भारत विरोधी इतिहास और इतिहासकार
ईसाई, इस्लामी और वामपंथी तीनों इतिहास के दुश्मन होते हैं. ये तीनों अपने अतीत के इतिहास को निकम्मा और गैरजरूरी बताकर नष्ट कर देते हैं. अगर भारत में घर घर में रामायण, महाभारत, वेद, पुराण आदि नहीं होते तो ये तीनों मिलकर भारत के गौरवशाली अतीत को भी नष्ट करने में सफल हो गये होते-स्वर्गीय पुरुषोत्तम नागेश ओक, महान राष्ट्रवादी इतिहासकार
विचार कीजिए…
आपने किसी देश का ऐसा इतिहास पढ़ा है जो अपने ही देश और उसके मूलनिवासियों के अतीत को कलंकित करती हो? कभी आपने सोचा है विश्व की सबसे प्राचीन और गौरवशाली सभ्यता, संस्कृति, धर्म, आध्यात्म, ज्ञान, विज्ञान और अर्थशास्त्र का वाहक “विश्व गुरु भारत” की गौरव गाथाएं मार्क्सवादी इतिहास की किताबों में कहाँ, कैसे और क्यों गुम हो जाती है? क्यों मार्क्सवादी इतिहास में भारत के गौरवशाली अतीत की गौरवगाथा की जगह अतीत की झूठी-सच्ची, खट्टी, कडवी और धुंधली तस्वीर पेश की जाती है? क्यों आपको अपने ही देश का इतिहास पढ़ने में इतनी अरुचि पैदा हो गयी है कि आप इसके अतीत में झांकना भी नहीं चाहते हैं? ऐसे और भी कई सवाल हैं जिसका उत्तर आज हम ढूंढेंगे और एकबार जब सच्चाई जान लेंगे तो आप अपने और अपने बच्चों के द्वारा पढ़े-पढाये जा रहे नेहरूवादी-मार्क्सवादी इतिहास को कूड़े के ढेर में फेंक देंगे जो इनकी सही जगह है.
भारत के इतिहास के प्रणेता जेम्स मिल का भारतियों के बारे में क्या राय था?
हमारे नेहरूवादी-वामपंथी इतिहासकार हमें यह समझाते हैं की हम भारतीयों को इतिहास लेखन का कोई ज्ञान नहीं था और भारत का इतिहास लिखने वाला प्रथम इतिहासकार होने का श्रेय उपयोगितावादी (Utilitarian) जेम्स मिल तथा भारत के इतिहास की प्रथम पुस्तक का श्रेय इनकी पुस्तक “हिस्ट्री ऑफ ब्रिटिश इंडिया” को देते हैं. जेम्स मिल ने पूरे दस वर्ष भारत पर अध्ययन किया और निष्कर्ष निकाला:
“भारतीय कुटिल, पाखंडी, धोखेबाज और मिथ्यावादी हैं, जितना कोई असभ्य से असभ्य समाज नहीं होगा. इनमे हर बात को अतिशय बढा-चढाकर पेश करने की आदत है. ये कायर और भावशून्य हैं. बेहद घमंडी और दूसरों के प्रति दम्भपूर्ण घृणा से ओतप्रोत हैं, पर अपने व्यक्तिगत जीवन में और घरों के मामले में नितांत जुगुप्सु (Disgusting) हैं.”
दरअसल इनकी पुस्तक भारत पर दस वर्षों का अध्ययन का परिणाम तो था, परन्तु कुछ निश्चित पूर्वाग्रहों से ग्रस्त और केवल गौण साक्ष्यों पर आधारित था. पूर्वाग्रह हिन्दू धर्म विरोधी कट्टर ईसायत से उत्पन्न थी और गौण साक्ष्य भारत में अंग्रेजी राज को स्थायी बनाने केलिए काम कर रहे ईसाई मिशनरियों के रिपोर्ट्स थे. भारत के इस प्रथम इतिहासकार की सबसे बड़ी विशेषता यह थी की इन्होने न तो कभी भारत का दर्शन किया था और ना ही कभी भारतीय भाषाओँ के अध्ययन करने का कष्ट किया था. कारन साफ था, इन्हें इनके मनमुताबिक सामग्री ईसाई मिशनरियों से और भारत से जाने वाले अंग्रेज साथियों से मिल जाता था.
ईसाई मिशनरियां हम भारतियों के बारे क्या राय रखती थी?
