डर से मुसलमान बनकर हिन्दू बौद्ध राजा के विरुद्ध उनका साथ देने केलिए तैयार हो जाएँ या हिन्दू, बौद्ध राज्य अपनी जनता को बचाने केलिए आसानी से आत्मसमर्पण कर दे. यही कारण है कि मुसलमानों द्वारा किला फ़तेह होने से पहले ही हिन्दू औरतें जौहर कर लेती थी.

इस्लामिक आक्रमणकारियों की बर्बरता

कहा जाता है जब मोहम्मद कासिम सिंध पर कब्जा करने में लगा था उस समय कराची (देवल) से बगदाद और दमिश्क जाने वाली सडक पर हिन्दू, बौद्ध स्त्रियों, बच्चों और मनुष्यों की हड्डियाँ बिखरी पड़ी रहती थी. हिन्दुओं, बौद्धों का एक नये प्रकार के खूंखार नरपिशाचों से मुकाबला था जिसके लिए वे मानसिक और धार्मिक रूप से तैयार नहीं थे क्योंकि सनातन संस्कार हिन्दुओं, बौद्धों को उनके जैसा नरपिशाच बनने की इजाजत नहीं देता था. परिणाम यह होता की हिन्दू राज्य कमजोर पड़ जाते और उनसे समझौता करने की कोशिश करते और मारे जाते या जिसकी परिणति राज्य के इस्लामीकरण में होती थी.

इस्लामिक आक्रमणकारियों का छल-कपट

मुसलमानों की अधिकांश जीत छल-कपट और नृशंस हिंसा-बलात्कार से ही हुई थी इसके सैकड़ों उदाहरन भरे पड़े हैं. राजा दाहिर सेन भी इसी छल-कपट के शिकार हुए थे. क़ासिम ने छल से अपने कुछ सैनिकों को रात के समय औरतो के वेश में स्थानीय औरतों के झुण्ड में दाहिर की सेना के पास भेजा. रोती बिलखती आवाजो के कारण राजा दाहिर उनकी मदद के लिए आए और कासिम ने अंधेरे का फायदा उठा कर अकेले दाहिर पर हमला बोल दिया. दाहिर हजारों हत्यारो के बीच लड़ते रहे और वीरगति को प्राप्त किये.  

raja dahir sen
राजा दाहिर सेन

राजा दाहिर की दूसरी पत्नी रानी बाई बरह्मणाबाद के किले से अपने पुत्र जयसिम्हा के साथ कासिम की सेना से जमकर मोर्चा ली. कासिम की सेना में नये बने मुसलमान जो कल तक दाहिर को अपना राजा मानते थे वे भी जुड़ गये थे. मुसलमानों ने फसलें जला दी. जलाशयों में जहर घोल दिया. पर बात नहीं बनी तो एकबार फिर छल से काम लिया और कुछ गद्दारों ने किले का फाटक रात्रि को खोल दिया और फिर किले पर कब्जा कर १६००० लोगों का नरसंहार किया गया. यहीं से दाहिर की दो पुत्रियों सुर्यदेवी और परिमल देवी को बंदी बनाकर ख़लीफा वालिद के पास भेज दिया था.

कासिम की सेना के राओर और बरह्मणाबाद की ओर जाते ही दाहिर का पुत्र फूफी ने राजधानी आलोर पर पुनः अधिकार कर लिया था. फूफी की सेना में एक अरबी मुसलमान भी नौकरी करता था. उसने एक रात कासिम केलिए नगर का द्वार खोल दिया और नगर पर पुनः कासिम का अधिकार हो गया. इतिहासकार पुरुषोत्तम नागेश ओक लिखते हैं, “सभ्य और सीधे-सादे हिन्दुओं ने कभी यह नहीं सोचा था कि उनकी सेना में एक भी मुसलमान का होना देशद्रोह और विश्वासघात के सांप को दूध पिलाना होगा.”

यह सिर्फ एक इस्लामिक हमले और उनके जीत के तरीके का उदाहरन है, ऐसे सैकड़ों हैं. सीरिया के जीत की कहानी भी इसी तरह शर्मनाक थी. मुसलमानो ने सीरिया के ईसाई सैनिकों के आगे अपनी औरतों को कर दिया. मुसलमान औरते गयी ईसाइयों के पास की मुसलमानो से हमारी रक्षा करो, ईसाइयों ने इन धूर्तो की बातों में आकर उन्हें शरण दे दी. फिर क्या था, सारी जिहादन औरतों ने मिलकर रातों रात सभी ईसाई सैनिकों को हलाल करवा दिया. आगे भी मुसलमानों की लगभग सभी जीत इसी प्रकार के छल कपट के कारण होती गयी क्योंकि हिन्दू, बौद्ध राज्य मुसलमानों के छल-कपट, हिंसा, लूट और बलात्कार के जिहादी संस्कार को समझने में असफल रहे.

हिन्दू बौद्ध मंदिरें मुस्लिम आक्रमणकारियों के हथियार

इसी प्रकार मुसलमान हिन्दुओं, बौद्धों, जैनों के मन्दिरों को भी नष्ट भ्रष्ट कर देते थे, देवी देवताओं की मूर्तियों का अपमान करते और नष्ट कर देते थे. यह भी मुस्लिम आक्रमणकारियों का हिन्दू बौद्ध राज्यों को आत्मसमपर्ण कराने का एक हथियार था. इसका एक दूसरा रूप यह भी था कि मुस्लिम आक्रमणकारी जिस इलाके पर कब्जा कर लेते उन इलाकों के हिन्दू बौद्ध जनता के जान और अस्मत का सौदा करने के साथ बड़े बड़े मन्दिरों का भी सौदा हिन्दू राज्यों से करते थे.

जैसे सिंध क्षेत्र पर मुसलमान जब सिंध के धर्मान्तरित मुसलमानों की मदद से दूसरी बार अधिकार करने में सफल हुए तो हिन्दू शाही वंश, गुर्जर प्रतिहार आदि इतने सक्षम थे कि उन्हें सिंध क्षेत्र से पुनः मार भगाते परन्तु मुसलमान धमकी देते की अगर उनपर हमला किया गया तो मुल्तान का सूर्यमंदिर और स्थानेश्वर का चक्रपाणी मन्दिर, जो काशी और सोमनाथ के मन्दिरों की तरह ही विशाल और अंतरराष्ट्रीय तीर्थ स्थल था, उसे नष्ट कर देंगे. परिणामतः हिन्दू राज्य उनपर हमला नहीं कर पाते थे.

मुल्तान का सूर्य मन्दिर

यह उनकी भारी भूल थी क्योंकि अब हम हिन्दुओं के पास न सिंध है, न ही मुल्तान का सूर्यमंदिर और स्थानेश्वर का चक्रपाणी मन्दिर. यदि खतरा उठाकर आक्रमणकारियों को जड़ से खत्म कर दिया होता तो और हजारों मन्दिर, मठ टूटने लुटने से बच जाते और अगर ये दो मन्दिर तोड़ भी दिए जाते तो सोमनाथ की तरह फिर से भारत की भूमि पर सीना ताने खड़ा हो जाते.

शेष अगले भाग में….

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