गौरवशाली भारत

गौरवशाली भारत-९

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201.      ईजिप्त के इतिहासकार Bengsch Bey लिखते हैं, “अति प्राचीनकाल में भारत से लोग आकर ईजिप्त में नील नदी के किनारे बसे. स्वयं ईजिप्त के लोगों में यह भावना व्याप्त है कि वे किसी अन्य अद्भुत देश से ईजिप्त में आ बसे. वह देश हिन्द महासागर के किनारे का पवित्र पन्त देश (पंडितों का देश) था. वह उनलोगों के देवताओं का मूल देश था. वह पन्त देश भारत के अतिरिक्त अन्य कोई हो ही नहीं सकता. (Pg. 123, The Theosophist मासिक, मार्च १८८१)

२०२.  ईजिप्त के शिलालेखों से पता चलता है कि फराओ संकर्राह (राजा शंकर) ने कई प्रजाजनों को नौकाओं में बैठाकर सागर पार पन्त देश (भारत) की यात्रा पर भेजा था. वे लोग Ophir (सौवीर, सिन्धु नदी के मुहाना के पास) तट पर उतरे थे और ढाई वर्ष के पश्चात वापस लौटे. यह ईसापूर्व लगभग १८०० की घटना है. उस बेड़े में कई नौकाएँ थी. वे लोग देवताओं के उस देश (भारत) में कुछ समय रहे. राजा पुरुह से उनकी भेंट हुई.

उपर्युक्त शिलालेख फराओ संकर्राह की रानी ने लिखवाया था.

२०३.  ईजिप्त के लोग भी पृथ्वी को गौ रूप मानते थे और वैदिक परम्परा के अनुसार शेष के माथे के आधार पर स्थित भी मानते थे-पी एन ओक

204.        वैदिक प्रथा के अनुसार ईजिप्त के राजा अपने आपको भगवान का प्रतिनिधि मानते थे. ग्रीक इतिहासकार हेरोडोटस का कहना है कि ईजिप्त के राजा या तो ब्राह्मण होते थे या क्षत्रिय. वे धर्मयुद्ध करते थे. शरण आनेवालों या निःशस्त्र व्यक्ति के साथ छल करना या उसे ताडन करना या कोई अन्य हानि पहुंचाना ईजिप्त की राज्यप्रथा में अयोग्य माना जाता था. (पी एन ओक, वैदिक विश्वराष्ट्र का इतिहास, भाग-२)

205.  ईजिप्त के लोग वरिष्ठ लोगों का चरणस्पर्श करते थे, फलज्योतिष का अध्धयन करते थे. वे प्रदोष, अमावस्या, एकादशी, संक्रांति, महाशिवरात्रि आदि व्रत का पालन करते थे. ईजिप्त के पुरोहित दिन में तिन बार स्नान करते थे. प्राचीन ईजिप्त में स्त्रियों का सम्मान किया जाता था. क्षत्रियों को ईजिप्त में खत्ती कहा जाता था. ह्ब्रू भाषा में उसी को हित्ताइत लिखते थे. मित्तनी प्रदेश के एक राजा का नाम तशरथ (दशरथ) था. हित्ताइत और मित्तनी राज्यों की सेनाओं में युद्ध होने के पश्चात् जो संधि हुई उसमें वरुण आदि वैदिक देवताओं को साक्षी कहकर संधि की शर्तें लिखी गयी है.