अब जिन ईसाई मिशनरियों के रिपोर्ट पर उन्होंने भारत का इतिहास लिखा था उन ईसाई मिशनरियों के भारत और भारतीयों के सम्बन्ध में क्या राय थी ये जानना भी जरूरी है. भारत में काम कर रहे ईसाई मिशनरियों के अनुसार “भारत का उद्धार हिंदू धर्म को निर्मूल करके ही सम्भव था. कारन, भारतीय सभ्यता बर्बर थी और इसका धर्म गर्हित (बीभत्स, घृणित) था. अतः ऐसी संस्कृति को सहन करना भी ईसाई भावना का खतरनाक उल्लंघन था.”
अब इनसे प्राप्त रिपोर्ट के आधार पर लिखा भारत का इतिहास और इतिहासकार भला और कैसा हो सकता था! यही कारन है कि जेम्स मिल भारतीय समाज का मूल्यांकन करते हुए लिखते हैं, “भारतीय समाज प्राचीनतम काल से जड़ और परिवर्तनहीन बना हुआ था और इसके पीछे उदंड राजाओं और ब्राह्मणों का दुहरा स्वेच्छाचार था”. इनके अनुसार भारतीय जातिगत रूप से एक लम्बे अरसे से जड़ता की स्थिति में रहने के कारन सभी प्रकार की योग्यताओं से शुन्य हो चुके हैं और इनमे अपना शासन करने तक की योग्यता का आभाव है, जो क्रमिक शिक्षा और पश्चिमीकरण के द्वारा ही आ सकती है”.
दुर्भाग्य की बात यह है कि इसके बाद भारत के विषय में पाश्चात्य विचारकों और दार्शनिकों के मन में भारत की जो छवि तैयार हुई वह मुख्यतः इसी पुस्तक पर आधारित थी. आगे के इतिहासकारों के लिए जेम्स मिल का यही इतिहास एक माडल का काम करता रहा है. पाश्चात्य इतिहासकारों की नजर में भारत का अतीत बर्बर या अर्धबर्बर से भिन्न कुछ नहीं रह गया था और वैदिक साहित्य के अनेक अधिकारी विद्वान भी इसके अपवाद नहीं थे. इसकी एक अच्छी मिसाल मैक्समूलर है, जिनके संस्कृत साहित्य के इतिहास का शीर्षक ही था, “ए हिस्ट्री ऑफ संस्कृत लिटरेचर सो फोर ईट इलस्ट्रेटस दी प्रिमिटिव रिलीजन ऑफ दी ब्रह्मनाज”. दुर्भाग्य से संस्कृत साहित्य के नाम पर हम आज भी इसी धूर्त मैक्समूलर को पढ़ने के लिए बाध्य हैं. मोटे तौर पर कहा जा सकता है की वैदिक अध्ययन में इसके बाद पाश्चात्य विद्वानों का आज तक यही रुख रहा है. (साभार: हडप्पा सभ्यता और वैदिक साहित्य, लेखक-भगवान सिंह)
ब्रिटिश सरकार ने भारत के इतिहास के साथ क्या किया?
ईसाईयत के एजेंडे को कार्यान्वित कर भारत में अपनी सम्राज्यवादी सत्ता को स्थायी बनाने केलिए ब्रिटिश सरकार ने अन्य उपायों के साथ भारत के गौरवशाली इतिहास को तोड़ मरोड़ कर विकृत और कलंकित कर दिया. भारत के धार्मिक ग्रन्थों को विकृत करने केलिए मैक्समूलर के नेतृत्व में कार्य प्रारम्भ हुआ और भारत के इतिहास को विकृत करने की जिम्मेदारी आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया (ASI) के अधिकारी अलेक्जेंडर कनिंघम को सौंपा गया. और फिर:
१. ब्रिटिश सरकार ने अपनी साम्राज्यवादी सत्ता को वैध ठहराने केलिए एक फर्जी आर्य जाति का आविष्कार किया और भारतवर्ष में हजारों लाखों वर्ष से रह रहे हिन्दुओं को ही आर्य जाति बताकर विदेशी और अपने ही देश भारतवर्ष पर आक्रमणकारी घोषित कर दिया.
