ऐतिहासिक कहानियाँ, मध्यकालीन भारत

महापराक्रमी पृथ्वीराज चौहान की अक्षम्य गलतियाँ

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पृथ्वीराज चौहान राजा सोमेश्वर और कलचुरी की राजकुमारी रानी कर्पुरदेवी के पुत्र थे. पृथ्वीराज विजय के अनुसार उनका जन्म ज्येष्ठ माह के बारहवीं तिथि को हुआ था. वे बहुत सी भाषाओँ के जानकार थे. धनुर्विद्या में महारत हासिल कर रखा था. शब्दभेदी बाण के वे सिद्धहस्त थे. उन्होंने बचपन में शेर का जबड़ा अपने हाथों से फाड़ दिया था. जब उनके पिता राजा सोमेश्वर का देहांत विक्रमी संवत १२३४ में हुआ था उस समय पृथवीराज मात्र ग्यारह वर्ष के थे. अपनी माँ के संरक्षण में उन्होंने राजगद्दी सम्भाली. हालाँकि हम्मीर महाकाव्य दावा करता है कि राजा सोमेश्वर ने खुद पृथ्वीराज को गद्दी सौंप कर सन्यास लेकर वन चले गये थे.

पृथ्वीराज का शासन उत्त्तर-पश्चिम भारत से लेकर हरियाणा, राजस्थान, पंजाब, दिल्ली, मध्य प्रदेश और उत्त्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों तक विस्तृत था. पृथ्वीराज चौहान तरावरी में एक किला बनवाया था जो करनाल में है जिसका पहला नाम तराईन था.

पृथ्वीराज चौहान की पहली गलती

सन ११७५ में मोहम्मद गोरी ने सिन्धु नदी पार कर मुल्तान पर अधिकार कर लिया. ११७८ में वह गुजरात पर हमला किया जो चालुक्य (सोलंकी) राजा द्वारा शासित था. गुजरात की ओर जाते हुए उसकी सेना चौहान साम्राज्य के पश्चिमी हिस्से से होकर गुजरी थी ऐसा उस क्षेत्र के मन्दिरों के विध्वंस और भाटी शासक लोध्रुव के पददलित किये जाने से पता चलता है. [ R. V. Somani 1976, pp. 40–42]

इसके बाबजूद पृथ्वीराज चौहान ने चालुक्यों की सहायता अपने मंत्री कदमबावसा की सलाह पर नहीं किया. हालाँकि चालुक्यों ने शैतान मोहम्मद गोरी को हरा दिया पर इस युद्ध से चौहानों ने दूरी बनाये रखा.       (Dasharatha Sharma 1959, pp. 80–81)

यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण था. यदि चौहानों ने चालुक्यों के साथ मिलकर आक्रमणकारी मोहम्मद गोरी के विरुद्ध लड़े होते तो गोरी या उसके एक भी सैनिक जिन्दा वापस नहीं गये होते. फिर कोई मुस्लिम शैतान भारत पर आक्रमण करने की हिम्मत नहीं करता. परन्तु सक्षम, सबल, महापराक्रमी सम्राट पृथ्वीराज चौहान ने भारत राष्ट्र और भारत की जनता के साथ इससे भी भयानक गलतियों का प्रदर्शन आगे किया.

पृथ्वीराज चौहान की दूसरी गलती

भारत पर मुस्लिम आक्रमण लगातार हो रहे थे. चौहान साम्राज्य भी इससे अछूता नहीं था. मोहम्मद गोरी का आक्रमण चौहान साम्राज्य पर भी हुआ था ये और बात है कि चौहानों उन्हें बार बार शिकस्त दी थी. इन विषम परिस्थितियों में भारत के दो शक्तिशाली राज्यों का आपसी टकराव कतई उचित नहीं था. जयचंद मुर्ख था और आगे गद्दार भी बना पर दुश्मनों के सर पर होते हुए सिर्फ एक स्त्री केलिए एक बड़े राज्य के विरुद्ध दुश्मनी मोल लेना कतई उचित नहीं था और न ही एक स्त्री केलिए अपने चालीस प्रतिशत वीर योद्धाओं को कुर्बान करना उचित था.

इसका परिणाम यह हुआ कि पृथ्वीराज चौहान न केवल सैन्य रूप से कमजोर हुए बल्कि उनके सहयोगी (कन्नौज) जो कभी मुस्लिम आक्रमणकारियों के विरुद्ध साथ लड़ते थे वे उनके दुश्मन हो गये. इतना ही नहीं संयोगिता के अपहरण की घटना के बाद जयचंद ने विदेशी आक्रमणकारी मोहम्मद गोरी की पृथ्वीराज चौहान के विरुद्ध हर प्रकार से सहायता की.