(पी एन ओक, वैदिक विश्वराष्ट्र का इतिहास, भाग-२)

206.      सीरिया के पामीरा (Palmyra) स्थित मन्दिर के अंदर दुर्भाग्यवश तोड़-फोड़ दिखती है. धर्मान्ध मूर्ति भंजक मुसलमानों को सुंदर कलाकृतियों को छिन्न-भिन्न करने में एसा आसुरी आनंद होता था कि मानो वे अल्लाह की बड़ी सेवा कर रहे हैं. वहां का मन्दिर मस्जिद के रूप में प्रयोग किए जाने से उसकी और भी दुर्दशा हो गयी थी. वहां की नक्काशी, मूर्ति आदि पर कीचड़ का लेप चढ़ा दिया गया है. वहां के विशाल केन्द्रीय दालान में टहनियों, घास-फूस आदि से एक छत बना दी गयी है और उसके निचे पशु बांध दिए जाते हैं. (Remains of Lost Empires, Writer P.V.N. Myers, Page-34)

News18india.com के अनुसार हाल ही में ISIS के आतंकियों ने सीरिया में मन्दिरों के उन सभी अवशेषों को ध्वस्त कर दिया है जो मस्जिद के रूप में प्रयोग नहीं हो रहे थे. उनमे पामीरा के महाकाल शिव का विशाल मन्दिर भी शामिल है.

२०७.  असीरिया के धनुर्धारी कमर से आरम्भ होकर घुटनों से उपर आधे अंतर तक ही शरीर ढकते थे. एक चौड़े पट्टे से वह कमर पर कसी जाती थी. स्कोटलैंड के लोग जिस प्रकार कमर से निचे मध्य में Philibeg लटकाते है उसी प्रकार उसके कमरबंध से भी मध्य में एक पदम्-सा लटका करता. भारत का कोई भी व्यक्ति उस चित्र को देखते ही कहेगा की “अरे भाई यह हमारी धोती ही तो है”. (Indian Antiquary, खंड-१, पृष्ठ-१८१ वर्ष १८७८)

208.      इस्लाम थोपे जाने से पूर्व अरब के लोगों में हिन्दू नाम का बड़ा प्रभाव तथा सम्मान दिखाई पड़ता है. वे अपनी सुंदर और लाडली बेटियों को “हिन्दा” या “सैफी हिंदी” कहकर पुकारा करते थे. संख्या और गणित की जननी भारत होने के कारण वे उसे “हिन्दिसा” कहते थे. भारतियों के प्रति अरब लोग बड़ी श्रद्धा और आदर रखते थे-पी एन ओक

209.      सिद्दीकी के लेख में उल्लेख है कि अंकगणित, दशमलव पद्धति, बीजगणित, त्रिगुनमिति, भुमिति आदि गणित की विविध शाखाएँ अरब लोग भारतियों से ही सीखे-पी एन ओक

210.      भारतीय विद्वान फलज्योतिष और गणित में बड़े प्रवीन हैं. आयुर्वेद में भी वे बड़े कुशल है और जटिल रोगों कि अच्छी चिकित्सा करते हैं. वे कुशल मूर्तिकार और चित्रकार होते हैं. सर्वोत्तम बौद्धिक खेल शतरंज के निर्माता भारतीय लोग ही हैं. भारतियों की तलवारें बड़ी धारदार होती है और वे तलवार बड़ी सफाई से चलाते हैं. मन्त्रों से विष उतारने का कौशल्य भारतीयों में है. (रियासत ई-फ्खरुस्सौदन अल-अल बेदन, लेखक-अबु उमर जाहिझ, बसरा, अरब)

211.      चार हिंदी या संस्कृत शब्द कुरान में बार बार उल्लिखित है. वे हैं अम्बर, कस्तुरी, झंझाबिल (सोंठ या अदरख) और कपूर. बुद्ध का भी उल्लेख कुरान में फिल-किफ़े (यानि कपिलवस्तु नगर का निवासी) नाम से हुआ है-इस्लामी लेखक सुलेमान नदवी

212.      सिद्दीकी के लेख में उल्लेख है कि बगदाद नगर (जो हिन्दू वैदिक और वेदविद्या का केंद्र था) स्वयं संस्कृत नाम है. भग (उर्फ़ बग यानि ईश्वर) और दाद (यह दत्त यानि दिया हुआ इस अर्थ का संस्कृत शब्द है) का मतलब ईश्वर का दिया हुआ अर्थात भगवददत नगर है.

