ऐतिहासिक कहानियाँ, मध्यकालीन भारत

भारत की शान परमशक्तिशाली रघुवंशी राजा बाप्पा रावल

bappa rawal
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बाप्पा रावल

एक बालक की गाय रोज दूध दुहने के समय कहीं चली जाती थी. उस बालक को अक्सर भूखा रहना पड़ता था, इसलिए एक दिन वो गाय के पीछे पीछे गया और देखा गाय एक ऋषि के आश्रम में जाकर एक शिवलिंग पर अपने दूध से अभिषेक करने लगी. बालक अचम्भित देख ही रहा था कि तभी उसने देखा उसके पीछे एक ऋषि खड़े मुस्कुरा रहे हैं. उस ऋषि का नाम था “हारीत ऋषि” और वह बालक बाप्पा रावल के नाम से विख्यात हुआ. हारीत ऋषि ने ही उस बालक को शिक्षा दीक्षा दी और उनके सहयोग से ही वह बालक मेवाड़ का सबसे प्रतापी शासक बना.

बाप्पा रावल का परिचय

गुहिल या गहलौत वंश के बप्पा रावल मेवाड़ के वास्तविक संस्थापक माने जाते हैं क्योंकि मेवाड़ ने जो शक्ति, प्रसिद्धि और सम्मान प्राप्त किया वो इन्ही की देन थी. इसी राजवंश में से सिसोदिया वंश का निकास माना जाता है, जिनमें आगे चल कर महान राजा राणा कुम्भा, राणा सांगा, महाराणा प्रताप हुए. बप्पा रावल इनका नाम नहीं बल्कि इनके प्रजासरंक्षण, देशरक्षण आदि कामों से प्रभावित होकर जनता ने इन्हें बाप्पा पदवी से विभूषित किया था. विरुदावलियों/प्रशस्तियों में इन्हें बार बार रघुवंशी कहा गया है.

इनका जन्म मेवाड़ के नागदा में हुआ था. अधिकांश इतिहासकारों का मत है इनका वास्तविक नाम कालभोज था पर कुछ इन्हें अपराजित भी मानते है. उसी तरह कुछ इतिहासकार इन्हें ब्राह्मण वंशी बताते है तो कुछ इन्हें क्षत्रिय वंशी. पर जाति के सम्बन्ध में मेरा मत है अभी १९५० से लागू जन्म आधारित जाति वाली बकबास पर ध्यान न देकर हजारों वर्ष से चली आ रही सनातन संविधान के अनुसार उन्हें क्षत्रिय मानना ही उचित है क्योंकि उनके कर्म क्षत्रियों वाले थे. और सम्भव हों तो इस बकबास को भी छोड़ दे, उनका हिन्दू होना ही पर्याप्त  है.

बप्पा रावल को रावल की उपाधि भील सरदारों ने दी थी. जब बप्पा रावल 3 वर्ष के थे तब वे और उनकी माता जी असहाय महसूस कर रहे थे, तब भील समुदाय ने उन दोनों की मदद कर सुरक्षित रखा. बप्पा रावल का बचपन भील जनजाति के बीच रहकर बीता, बाद में भील समुदाय ने अरबों के खिलाफ युद्ध में बप्पा रावल का सहयोग किया था.

सेनापति से सम्राट का सफर

बाप्पा रावल प्रारम्भ में सम्भवतः चितौड़ के मोरिय या मौर्य शासक के सेनापति थे. सिंध के अधिकृत इतिहास चचनामा में बाप्पा का विवरण मिलता है. इससे पता चलता है कि दाहिर के पुत्र जयसेन के साथ उसकी माता रानी लाड़ी देवी चितौड़ मदद मांगने आई थी. इस पर चितौड़ के मौर्य शासक ने अपने सेनापति बाप्पा रावल को सेना के साथ मदद केलिए भेजा.

