पौराणिक काल

प्राचीन Egypt में वैदिक आर्य संस्कृति थी

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Egypt के बेबिलोनिया में नरसिंह अवतार हुआ था और बाइबिल के Genesis यानि जन्म अथवा आरम्भ XI-7 नाम के भाग में इसका उल्लेख है. एसा थॉमस मॉरिस का मानना है. उन्होंने अपने ग्रन्थ में लिखा है, “इसमें कोई संदेह नहीं की जब मानवजाति तितर-बितर हुई तब जो लोग Egypt में गए वे उस भयंकर (नरसिंह अवतार की) इतिहास की स्मृतियाँ साथ ले गए. उनका वही (नरसिंह) नाम था जो भारतीय परम्परा में है.”

वे आगे लिखते हैं, “Egypt में आधा नर और आधा सिंह ऐसी जो स्फिंक्स (Sphinx) नाम की अद्भुत प्रतिमा बनी है उसका स्रोत नरसिंह अवतार ही तो है. मैं यह पूर्ण आत्मविश्वास से कह रहा हूँ कि ईजिप्त के शिलालेखों में तथा इतिहास में नरसिंह के पूर्व तिन ईश्वरावतार मत्स्य, वराह, वामन आदि पाए गए हैं. प्रह्लाद के व्यक्तित्व और अब्राहम में बड़ी समानता है.” (Pg. 26-30, The History of Hindustan, its arts and its sciences as connected with the history of the other great empires. Writer-Thomas Maurice, Republished by Navrang, New delhi, 1974)

इतिहासकार पी एन ओक थॉमस मॉरिस से सहमती जताते हैं पर उनका मानना है कि स्फिंक्स नरसिंह का नहीं रामसिंह का प्रतीक है क्योंकि नरसिंह भगवान का सिर सिंह का और धड़ मानव का था जबकि स्फिंक्स का धड़ सिंह का और चेहरा राम (मानव) का है. वे लिखते हैं कि पाश्चात्य देशों में राम को शेरदिल यानि सिंह के सामान हृदयवाला कहते थे. इसका प्रमाण यूरोपीय देशों में प्रसिद्ध Richard the Lion-hearted की दंतकथा है जो रामायण का ही विकृत स्मृति है. Richard वस्तुतः रामचन्द्र का यूरोपीय अपभ्रंश है.

वे आगे लिखते हैं, “पूर्वकाल में यूरोपीय तथा ग्रीक इतिहासकार Egypt को AEgypt लिखते थे जो वस्तुतः अजपति जो दशरथ के पिता और राम के दादा थे का अपभ्रंश है. शेरदिल भगवान राम Egypt के राष्ट्ररक्षक देवता के रूप में प्रतिष्ठित थे. वहां के राजाओं के नाम भी राम पर आधारित रामेशस (राम+इशस) प्रथम, रामेशस द्वितीय आदि होते थे.

रामेशस द्वितीय कि मूर्ति, Karnak (कोणार्क) मन्दिर, Egypt

राम का उच्चार अफ्रीका खण्ड में ‘रहाम (आधा र)’ किया जाता था. कुछ समय पश्चात ‘र’ निकलकर केवल ‘हाम’ नाम रह गया. अफ़्रीकी पाठ्य-पुस्तकों में लिखा होता था कि अफ़्रीकी लोग कुशाईटस यानि कुश के प्रजाजन थे और कुश के पिता ‘हाम’ थे.”

Count Biornstierna लिखते हैं, “भारतीय पुराणों के कई नाम Egypt की दंतकथाओं में पहचाने जा सकते हैं. Egypt के Haye-Goptians लोगों के परमेश्वर Ammon कहलाते थे जो हिन्दुओं के ॐ ही है. ब्राह्मणों (हिन्दुओं) के शिव देवता Egypt के जिस मन्दिर में हैं उसके दर्शनार्थ सिकन्दर ने जिस नगर की यात्रा की थी उस नगर का नाम Alexandria अभी भी उसी के नाम से जुड़ा है (अर्थात Alexandria प्राचीन शिव-तीर्थस्थल था).”

