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नेहरु हिंदू थे या मुस्लिम: एक खोज, भाग-१

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उपर बाएं गंगाधर नेहरु, फोटो साभार आनंद भवन

(नये तथ्यों के आधार पर संशोधित)

लोग अक्सर प्रश्न पूछते हैं कि ईसाई माँ और मुसलमान (या पारसी) बाप का बेटा राहुल गाँधी जैसे खुद को दत्तात्रेय गोत्र का जनेऊधारी ब्राह्मण बताता है, कहीं पंडित जवाहरलाल नेहरु भी, वैसे ही फर्जी पंडित तो नहीं थे? जवाहरलाल नेहरु के हिन्दू विरोधी, हिन्दू धर्म विरोधी और भारत विरोधी कुकृत्यों की लम्बी श्रृंखला देखकर मेरे दिमाग में भी अक्सर यही प्रश्न उठता था. इसलिए मैंने सत्य का पता लगाने का निश्चय किया. ज्ञातव्य है कि अपने मुस्लिमपरस्त मानसकिता और कार्यों की वजह से पंडित नेहरु “मौलाना नेहरु” के नाम से भी जाने जाते थे.

भाग-१ इंटरनेट पर उपलब्ध जानकारी

•             मोतीलाल नेहरु- पिता गियासुद्दीन उर्फ गंगाधर नेहरु

•             जवाहर लाल नेहरु- पिता मोतीलाल नेहरु/मुबारक अली

•             इंदिरा गाँधी उर्फ मैमूना बेगम- पिता जवाहरलाल नेहरु

•             राजीव गाँधी- पिता फिरोज खान (गाँधी) वल्द जहाँगीर नवाब खान, माता मैमूना बेगम. राजीव गाँधी ने ईसाई धर्म अपनाकर अपना नाम रोबर्टो रखकर एंटोनियो माईनो उर्फ सोनिया कैथोलिक ईसाई से शादी की

•             संजय गाँधी- पिता मोहम्मद युनुस खान, माता मैमूना बेगम उर्फ इंदिरा गाँधी 

•             राउल विन्ची उर्फ राहुल गाँधी- पिता राजीव गाँधी (मुसलमान/पारसी) या रोबर्टो (कैथोलिक ईसाई)

•             बियांका उर्फ प्रियंका गाँधी- पिता राजीव गाँधी (मुसलमान/ईसाई) उर्फ रोबर्टो (कैथोलिक ईसाई), पति रोबर्ट वढेरा, कैथोलिक ईसाई

•             एंटोनियो माईनो उर्फ सोनिया गाँधी- पिता स्टेफिनो माईनो, इटालियन कैथोलिक ईसाई

भाग-२ मेरी खोज

1.            सबसे पहला प्रश्न मेरे दिमाग में था कि, जैसा की लोग इन्टरनेट पर दावा करते हैं, क्या सचमुच में गियासुद्दीन ही मोतीलाल नेहरु का पिता और जवाहरलाल नेहरु का दादा था. इसलिए पहले उसी प्रश्न पर विचार करते हैं.

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गंगाधर नेहरु फोटो साभार आनंद भवन

उपर्युक्त तस्वीर जवाहरलाल नेहरु के दादा जी का है जो आनंद भवन में लगा है और जिसपर लिखा है “जवाहर लाल नेहरु के दादा गंगाधर नेहरु”. ये १८५७ के विप्लव के पूर्व दिल्ली के कोतवाल थे. नेहरु ने अपने जीवनी में इनके बारे में लिखा है,

 “My grandfather, Ganga Dhar Nehru, was Kotwal of Delhi for some time before the great revolt of 1857.” (pg.2)

जवाहरलाल नेहरु ने दिल्ली पुलिस के रिकोर्ड में भी यही लिखवाया है:

“The institution of Kotwal came to an end with the crushing of the revolt of 1857, the first war of freedom by the British and, interestingly, the last Kotwal of Delhi, appointed just before the eruption of the first war of freedom, was Gangadhar Nehru, father of Pandit Motilal Nehru and grand father of Pandit Jawaharlal Nehru, India’s first Prime Minister.” (Delhi Police Record)