२. इसी तरह भारत की तत्कालीन राजनीतिक सीमा के बाहर शासन करनेवाले भारतीय क्षत्रपों शक, कुषाण, पह्लव आदि को भी विदेशी और आक्रमणकारी घोषित कर दिया
३. बाईबल में सृष्टि निर्माण का वर्ष महज ४००४ ईसवी पूर्व दिया हुआ है. इसी बाईबल के ज्ञान से अंधे होकर यूरोप के इतिहासकार यूरोप के ईसापूर्व काल के इतिहास का कचड़ा कर रखें हैं और हजारों लाखों वर्ष के इतिहास को ४००४ वर्ष में एडजस्ट नहीं कर पाने के कारन ईसापूर्व काल के इतिहास को अंधकार युग बताकर पल्ला झाड़ चुके हैं. बाईबल के इसी चश्मे से देखने के कारन अंग्रेजों ने भारतवर्ष के हजारों लाखों वर्ष पुराणी गौरवशाली इतिहास को मिथक (mythology) बताकर झुठला दिया और भारत में भी १००० ईसापूर्व से पीछे के काल को नवपाषाण काल, पाषाणकाल और पुरापाषाण काल जैसे पगलबुद्धियों में बाँट दिया. उसी चश्मे के भीतर एडजस्टमेंट हेतु विक्रमादित्य, शालिवाहन शक जैसे कई महाप्रतापी हिन्दू सम्राटों जिनका शासन अरब के प्रायद्वीप तक विस्तृत था को मिथक बताकर भारतीय इतिहास से गायब कर दिया है. वामपंथी इतिहासकार इसी मुर्खता को अंग्रेजों का अद्भुत ज्ञान मानकर अपनी गुलाम मानसिक विकलांगता को बुद्धिजीविता समझकर आजतक झूठ फैला रहे हैं.
४. १८५७ के स्वतंत्रता संग्राम के बाद अपनाये गये फूट डालो राज करो कि नीति के तहत मुसलमानों को अपने पक्ष में करने केलिए तथा हिन्दुओं के गौरव को नष्ट कर उन्हें आत्महीन बनाने केलिए आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया (ASI) के डायरेक्टर धूर्त कनिंघम ने मुसलमानों द्वारा कब्जा किये गये सभी हिन्दू, बौद्ध, जैन भवनों, मन्दिरों, पाठशालाओं आदि को मुसलमानों का भवन, मस्जिद, मकबरा और मदरसा घोषित कर दिया इसके बाबजूद कि ब्रिटिश सरकार द्वारा नियुक्त किये गये सर्वेक्षकों ने उनमे से अधिकांश इमारतों को हिन्दुओं का भवन, मन्दिर, पाठशाला आदि होने का रिपोर्ट दिया था.
५. इसी फूट डालो राज करो कि नीति के तहत उत्तर और दक्षिण भारत के हिन्दुओं को आपस में लड़ाने केलिए फर्जी आर्य और द्रविड़ प्रजाति का सिद्धांत बनाया गया.
६. भारत पर हमला करनेवाले विदेशी मुस्लिम आक्रमणकारियों ने तो भारत के हजारों एतिहासिक इमारतों, मन्दिरों, पाठशालाओं, विश्वविद्यालयों को नष्ट करने के साथ ही हजारों अभिलेखों, शिलालेखों और लाखों लाख ज्ञान विज्ञान की पुस्तकों, एतिहासिक संस्कृत ग्रन्थों को नष्ट कर ही दिया था, बचे खुचे अभिलेखों, शिलालेखों को हिन्दुओं को विदेशी आक्रमणकारी और सिर्फ १५०० ईसवी पूर्व भारत आये थे इस झूठ को सच साबित करने केलिए ASI के डायरेक्टर धूर्त कनिंघम और उसके साथियों ने नष्ट कर दिया और कई प्राचीन शिलालेखों और अभिलेखों में हेरफेर कर दिया.
७. इतना ही नहीं, आपको जानकर आश्चर्य होगा की हिन्दुओं के भवनों, मन्दिरों, पाठशालाओं आदि को मुसलमानों का घोषित कर अपने सम्राज्यवादी हितों की पूर्ति केलिए जो हिन्दू विरोधी षड्यंत्र ब्रिटिश सरकार ASI के डायरेक्टर कनिंघम के नेतृत्व में किया था दुर्भाग्य से वह षड्यंत्र आजादी के बाद भी, चाहे कुतुबमीनार परिसर में देवी देवताओं की मूर्तियाँ निकलने की बात हो या ताजमहल परिसर में, नेहरु-इंदिरा कांग्रेस की सरकार, इनके मुस्लिम शिक्षा मंत्रियों और ASI के अधिकारियों के नेतृत्व में जारी रहा और अब तो शायद यह इनकी सामान्य दिनचर्या हो गई होगी.