वे आगे लिखते हैं, “Neibuhr, Valentia, Champollion, Waddington आदि विद्वानों के अनुसार Egypt के उत्तर प्रांतीय देवस्थान दक्षिण प्रांतीय देवस्थानों से अधिक प्राचीन हैं. उन देवस्थानों से पता चलता है भारत ही Egypt की सभ्यता का स्रोत है. Abydos और Sais के मन्दिरों में पाए गए इतिहासों का उल्लेख Josephus, Julius, Africanus और Eusebius ने किया है. वे सभी कहते हैं कि Egypt की धर्मप्रथा भारत वाली ही है.

Manetho कहते हैं कि Egypt के राजकुलों के इतिहास से हिन्दू राज परम्परा अधिक प्राचीन है. अतः धर्म तथा संस्कृति में Egypt से भी बढ़कर विश्व की प्राचीनतम परम्परा भारतीय ही है.” (Pg. 40-46, The Theogony of Hindus, Count Biornstierna)

Count Biornstierna आगे लिखते हैं, “भारत और Egypt की धर्मप्रथाओं की तुलना करने पर उनमें बड़ी समानता प्रतीत होती है. दोनों में परमात्मा एक ही कहा गया है. फिर भी अनेक देवताओं की पूजा दोनों में होती है. त्रिमूर्ति की कल्पना, आत्मा का अस्तित्व, पुनर्जन्म, समाज के चार वर्ग-ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र यह दोनों पद्धतियों के मुख्य लक्षण हैं. गंगा और नील नदी के किनारे दोनों के प्रतीक भी वही हैं.

गंगा-तट पर के मन्दिरों में जैसा शिवलिंग है वैसा Egypt के Ammon मन्दिर में भी है. Egypt के अन्य देवताओं के मस्तिष्क पर भी वही चिन्ह दिखाई देता है. सूर्य का प्रतीक कमल भारत में जैसा माना जाता है वैसा ही Egypt में भी माना जाता है. अरबी स्त्रियाँ मुसलमान बनने पर भी मातृत्व पाने की इच्छा से Ammon के मन्दिरों की परिक्रमा करते हैं.”

Amon Temple Egypt

Eusebius नाम के ग्रीक इतिहासकार ने India as seen and known by Foreigners पुस्तक में लिखा है कि सिन्धु नदी के किनारे रहनेवाले लोग Egypt के समीप इथिओपिया प्रदेश में आकर बसे. मैक्समूलर ने कहा है कि Egypt तथा ग्रीक और असीरीय लोगों की दंतकथाएँ हिन्दू पुराणों पर आधारित थी. अन्तर्राष्ट्रीय संस्था Theosophical Society के भूतपूर्व अध्यक्ष कर्नल ओल कोट ने लिखा है कि आजकल जिसे Egypt कहते हैं वहां भारत के प्रगत (प्रगतिशील, विकसित) लोग बसे और उन्होंने निजी कलाओं का प्रसार किया.

Egypt के इतिहासकार Bengsch Bey लिखते हैं, “अति प्राचीनकाल में भारत से लोग आकर Egypt में नील नदी के किनारे बसे. स्वयं ईजिप्त के लोगों में यह भावना व्याप्त है कि वे किसी अन्य अद्भुत देश से Egypt में आ बसे. वह देश हिन्द महासागर के किनारे का पवित्र पन्त देश (पंडितों का देश) था. वह उनलोगों के देवताओं का मूल देश था. वह पन्त देश भारत के अतिरिक्त अन्य कोई हो ही नहीं सकता. (Pg. 123, The Theosophist मासिक, मार्च १८८१)

Egypt के शिलालेखों से पता चलता है कि फराओ संकर्राह (राजा शंकर) ने कई प्रजाजनों को नौकाओं में बैठाकर सागर पार पन्त देश (भारत) की यात्रा पर भेजा था. वे लोग Ophir (सौवीर, सिन्धु नदी के मुहाना के पास) तट पर उतरे थे और ढाई वर्ष के पश्चात वापस लौटे. यह ईसापूर्व लगभग १८०० की घटना है. उस बेड़े में कई नौकाएँ थी. वे लोग देवताओं के उस देश (भारत) में कुछ समय रहे. राजा पुरुह से उनकी भेंट हुई. लौटते समय वे भारत से बड़ी मूल्यवान सामग्री ले आए जिसमे सोना, चांदी मोर, विविध प्रकार के रंग और चीतों की खाल थी.