परन्तु, ब्रिटिश रिकोर्ड से पता चलता है कि १८५७ में कुल तिन कोतवाल हुए-पहला काजी फजुल्लाह, दूसरा मोईनुद्दीन हसन खान, तीसरा और अंतिम सईद मुबारक शाह. ब्रिटिश रिकार्ड में लिखा है,

“Documents from the early period of the uprising (revolt of 1857) represent attempts by the Royal government to assert its authority. In an attempt to take control, the King (Mughal Badshah) wrote to the officers, or thanadars, of all the thanas or police sations in the city, in the second week of the uprising. It was in the same period that Moinuddin Hasan Khan was appointed Kotwal, or city police chief, for a brief period, replacing Qazi Faizullah. Shortly afterwards Syed Mubarak Shah was appointed Kotwal and he continued in this post till the end.” (Source: Charles Metcalfe, Two Native Narratives, The Narrative of Mainodin Hasan Khan, p . 50.)

सवाल है, इनमे से गंगाधर नेहरु कौन थे? उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है या तो नेहरु झूठ बोल रहे थे या फिर नेहरु के दादा गंगाधर नेहरु उपर्युक्त तीनों कोतवाल में से कोई एक थे और चूँकि उन्होंने लिखा है अंतिम कोतवाल थे तो फिर ‘सईद मुबारक शाह’ होना चाहिए क्योंकि वही दिल्ली का अंतिम कोतवाल था. तो क्या नेहरु भी पारसी/मुस्लिम/ईसाई माँ बाप की औलाद राहुल गाँधी की तरह फर्जी जनेउधारी हिन्दू थे? भारत के नागरिक होने के नाते यह सवाल पूछना हमारा हक है.

मुगल रिकॉर्ड से भी पता चलता है कि १८५७ के विप्लव के समय और उससे पहले कोई भी हिंदू दिल्ली का कोतवाल नही था. जैसा की चित्र से स्पष्ट है गंगाधर नेहरु का लिबास किसी मुस्लिम की तरह ही है. नेहरु ने अपने जीवनी में लिखा है कि ब्रिटिश पुलिस ने उन्हें मुसलमान होने के शक में रोका था तो उन्होंने कहा मेरा नाम गंगाधर है मैं कश्मीरी पंडित हूँ मुस्लिम नहीं.

सवाल है, उनका लिवास क्या कश्मीरी पंडितों वाला था या बचने केलिए झूठ बोला था? उपर्युक्त तथ्यों से नेहरु का फर्जीवाड़ा स्पष्ट हो गया की नेहरु के दादा कोतवाल नहीं थे और यदि यह फर्जीवाड़ा नहीं सच है तो फिर यह इस अफवाह का समर्थन है की गंगाधर नेहरु वास्तव में मुसलमान था और केवल अंग्रेजों से बचने केलिए उन्होंने अपना नाम बदला था. नेहरु ने अपने फर्जीवाड़े को एतिहासिक रंग देने केलिए दिल्ली पुलिस की रिकार्ड में अपने दादा को चौथे नम्बर पर कोतवाल के रूप में दिखाया है. इसके पहले १२३७ ईसवी, १२९७ ईसवी और १६४८ ईसवी के तिन मुस्लिम कोतवाल के नाम भी दिए हैं. सवाल है जब १८५७ में ही दिल्ली के तिन तिन कोतवाल हो गये तो फिर १२००-१८५७ ईसवी तक मुस्लिम शासन में तो सैकड़ों कोतवाल हुए होंगे फिर तिन ही क्यों. स्पष्ट है अपने फर्जीवाड़े को ऐतिहासिक रंग देने केलिए.

खैर, मैंने अपनी खोज को और आगे बढाया तो ब्रिटिश रिकॉर्ड में पाया की दिल्ली में एक कोतवाल और दो डिप्टी कोतवाल होते थे. अंग्रेजों के हमले में एक डिप्टी कोतवाल मारा गया दूसरा डिप्टी कोतवाल जिसका नाम गियासुद्दीन था भाग गया. उसकी आगे की कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है.