८. हिन्दुओं के प्राचीन धर्म ग्रंथों, संस्कृत साहित्यों आदि का विकृत अनुवाद प्रकाशित किया.
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भारत की आजादी के बाद क्या हुआ?
शिक्षा राष्ट्र निर्माण कि कुंजी होती है और इतिहास भविष्य का दर्पण होता है जो राष्ट्र और समाज के सुखद भविष्य का निर्धारण करता है; परन्तु स्वतंत्रता प्राप्ति पश्चात भारत के शिक्षण कार्य का नेतृत्व १९४७ से १९७७ तक जवाहरलाल नेहरु और इंदिरा गाँधी के आक्रमणकारी जमात के ही पांच शिक्षा मंत्रियों के हाथ में दे दिया गया तथा भारत के इतिहास लेखन का कार्य नेहरूवादी-वामपंथी इतिहासकारों के हाथों में चला गया जो मानसिक रूप से आक्रमणकारी अंग्रेजों और मुस्लिमों के गुलाम थे. इन्होने पश्चिमी आकाओं के साम्राज्यवादी दुष्प्रचार को भारत के इतिहास का रूप देने के लिए कई कुतर्कों का सहारा लिया तथा उसे और भी विकृत कर दिया.
इनमे से सबसे प्रमुख थे डी डी कौशाम्बी जो भारत में मार्क्सवादी इतिहास के प्रणेता माने जाते हैं. इनका मानना था की “यदि हम भारत के गौरवशाली अतीत का चित्र इतिहास में उभारते हैं तो एक तरह का खतरा उत्पन्न हो सकता है. इससे हमारा विवेक कुंठित हो जायेगा और हम अतीतोन्मुख हो जायेंगे. भारत के हिंदू काल का गौरवशाली अतीत भारत के बहुजातीय और संस्कृति-बहुल समाज में प्रक्रियावाद को बढ़ावा दे सकता है जो अंग्रेजों की फूट डालो राज करो की निति को बढ़ावा दे सकता है जो खतरनाक होगा”. (हडप्पा सभ्यता और वैदिक साहित्य, भगवान सिंह)
इन विचित्र तर्कों के साथ ही कौशाम्बी ने एक नए प्रकार के इतिहास लेखन का प्रस्ताव रखा जिसमे धरा को उठाओ गगन को झुकाओ की निति अपनाई गयी. इस निति के तहत भारत और हिंदुओं के गौरवशाली इतिहास को दबा दिया गया. भारत की सभ्यता संस्कृति और धर्म से जुडी मामूली से मामूली खामियों को तिल का ताड़ बनाकर पेश किया गया जबकि आक्रमणकारियों की एकाध अच्छाईयों को भी कई पन्नों में गुणगान किया गया. इसी तरह भारत के गौरवशाली इतिहास पुरुष की गौरवगाथा को चंद लाईनों में समेट दिया गया जबकि आक्रमणकारियों के इतिहास लेखन में अध्याय के अध्याय भी कम पड़ गए. भारत के अन्य इतिहासकार इन्ही के दिखाए मार्ग का अनुसरण करते हैं या इनका भी गुरु बनने की कोशिश करते हैं.