पृथ्वीराज चौहान की सबसे बड़ी गलती

हम्मीर  महाकाव्य के अनुसार जब गोरी ने पृथ्वीराज चौहान के साम्राज्य पर हमला किया तो पृथ्वीराज ने गोरी को हराकर युद्ध में बंदी बना लिया और उसे उन राज्यों के अधिपतियों से माफ़ी मांगने केलिए बाध्य किया जिसे उसने लूटा था. फिर उसे जिन्दा छोड़ दिया. पृथ्वीराज प्रबंध ऐसे ८ युद्धों का विवरण देता है जिसमें पृथ्वीराज चौहान ने मोहम्मद गोरी को हराकर बंदी बनाया और फिर यूँ ही छोड़ दिया, न तो दण्डित किया और न ही हर्जाना वसूला. प्रबंधकोष पृथ्वीराज चौहान द्वारा २० बार मोहम्मद गोरी को हराकर बंदी बनाये जाने का जिक्र करता है और २१ वीं बार हार जाने का जिक्र करता है. सुरजन चरित और पृथ्वीराज रासो भी मोहम्मद गोरी और पृथ्वीराज चौहान के बीच २१ युद्धों का वर्णन करता है.

गोरी ने सरहिंद (भटिंडा) पर हमला किया जहाँ थोड़े से ही दुर्ग रक्षक थे. फिर भी वीर क्षत्रियों ने उनके छक्के छुड़ा दिए. फिर गोरी ने शांति वार्ता केलिए उन्हें बुलाया और कैद कर छल से दुर्ग पर अधिकार कर लिया. यह सुनकर पृथ्वीराज चौहान ने गोरी पर हमला किया, गोरी सेना सहित दुर्ग छोड़कर भाग गया. भटिंडा को फिर से हिन्दू क्षेत्र में मिला लिया गया. गद्दार जयचंद के सहयोग के भरोसे गोरी ने फिर आक्रमण किया पर इसबार भी पृथ्वीराज चौहान के वीर सैनिकों ने उसे नेस्तनाबूद कर हाथ पैर बांधकर पृथ्वीराज चौहान के सामने पेश किया. पृथ्वीराज चौहान ने हर्जाना वसूल कर उस नरपिशाच को दयाकर या अहंकारवश इस बार भी जिन्दा छोड़ दिया.

मोहम्मद गोरी और पृथ्वीराज चौहान के बीच आखरी संघर्ष

इसप्रकार ११९२ की तराईन युद्ध से पहले पृथ्वीराज चौहान ने शैतान मोहम्मद गोरी को कई बार कुत्ते की तरह दौड़ा दौड़ाकर भगाया था या पकड़ कर जिन्दा छोड़ दिया था. ११९२ में जयचंद के सहयोग से लड़ रहे मुहम्मद गोरी को तराईन के युद्ध में भी हिन्दू वीरों ने छक्के छुड़ा दिए थे. उसने हाथ जोड़कर रात्रि में युद्ध विराम की प्रार्थना की जिसे पृथ्वीराज चौहान ने धर्मयुद्ध की नीति के अनुसार उचित समझ मान लिया. परन्तु शैतान गोरी रात्रि में पृथ्वीराज चौहान के निश्चिन्त सोये हुए सैनिकों पर एकाएक धावा बोल दिया और उन्हें गाजर मूली की तरह काट दिया. पृथ्वीराज चौहान भी बुरी तरह घायल हो दुश्मन सेना से घिर गये. गोरी उनके पास अट्टहास करता हुआ पहुंचा और बोला, “आखिर मैंने तुम्हे हरा ही दिया!”

“तुमने छल से हमें हराया है! यह धर्मयुद्ध नहीं है!” अपनी शारीरिक पीड़ा को दबाते हुए चौहान क्रोध से फुंफकारता हुआ चीखा.

“युद्ध जीतना ही हमारा धर्म है, जीत चाहे जैसे भी मिले!” गोरी अट्टहास करने लगा

अपने क्रोध पर काबू पाने की कोशिश करते हुए चौहान गरजा, “युद्ध में हार जीत होता ही रहता है. मैंने तो तुम्हे कई बार रणभूमि में हराया और बंदी बनाकर जिन्दा छोड़ दिया था…”

“पर मैं तुम्हारी तरह मुर्ख नहीं हूँ”… गोरी अट्टहास करते हुए बोला

“मैं हाथ में आये शत्रु को जिन्दा छोड़ने की मुर्खता नहीं करूंगा. और न ही हाथ में आये तुम्हारे राज्य को छोड़कर चला जाऊंगा….”

