प्राचीन भारत

क्या वैदिक लोग गौ मांस खाते थे?

गौ माता
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जो हिन्दू है वो गौ को माता मानते थे, मानते हैं और मानते रहेंगे

विश्व का एकमात्र बदनसीब देश भारत है जहाँ पढाया जानेवाला भारत का इतिहास उन लोगों के द्वारा लिखा गया है जो मानसिक रूप में अंग्रेजों के गुलाम, अपने ही देश की सभ्यता, संस्कृति और धर्म के कट्टर विरोधी तथा आक्रमणकारियों के कट्टर पक्षपाती हैं जो भारत पर आक्रमण करने वाले आक्रमणकारीयों को तो हीरो की तरह पेश करते हैं जबकि उन धर्मान्ध, हिंसक नराधमों से अपने मातृभूमि, धर्म और जनता की रक्षा के लिए लडने वाले आक्रमित हिंदू वीरों को ही शत्रु के रूप में प्रदर्शित करते हैं. इससे बढ़कर इस देश का दुर्भाग्य और क्या हो सकता है? यहाँ आक्रमणकारी शासकों के एकाध गुण यदि हो तो उसे खोज खोजकर बढ़ा चढाकर कर लिखते हैं और हिंदुओं की एकाध खामियां हो तो उसे तिल का ताड़ बना देते हैं. इन वामपंथी इतिहासकारों की घिनौनी करतूतों मैंने पहले ही अपने घोषणापत्र में उजागर कर दिया जिसे आप परिचय टैब के अंतर्गत घोषणापत्र टैब में पढ़ सकते हैं. इसलिए यहाँ ज्यादा नहीं लिखते हुए पूछता हूँ की सोचिये, ऐसे दोगले इतिहासकारों के द्वारा लिखा गया भारत का इतिहास क्या वास्तव में भारत का इतिहास होगा?

वामपंथी इतिहासकार  द्विजेन्द्रनाथ झा का लेख

झा
वामपंथी इतिहासकार द्विजेन्द्रनाथ झा

बीबीसी में एक ऐसे ही वामपंथी इतिहासकार द्विजेन्द्रनाथ झा का लेख छपा है. उसने लिखा है-“वैदिक साहित्य में ऐसे कई उदाहरण हैं जिनसे पता चलता है कि उस दौर में भी गोमांस का सेवन किया जाता था. जब यज्ञ होता था तब भी गोवंश की बली दी जाती थी. उस वक़्त यह भी रिवाज था कि अगर मेहमान आ जाए या कोई ख़ास व्यक्ति आ जाए तो उसके स्वागत में गाय की बलि दी जाती थी. शादी के अनुष्ठान में या फिर गृह प्रवेश के समय भी गोमांस खाने-खिलाने का चलन आम हुआ करता था. ये गुप्तकाल से पहले की बात है. गोहत्या पर कभी प्रतिबंध नहीं रहा है लेकिन पांचवीं सदी से छठी शताब्दी के आस-पास छोटे-छोटे राज्य बनने लगे और भूमि दान देने का चलन शुरू हुआ. इसी वजह से खेती के लिए जानवरों का महत्व बढ़ता गया. ख़ासकर गाय का महत्व भी बढ़ा. उसके बाद धर्मशास्त्रों में ज़िक्र आने लगा कि गाय को नहीं मारना चाहिए.

पांचवीं-छठी शताब्दी तक दलितों की संख्या भी काफ़ी बढ़ गई थी. उस वक़्त ब्राह्मणों ने धर्मशास्त्रों में यह भी लिखना शुरू किया कि जो गोमांस खाएगा वो दलित है. उसी दौरान सज़ा का भी प्रावधान किया गया, यानी जिसने गोहत्या की उसे प्रायश्चित करना पड़ेगा. फिर भी ऐसा क़ायदा नहीं था कि गोहत्या करने वाले की जान ली जाए, जैसा आज कुछ लोग कह कर रहे हैं. लेकिन गोहत्या को ब्रह्म हत्या की श्रेणी में रखा गया. इसके बावजूद भी इसके लिए किसी कड़ी सज़ा का प्रावधान नहीं किया गया. सज़ा के तौर सिर्फ इतना तय किया गया कि गोहत्या करने वाले को ब्राह्मणों को भोजन खिलाना पड़ेगा. धर्मशास्त्रों में यह कोई बड़ा अपराध नहीं है इसलिए प्राचीनकाल में इसपर कभी प्रतिबंध नहीं लगाया गया. हाँ, अलबत्ता इतना ज़रूर हुआ मुग़ल बादशाहों के दौर में कि राज दरबार में जैनियों का प्रवेश था, इसलिए कुछ ख़ास ख़ास मौक़ों पर गोहत्या पर पाबंदी रही.