कौशाम्बी के इतिहास लेखन की नई निति पश्चिमी इतिहासकारों का भारतीय संस्करण मात्र है, मसलन, ऋग्वैदिक समाज पशुचारी, पशुओं के लिए ही लड़ाई-झगड़ा करने वाला, समुद्र से अपरिचित, व्यापार-वाणिज्य से अनभिज्ञ, बर्बर एवं अपने ही मातृभूमि भारत पर आक्रमणकारी बताते हुए बर्बरता से सभ्यता के विकास की तलाश करते हैं और इससे पीछे के इतिहास को बट्टे खाते में डालते हुए, बौद्ध काल तक के विविध विकासों को समेटकर इतिहास को संकुचित कर देते हैं. ये एकल शब्दों की मनचाही व्याख्या करके आत्मगत निष्कर्षों को इतिहास पर आरोपित करते हैं जिसमे हिंदू इतिहास के प्रति वितृष्णा और आक्रमणकारियों के प्रति सम्मान का भाव होता है. (हडप्पा सभ्यता और वैदिक साहित्य, लेखक-भगवान सिंह)
कौसंबी के मार्क्सवादी चेले तो खुद इनके भी बाप निकले. इन मार्क्सवादी इतिहासकारों ने यहाँ तक साबित करने की कोशिश की कि मुस्लिम आक्रमणकारियों के भारत आगमन से पूर्व भारत की सामाजिक, आर्थिक, राजनितिक और धार्मिक स्थिति अत्यंत दयनीय थी और सबकुछ ठीक मुस्लिम आक्रमणकारियों द्वारा भारत पर अधिकार करने और सत्ता सम्भालने के बाद ही हुआ. ये बेशर्मी से भारत की अखंडता, अपने मातृभूमि की रक्षा, स्त्रियों का सम्मान और धर्म की रक्षा के लिए लड़ने वाले बहादुर भारतीय योद्धाओं को विलेन के रूप में चित्रित करते हैं और आततायी, हिंसक, लूटेरे और बलात्कारी आक्रमणकारियों को हीरो के रूप में चित्रित करते हैं. हरिश्चन्द्र वर्मा जैसे वामपंथी इतिहासकारों ने तो नीचता की हद ही पार कर दी है. इसने मुस्लिम आक्रमणकारियों द्वारा हिंदुओं और हिंदू मंदिरों, मठों और पाठशालाओं पर हमले और उसे नष्ट करने को आक्रमणकारियों द्वारा एकेश्वरवाद का प्रचार के रूप में व्याख्या किया है.
डी डी कौशाम्बी की शिकायत थी कि पुनरुत्थानवादी भारतीय इतिहासकार काल-क्रम का ध्यान न रखकर और आंचलिक परम्पराओं की संवर्तिता की परवाह न करके, एक घोटाला-सा पैदा कर रहे थे. पर परवर्ती काल में विकसित वर्ण-जाति व्यवस्था को पीछे ले जाकर इसे भारत पर आर्यों के कल्पित आक्रमण से जोड़कर, एक क्षत्रिय प्रधान आर्य आक्रमण की तस्वीर उभारते हुए कौशाम्बी स्वयम भी यही कर रहे थे. वे खुद साम्राज्यवादी एतिहासिक व्याख्या के शिकार थे जिसमे प्रत्येक संघर्ष में एक विदेशी आक्रमणकारी होता है और दूसरा स्थानीय. उनकी क्षत्रिय-ब्राह्मण संघर्ष की व्याख्या भी नई नहीं थी और इतिहास का उपयोग फूट डालने के लिए करने के शासकीय षड्यंत्र का जहर लिए हुई थी. वे स्वयम भी इतिहास की जड़ व्याख्या कर रहे थे जब वे हडप्पा सभ्यता को आर्येतर सिद्ध करने के लिए मामूली ब्योरों को तूल देकर इकहरे चित्र पेश कर रहे थे. (हडप्पा सभ्यता और वैदिक साहित्य-भगवान सिंह)
आधुनिक भारत का इतिहास क्या सत्य लिखा गया है?
इसी तरह आधुनिक भारत का इतिहास और स्वतंत्रता संघर्ष का इतिहास भी नेहरु, गाँधी, कांग्रेस और कम्युनिष्टों के फर्जी गुणगान से भरा हुआ है और स्वतंत्रता केलिए लड़नेवाले और सर्वस्व बलिदान देनेवाले लाखों शहीदों को दरकिनार कर दिया गया है. गुरुदत्त लिखते हैं कि स्वंत्रता संघर्ष का इतिहास लिखने केलिए जब सामग्रियों को इकठ्ठा किया गया तो गाँधी और कांग्रेस उनमे खो गये थे परन्तु आजादी केलिए सर्वस्व न्योछावर करनेवाले क्रांतिकारियों के गौरवशाली इतिहास को कूड़े में डालकर गाँधी-कांग्रेस का फर्जी गुणगान वाला इतिहास लिखा गया. नेहरु-गाँधी परिवार ने तो क्रन्तिकारी मनमंथनाथ गुप्त द्वारा लिखे “क्रांतिकारियों के वृहत इतिहास” कि किताब पर ही प्रतिबन्ध लगा दिया था जो अटल बिहारी वाजपेयी जी के सत्ता में आने के बाद ही जनता को प्राप्त हो सकी.
