गौरवशाली भारत

गौरवशाली भारत-१

Bharat Mata-1
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1.            भा-रत यानि सूर्य की दैवी आभा के ध्यान में रत रहने वाला देश. वैदिक सम्राट भरत प्रलय के पश्चात विश्व के सम्राट हुए तब से सारे विश्व का भारतवर्ष नाम पड़ा. “वर्ष” शब्द पूरी गोल पृथ्वी का निदर्शक है. आंग्ल शब्द युनिवर्ष (Universe) में भी वही संस्कृत शब्द उसी अर्थ से रूढ़ है. बारह मासों का एक वर्ष जब कहा जाता है तो वहां भी “वर्ष” शब्द गोल ऋतुचक्र का द्योतक है-पी.एन.ओक

२.     भारतियों को अरब लेखक हिन्दू कहा करते थे क्योंकि उस समय भारत निवासी सारे हिन्दू होते थे. फ्रेंच लोग भी भारतियों को हिन्दू ही कहते हैं-पी एन ओक

3.            वैदिक संस्कृति महान सिन्धुघाटी में पली बढ़ी और पुरे विश्व में फैली. इसलिए कालान्तर में भारत के वैदिक लोग खुद को गर्व से सिन्धु (सिन्धु प्रदेश के निवासी) अपभ्रंश हिन्दू कहने लगे और हिन्दुओं का मूल प्रदेश भारत हिन्दुस्थान भी कहा जाने लगा. तत्कालीन वैदिक संस्कृति के अनुयायी अरब ईरान के लोग हिन्दुओं का वैसे ही सम्मान करते थे जैसे मुसलमान आज सऊदी अरब के लोगों का करते हैं और हिन्दुस्थान की वे वैसे ही पूजा करते थे जैसे आज मुसलमान मक्का की और ईसाई रोम की करते हैं. महादेव के भक्त मोहम्मद के चाचा द्वारा भारत की गुणगान की कविता आज भी ताम्रपत्र में सुरक्षित है. परन्तु अरब (और ईरान) में वैदिक संस्कृति के विरोध में ईसायत और इस्लाम के उदय के पश्चात वैदिक संस्कृति का स्रोत हिन्दुओं और हिन्दुस्थान से वे घृणा करने लगे और कुछ लोग उनके लिए अपमानजनक शब्दों का प्रयोग करने लगे.

४.            कुछ विद्वानों का मत है की हिन्दू शब्द सिन्धु से नहीं इन्दु (चन्द्रमा) से बना है. यूरोपीय लोग हिन्दू को इन्दु ही कहते थे और हिन्दुओं के देश को इंदीय (चन्द्रमा के समान) अपभ्रंश इंडिया कहते थे. चीनी यात्री हुवेन्त्संग ने लिखा है, “भारत के कई नाम हैं. प्राचीनकाल में भारत को शितु और हिनाऊ कहते थे किन्तु उसका सही उच्चार इन्दु है. उस नाम के प्रति बड़ा आदरभाव है. उस देश का नाम इन्दु इसलिए है की उस देश के विद्वानों ने अपने शीतल, धवल ज्ञानप्रकाश से चन्द्रमा जैसे ही सारे विश्व को उजागर किया.” (हुवेन्त्संग की यात्राकथा, अनुवादक सैम्युएल बील)    

५.     सिन्धु शब्द का ही अपभ्रंश हिन्दू हुआ यह सामान्य धारणा गलत भी हो सकती है. हिन्दू शब्द इन्दु (चन्द्रमा) से भी उत्पन्न हो सकता है जैसा की ह्वेन्त्संग ने भी अपने यात्रा वृतांत में लिखा है. अलबरूनी के ग्रन्थ से भी लगता है सिन्धु और हिन्दू शब्द दो अलग उच्चार है. अलबरूनी ने लिखा है की उसके प्रदेश से “सिंध में जाने केलिए हिमरोझ उर्फ़ सिजिस्थान से होकर जाना पड़ता है किन्तु यदि हिन्द में पहुंचना हो तो काबुल होकर जाना पड़ता है.” (पृष्ठ १९८, खंड १, एडवर्ड सचाऊ द्वारा अनुदित Al Baruni’s India) 

६.     जैसे भारत हि मानव जाति की माता है उसी प्रकार संस्कृत ही विश्व की सारी भाषाओँ की जननी है. संस्कृत में ही हमारा दर्शनशास्त्र पाया जाता है, गणित का भी स्रोत वही है, ईसाईपंथ में गढ़े आदर्शों का उद्गम भी भारत ही है. स्वतंत्रता, जनशासन आदि सारी प्रथाएं भारत-मूलक होने के कारन भारत ही विविध प्रकार से मानवी सभ्यता की जननी है-The Story of Civilization, लेखक-विलियम ड्युरन्ट, अमेरिका    