सारा विवाद 19वीं शताब्दी में शुरू हुआ जब आर्य समाज की स्थापना हुई और स्वामी दयानंद सरस्वती ने गोरक्षा के लिये अभियान चलाया. और इसके बाद ही ऐसा चिन्हित कर दिया गया कि जो ‘बीफ़’ बेचता और खाता है वो मुसलमान है. इसी के बाद साम्प्रदायिक तनाव भी होने शुरू हो गए. उससे पहले साम्प्रदायिक दंगे नहीं होते थे. जब आप यह कहते हैं कि देश के बहुसंख्यकों की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए बीफ पर प्रतिबंध लगाना चाहिए तो आप इन्हीं में से एक वर्ग की भावनाओं को ठेस भी पहुंचा रहे हैं. वहीं एक दूसरे वर्ग के खान-पान पर आप अतिक्रमण भी कर रहे हैं”.

http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2015/04/150331_beef_history_dnjha_sra_vr?ocid=socialflow_facebook

आपको जानकर दुखद आश्चर्य होगा की अधिकांश वामपंथी इतिहासकार भी इसी प्रकार अपनी मानसिक गंदगी को इतिहास बताकर पडोसते हैं. इनमे मार्क्सवादी इतिहासकार डी डी कौशाम्बी के बाद सबसे कुख्यात वामपंथी इतिहासकार रोमिला थापर भी शामिल है.

वामपंथी झूठ का पर्दाफाश

अब आइये इस वामपंथी इतिहासकार के झूठ की बखिया उधेड़कर इसकी औकात बताएं:

अच्छे बुरे लोग हमेशा रहे हैं, परन्तु इसका मतलब यह कतई नहीं है की बुराई सामान्य जीवन का स्वीकार्य हिस्सा हो. चलो मान लिया, की वैदिक काल में भी कुछ लोग बीफ खाते थे, परन्तु वे लोग कौन थे? और क्या उसे हिंदू समाज में स्वीकार्यता प्राप्त था? जबाब है नहीं. उदहारण के लिए, आज कुछ हिंदू नामधारी नीच वामपंथी भी गौमांस खाते हैं. क्या इसका मतलब यह है कि हिंदू गौमांस खाते हैं? हो सकता है वैदिक काल में अवैदिक लोग-असुर, राक्षस, दानव, दैत्य गौमांस खाते हों. वे तो मनुष्यों का मांस भी खाते थे. तब तो इसे यह भी लिखना चाहिए था की वैदिक लोग नरभक्षी थे. एक और उदहारण लेते हैं. लीबिया और उसके आस-पास के इस्लामिक आतंकवादी संगठन नरभक्षी हैं. मुस्लिम विश्व के शरिया कानून के प्रमुख सउदी अरब के मुफ्ती शेख अब्दुल अजीज अल शेख कहते हैं कि विषम परिस्थितियों में भोजन नहीं मिलने की स्थिति में मुसलमान अपने बीबी का मांस खा सकते हैं. क्या इससे यह कहना उचित होगा की मुसलमान नरभक्षी होते हैं?

हिन्दू धर्मग्रंथ क्या कहता है

मनु स्मृति भारत में मानवों के प्रथम प्रजनेता राजर्षि मनु ने लिखा था. मनु किसी भी मन्वन्तर में मानवों के प्रथम प्रजनेता को कहा जाता है और प्रत्येक मन्वन्तर में पूरे विश्व के नीति और संविधान के तौर पर मनुस्मृति की रचना की जाती है जो उस मन्वन्तर का वैश्विक संविधान कहलाता है. वर्तमान में वैवस्त मन्वन्तर हजारों लाखों वर्ष से चल रहा है और वर्तमान मनुस्मृति वैवस्त मनु का लिखा वैश्विक संविधान है जो ईसाईयत और इस्लाम से पूर्व तक पुरे विश्व का संविधान था. वह मनु स्मृति कहता है मद्य, माँस आदि यक्ष,राक्षस और पिशाचों का भोजन हैं. (मनु स्मृति ११/७५) 