उपर्युक्त शिलालेख फराओ संकर्राह की रानी ने लिखवाया था.

Egyptian Myth and Legend ग्रन्थ के पृष्ठ ३६८ पर पिरामिड का नक्शा बनानेवाले एक स्थापत्यकार का चित्र उद्धृत है. उसके शरीर पर भस्म तथा चन्दन के अष्टचिन्ह उसी प्रकार हैं जैसे संत तुलसीदास के. स्थापत्यकार का नाम देवेसर है जो संस्कृत देवेश्वर का अपभ्रंश लगता है. पिरामिड के वास्तुकार आर्य संस्कृति के लोग थे और यह वैदिक स्थापत्य पर आधारित था इस सम्बन्ध में पहले भी बहुत विदेशी लेखकों के साक्ष्य पिछले लेखों में उपलब्ध कराए गए हैं.

एडवर्ड पोकोक कहते हैं, “उत्तर भारत के सूर्यवंशी लोगों का विश्व-प्रसार उनके विशाल भवनों से पहचाना जा सकता है. मन्दिर, महल, किले आदि की मोटी दीवारें, सार्वजनिक सुविधाओं के विविध निर्माण-कार्य जो रोम, इटली, ग्रीक, पेरू, ईजिप्त, सीलोन आदि प्रदेशों में पाए जाते हैं, उनकी विशालता से बड़ा अचम्भा होता है.” (पेज-१६३, India in Greece, By E Pococke)

The Celtic Druids, Writer-Godfrey Higgins, Picadilly, 1929 ग्रन्थ की भूमिका में हिगिंस ने लिखा है, “उत्तर भारत के निवासी बौद्ध (या हिन्दू) लोग, जिन्होंने पिरमिड्स, स्टोनहेंज, कोरनोक आदि (भवन) बनाए उन्होंने ही विश्व की दंतकथाएँ (पुराण आदि) लिखी जिनका स्रोत एक ही था और जिनकी प्रणाली बड़े उच्च, सुंदर, सत्य तत्वों पर आधारित थी-उन्ही की गौरवगाथा इस ग्रन्थ में वर्णित है.

इतिहासकार पी एन ओक लिखते हैं, “Egypt में ब्रिटिश-फ़्रांस युद्ध के समय भी कृष्ण मन्दिर था.” यह भी एक प्रमाण है प्राचीन इजिप्त में वैदिक संस्कृति होने का.

हिगिंस के ग्रन्थ के पृष्ठ ४३ से ५९ पर उल्लेख है कि “भारत के नगरकोट, कश्मीर और वाराणसी नगरों में, रशिया के समरकंद नगर में बड़े विद्याकेंद्र थे जहाँ विपुल संस्कृत साहित्य था.” वैसा ही वैदिक साहित्य और धर्मकेंद्र Egypt के अलेक्जेंड्रिया, इटली के रोम और तुर्की के इस्ताम्बुल नगरों में भी था. वहां की जनता जैसे जैसे ईसाई और इस्लामी बनती गयी वहां के मन्दिर, ग्रन्थ आदि सब जला दिए गये.

Temple of Horus, Egypt
  • Egypt के देवता और वैदिक नाम
  • Isis         उषस
  • Ptah        परमपिता अर्थात परमेश्वर
  • Seb         शिव
  • Saket       शक्ति (की देवी)
  • Bes         विष्णु
  • Horus    सूर्य देवता (?)

Egypt के लोग भी भारतीय परम्परानुसार पृथ्वी को गौ रूप में भी मानते थे और शेष के माथे के आधार पर स्थित भी मानते थे. नदियों का जल पवित्र माना जाता था. वैदिक प्रथा के अनुसार Egypt के राजा अपने आपको भगवान का प्रतिनिधि मानते थे.