७.     हिन्दू लोग ग्रीकों से कितने ही अधिक अग्रसर होने के कारन वही ग्रीकों के गुरु रहे होंगे और ग्रीक लोग हिन्दुओं के शिष्य-The Theogony of the Hindus, Writer-Count Bionstiarna    

8.            मानवी सभ्यता का आरम्भ कश्मीर में हुआ. वही स्वर्ग था. मानवता का आरम्भ पूर्ववर्ती प्रदेशों में होने के कारन Iberians और Celts जैसी पश्चिमी जातियां वहीँ से निकली होंगी-Adelung (Origin of the Aryans, Writer-Sir Issac Taylor) 

९.     विश्व में यदि एसा कोई देश है जो मानवता का पलना होने का दावा कर सकता है या आरम्भ से मानव का निवासस्थान रहा और जहाँ से प्रगति और ज्ञान की लहरें सर्वत्र पहुंचकर मानव का पुनर्ज्जीवन होता रहा, तो वह देश भारत ही हो सकता है-Cruiser, a French writer

१०.    प्राचीन सभ्यताओं में जो समानता दिखती है उसका रहस्य समझ में नहीं आता था. अब पता लगता है कि वह किसी उन्नत सभ्यता के अंग-प्रत्यंग रहे और विश्व में फैले. वह उन्नत लोग आर्य कहलाते थे और वे निश्चय ही पूर्व के प्रदेशों के थे. उन्ही का एक भाग फिनिशियंस (यानि पणि या फणि अर्थात व्यापारी) लोग सागर पारकर सर्वत्र जा बसे. (Phoenician origin of the Britons, Scots and Anglo Saxons. Writer-L.A. Waddell, पृष्ठ-१०)     

११.    संस्कृत भाषा के गुण विशेष विश्वभर की भाषाओँ में पाए जाने के कारन उन सबका प्रसार उस एक केंद्र-स्थान से हुआ होगा जहाँ मानव आरम्भ में बसता था. (विष्णु पुराण की भूमिका पृष्ठ-Cii, प्रकाशक ऑक्सफ़ोर्ड, लेखक-एच.एच. विल्सन)             

१२.    बाइबिल के पूर्वभाग (Old Testament) का इतिहास और कालक्रम के बारे में जो आधुनिकतम संशोधन हुआ है उससे हम यह कह सकते हैं की ऋग्वेद प्राचीनतम ग्रन्थ है. केवल आर्यों का ही नहीं अपितु सारे मानवों का. अतः यह निष्कर्ष अनिवार्य हो जाता है की वैदिक आर्यों के उच्च और श्रेष्ठ सिद्धांत प्रारम्भिक दैवी आविष्कार द्वारा ही ज्ञात कराए गए थे. (पृष्ठ २११, The Teaching of Vedas, Writer-Father Philips)

१३.    इब्राहीम अबू अनाजिल उर्फ़ सिन्धवाद द सेलर की जो कथाएँ प्रसिद्ध है वह प्राचीन विश्व में सिन्धप्रांत के एक प्राचीन हिन्दू वैद्य थे जिन्हें रोग चिकित्सा केलिए विश्व के अनेक देशों से निमन्त्रण आता रहता था. अतः उन्हें बार बार सागर पार यात्रा करनी पडती थी-पी एन ओक

१४.    सिन्धु (हिन्दू) का शासन और न्यायव्यवस्था बड़ी तत्पर, सरल और पूर्ण समाधान करने वाली होती थी. मदिरा और स्त्रीलम्पटता का कहीं नामोनिशान नहीं था-विशारी मुकदसी, अरब निवासी

१५.    सिन्धु (हिन्दू) लोग गणित में बड़े प्रवीण हैं. अरब लोग भारतियों से ही गणित सीखे-काजी सईद अदलसी, अरब

१६.    एक हिन्दू राजा ने बेबिलोनिया और इजरायिलों को दण्डित करने केलिए उनके ऊपर चढ़ाई की थी-याकुबी, अरबी इतिहासकार

17.          भारतियों को अरब लेखक हिन्दू कहा करते थे क्योंकि उस समय भारत निवासी सारे हिन्दू होते थे. फ्रेंच लोग भी भारतियों को हिन्दू ही कहते हैं-पी एन ओक