मांस खानेवालों के लिए मनुस्मृति में कहा गया है, “जिसकी सम्मति से मारते हो और जो अंगों को काट काट कर अलग करता हैं. मारने वाला तथा क्रय करने वाला, विक्रय करनेवाला, पकानेवाला, परोसने वाला तथा खाने वाला ये ८ सब घातक हैं. जो दूसरों के माँस से अपना माँस बढ़ाने की इच्छा रखता हैं, पितरों, देवताओं और विद्वानों की माँस भक्षण निषेधाज्ञा का भंग रूप अनादर करता हैं उससे बढ़कर कोई भी पाप करने वाला नहीं हैं”. (मनु स्मृति ५/५१,५२)

मनु स्मृति को खुद ये वामपंथी इतिहासकार कम से कम गुप्तकाल से पहले का तो मानते ही हैं. और ध्यान दीजिए इसमें गौ मांस खाने की आलोचना नहीं वरन सभी प्रकार के मांस खाने की आलोचना की गयी है. और चीनी स्रोतों से पता चलता है की मूल मनुस्मृति ग्रन्थ का रचनाकाल दस हजार ईस्वी पूर्व है और यह सिर्फ एतिहासिक अनुमान है वास्तविकता तो यह है कि यह लाखों वर्ष से विश्व का संविधान है. वेदों की रचना उससे भी पहले हुई थी. आइये वेदों के साक्ष्य से इन मक्कारों की मक्कारी का पर्दाफाश करें:

ऋगवेद ८.१०१.१५ – मैं समझदार मनुष्य को कहे देता हूँ की तू बेचारी बेकसूर गायकी हत्या मत कर, वह अदिति हैं अर्थात काटने- चीरने योग्य नहीं हैं.

ऋगवेद ८.१०१.१६ – मनुष्य अल्पबुद्धि होकर गाय को मारे काटे नहीं.

अथर्ववेद १०.१.२९ – तू हमारे गाय, घोड़े और पुरुष को मत मार.

अथर्ववेद १२.४.३८ -जो (वृद्ध) गाय को घर में पकाता हैं उसके पुत्र मर जाते हैं.

अथर्ववेद ४.११.३- जो बैलो को नहीं खाता वह कष्ट में नहीं पड़ता हैं

ऋगवेद ६.२८.४ – गायें वधालय में न जाये

अथर्ववेद ८.३.२४ – जो गोहत्या करके गाय के दूध से लोगो को वंचित करे, तलवार से उसका सर काट दो

यजुर्वेद १३.४३ – गाय का वध मत कर , जो अखंडनिय हैं

अथर्ववेद ७.५.५ – वे लोग मूढ़ हैं जो कुत्ते से या गाय के अंगों से यज्ञ करते हैं

यजुर्वेद ३०.१८- गोहत्यारे को प्राण दंड दो

उपर्युक्त बातों को ध्यान से पढ़ेंगे तो निष्कर्ष निकलता है की उस समय भी कुछ असुर, राक्षस, दानव, दुष्ट लोग थे जो गौवंश की हत्या करते थे या उनका मांस खाते थे परन्तु जैसा की मनुस्मृति में कहा गया है जो वैश्विक संविधान था उसके अनुसार वह गलत था. इसलिए वेदों में गौवध, गौ मांस खाने के निषेध के साथ साथ उस कुकृत्य के लिए कड़े दंड का विधान भी किया गया था.

वास्तव में ऋग्वेद में नदियों में सरस्वती और पशुओं में गौ सर्वाधिक बार और सबसे पवित्र शब्द के रूप में प्रयोग हुए हैं. वेदों के इन ऋचाओं से स्पष्ट हो जाता है कि इसने जो कहा की वैदिक काल के लोग गौ मांस खाते थे, गौ हत्या के लिए कोई सजा का प्रावधान नहीं था या बहुत कम सजा का प्रावधान था, यज्ञों में गौ बलि दी जाती थी आदि झूठ और वामपंथी बकवास है.

गौ वध पर मृत्युदंड का प्रावधान भारत में आक्रमणकारी मुसलमानों के आगमन से पूर्व तक लागू था. इसका प्रमाण हमें तेरहवीं सदी में बंगाल के सप्तग्राम में घटी घटना से भी मिलता है.