पृथ्वीराज चौहान के दिल में दर्द और पश्चताप की एक भयंकर लहर सी उठी. वह अपने अहंकारवश पूर्व में किये गये अपनी गलती पर घोर निराशा में डूब गया… उसे एहसास हो रहा था उसने गोरी जैसे शैतान को जीवनदान देकर अपने राष्ट्र, धर्म और अपनी प्रजा से गद्दारी किया था. दर्द और शोक में डूबा उसका मस्तिष्क छाती पर लुढ़क गया. यह कहना मुश्किल था कि उसके प्राण गलती के एहसास की पीड़ा ने ले लिया था या उसके झुके हुए गर्दन पर गोरी की तलवार की वार ने.

कहा जाता है पृथ्वीराज चौहान गौ माता के भक्त थे, उनकी पूजा करते थे और उनकी इसी कमजोरी का फायदा इसबार मोहम्मद गोरी ने उठाया था. वह शैतान युद्ध के मैदान में गौओं की भीड़ को आगे कर युद्ध के मैदान में उतरा था. गौ माता के झुण्ड को देखकर पृथ्वीराज अपने हथियार रख दिए. पृथ्वीराज के उस पराजय का गम उनके वंशजों में आज भी है. इसीलिए मिर्जापुर के राजगढ़ ब्लोक स्थित अटारी गाँव में साथ ही विशुनपुरा, लालपुर और मटियारी में पृथ्वीराज के करीब १५ हजार वंशज दीवाली नहीं मनाते हैं. बल्कि वे एक जगह एकत्र होकर शोक मानते हैं. इन गाँव में पीढ़ियों से यह परम्परा चली आ रही है. (डॉ अजय कृष्ण चतुर्वेदी, पत्रिका न्यूज)

इस प्रकार पृथ्वीराज चौहान ने विदेशी मुस्लिम आक्रमणकारी मोहम्मद गौरी को कम से कम १६ बार युद्ध में हराकर बंदी बनाया था और हर बार उसे यूँ ही जाने दिया. पर मोहम्मद गोरी ने  सिर्फ एकबार छल से पृथ्वीराज चौहान को हरा दिया और फिर भारत का इतिहास और भूगोल बदल गया. भारत का सुख, चैन, आध्यात्म, शिक्षा, दर्शन, संस्कृति, संस्कार, सभ्यता सब बदल गया या यूँ कहे नष्ट कर दिया गया.

मुस्लिम आक्रमणकारियों के विरुद्ध सही रणनीति क्या होता

भावी विनाशकारी परिणामों को टालने का सही रणनीति यह था कि मुस्लिम आक्रमणकारियों को केवल पराजित ही नहीं किया जाता बल्कि उन्हें उनके घरों में घुसकर अरब तक खदेड़कर खत्म कर दिया जाता. पर ऐसा नहीं हुआ जिसका परिणाम परवर्ती भारतीय भुगतने को बाध्य हुए.

पृथ्वीराज चौहान इस गलती केलिए कुख्यात हैं क्योंकि उन्होंने इस गलती को बार बार दुहराया था. उन्होंने हाथ आये मुस्लिम आक्रमणकारियों को खत्म करने की जगह कई कई बार छोड़ दिया. हाँ, मैं कुख्यात शब्द का ही प्रयोग करूंगा क्योंकि जब बात राष्ट्र की सुरक्षा और राष्ट्रहित का हो तो फिर व्यक्तिगत स्वार्थ, अहंकार और उदारता कोई मायने नहीं रखना चाहिए. यदि पृथ्वीराज चौहान ने अहंकारवश या उदारतावश यह गलती न की होती तो भारत को दुर्दिन नहीं देखना पड़ता, आज भारतवर्ष की तस्वीर इतनी घिनौनी न हो गयी होती. पृथ्वीराज चौहान इस मानक के उल्लंघन का दोषी थे और हमें भविष्य में ऐसी किसी भी गलती/उदारता से बचने का संकल्प लेना चाहिए.

शैतान मोहम्मद गोरी का वध

भारत का विजित क्षेत्र अपने गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक को सौंप वह लाहौर के दुर्ग में कुछ महीने रहा. इसके बाद मोहम्मद गोरी गजनी केलिए प्रस्थान किया. मार्ग में उसने दमयक में पड़ाव डाला. उसके सैनिक लूटी हुई स्त्रियों के भोग में मग्न था और गोरी भी खुद राग रंग और भोग में डूबा था. एसा ही रोज चल रहा था.

१५ मार्च, १२६६ का दिन था. अचानक सर पर भगवा कपड़ा बांधे सिर्फ दो चार दर्जन हिन्दू वीरों का एक दल रास रंग और भोग में डूबे गोरी के टिड्डी दल पर शेर की तरह झपट पड़े. कुछ ही देर में लाशों का ढेर लग गया और वीर हिन्दुओं का एक दल गोरी के पास पहुँच गये और उस शैतान का सर काटकर जमीन पर फेंक दिया. एक एक हिन्दू वीरों ने दस दस इस्लामी शैतानों को मारकर अपनी आहूति दी थी. कहा जाता है इस्लामिक शैतानों ने लौटते वक्त एक गाँव पर हमला कर इनकी बहन, बेटियों को उठा लाये थे जिसका बदला इन हिन्दू वीरों ने आत्मघाती दस्ता बनाकर गोरी को मौत के घाट उतारकर लिया था. जो काम बड़ी बड़ी सेना नहीं कर सकी थी वह काम जान हथेली पर रखकर चंद बहादुर हिन्दू वीरों का आत्मघाती दस्ता ने कर दिखाया था.