क्या आजादी गाँधी-कांग्रेस ने दिलाया था?
यह सफेद झूठ फैलाया गया है कि भारत को आजादी गाँधी और कांग्रेस के कारण मिली. सच्चाई तो यह है कि गाँधी-कांग्रेस के कारन ही भारत को खंडित आजादी मिली और पाकिस्तान, बांग्लादेश के लाखों करोड़ों हिन्दू, बौद्ध, सिक्ख, जैन; स्त्री, पुरुष, बच्चे, बूढ़े उस खंडित आजादी में इस्लामिक हिंसा के भेंट चढ़ गये. इतना होने के बाबजूद जिन लोगों ने हिंसा, दंगा, लूट, रेप के बदौलत भारत का विभाजन कर पाकिस्तान बनाया उन लोगों को पुनः विभाजित भारत में रखकर इन्ही गाँधी-नेहरु ने हम हिन्दुओं के जीवन में जहर घोल दिया है और हिन्दुस्थान के बर्बादी का बीज बो दिया है.
दलित, वनवासी और अछूत कौन हैं?
इसी तरह दलित, सवर्ण और छूआछूत का दुष्प्रचार भी नेहरुवादियों और वामपंथियों का फैलाया हुआ है. आपको जानकर आश्चर्य होगा कि अंग्रेजों ने जिन हिन्दू जातियों को डिप्रेस्ड क्लास कहकर अनुसूचित जातियों के लिस्ट में शामिल किया था वे क्षत्रियों, ब्राह्मणों के शोषण, उत्पीडन और छूआछूत के शिकार नहीं थे बल्कि मुस्लिम-अंग्रेज शासन के लूट, शोषण, अत्याचार और कुशासन के कारण दरिद्र बने, अपवाद को छोड़कर, क्षत्रिय, ब्राह्मण और वैश्य जाति के लोग हैं. इसी तरह अनुसूचित जनजाति वर्ग के अधिकांश लोग मुस्लिम शासकों से पराजित होकर अपने और अपने सम्बन्धियों, सहयोगियों के साथ जंगलों के भीतर छुपकर रहनेवाले क्षत्रिय, ब्राह्मण, वैश्य और शूद्र वर्ण के राजवंशी लोगों के वंशज हैं.
इससे भी आश्चर्य आपको यह जानकर होगा कि तथाकथित दलितों और अछूतों के मसीहा डॉ भीमराव रामजी अम्बेडकर जिन्हें दलित, अछूत और गरीब बताकर प्रचार किया जाता है वे न तो दलित थे, न अछूत और न ही गरीब. वे पांडुपुत्र महाबली भीम के वंशज महार(थी) क्षत्रिय थे. महार जातियां गर्व से खुद को पांडवों के वंशज बताते थे और उन्नीसवीं शताब्दी तक दावा करते थे कि उनके पूर्वज महाभारत के युद्ध में कौरवों के विरुद्ध पांडवों कि ओर से लड़े थे. डॉ अम्बेडकर के पिता ब्रिटिश सेना में सूबेदार मेजर के पद पर थे और आर्मी स्कूल में हेडमास्टर थे.
सत्य इतिहास जानकर क्या फायदा होगा?
आप कह सकते हैं चलो ठीक है फर्जी इतिहास पढ़ाया गया या पढाया जा रहा है पर सत्य इतिहास पढ़ने से भी क्या फायदे होंगे? सवाल वाजिब है. यदि इतिहस पढ़ने से फायदे ही न हो तो फर्जी इतिहास पढ़ें या सत्य क्या फर्क पड़ता है. मेरा सवाल है, अगर सत्य या फर्जी इतिहास पढ़ाने से कोई फर्क नहीं पड़ता तो रणनीति के तहत फर्जी इतिहास क्यों लिखा गया होता ताकि हिन्दू अपना सत्य इतिहास जान ही नहीं सके और जानना भी चाहे तो वे किंकर्तव्यविमूढ़ और आत्महीनता का शिकार हो जाएँ? मैं आपको बताता हूँ यदि भारत का सत्य इतिहास पढ़ाया जाता तो भारत की वर्तमान राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक स्थिति पर क्या फर्क पड़ता.
१. इतिहास भविष्य का दर्पण होता है. सत्य इतिहास एक मजबूत राष्ट्र का निर्माण करता है और फर्जी इतिहास राष्ट्र का विनाश कर देता है. कहा गया है जो समुदाय अपने इतिहास को भूल जाते हैं वे किंकर्तव्यविमूढ़ होकर भटक जाते हैं और एकदिन खत्म हो जाते हैं.
