आधुनिक भारत

अम्बेडकर ने क्यों कहा कम्युनिष्ट हिंसक और मजदूर, लोकतंत्र के दुश्मन होते हैं

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बाबा साहेब अम्बेडकर कम्युनिष्टों के हिंसक, राष्ट्रविरोधी, लोकतंत्र विरोधी और मजदूर विरोधी विचारों और करतूतों से समझ गये थे कि कम्युनिष्ट भारत केलिए खतरनाक साबित होंगे. कम्युनिष्टों ने मुस्लिम लीग के साथ मिलकर भारत विभाजन कर पाकिस्तान बनाया और २४% मुसलमानों केलिए ३५% भारतीय भूभाग देकर पाकिस्तान बनाने के बाबजूद उन्हें भारत में रखने का समर्थन किया जबकि अम्बेडकर इसके सख्त खिलाफ थे. इतना ही नहीं कम्युनिष्ट जोगेन्द्रनाथ मंडल ने दलित-मुस्लिम भाई भाई का नारा दिया था जिसके कारण पूर्वी एवं पश्चिमी पाकिस्तान में लाखों दलित, हिन्दू, बौद्ध वहीँ रह गये और जघन्य नरसंहार, रेप और धर्मांतरण के शिकार हुए. खुद जोगेन्द्रनाथ मंडल को भी पाकिस्तानी मुसलमानों ने लात मारकर पाकिस्तान के मंत्रीमंडल से बाहर कर दिया जिसके बाद फिर उसे भारत में ही शरण लेना पड़ा.

इन सब बातों से वे पहले ही आहत थे. इस विषय पर उन्होंने विस्तार से अपनी बात “पाकिस्तान और पार्टीशन ऑफ़ इंडिया” पुस्तक में रखी है. इन घटनाओं ने अम्बेडकर को झकझोड़ दिया और उन्हें लगा कि ये कम्युनिष्ट दलितों, मजदूरों को भविष्य में भी अपने स्वार्थ केलिए इस्तेमाल कर उन्हें खतरे में डाल सकते हैं. इसलिए उन्होंने दलितों और मजदूरों को कम्युनिष्टों से दूर रहने कि सलाह दिया जिसके कारन कम्युनिष्ट डॉ अम्बेडकर के कट्टर शत्रु बन गये. यही कारण है कि बंगाल में अपने ३०-३५ वर्षों के शासन में कम्युनिष्टों ने अम्बेडकर समर्थक एक भी दलित को मंत्रीमंडल में जगह नहीं दिया.

कम्युनिष्ट दलितों और मजदूरों के दुश्मन है

डॉ अम्बेडकर ने दलितों और मजदूरों को कम्युनिष्टों से बिलकुल दूर रहने कि चेतावनी देते हुए ४ दिसम्बर, १९४५ को नागपुर के चुनावी सभा में भाषण देते हुए कहा था, “मैं आपको कम्युनिष्टों से सावधान रहने कि चेतावनी देता हूँ. कम्युनिष्ट मजदूरों के हितों के खिलाफ काम करते हैं और मेरा विश्वास है कि कम्युनिष्ट मजदूरों के दुश्मन है.”

मसूर-सतारा जिला के बहिष्कृत जिला सम्मेलन में सितम्बर १९३७ में बोलते हुए उन्होंने कहा, “कम्युनिष्टों ने मजदूरों का हमेशा शोषण और दमन किया है. It is absolutely impossible for me to keep relations with the communists. I am an implacable enemy of the Communists.”

बाबा साहेब अम्बेडकर कि उपर्युक्त बातें कितनी सत्य थी यह हम कम्युनिष्टों के कारगुजारियों से समझ सकते हैं. कम्युनिष्टों ने बंगाल में अपनी सत्ता कायम रखने केलिए लगभग सभी उद्योग धंधे बंद करवा दिए ताकि लोग गरीब और मजदूर बने रहें और वे गरीब और मजदूर का नारा लगाकर सदैव सत्ता में बने रहें. कुछ विचारकों का तो यह भी मत है कि चीनी सामान को बढ़ावा देने केलिए कम्युनिष्ट सरकार ने चीन के इशारे पर हड़ताल, प्रदर्शन को बढ़ावा देकर जानबूझकर सारे उद्योग धंधे बंद करवा दिए ताकि भारत चीन के सामान का बड़ा बाजार बन सके.