जवाहरलाल नेहरु ने अपने जीवनी में लिखा है, “The Revolt of 1857 put an end to our family’s connection with Delhi…The family, having lost nearly all it possessed, joined the numerous fugitives who were leaving the old imperial city and went to Agra. He (Gangadhar) died at the early age of 34 in 1861” (pg.2)

उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है नेहरु के दादा दिल्ली के कोतवाल तो नहीं थे पर डिप्टी कोतवाल हो सकते हैं जो अंग्रेजों के डर से जान बचाने केलिए सपरिवार आगरा की ओर भाग गये थे. उनके लिबास मुस्लिम वाले ही थे जैसा की नेहरु ने खुद लिखा है कि अंग्रेजों ने उन्हें मुस्लिम समझकर रोका था. अतः कहा जा सकता है कि गियासुद्दीन और गंगाधर संभवतः दोनों एक ही व्यक्ति था.

१८५७ में विप्लव के समय जब वे आगरा की ओर भाग रहे थे तो अपना पहचान छुपाने के लिए अपना नाम भी बदल लिए और पहचान भी क्योंकि बाद में इनके परिवार का और कोई भी सदस्य गंगाधर नेहरु ( या गियासुद्दीन) के जैसा लिवास पहने नहीं दिखता है. यह वैसा ही है जैसे की १९८४ के सिक्ख दंगे के समय अल्पसंख्यक क्षेत्रों में सिक्खों ने अपने बाल मुंडवा लिए और पगड़ी बांधना छोड़ दिए थे. परन्तु देखनेवाली बात यह है कि गियासुद्दीन ने छद्म नाम गंगाधर हिन्दुवाला तो रख लिया परन्तु सरनेम किसी हिंदू का नही रखा शायद इसलिए की सर नेम खानदान को व्यक्त करता है. इसलिए एक नया सरनेम ‘नेहरु’ रख लिया ताकि जरुरत पड़ने पर यथापरिस्थिति लोगों को संशय में डाल सके और अपनी वास्तविक पहचान छुपा सकें. नेहरु सरनेम की उत्पति पर नेहरु ने अपनी जीवनी में लिखा है,

“A jagir with a house situated on the banks of canal had been granted …and, from the fact of this residence, ‘Nehru’ (from nahar, a canal) came to be attached to his name.” (pg.1)

सवाल है जब वो कश्मीरी ब्राह्मण थे और मुगलों के दरबार में १५० वर्षों से कश्मीरी ब्राह्मण के रूप में ही काम करते आ रहे थे तो फिर कश्मीरी सरनेम की जगह फर्जी ‘नेहरु’ सरनेम रखने की आवश्यकता क्यों पड़ी?

2.           जवाहरलाल नेहरु ने अपने पिता मोतीलाल नेहरु के शिक्षा के बारे में लिखा है, “His early education was confined entirely to Persian and Arabic and he only began learning English in his early teens.” (pg.3)

जवाहरलाल नेहरु के चाचा, फोटो साभार आनंद भवन

                प्रश्न उठता है कि जब नेहरु पंडित थे तो उन्हें संस्कृत की शिक्षा तो अवश्य दी जानी चाहिए थी भले ही उन्हें अरबी फारसी भी पढाया जाता. परन्तु उन्हें संस्कृत की शिक्षा ही नही दी गयी. इतना ही नही नेहरु ने अपने जीवनी में कई एसी घटनाओं का उल्लेख किया है जो दर्शाता है कि पिता मोतीलाल या उनके चाचा और चचेरे भाईओं के दिल में हिंदू धर्म, हिंदुओं के भगवान और हिंदू कर्मकांड में कोई दिलचस्पी नही थी. इससे स्पष्ट होता है की ‘नेहरु’ पंडित नही थे. एक स्थान पर नेहरु लिखते है, “Of religion I had very hazy notions. It seemed to be a woman’s affair. Father and my older cousins treated the religious question humorously and refused to take it seriously.”