एकदिन सप्तग्राम में आकर रहनेवाले एक मुस्लिम ने अपने पुत्र के खतना के अवसर पर गाय काटकर भोज किया. यह खबर पूरे बंगाल में आग की तरह फ़ैल गया. हिन्दुओं केलिए गौ माता के सामान पूजनीय और पवित्र थी. वेदों में गौ वध का निषेध है और गौ की हत्या पर मृत्युदंड का विधान है. इसलिए पवित्र तीर्थस्थल सप्तग्राम में गौवध से सभी हिन्दू आहत और क्रोधित थे. उन्होंने मान नृपति से उसे दंड देने की मांग की. राजा मान नृपति ने उस मुसलमान के बेटे को मौत की सजा दी और उसे मौत के घाट उतार दिया गया. (An Account of the Temple of Triveni near Hugli, by D. Money, Esq. Bengal Civil Service)

क्या पांचवी छठी शताब्दी में भारत में छोटे छोटे राज्य बनना शुरू हुए थे

फिर यह कहता है कि “पांचवीं सदी से छठी शताब्दी के आस-पास छोटे-छोटे राज्य बनने लगे और भूमि दान देने का चलन शुरू हुआ. इसी वजह से खेती के लिए जानवरों का महत्व बढ़ता गया. ख़ासकर गाय का महत्व भी बढ़ा. उसके बाद धर्मशास्त्रों में ज़िक्र आने लगा कि गाय को नहीं मारना चाहिए. पांचवीं-छठी शताब्दी तक दलितों की संख्या भी काफ़ी बढ़ गई थी. उस वक़्त ब्राह्मणों ने धर्मशास्त्रों में यह भी लिखना शुरू किया कि जो गोमांस खाएगा वो दलित है.”

कृषि का आविष्कार और कृषि कर्म की शुरुआत तो इच्छ्वाकू वंशी महाराज पृथु ने किया था जिनके साम्राज्य को पृथ्वी कहा जाता था जिसके कारण पूरी धरती के लिए सबसे प्रचलित शब्द आज भी पृथ्वी बनी हुई है. वामपंथी चूँकि अक्ल के अंधे होते हैं इसलिए इन्हें उतना दूर की दिखाई नहीं देगा पर वामपंथी इतिहासकार ये तो बताते हैं कि ५०० ईस्वी पूर्व हर्यक वंश का साम्राज्य था जिसमे बिम्बिसार और अजातशत्रु दो चक्रवर्ती सम्राट थे.  उसके बाद घनानंद भारत का चक्रवर्ती सम्राट था, वर्तमान बांग्लादेश से अफगानिस्तान तक भारतवर्ष सिर्फ १६ महाजनपद में विभाजित था. चन्द्रगुप मौर्य का साम्राज्य इन्ही इतिहासकारों के अनुसार अफगानिस्तान, पाकिस्तान से लेकर उत्तर में कश्मीर दक्षिण में नर्मदा और पूर्व में बंग प्रदेश के अधिकांश हिस्सों पर था, फिर अशोक ने उस साम्राज्य का और अधिक विस्तार ही किया था. चक्रबर्ती सम्राट विक्रमादित्य की गाथा तो अरब देश में भी गाये जाते थे जिसके सबूत आज भी संग्रहालयों में सुरक्षित हैं. ये सब क्या छोटे मोटे राज्य थे?

दूसरी बात,  क्या वैदिक काल से लेकर उत्तर वैदिक काल तक गौ ही समृद्धि का प्रतीक नहीं था? क्या लड़ाई मुख्यतः गौ के लिए ही नहीं होती थी? फिर इसकी महत्ता पांचवीं छठी शताब्दी में कैसे बढ़ी? क्या बैलों का उपयोग हलों में पांचवी छठी शताब्दी से ही होनी शुरू हुई थी? उसके पहले कृषि और हल का उपयोग नहीं होता था? ये वामपंथी इतिहासकार ही तो बताते हैं कि २००० ईस्वी पूर्व सिंधु घाटी सभ्यता में हलों के निशान मिले हैं. मेहरगढ़ में ८००० ईस्वी पूर्व चावल के खेती के साक्ष्य मिले हैं. हालाँकि इनके कालगणना भी इनके झूठ और मक्कारी का ही नमूना है परन्तु वो अलग विषय में देखा जायेगा. पर उपर्युक्त से स्पष्ट है कि ये वामपंथी इतिहासकार भारत विरोधी, हिन्दू विरोधी मानसिकता के कारण विकलांग हो चुके हैं. इन्हें सत्य इतिहास और वामपंथी मानसिक विकृति में कोई अंतर समझ में नहीं आता है.