कम्युनिष्ट हिंसक और अराजक होते हैं

वर्ष १९५६ में नेपाल के काठमांडू में आयोजित बौद्ध विश्व फेलोशिप के चौथे सम्मेलन में डॉ. अम्बेडकर ने एक निबंध प्रस्तुत किया था जिसका शीर्षक था ‘बुद्ध या कार्ल मार्क्स. डॉ. अम्बेडकर ने इस निबंध में स्पष्ट कहा, “साम्यवाद लाने के लिए कम्युनिस्ट जो जरिया अपनाएंगे…वह हिंसा और विरोधियों की हत्या है. निस्संदेह कम्युनिस्टों को तुरंत परिणाम प्राप्त हो जाते थे क्योंकि जब आप मनुष्यों के संहार का तरीका अपनाएंगे तो आपका विरोध करने के लिए लोग बचेंगे ही नहीं.”

डॉ. अम्बेडकर सवाल उठाते हैं, “अपने बहुमूल्य लक्ष्य प्राप्त करने में (साम्यवाद स्थापित करने में) अन्य लोगों के बहुमूल्य लक्ष्यों का विनाश उन्होंने नहीं किया, क्या साम्यवादी कह सकते हैं? निजी संपत्ति उन्होंने नष्ट की. अपना उद्देश्य पूरा करने में उन्होंने कितनी हत्याएं कीं? क्या मनुष्य जीवन का कोई मूल्य नहीं है? किसी के प्राण लिए बिना उसकी संपत्ति छीन लेना उसके लिए असंभव था?”

“वे (कम्युनिष्ट) जिसे सर्वहारा वर्ग की तानाशाही कहते हैं उसे हिंसा से स्थापित करते हैं. वे उन सभी लोगों के राजनीतिक अधिकार छीन लेते हैं जिनके पास संपत्ति है. उन्हें विधायिका में प्रतिनिधित्व नहीं मिल सकता. उन्हें वोट देने का अधिकार नहीं मिल सकता, उन्हें राज्य में दोयम दर्जे का नगारिक बनकर रहना पड़ता है, शासित के रूप में रहना पड़ता है और सत्ता में अधिकार नहीं मिलता.”

पूर्व राज्यसभा सांसद बलबीर पुंज लिखते हैं, “कम्युनिस्टों की पूरे विश्व में जो कार्यपद्धति है वह तथाकथित जनक्रांति के नाम पर लोकतान्त्रिक मूल्यों कि हत्या का साक्षी है. बिडम्बना यह है कि यह जनक्रांति लोकतान्त्रिक आवरण में तो छेड़ी जाती है, किन्तु शीघ्र ही उसका स्थान अधिनायकवाद ले लेता है. माओ ने सांस्कृतिक क्रांति के नाम पर स्वतंत्र विचारधारा और जनतंत्र का इसी तरह दमन किया था. अपने राजनितिक विरोधियों को खत्म करने के मामले में जहाँ स्टालिन ने हिटलर को पीछे छोड़ दिया, वहीँ माओ राजनितिक प्रतिद्वंदियों कि हत्या में इन दोनों से काफी आगे था. माओ के अनुयायी केवल केन्द्रीय सत्ता पर विश्वास रखते हैं और पार्टी कि विचारधारा व नेतृत्व का विरोध करने वालों का हिंसात्मक दमन ही उनकी नीति है. सभ्य समाज के प्रति युद्ध को वे जनयुद्ध कि संज्ञा देते हैं.” (साभार दैनिक जागरण)

कम्युनिष्ट लोकतंत्र और संविधान के दुश्मन है

डॉ अम्बेडकर ने कहा, “जब मैने उनसे पूछा, “क्या आप इस बात से सहमत है कि तानाशाही लोगों पर शासन करने की अच्छी पद्धति है? वह कहते हैं, नहीं हम तानाशाही को पसंद नहीं करते. फिर हम कहते हैं, आप इसकी इजाजत क्यों देते हैं? वह कहते हैं, लेकिन शुरूआत में तानाशाही होनी चाहिए.”