३.     जवाहरलाल नेहरु ने अपने जीवनी में लिखा है मेरा जन्म १४ नवम्बर, १८८९ को इलाहाबाद में हुआ, पर उन्होंने यह नही बताया की इलाहबाद में किस जगह हुआ था. मैं जब इलाहबाद में था तो एक दैनिक पेपर में एक लेख छपा था और उससे पता चला की नेहरु का जन्म इलाहबाद के मीरगंज इलाके में हुआ था. लेख में उनके घर की तस्वीर भी दी हुई थी जो एक सामान्य सा दो मंजिला घर था. मुझे लगा मुझे यहाँ से कुछ बेहतर जानकारी मिल सकती है इसलिए मैं वहाँ जाने को उत्सुक हुआ, पर यह जानकर हैरान रह गया की मीरगंज इलाका रेड लाईट एरिया था. मुझे आश्चर्य हुआ की इतने बड़े व्यक्ति का जन्मस्थान वेश्यालय कैसे बन गया, परन्तु जब मैंने इस बाबत जानकारी इकट्ठी करनी शुरू की तो पता चला की वो बहुत पहले से रेड लाईट एरिया था और मोतीलाल रेड लाईट एरिया में ही रहते थे.

इसी छान बीन के दौरान मुझे कुछ लोगों ने बताया की जवाहर लाल नेहरु का असली पिता मुबारक अली था. मेरे पास इस बात के कोई साबुत नही है इसलिए मैं कुछ भी नही कह सकता, परन्तु मैं निम्नलिखित कारणों से इस बात से बिलकुल इंकार करने की स्थिति में नहीं हूँ:

आनंद भवन, प्रयागराज

* मुबारक अली बदायूं का एक धनाढ्य वकील था और वह मोतीलाल के घर मीरगंज में आया करता था.

* १८५७ के विप्लव में सबकुछ गंवाने के बाद नेहरु परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत खराब हो चुकी थी, शायद इसीलिए वे रेड लाईट एरिया में रह रहे थे.

* मुबारक अली एक अय्याश किस्म का व्यक्ति था. मोतीलाल का रेड लाईट एरिया में रहना और खराब आर्थिक स्थिति में कुछ भी सम्भव है.

* मोतीलाल को ‘इशरत मंजिल’ मुबारक अली से मिला था जिसका नाम मोतीलाल ने ‘आनंद भवन’ रखा था

* नेहरु लिखते है कि जब वे दशवें वर्ष में थे तो वे पुराने मकान से नए मकान ‘आनंद भवन’ में आये थे. मुबारक अली से नेहरु आनंद भवन आने से पूर्व अच्छी तरह परिचित थे और मुबारक अली आनंद भवन आता जाता रहता था और नेहरु को बेटे जैसा प्यार करता था.

* नेहरु ने मुबारक अली के बारे में अपने जीवनी में लिखा है, “He came from a well-to-do family of Badaun….and for me he was a sure haven of refuge whenever I was unhappy or in trouble. I used to snuggle up to him and listen, wide-eyed, by the hour to his innumerable stories……and the memory of him still remains with me as a dear and precious possession.”

* जवाहरलाल नेहरु ने खुद स्वीकार किया है कि उनका हिंदु होना महज एक दुर्घटना है और उनके संस्कार मुस्लिम के हैं.

* जवाहर अरबी शब्द है जो एक कीमती पत्थर को व्यक्त करता है. कोई हिंदू और वो भी पंडित अपने पुत्र का नाम अरबी क्यों रखेगा.

* कुछ लोगों का तो यह भी कहना है कि थुस्सू मुबारक अली की विधवा थी जिससे मोतीलाल ने विवाह किया था. नेहरु वास्तव में थुस्सू का ही बेटा था.