२. सत्य इतिहास की जानकारी और अनुभव के वगैर राष्ट्रहितैशी संविधान और कानून नहीं बन सकता है, सुदृढ सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था का निर्माण सम्भव नहीं है.
३. राष्ट्र की एकता, अखंडता की रक्षा केलिए सुदृढ सुरक्षा नीति और युद्धनीति का निर्माण सत्य इतिहास की जानकारी और अनुभव के वगैर सम्भव ही नहीं है.
४. अगर भारत का सत्य इतिहास पढ़ाया जाता तो पढ़ लिखकर युवा सेकुलर, वामपंथी मुर्ख बनकर “भारत तेरे टुकड़े होंगे” के नारे नहीं लगाते, देश के दुश्मनों के साथ मिलकर भारत की बर्बादी तक जंग लड़ने की बात करने की जगह भारत की महान सभ्यता, संस्कृति, धर्म और परम्परा पर गर्व करनेवाले स्वाभिमानी और राष्ट्रवादी बनते तथा अपने देश और समाज के दुश्मनों तथा षड्यंत्रकारियों की गर्दन तोड़ देते.
५. बाबा साहेब आम्बेडकर का मानना था कि मुसलमानों की भातृ भावना केवल मुसमलमानों के लिए है. कुरान गैर मुसलमानों को मित्र बनाने का विरोधी है, इसीलिए काफिर हिन्दू सिर्फ घृणा और शत्रुता के योग्य हैं. हिन्दू मुसलमान कभी एक साथ नहीं रह सकते. अगर हिन्दुओं (हिन्दू, बौद्ध, सिक्ख, जैन) को इस्लाम और मुसलमान का सत्य इतिहास बताया गया होता तो लाखों करोड़ों दलित, बौद्ध हिन्दू वामपंथी जोगेन्द्रनाथ मंडल के दलित मुस्लिम भाई-भाई के बहकावे में आकर मुसलमानों के हाथों लुटने, मरने और बलित्कृत होने केलिए पाकिस्तान, बंगलादेश में नहीं रह जाते और न ही गाँधी पर भरोसा कर सवर्ण हिन्दू ही वहां लुटने, मरने और बलित्कृत होने केलिए रहते. उन करोड़ों हिन्दुओं की मौत का कारण सत्य इतिहास की जानकारी का आभाव ही है.
६. अगर सत्य इतिहास पढ़ाया जाता तो आज दलित और बौद्ध हिन्दू फिर से दलित-मुस्लिम भाई भाई का आत्मघाती नारा नहीं लगाते? अगर उन्हें सत्य इतिहास पता होता कि इस्लामिक मुल्क पाकिस्तान में अहमदिया, मुजाहिर आदि मुसलमानों को भी काफ़िर बताकर खत्म कर दिया गया और आज शिया मुसलमानों को काफ़िर बताकर खत्म करने का नारा खुलेआम सड़कों पर लगाया जा रहा हैं तो सभी भारतीय हिन्दू हिन्दू भाई-भाई का नारा लगाते जो जरूरी है.
७. अगर सत्य इतिहास पढ़ाया जाता की अल्लाह ईश्वर को एक बताने पर आक्रमणकारी मुग़ल हिन्दुओं को जिन्दा जला दिया करते थे तो आज लोग गाँधी का राजनीतिक भजन “अल्लाह ईश्वर तेरो नाम” गाकर अज्ञानतावश इतरा नहीं रहे होते और भविष्य में अपनी मौत को दावत नहीं दे रहे होते.