18.          पाश्चात्य विद्वान बाइबिल के कहे अनुसार सृष्टि का निर्माण ४००४ ईसापूर्व मानते रहे जबकि भारतीय पंचांग के अनुसार सृष्टि निर्माण काल १९७२६४८०८४ वर्ष पूर्व है. आधुनिक भौतिक शास्त्रियों का भी यही हिसाब है. कुछ भारतीय विद्वानों का मत है की सतयुग और तत्पश्चात अन्य युगों का काल क्रमशः ४८०० वर्ष, ३६०० वर्ष, २४०० वर्ष और १२०० वर्ष है परन्तु यह दैवी वर्ष है. अतः उन्हें ३६० से गुना करने से प्रत्येक युग का काल मानवी वर्ष में प्राप्त होता है-पी एन ओक

१९.    मानव की प्रारम्भिक अवस्था के सम्बन्ध में सर्वत्र पूरा अज्ञानान्धकार फैला होने के कारन भारत से ही वह पूरी जानकारी प्राप्त होने की अपेक्षा है-फ्राईडिश श्लेगल, जर्मन विद्वान

20.          अनेक इतिहासकारों के कथन से यही निष्कर्ष निकलता है की आंग्लभूमि के मूल निवासी विश्व के पूर्वी भागों से आए थे-A Complete History of the Druids by Lichfield. इससे स्पष्ट है की वे भारत से ही आंग्ल भूमि में जा बसे थे क्योंकि उतने प्राचीन काल में सभ्यता केवल भारत में ही थी-पी एन ओक

21.          अरब स्थान के मक्का नगर में स्थित काबा प्राचीन काल में वैदिक तांत्रिक ढांचे पर बना एक विशाल देवमंदिर था. वैदिक अष्टकोण के आकार का वह मन्दिर था. काबा के मन्दिर में जब किन्ही विशेष व्यक्तियों को प्रवेश कराया जाता है तो उन्हें आँखों पर पट्टी बंधकर ही अंदर छोड़ा जाता है ताकि वह अंदर शेष रही वैदिक मूर्तियों के बारे में किसी को कुछ बता न पाएं. मन्दिर में जो चौकोन है उसके बाएँ वह प्राचीन शिवलिंग दीवार में आधा चुनवाया गया है. उसकी परिक्रमा करने केलिए पुरे मन्दिर की ही परिक्रमा करनी पड़ती है. यहाँ जाने वाले सारे मोहम्मदपंथी एक दो नहीं बल्कि उसी वैदिक प्रथा के अनुसार इस शिवलिंग की सात परिक्रमा करते हैं-पी एन ओक

22.          एकं पदं गयायां तु मकायां तु द्वितीयकम I तृतीयं स्थापितं दिव्यं मुक्त्यै शुक्लस्यम सन्निधौ II अर्थात विष्णु के पवित्र पदचिन्ह विश्व के तिन प्रमुख स्थान में थे-एक भारत के गया नगर में, दूसरा मक्का नगर में और तीसरा शुक्लतिर्थ के समीप. (हरिहरेश्वर महात्म्य, प्राचीन संस्कृत ग्रन्थ)

२३.   Forum Romanum रोम नगर का प्राचीनतम स्थान है. वह प्रांगणम रामानम यानि भगवान राम का प्रांगण अर्थात राममन्दिर का स्थान था जिसे केंद्र मानकर रोम नगर बसाया गया. रोम भी राम नाम का ही यूरोपीय अपभ्रंश है-पी एन ओक

24.         प्राचीन इटली को एत्रुरिया (Etruria) उर्फ़ अत्रिरिय यानि अत्रि ऋषि का प्रदेश कहते थे. उस प्राचीन इटली की जीवन-प्रणाली का एत्रुस्कन (Etruscan) नाम भी अत्रि ऋषि से पड़ा. इटली के पूर्व तट पर अत्रि ऋषि के नाम पर ही अत्रियाटिक (Atriatic) सागर है-पी एन ओक

रेजिया नाम राजगुरु का संक्षिप्त रूप है. अत्रियम रेजिया इसलिए कहा जाता था की राजगुरु को अत्रि उपाधि प्राप्त थी और अत्रियम वेष्टे का अर्थ विष्णुभक्त अत्रि है. राजगुरु के भवन के प्राचीन रोम नगर में ऐसे वैदिक नाम थे. देव सेनापति मंगल के भाले वहां रखे जाते थे. (रोम अंई दि कैम्प्गना, लेखक आर. बर्न, पृष्ठ ४१)

25.          वेदों की आयु:

मैक्समूलर आदि पाश्चात्य विद्वान-३५०० वर्ष पूर्व

राजापुर के पाटनकर शास्त्री-२१००० वर्ष

लेले शास्त्री-४०००० वर्ष

पंडित सुधाकर द्विवेदी-५४००० वर्ष

पंडित कृष्णशास्त्री गोडबोले-७२००० वर्ष

पंडित दीनानाथ चुलेट-१५ लाख वर्ष

स्वामी दयानंद सरस्वती-लगभग दो अरब वर्ष यानि सृष्टि के प्रारम्भ से

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