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आर्य-द्रविड़ एक ही मूल और एक ही संस्कृति के लोग है

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आर्य द्रविड़ जन

द्रविड़ संस्कृति वैदिक आर्य संस्कृति ही है. द्रविड़ और आर्य दोनों वैदिक लोग ही हैं. एसा इसलिए नहीं कह रहा हैं कि आधुनिक एतिहासिक और वैज्ञानिक शोधों से साबित हो चूका है की आर्य हजारों लाखों वर्षों से भारत के मूलनिवासी रहे हैं या डीएनए शोध से आर्यों और द्रविड़ों के एक ही मूल के होने का पता चला है. या फिर विदेशी इतिहासकार द्रविड़ों को आर्य क्षत्रिय बताते हैं या मनुस्मृति द्रविड़ों को भारत के दस क्षत्रिय वंशों में से एक बताते हैं आदि. मैं एसा इसलिए कह रहा हूँ कि हमारे वामपंथी इतिहासकार जब द्रविड़ संस्कृति का वर्णन करते हैं तो वे भी वास्तव में आर्य संस्कृति का ही वर्णन करते हैं.

खुद द्रविड़ शब्द संस्कृत का शब्द हैं तो द्रविड़ अनार्य कैसे हो सकते है? द्रविड़ का ‘द्र’ यानि ‘द्रष्टा’ और विद यानि ज्ञानी या जाननेवाला यानि ऋषि मुनि. द्रविड़ उपर्युक्त कहे अनुसार वैदिक ऋषि मुनि थे और आज उनके वंशज द्रविड़ कहलाते है. देखिये विदेशी विद्वान क्या कहते हैं, “द्रविड़ तो क्षत्रिय थे और सारे क्षत्रिय आर्य (धर्मी) थे. मनुस्मृति के १० वें अध्याय के श्लोक ४३, ४४ में वृषलों के यानि क्षत्रियों के १० कुल थे जिनमे द्रविड़ सम्मिलित थे. (पेज १५४, Matter, myth and spirit or keltic Hindu Links, लेखिका, दोरोथि चैपलिन, प्रकाशक-F.S.A. Scott Rider and co., London, 1935)

वामपंथी इतिहासकार जिस द्रविड़ संस्कृति का वर्णन करते हैं वह वैदिक संस्कृति ही है

वामपंथी इतिहासकारों ने भी इस सत्य का उल्लेख अपने किताबों में किया है पर अंग्रेजी दासता का प्रभाव और हिन्दू विरोधी नीच मानसिकता के कारन निष्कर्ष गलत देते है. देखिये वामपंथी इतिहासकार डी एन झा एंड श्रीमाली ने अपनी किताब प्राचीन भारत का इतिहास में क्या लिखा है और बताइए जो वर्णन उसने द्रविड़ संस्कृति का किया है क्या वह वैदिक आर्य संस्कृति से भिन्न है? वे लिखते हैं:

दक्षिण भारत  के इतिहास में तिन संगम का वर्णन है. इन तिन संगमों के बिच के काल को संगम काल कहते हैं. यह संगम काल १९७ पाण्ड्य राजाओं के कार्यकाल में कुल ९९९० वर्षों का था. प्रथम और तृतीय संगम की अध्यक्षता महर्षि अगस्त्य ने की थी. तमिल भाषा में संस्कृत के पर्याप्त शब्द हैं. संगम काल में ही तमिल भाषा का पूर्ण विकास हुआ.

दक्षिण भारत में वैदिक धर्म का गहरा प्रभाव था. संगम साहित्य से ज्ञात होता है की दक्षिण में वैदिक यज्ञ का प्रचलन था. राजा महाराजा तथा बड़े धनाढ्य लोग यज्ञ करते थे. वैदिक संस्कृति के प्रचलन के कारन राजदरबारों में ब्राह्मणों तथा पुरोहितों की पर्याप्त प्रतिष्ठा थी. ब्राह्मण वैदिक अध्ययन और दैनिक पूजा पाठ करते थे. उदियनजेरल के समकालीन शासक अन्दुबन का पुत्र वैदिक यज्ञ करने केलिए विख्यात था.