४.     हिंदू धर्म और हिंदू संस्कृति के विषय में जवाहरलाल नेहरु के विचार कितने निम्न स्तर के थे और हिंदू धर्म के प्रति उनके दिल में कितना विद्वेष था यह उनके निम्नलिखित कथन से झलकता है:

      “Hindu culture would injure India’s interests. By education I am an Englishman, by views an internationalist, by culture a Muslim, and I am a Hindu only by accident of birth. The ideology of Hindu Dharma is completely out of tune with the present times and if it took root in India, it would smash the country to pieces. [Source:Violation of Hindu HR-Need for a Hindu nation-III by V Sunderam (Retd. IAS Officer), originally in “Reminiscences of the Nehru Age” by M.O. Mathai]

      भारतीय सभ्यता, संस्कृति और सनातन धर्म जो विश्व की प्राचीनतम और महानतम सभ्यता, संस्कृति और धर्म है, जो जियो और जीने दो, वसुधैव कुटुम्बकम और सत्यमेव जयते जैसे आदर्शों पर आधारित है, के विषय में कोई हिंदू तो क्या इसे समझने वाला कोई भी इस प्रकार की सोच नही रख सकता है. इन्हें इस बात का डर था कि यदि हिंदू धर्म ने हिन्दुस्थान में अपनी जड़े जमा ली तो देश के टुकड़े हो जायेंगे. ये ठीक वैसा ही जैसे आज राहुल गाँधी कहता है कि भारत को लश्कर ऐ तोइबा से ज्यादा हिंदू कट्टरवाद से खतरा है.

सवाल है देश के टुकड़े होने से उनका तात्पर्य क्या था? मेरा मानना है, उन्हें लगता था कि यदि हिंदू धर्म अपनी जड़ें मजबूती से जमा लेती है तो भारत अखंड मुस्लिम राज्य नही बन सकेगा और हिंदू अपने लिए फिर कोई छोटा हिंदुस्तान ले लेगा और भारत के टुकड़े हो जायेंगे. शायद आपको मेरी सोच पर तरस आ रही होगी, लेकिन मेरे इस सोच का पर्याप्त आधार है और आप भी देख लीजिए….

५.     जवाहरलाल नेहरु का कहना है कि उनका खानदान फर्रुखशियर का कृपा प्राप्त कर उसी के समय (१७१६ ईस्वी) कश्मीर छोडकर मुगलों की सेवा के लिए दिल्ली आ बसे थे. वे अपनी जीवनी में खुद को कश्मीरी पंडित साबित करने के लिए नाना प्रकार के अनर्गल प्रलाप किये है जो की महत्वहीन और असम्बद्ध भी है, परन्तु उन्होंने कहीं भी कश्मीर के उस भू-भाग का जिक्र नही किया है जहाँ के वे खुद को खानदानी बताते है. परन्तु विडम्बना देखिये, खुद को कश्मीर पंडित साबित करने के लिए अनर्गल प्रलाप करनेवाला नेहरु की राय कश्मीरी पंडितों के सम्बन्ध में कितना घिनौना और निम्नस्तरीय है.  नेहरु ने अपनी पुस्तक Glimpses of World history में लिखा है:

 “The treatment of men was sometimes worse than that of animals (some of the animals like cows were actually revered because they were Gods). 

Lower caste Hindus had a miserable life. Other historians have commented that the treatment of women was even worse, specially women of lower castes, they were considered the property of the upper caste Hindus, to be molested and/or raped at will. 

In many cases the new bride had to stay a night with the village Brahman before she was married off. Kashmir converted to Islam during this time period. It was cruelty like this that led to the whole sale conversion to Islam. The new religion offered them equality and saved them from the Brahmans.”

जरा तीसरे पैरा पर ध्यान दीजिए. नेहरु का मानना है कि कश्मीर की सामाजिक धार्मिक स्थिति बहुत ही खराब थी और वे ब्राह्मणों के अत्याचार से त्रस्त थे. और इन्ही अत्याचार के परिस्थितियों में कश्मीर के लोगों ने सामूहिक रूप से इस्लाम धर्म कबूल कर लिया. कश्मीर के इतिहास लेखक कल्हण,  विल्हण या अन्य किसी ने भी इस प्रकार की बातें नही लिखी है. दूसरी बात कश्मीर १४ वीं शताब्दी के उत्तरार्ध से ही मुस्लिम अत्याचार से त्रस्त था.