८. अगर धर्मान्तरित मुस्लिम भाईयों को सत्य इतिहास पढाया जाता की उनके हिन्दू, बौद्ध, जैन, सिक्ख पूर्वजों को गुरु अर्जुनदेव की तरह गर्म तवे पर बैठाने के बाद उनपर तपती हुई रेत डालकर मारा जाता था, गुरु तेगबहादुर की तरह नृशंस हत्या की जाती थी, भाई मतिदास की तरह लकड़ी के दो पाटों में बांधकर ऊपर से नीचे आरी से चीरा जाता था, भाई सतीदास की तरह बड़े कड़ाह में खौलते तेल में डुबाकर मारा जाता था, भाई दयाला की तरह रुई में लपेटकर जलाया जाता था, गुरु गोविंद सिंह के मासूम साहिबजादों की तरह जिंदा दीवार में चुनवा दिया जाता था, बाबा बंदा बहादुर की तरह खाल नोंचते हुए दिल्ली लाने के बाद मुँह में उनके ही बच्चे का दिल ठूँस कर मारा जाता था इसलिए वे मजबूर होकर आक्रमणकारियों का मजहब अपनाने को बाध्य हो जाते थे तो आज हमारे मुस्लिम भाई अरबी तुर्की जिहादी बनकर अपनी ही मातृभूमि गौरवशाली भारतवर्ष का इस्लामीकरण करने का स्वप्न देखने की जगह हिन्दुस्थान की सुरक्षा केलिए हिन्दुओं के साथ कंधे से कंधे मिलाकर लड़ रहे होते!
अगर भारत के धर्मान्तरित मुस्लिम भाईयों को आक्रमणकारी मुसलमानों का सत्य इतिहास पढ़ाया गया होता और बताया गया होता की वे उन बेबस हिन्दुओं की सन्तान हैं जिन्हें मुस्लिम आक्रमणकारी मौत के घाट उतारकर उनकी बहन, बेटियों और पत्नियों को जेहादी पैदा करने केलिए उठा ले जाते थे. वे उन लाचार हिन्दुओं की सन्तान है जिनके पिता अपनी पत्नी, बहन, बेटियों की इज्जत बचाने के खातिर; पत्नी, बहन और बेटियां अपने पति, भाई की गर्दन बचाने की खातिर और माएं अपने बच्चों को आक्रमणकारियों के बरछे से बींधे जाने से बचाने की खातिर आक्रमणकारियों का मजहब अपनाने को मजबूर हो जाते थे तो वे आज अरबी, तुर्की जिहादी बनने की जगह हिन्दुस्तानी बनते और सम्भव था कि वे पुनः हिन्दू बनकर हिन्दुस्थान को भी मजबूत करते.
९. यदि दलितों और आदिवासियों को यह सच्चाई बताई गयी होती की वे क्षत्रिय और ब्राह्मणों के शोषण के शिकार नहीं बल्कि मुस्लिम-ईसाई (अंग्रेज) सरकारों के लूट, शोषण और अत्याचार के कारण दीन हीन अवस्था को प्राप्त खुद क्षत्रिय, ब्राह्मण और वैश्य जातियों के राजवंशी लोगों की सन्तान हैं तो आज वे धर्मांतरण कर ईसाई बनने और हिन्दुओं का विरोध करने की जगह हिन्दुओं के साथ कंधे से कंधा मिलाकर हिन्दुस्थान को मजबूत कर रहे होते.
१०. अगर डॉ भीमराव रामजी अम्बेडकर के महार(थी) जाति का गौरवशाली इतिहास, उनके द्वारा लिखित “पाकिस्तान और पार्टीशन ऑफ़ इंडिया” पुस्तक में इस्लाम की असलियत तथा “शूद्र कौन है” पुस्तक में शूद्र जातियों का क्षत्रिय इतिहास जैसी बातों से अम्बेडकरवादीयों को अवगत कराया गया होता तो वे क्षत्रिय और ब्राह्मणों को विदेशी घोषित कर अपनी अज्ञानता का परिचय नहीं दे रहे होते. सबसे बड़ी बात है बंटबारे की आधुनिक राजनीती का मुहरा बनकर भारत राष्ट्र को कमजोर करने की जगह वे भी हिन्दुओं के साथ कंधे से कंधा मिलाकर भारत की एकता, अखंडता केलिए लड़ रहे होते.
ये सिर्फ चंद उदहारण हैं. अगर आज भी समस्त भारतीय अपने इतिहास की सच्चाई से परिचित हो जाएँ तो अभी भी भारत का भविष्य उज्जवल हो सकता है.
प्रमाण और स्रोत: उपर्युक्त विवरण से सम्बन्धित आगे विभिन्न लेखों के साथ अपडेट होता रहेगा
शानदार जानदार जबरदस्त जानकारी के लिए धन्यवाद पहुचें
धन्यवाद श्रीमान!
भारत के इतिहास k नाम पर हमलोगों को जो पढ़ाया जा रहा है वो सब साम्राज्यवादी झूठ और वामपंथी मक्कारी है। भारत का सत्य इतिहास लिखने की जरूरत है।
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