पर मेवाड़ के मौर्य शासक मानमोरी या मानसिह मौर्य अरबों के विरुद्ध संघर्ष के प्रति उदासीन या असक्षम साबित हो रहा था. तब हारीत ऋषि ने उन्हें एक गुप्त खजाने की पता बताई जहाँ से करीब पन्द्रह करोड़ स्वर्ण मुद्रा निकला. उन्होंने उस खजाने से सैन्य संगठन बनाकर बाप्पा को अरबों को भारत की सीमा से बाहर खदेड़ने का आदेश दिया. बाप्पा ने इस कार्य में बाधा बन रहे मानमोरी को मारकर (या हराकर) चितौड़ दुर्ग को हस्तगत कर लिया और बारह लाख बहत्तर हजार सेनाओं का विशाल सैन्य संगठन तैयार किया.

महादेव के परमभक्त बाप्पा रावल

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एकलिंगजी मन्दिर, उदयपुर

हारीत ऋषि के आशीर्वाद से बप्पा महादेव के बहुत बड़े भक्त हुए. उनकी धर्म मे इतनी रुचि थी कि जहां भी धर्म पर आघात होता, वहीं पर बप्पा का कहर टूटता और उस जगह को पुनः सनातन में मिला कर भगवा लहराते. उन्होंने उदयपुर के उत्तर में कैलाशपुरी में एकलिंगजी महाराज का मन्दिर 734 ई. में निर्माण करवाया जो आज भी सीना तानकर खड़ा है. इसके निकट हारीत ऋषि का आश्रम है. उन्होंने आदी वराह मन्दिर  का भी निर्माण करवाया. यह मन्दिर एकलिंग जी के मन्दिर के पीछे बनवाया. पाकिस्तान के शहर रावलपिण्डी का नाम बप्पा रावल के नाम से ही रावलपिंडी पड़ा है.

अरबों का काल बाप्पा रावल

बाप्पा रावल गुर्जर-प्रतिहार शासक नागभट्ट प्रथम और चालुक्य वंशी विक्रमादित्य द्वितीय के साथ मिलकर अरबों के विरुद्ध सन्गठन बनाकर युद्ध करना प्रारम्भ किया. सम्राट नागभट्ट ने अरबों को पश्चिमी राजस्थान और मालवे से मार भगाया. बापा ने यही कार्य मेवाड़ और सिंध प्रदेश के लिए किया.

७२३ ईस्वी में अल जुनैद खलीफा का प्रतिनिधि बनकर जब भारत पर आक्रमण किया तब बाप्पा के नेतृत्व में गठबंधन सेना ने जुनैद की सेना को हराया और आगे बढ़कर आलोर को भी जीत लिया. इसके प्रमाण हमें चचनामा से मिलते हैं. पराजित जुनैद ने कश्मीर का रास्ता पकड़ा लेकिन वहां भी उसे तत्कालीन शासक ललितादित्य मुक्तापीड के हाथों मार खाकर भागना पड़ा. इस सेना ने अरब के अल हकम बिन अलावा, तामिम बिन जैद अल उतबी, अब्दुलरहमान अल मूरी की ऐसी खटिया खड़ी की कि इस्लामी शासक बप्पा रावल के नाम से भी थर थर कांपने लगे.

महापराक्रमी बाप्पा रावल

अन्हिलवाड़ के चालुक्यवंशी सम्राट विक्रमादित्य द्वितीय के सेनापति अवनिजनाश्रय पुलकेशी के साथ मिलकर बाप्पा रावल ने अरबों पर गजनी तक धावे बोले. बप्पा यहीं नहीं रुके, उन्होंने गजनी के शासक सलीम को बुरी तरह हराया और उसकी पुत्री माईया से विवाह कर जान बख्श दिया. वह अपने भतीजे को वहां की गद्दी पर बिठा आये. उन्होंने गांधार, तुरान, खुरासान और ईरान तक अपनी सत्ता का परचम लहराया और वहां भगवा राज कायम किया. उनके डर से १८ मुस्लिम शासकों ने अपनी लड़कियों का ब्याह उनसे कर दिया था.

इसके बाद तत्कालीन ब्राह्मणाबाद (कराची) को केंद्र बनाकर भारतीय शासकों ने एक शासन व्यवस्था भी बनाई. इससे यहाँ पर तलवार के बल पर इस्लाम कबूल चुके क्षत्रियों को पुनः हिन्दू बनाकर नये राजपूत वंश का गठन किया गया. इनके वंशज आज भी पाकिस्तान के सिंध प्रान्त में नजर आते हैं.