क्या भारतीय इतिहास और साहित्य में दलित था

अब देखिये हमारे किसी भी ग्रन्थ में दलित शब्द का प्रयोग नहीं हुआ है. दलित शब्द आधुनिक है. जब यह कहता है कि उस वक़्त ब्राह्मणों ने धर्मशास्त्रों में यह भी लिखना शुरू किया कि जो गोमांस खाएगा वो दलित है इसका सीधा मतलब है कि यह सौ प्रतिशत झूठ बोल रहा है. अगर दलित को अनुसूचित जाति वर्ग में शामिल हिन्दू जातियां भी मान लिया जाये तो भी ये सौ प्रतिशत झूठे ही सबित होंगे क्योंकि हिन्दू चाहे किसी भी वर्ण का हो वे गौ मांस नहीं खा सकते हैं. अनुसूचित जातियों में शामिल हिन्दू जातियां तो आक्रमणकारी, हिंसक, लूटेरे, शोषक, उत्पीड़क, अत्याचारी मुस्लिम-अंग्रेज शासकों के कुशासन से दरिद्र बने, अपवाद को छोड़कर, ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य लोग ही हैं (पढ़ें शोधपत्र-अनुसूचित जाति के लोग मुस्लिम-अंग्रेज शासकों के कुशासन, अत्याचार, लूट से दरिद्र बने ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य लोग हैं). अपर कास्ट, लोवर कास्ट, अछूत जैसे शब्दों का आविष्कार अंग्रेजों ने किया था. वैज्ञानिक कारणों से मृतकों का दाह संस्कार कराने वाले डोम और मृतक पशुओं के चमड़े का व्यापार करने वाले चर्मकारों को गाँव/शहर के बाहरी हिस्से में बसाया जाता था ताकि संक्रमण न फैले. इन्हें ही अंग्रेजों ने फूट डालो राज करो नीति के तहत untouchables कहा. इसी अंग्रेजों के ज्ञान से अंधे नेहरुवादियों, वामपंथियों और दलितवादियों ने छूआछूत का प्रपंच रच दिया. यहाँ तक कि दलितों के मसीहा डॉ भीमराव रामजी अम्बेडकर खुद न दलित थे, न अछूत बल्कि वे पांडुपुत्र महाबली भीम के वंशज महार(थी) क्षत्रिय थे. महार जातियां कम से कम उन्नीसवी सदी तक या उसके बाद तक गर्व से खुद को पांडवों के वंशज और महाभारत के युद्ध में कौरवों के विरुद्ध पांडवों के पक्ष में लड़ने का दावा करते थे (पढ़ें शोधपत्र-डॉ भीमराव रामजी अम्बेडकर न दलित थे न अछूत, वे क्षत्रिय थे). डॉ अम्बेडकर भी अपने जाति का इतिहास भली भांति जानते थे इसलिए उन्होंने अपनी पुस्तक “शूद्र कौन है” में लिखा है कि अधिकांश शूद्र जातियां क्षत्रियों की ही सन्तान हैं. परन्तु ये धूर्त नेहरूवादी वामपंथी इतिहासकार न सत्य इतिहास को मानते हैं और न बाबा साहेब अम्बेडकर को.

सवाल है फिर कौन लोग थे जो गौ मांस खाते थे और जिसके विरुद्ध मनुस्मृति और वेदों में लिखा हुआ है? स्पष्ट है वे क्षत्रिय, ब्राह्मण, वैश्य या शूद्र हिन्दू नहीं थे, बल्कि भारतवर्ष में तब भी वामपंथियों, जिहादियों और मिशनरियों की तरह रहनेवाले कुछ लोग थे जो गौ मांस खाते थे, जिन्हें उनके कुकर्मों के आधार पर मनुस्मृति और वेदों में असुर, राक्षस, दानव, दैत्य आदि बुरे शब्दों से लांक्षित किया गया है. वैदिक लोगों को गौ मांस ना खाने की सलाह दी जाती थी और दंड का प्रावधान किया गया था ताकि वे उन नीच लोगों की तरह असुर, राक्षस और पिशाच मनोवृत्ति के नहीं बने. खुद द्विजेन्द्रनाथ झा इसका बढ़िया उदहारण है जो हिन्दू होकर नीचता की सारी हदें लांघता है. इसके जैसे कुछ लोग यदि आज भी गौ मांस खाते हैं तो इसका यह कतई मतलब नहीं हो सकता है कि हिंदू लोग गौ मांस खानेवाले होते हैं.

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