ग्रीक इतिहासकार हेरोडोटस का कहना है कि Egypt के राजा या तो ब्राह्मण होते थे या क्षत्रिय. वे धर्मयुद्ध करते थे. शरण आनेवालों या निःशस्त्र व्यक्ति के साथ छल करना या उसे ताड़न करना या कोई अन्य हानि पहुंचाना Egypt की राज्यप्रथा में अयोग्य माना जाता था.

Egypt के लोग वरिष्ठ लोगों का चरणस्पर्श करते थे, फलज्योतिष का अध्ययन करते थे. वे प्रदोष, अमावस्या, एकादशी, संक्रांति, महाशिवरात्रि आदि व्रत का पालन करते थे. Egypt के पुरोहित दिन में तिन बार स्नान करते थे. प्राचीन Egypt में स्त्रियों का सम्मान किया जाता था. क्षत्रियों को Egypt में खत्ती कहा जाता था. ह्ब्रू भाषा में उसी को हित्ताइत लिखते थे. मित्तनी प्रदेश के एक राजा का नाम तशरथ (दशरथ) था. हित्ताइत और मित्तानी राज्यों की सेनाओं में युद्ध होने के पश्चात् जो संधि हुई उसमें वरुण आदि वैदिक देवताओं को साक्षी कहकर संधि की शर्तें लिखी गयी है.

Count Biornstierna लिखते हैं, “हिन्दू प्रणाली की प्राचीनता की कोई बराबरी नहीं कर सकता. वहीँ (आर्यावर्त में) हमें न केवल ब्राह्मण धर्म अपितु समस्त हिन्दू प्रणाली का आरम्भ प्रतीत होगा. वहां से वह धर्म पश्चिम में इथिओपिया से इजिप्त और फिनिशिया तक बढ़ा; पूर्व में स्याम से होते हुए चीन और जापान तक फैला; दक्षिण में सीलोन और जावा सुमात्रा तक प्रसारित हुआ और उत्तर में ईरान से खाल्डइय, कोलचिस और हायपरबोरिया तक फैला. वहीं से वैदिक धर्म ग्रीस और रोम में भी उतर आया.” (पृष्ठ १६८, The Theogony of the Hindus by कौन्ट विअन्स्तिअर्ना)

Egypt का धर्म भी प्राचीन भारत का ही धर्म था. इसका प्रमाण हमें मोझेस (यहूदी लोगों का नेता) के कथन से मिलता है. मोझेस के धर्मतत्व एक ईश्वर की कल्पना पर ही आधारित थे. वेदों का तात्पर्य भी वही है. मोझेस की धर्म-प्रणाली और सृष्टि-उत्पत्ति की धारणाएँ कुछ मात्रा में उसी हिन्दू वैदिक स्रोत की दिखती है. (पृष्ठ १४४, The Theogony of the Hindus by कौन्ट विअन्स्तिअर्ना)

एडवर्ड पोकोक ने अपने ग्रन्थ के पृष्ठ १८०-१८१ पर लिखा है कि, “Egypt कि तरह रोम में भी सूर्य और चन्द्रवंशी क्षत्रिय आ बसे थे. अतः दोनों में पुरोहितों के द्वारा बड़े समारम्भपूर्वक विविध धार्मिक विधि-विधान किए जाते थे. वहां सूर्य को कुमारियाँ अर्पित कि जाती थी जिन्हें बाल्यावस्था में ही उनके कुटुंब से अलग कर कान्वेंट आश्रमों में रखा जाया करता. वहाँ उनका पालन पोषण Mama Conas (माता कन्या) करती थी. कितने आश्चर्य कि बात है कि अमेरिका के प्राचीन निवासी, रोम कि ईसापूर्व परम्परा और कैथलिक ईसाई परम्परा में कितनी गहरी समानता है.”

मुख्य स्रोत: वैदिक विश्वराष्ट्र का इतिहास, लेखक-पी एन ओक

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