आप उनसे पूछते हैं, “यह शुरुआती अवधि कब तक चलेगी? कितनी लंबी? २० वर्ष? ४० वर्ष? ५० वर्ष..? कोई जवाब नहीं! वह सिर्फ यही कहते रहते हैं कि सर्वहारा वर्ग की तानाशाही गायब हो जाएगी. तो फिर एक सवाल है, क्या होगा जब तानाशाही खत्म हो जाएगी? इसकी जगह कौन लेगा? क्या लोगों को किसी प्रकार की सरकार की आवश्यकता नहीं होगी? उनके पास कोई जवाब नहीं होता.”

उक्त टिप्पणियां तो मात्र एक झलक भर है उस बड़े आलोचना साहित्य की जिसमें डॉ. अम्बेडकर ने विस्तार से  भारत के कम्युनिस्टों की राष्ट्र-विरोधी सोच का पर्दाफाश किया. डॉ अम्बेडकर ने कहा,

“Can communism and free democracy work together? Can they live together? Is it possible to hope that there will not be a conflict between them? The theory, at any rate, seems to me utterly absurd, for communism is like a forest fire; it goes on burning and consuming anything and everything that comes in its way. It is quite possible that countries which are far distant from the centre of communism may feel safe that the forest fire may be extinguished before it reaches them or it may be that the fire may never reach them. But what about the countries which are living in the vicinity of this forest fire? Can you expect that human habitation and this forest fire can long live together?” – Dr Ambedkar (BAWS, Vol 15, page 878).

डॉ अम्बेडकर ने २५ नवम्बर १९४९ को संविधान सभा में भाषण देते हुए कहा, “The condemnation of the Constitution largely comes from two-quarters, the Communist Party and the Socialist Party. Why do they condemn the Constitution? Is it because it is really a bad Constitution? I venture to say no’. The Communist Party want a Constitution based upon the principle of the Dictatorship of the Proletariat. They condemn the Constitution because it is based upon parliamentary democracy.

The Socialists want two things. The first thing they want is that if they come in power, the Constitution must give them the freedom to nationalize or socialize all private property without payment of compensation. The second thing that the Socialists want is that the Fundamental Rights mentioned in the Constitution must be absolute and without any limitations so that if their Party fails to come into power, they would have the unfettered freedom not merely to criticize, but also to overthrow the State.”

कम्युनिष्ट राष्ट्रविरोधी होते हैं

कम्युनिष्ट भी मुसलमानों कि तरह राष्ट्र कि अवधारणा को नहीं मानते हैं और जिसप्रकार मुसलमान इस्लाम को वैश्विक भाईचारा कि कड़ी के रूप में देखते हैं उसी प्रकार कम्युनिष्ट भी कम्युनिज्म को वैश्विक भाईचारा कि कड़ी के रूप में देखते हैं. अतः भारत के कम्युनिष्टों ने न सिर्फ १९६२ के युद्ध में चीन का समर्थन किया बल्कि वे बार बार भारत के हितों के विरुद्ध जाकर चीन और रूस का समर्थन करते हैं. यही कारण है कि वामपंथी भारत तेरे टुकड़े होंगे के नारे लगाते हैं और कश्मीर, केरल, मणिपुर, नागालैंड आदि कि भारत से आजादी कि मांग करते हैं.

भारत छोड़ो आन्दोलन के समय कम्युनिस्टों ने सोवियत संघ के आदेश पर ब्रिटिश सरकार को लिखित रूप में अपना सहयोग देना स्वीकार किया और भारत छोड़ो आन्दोलन का न सिर्फ विरोध किया बल्कि इस आन्दोलन कि धार कम करने का भरसक प्रयत्न किया था. उन्होंने १५ अगस्त १९४७ को आजादी मिल जाने के बाबजूद भारत के स्वतंत्र अस्तित्व को नकारा, भारत चीन युद्ध के दौरान भारतीय राज्यों के विरुद्ध सशस्त्र विद्रोह छेड़ा. (पूर्व राज्यसभा सांसद बलबीर पुंज, साभार दैनिक जागरण)

मेरा मानना है कम्युनिष्ट भारत कि शांति, प्रगति, सुरक्षा और अखंडता केलिए सबसे बड़ा खतरा हैं. जिस प्रकार सोवियत रूस कि जनता ने लेनिन और स्टालिन को बहुत गहरे में दफनाकर शांति, प्रगति और मजबूती प्राप्त किया भारत कि जनता को भी इन्हें जल्द से जल्द गहरे में दफन कर देना चाहिए ताकि भारत भी सोवियत संघ कि तरह विखंडित होने से बच जाये.  

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