दक्षिण के वेळ शासकों की उत्पत्ति उत्तरी भारत के किसी ऋषि के अग्निकुंड से हुई है. वेलों का सम्बन्ध विष्णु तथा अगस्त्य से जोड़ते हैं.

पेरुन्जेरल इरम्पोरयी विद्वान तथा अनेक यज्ञ करने वाला शासक था.

तोंडईमान इलन्दिरैयन करिकाल के समय कांचीपुरम का शासक था. इसे विष्णु का वंशज बताया गया है.

पुरुनानुरु में सम्मिलित एक कविता में दक्षिण के चक्रवर्ती राजा की चर्चा है.

संगम कवियों के वर्णन से स्पष्ट है की चेर, चोल, पांड्य आदि दक्षिण के राज्यों के सामाजिक ढांचे में ब्राह्मण संस्कृति की नैतिकता तथा उच्च आदर्श स्थापित थे. उतरी तथा दक्षिणी भारत के सांस्कृतिक तत्वों का समन्वय हो चूका था.

संगमकालीन तमिल व्याकरण ग्रन्थ तोल्काप्पियम के अनुसार तमिल देश में आठ प्रकार के विवाह संस्कार (वैदिक संस्कृति) का वर्णन है. उत्तर भारत में आर्य दस्यु संघर्ष के विपरीत दक्षिण भारत में किसी प्रकार के संघर्ष के तत्व नहीं मिलते हैं. वहां वैदिक संस्कृति का स्वागत हुआ

गुलाम मानसिकता से ग्रस्त वामपंथी निष्कर्ष उल्टा देते हैं

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आउट ऑफ़ अफ्रीका सिद्धांत वास्तव में आउट ऑफ़ भारत सिद्धांत है

अगर वामपंथी भारत विरोधी जड़मुर्ख और अंग्रेजों के गुलाम नहीं होते तो उपर्युक्त अपने वर्णन में ही इन्हें स्पष्ट दिखाई देता की दक्षिण में वैदिक संस्कृति का स्वागत नहीं हुआ बल्कि दक्षिण भारतीय भी वैदिक जन ही थे. वे आगे लिखते हैं:

दक्षिण भारत से संस्कृति सम्पर्क में अगस्त्य ऋषि की महत्वपूर्ण भूमिका थी. दक्षिण में आज भी अगस्त्य ऋषि की विशेष रूप में उपासना होती है. अनेक मन्दिर अगस्त्येश्वर के नाम से प्रसिद्द हैं जिनमे शिव की मूर्तियाँ हैं. इन्हें अगस्त्य ऋषि द्वारा स्थापित माना जाता है. दक्षिण भारत में वैदिक धर्म के प्रसार में कौण्डिन्य ऋषि की भी महत्वपूर्ण भूमिका थी.

पांड्य राजवंशों के पुरोहित अगस्त्य गोत्र के ब्राह्मण होते थे. तमिल भाषा तथा व्याकरण की उत्पत्ति अगस्त्य ऋषि ने की है. दक्षिण के वेलिर जाति द्वारिकाधीश कृष्ण के वंशज माने जाते हैं. अगस्त्य ऋषि द्वारा द्वारका से अट्ठारह राजाओं के समूह, वेलिर के अठारह कुलों एवं अरुवालरों का नेतृत्व किया. इन्होने मार्ग में आने वाले वनों का नाश कर कृषि योग्य बनाया (और देवगिरी आदि में बसते गये). महाभारत तथा पुराणों में भी इस प्रकार का वर्णन मिलता है.

यह सिर्फ एक किताब से वर्णन है. अन्य किताबों में भी द्रविड़ों के ऐसे ही वर्णन है पर वामपंथी इतिहासकार निष्कर्ष उल्टा सीधा और हास्यास्पद देते हैं जो उनकी भारत विरोधी अंग्रेजों की गुलाम मानसिकता के कारन है.