उपसंहार

पृथ्वीराज चौहान के पहले भी हजारों हिन्दू वीर योद्धा हुए थे और पृथ्वीराज चौहान के बाद भी सैकड़ों हिन्दू वीर योद्धा हुए जिन्होंने १२४७ वर्षों तक अर्थात १९४७ तक शेष भारत को इस्लामीकरण से बचाए रखा. परन्तु चंद सत्तालोलुप, मुस्लिमपरस्त, सिकुलर मुर्ख और नपुंसक हिन्दुओं के कारन मुसलमान १९४७ के बाद भारत के पश्चिमी और पूर्वी हिस्से को पाकिस्तान और बांग्लादेश के रूप में इस्लामीकरण करने में सफल हो गये. धर्म के आधार पर विभाजित भारत में जिहादियों को रखकर नेहरु और गाँधी ने अपनी मुर्खता या धूर्तता से हिन्दुस्थान के विनाश का बीज बो दिया है.

आवश्यकता इस बात की है कि स्थानीय लोककथाओं, दंतकथाओं, अभिलेखागार, ताम्रपत्र, भोजपत्र, तालपत्र, शिलालेखों और किताबों आदि में पड़े उन वीर योद्धाओं की विरुद्दावली को संगृहीत, संकलित और लिपिबद्ध किया जाये. हिन्दू माताएं अपने पुत्र और पुत्रियों को उन वीर योद्धाओं का गौरवशाली इतिहास सुनाये ताकि हिन्दुओं के बच्चे सिकुलर मुर्ख, वामपंथी गद्दार और कायर भगोड़े बनने की जगह राष्ट्र, धर्म और समाज के रक्षक वीर योद्धा बने ताकि “अवशेष” भारत (हिन्दुस्थान) जो हम भारतीय हिन्दुओं, बौद्धों, सिक्खों और जैनों का अब छोटा सा घर बचा है, को इस्लामिक राज्य बनने से बचाया जा सके. साथ ही उन ऐतिहासिक गलतियों को प्रमुखता से बताया जाना चाहिए जिसके कारण हम भारतीय पहले मुस्लिम आक्रमणकारियों के फिर अंग्रेज व्यापारियों के गुलाम बनने को बाध्य हुए.

दूसरी बात, राष्ट्र, धर्म और समाज की रक्षा केलिए आसमान से तो कोई टपकेगा नहीं. इसलिए मेरा मत है, हम सभी हिन्दुओं (हिन्दू, बौद्ध, सिक्ख, जैन) को दस लोमड़ियों, भेड़ियों की तुलना में कम से कम चार शेर, शेरनियां अवश्य पैदा करना चाहिए-एक राष्ट्र के लिए, एक धर्म के लिए, एक समाज के लिए और एक अपने लिए. तभी अवशेष भारत (हिन्दुस्थान) सुरक्षित रह पायेगा.

मुख्य स्रोत: भारत में मुस्लिम सुल्तान, भाग-१ लेखक: पुरुषोत्तम नागेश ओक

अन्य स्रोत: विकिपीडिया, पत्रिका न्यूज आदि

Disclaimer: इतिहास के अतिरिक्त इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. हमारा वेबसाइट उन विचारों का न समर्थन करता है और न ही विरोध करता है. पाठक व्यक्त व्यक्तिगत विचारों से सहमत या असहमत होने के लिए स्वतंत्र हैं.

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7 thoughts on “महापराक्रमी पृथ्वीराज चौहान की अक्षम्य गलतियाँ

  1. राजा जयचंद को तुमने मूर्ख और गद्दार लिखा है इसका प्रमाण दे सकते हो! जबकि मैं तुम्हें प्रमाण दे सकता हूं कि उन्होंने गौरी को नहीं बुलाया! वे तराइन के युध्द में तटस्थ रहे क्योंकि सम्राट पृथ्वीराज चौहान ने उन्हे निमंत्रण ही नही दिया युध्द का! पृथ्वीराज चौहान के बाद गौरी का युध्द जयचंद से ही हुआ ! अगर जयचंद! गौरी को निमंत्रण देते तो अकारण ही पृथ्वीराज चौहान के बाद वह जयचंद पर ही आक्रमण क्यों करता??

    कुतुबुद्दीन! इल्तुतमिश तक कौ कन्नौज के सामंतों से संघर्ष करना पड़ा।

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