७३६ में अल-हकीम ने भारत पर हमला किया तो बाप्पा रावल ने मुस्लिम आक्रमणकारियों को इस बुरी तरह रौंद दिया कि आनेवाली ३०० वर्षों तक कोई इस्लामी आक्रमणकारी भारत पर हमले का प्रयास नहीं कर सकी. बाप्पा रावल ने भारत को खिलाफत के अंतर्गत लाने का स्वप्न देखने वाला अल-हकीम को मौत के घाट उतार दिया. इसका वर्णन भीनमाल के अभिलेख से मिलता है. इसका प्रमाण ७३९ ईस्वी के नवसारी अभिलेख से भी मिलता है की कच्छेला, सैन्धव, सौराष्ट्र, कर्कोटक, मौर्य और गुर्जर सेनाओं ने मिलकर मुस्लिम सेना को करारी मात दी.

बाप्पा रावल के द्वारा जारी सिक्के

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बाप्पा रावल के द्वारा जारी सिक्के फोटो साभार

बप्पा रावल ने अपने विशेष सिक्के जारी किए थे. इस सिक्के में बाईं ओर त्रिशूल है और उसकी दाहिनी तरफ वेदी पर शिवलिंग बना है. इसके दाहिनी ओर नंदी शिवलिंग की ओर मुख किए बैठा है. शिवलिंग और नंदी के नीचे दंडवत् करते हुए एक पुरुष की आकृति है, सिक्के पर बोप्प लिखा है. पीछे की तरफ सूर्य और छत्र के चिह्न हैं जो उनके सूर्यवंशी होने के प्रमाण हैं. इन सबके नीचे दाहिनी ओर मुख किए एक गौ खड़ी है और उसी के पास दूध पीता हुआ बछड़ा है. ये सब चिह्न बाप्पा रावल की शिवभक्ति और उनके जीवन की कुछ घटनाओं से संबद्ध हैं.

बाप्पा रावल का मूल्यांकन

कर्नल टॉड ने बाप्पा रावल के सम्बन्ध में लिखा है, “Bapp, who was the founder of a line of hundred kings, feared as a monarch, adorned as more than mortal, and according to the legend, still living, deserves to have the source of his pre-eminent fortune disclosed, which, in Mewar, it were sacrilege to doubt” (Tod, Annals, Pg. 184)

इतिहासकार सी वी वैद्य लिखते हैं, “Bappa Rawal the reputed founder of the Mewar family was the Charles Martel of India against the rock of whose velour, as we have already said, the eastern tide of Arab conquest was dashed to pieces in India. Like Shivaji, Bappa rawal was an intensely religious man and he equally hated the new invaders of India who were cow-killers” (History of Medieval Hindu, Vol-II, pg. 72-73)

इतिहासकार कविराज श्यामल दास बाप्पा की प्रशंसा करते हुए लिखते हैं कि, “इसमें संदेह नहीं की बाप्पा हिंदुस्तान का प्रतापी, पराक्रमी और तेजस्वी महाराजाधिराज हुआ, और उसने अपने पूर्वजों के प्रताप, बड़प्पन और पराक्रम को दुबारा प्रकाशित किया.”

गौरीशंकर हिराचंद ओझा लिखते हैं, “बाप्पा स्वतंत्र, प्रतापी और एक विशाल राज्य का स्वामी था. बाप्पा निसंदेह राजस्थान के महत्तम व्यक्तियों में से हैं.”

बाप्पा रावल का सन्यास

753 ई. में बप्पा रावल ने अपने पुत्र को सत्ता सौंपकर सन्यास ले लिया. इनका समाधि स्थान एकलिंगपुरी से उत्तर में एक मील दूर नागदा में स्थित है.

स्रोत:

१.            राजस्थान का इतिहास- डॉ गोपीनाथ शर्मा

२.     उदयपुर राज्य का इतिहास- डॉ गौरीशंकर हिराचंद ओझा

३.     एकलिंग महात्म्य

४.     वीर विनोद-कवि श्यामल दास आदि

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