द्रविड़ वैदिक ब्राह्मण और ऋषिगण को कहा जाता था

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ब्रिटेन के एन्ग्लसी द्वीप पर द्रविड़ मन्दिर के अवशेष

निष्कर्ष यह है कि दक्षिण भारत में अगस्त्य ऋषियों (अगस्त्य ऋषि एक पद था जैसे शंकराचार्य) द्वारा स्थापित गुरुकुलों में शिक्षित लोग द्रविड़ कहलाते थे और उनमे जो स्नातक होते थे वे द्रविड़ ब्राह्मण कहलाते थे. ये द्रविड़ ब्राह्मण वैदिक धर्म संस्कृति के ज्ञाता होते थे और वैदिक धर्म का प्रचार प्रसार का काम करते थे. सम्भवतः इन्ही द्रविड़ों ने समुद्र मार्ग या स्थल मार्ग से यूरोप की यात्रा कर वहां वैदिक धर्म संस्कृति का प्रचार प्रसार किया जिसे आज हम ड्रुइडस के नाम से जानते हैं.

पी एन ओक का कहना है की, “सारे विश्व में आर्यधर्म का अधीक्षण, निरिक्षण, व्यवस्थापन आदि करनेवाला वर्ग द्रविड़ कहलाता था. द्रविड़ का द्र यानि द्रष्टा और विद यानि ज्ञानी या जाननेवाला यानि ऋषि मुनि. यह द्रविड़ लोग केवल भारत में ही नहीं अपितु सारे विश्व में वही भूमिका निभाते थे. आर्य संस्कृति के रखवाले ऋषिमुनि ही यूरोप में ड्रुइड कहलाते हैं और भारत में द्रविड़. यूरोप में भी द्रविड़ थे. उन्हें ड्रुइड (Druids) कहा जाता था. अतः आर्य और द्रविड़ परस्पर पूरक संज्ञाएँ हैं.  वे समाज के पुरोहित, अध्यापक, गुरु, गणितज्ञ, वैज्ञानिक, पंचांगकर्ता, खगोल-ज्योतिषी, भविष्यवेत्ता, मन्त्रद्रष्टा, वेदपाठी आदि गुरुजन थे.”

ईसापूर्व समय में ब्रिटेन और फ़्रांस के लोगों का रहन-सहन एक जैसा था. उनके गुरुकुल होते थे और प्रतिवर्ष ब्रिटेन से द्रविड़ विद्वान धार्मिक समारम्भों में सम्मिलित होने केलिए गाल प्रान्त यानि फ़्रांस में जाया करते थे. इंग्लैण्ड में जो इटन और हैरो नाम के दो विद्यालय प्रसिद्द हैं वे इस कारन हैं की वे प्राचीन गुरुकुल-प्रथा आगे चला रहे हैं. (A complete History of Druids by Lichfield)

अमेरिकन इंस्टिट्यूट ऑफ़ वैदिक स्टडीज के संस्थापक डेविड फ्रावले लिखते हैं, “There is little in so-called Dravidian culture, ancient or modern, that does not have strong connections with so-called Aryan culture. The Aryan-Dravidian divide is largely a modern political construct. The culture of South India has been intimately woven with Sanskrit, Vedic philosophies, Vedic culture and Yoga as long as we can trace it.”   

आर्य-द्रविड़ विभेद राजनीतिक है

दरअसल ब्रिटिश सरकार ने अपनी साम्राज्यवादी सत्ता को वैध ठहराने केलिए एक फर्जी आर्य जाति का आविष्कार किया और भारतवर्ष में हजारों लाखों वर्ष से रह रहे हिन्दुओं को ही आर्य जाति बताकर विदेशी और अपने ही देश भारतवर्ष पर आक्रमणकारी घोषित कर दिया. इसी के तहत उत्तर और दक्षिण भारत के हिन्दुओं को आपस में लड़ाने केलिए फर्जी आर्य और द्रविड़ प्रजाति का सिद्धांत बनाया गया था.

अंग्रेजों का गुलाम वामपंथी पेरियार, उसके वंशज और पेरियार समर्थित DMK पार्टी भारत को आर्य और द्रविड़ के फर्जी इतिहास के आधार पर न केवल उत्तर भारत और दक्षिण भारत में बाँटने की वकालत करते है बल्कि अपनी अज्ञानतावश द्रविड़ ब्राह्मणों को वैदिक ब्राह्मण बता द्रविड़ों को ब्राह्मण और अब्राह्मण वर्ग में भी बांटते है जो उनकी मानसिक दिवालियेपन का ही सबूत है.

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