शायद नेहरु को यह पता नही था कि सिकन्दर शाह जैसे मुस्लिम शासकों ने कश्मीरी पंडितों के लिए तीन ही विकल्प दिए थे-इस्लाम कबूल करो, घाटी छोड़ो या मरो और उसने लाखों की संख्या में ब्राह्मणों का कत्ल करवाया था और यह की जब कश्मीर के महाराज गुलाब सिंह हुए तो १८४८ में हजारों की संख्या में धर्मान्तरित मुस्लिम उनके दरबार में उपस्थित हुए थे और अपने उपर मुस्लिम अत्याचार और जबरन धर्मान्तरण का हवाला देकर वापस हिंदू धर्म में शामिल करने की प्रार्थना की थी. गुलाब सिंह इसके लिए आश्वाशन भी दिए थे पर उनके पुरोहित की धर्मान्धता के कारण यह शुभ कार्य पूरा नही हो सका (My Frozen Turbulence of Kashmir- by Jagmohan).

अस्तु, यह उस कश्मीरी पंडित का विचार है जो खुद को कश्मीरी कहते नही अघाता है और खुद को कश्मीरी पंडित साबित करने के लिए मरता दिखाई देता है. कोई भी कश्मीरी पंडित इस प्रकार की सोच नही रख सकता है. इससे स्पष्ट होता है की नेहरु पंडित तो क्या हिंदू भी नही थे बल्कि जिहादी सोच रखनेवाला कट्टर मुस्लिम थे. और यह उनके अगले वाक्य से स्पष्ट होता है कि ‘नए धर्म ने उन्हें समानता का अवसर दिया और उन्हें ब्राह्मणों से बचाया.’

सवाल है यदि इस्लाम उसे इतना ही महान जान पडता था तो वे फिर खुद को कश्मीरी पंडित साबित करने के लिए क्यों मरे जा रहे थे? वे मुसलमान क्यों नही हो गये? और यदि कश्मीरी पंडितों का कश्मीर में उतना ही धाक था तो उनके पूर्वज कश्मीर छोड़कर मुगलों के तलुवे चाटने क्यों आ गए थे? फर्जी गांधियों को बताना चाहिए की जब नेहरु के पूर्वज १७१६ ईसवी में मुगलों के दरबार में नौकरी करने गये थे तब वे हिन्दू थे या मुस्लिम बन चुके थे? वे मुगलों के दरबार में हिन्दू बनकर गये और १५० वर्षों तक हिन्दू बनकर ही रहे क्या इसके कोई प्रमाण हैं?

       उपर्युक्त से स्पष्ट है कि जवाहरलाल नेहरु के दिल में हिंदुओं और हिंदू धर्म के लिए वैसे ही घृणा था जैसे एक कट्टर मुस्लिम में होता है और उसके नजर में दर-उल-इस्लाम और इस्लाम में धर्मान्तरण ही हिंदुओं के अत्याचार से मुक्ति का मार्ग था. कश्मीर दर-उल-इस्लाम के मार्ग पर अग्रसर था जबकि हिंदू धर्म की मजबूत जड़ें शेष भारत में इस मार्ग की बाधाएं थी और जिसके कारण उन्हें भारत के टुकड़े होने का खतरा दिखाई पडता था. (क्रमश:)

नेहरु के मुस्लिम होने के २५ सबूत दिए गए हैं. आगे पढ़ने केलिए निचे के लिंक पर क्लिक करें.

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3 thoughts on “नेहरु हिंदू थे या मुस्लिम: एक खोज, भाग-१

  1. दी गई जानकारियों से संतुष्टि मिलती है। तथ्यों और तर्कों पर आधारित है और बहुत ही सटीक लगता है। हां कालखण्ड के आधार पर इसे यद्यपि प्रमाणित करने में कुछ कठिनाइयां हो सकती है परंतु नेहरू जी द्वारा भी अपनी वंशावली का कोई प्रमाण नहीं दिया गया है। अस्तु आपकी समीक्षा पूर्णतया सत्य ही है, ऐसा मेरा मानना है। साधुवाद।

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