बगदाद नगर का निर्माण खलीफा अल मंसूर ने ७६२-६३ में भारतीय स्थपति (इंजिनियर) और नगर-निर्माताओं के सहायता से करवाया था इस बात में सच्चाई नहीं है-पी एन ओक

213.      अरब के लोगों को कुशाई (Cushites) और श्यामई (Semites) कहा जाता है. कुश राम के पुत्र थे और Cushites खुद को कुश का प्रजाजन कहते हैं. इसी प्रकार श्याम कृष्ण का नाम है और कृष्ण श्याम रंग के भी हैं. Semites श्याम कृष्ण के अनुयायी ही थे. वास्तव में इस्लाम पूर्व काल में अरब के लोग भी भगवान राम और कृष्ण के अनुयायी ही थे क्योंकि ईसाई इस्लाम से पहले पुरे विश्व में केवल वैदिक धर्म ही था-पी एन ओक

214.      कुश के कुल वाले नाम के कई वंशज निसंदेह अनादिकाल से अर्बस्थान में बसे हुए थे. कुश राम का पुत्र था. अफ्रीका और अर्बस्थान का कुश के साम्राज्य में अंतर्भाव था. (Origins, Part-3, Page-294, Writer-Sir William Drummond)

इसी ग्रन्थ के पृष्ठ ३६४ पर अर्बस्थान की एक नदी का नाम “राम” बताया गया है.

215.      Amru-Chief of one of the most ancient tribes…compelled to cede Meeca to the Ishmelites, threw the black stone and two Golden antelopes into the nearby well, Zamzam. अर्थात जब एक अतिप्राचीन टोली के मुखिया अमरु को, इशमायिलियों (मुसलमानों) को मक्का शहर सौंप देना पड़ा, तब उसने शिवलिंग और बारहसिंगों की दो स्वर्ण मूर्तियों को जमजम कुँए में फेंक दिया. (Origines, Part-3, Page-268, Writer-Sir William Drummond)

शिव को पशुपति कहे जाने के कारन काबा मन्दिर में शिव के साथ पशुओं की भी मूर्तियाँ थी-पी एन ओक

216.      प्राचीनकाल में Tsabaism (शैवइज्म अर्थात शिवपंथ) ही अरबों का धर्म था. वही Tsabaism समस्त मानवों का धर्म था…उस धर्म के तत्व उस समय के सारे ही सुबुद्धजन मानते थे. (Origins, Part-3, Page-411, Writer-Sir William Drummond)

अर्थात प्राचीन समय में वैदिक धर्म ही सभी मानवों का धर्म था.

217.      काबा के मन्दिर को विश्व का नाभि कहा जाता था. इससे हमारा अनुमान है कि जिस विष्णु भगवान की नाभि से ब्रह्मा प्रकट हुए और ब्रह्मा द्वारा सृष्टि-निर्माण हुई उन शेषशाई भगवान विष्णु की विशालकाय मूर्ति काबा के देवस्थान में बीचोबीच थी और इर्दगिर्द अन्य ३६० मन्दिरों में सैकड़ों देवी देवताओं की मूर्तियाँ थी-पी एन ओक

218.      गोरखपुर के किसी पीर के एक मुसलमान रखवाले ज्ञानदेव नाम लेकर आर्यसमाजी प्रचारक बन गये थे. ईरान के शाह के साथ वे चार-पांच बार हज कर आए थे. उनके कथन के अनुसार काबा के प्रवेश द्वार में एक Chandelier यानि कांच का भव्य द्वीपसमूह लगा है जिसके उपर भगवद्गीता के श्लोक अंकित हैं-पी एन ओक

219.      संस्कृत “ईड” का अर्थ है पूजा जैसे अग्निम इडे पुरोहितं अर्थात अग्नि को पूजा में अग्रस्थान दिया है. संस्कृत का यह ईड शब्द पूजा के अर्थ में पुरे विश्व में प्रचलित था जो मुसलमानों में ईद के नाम से सुरक्षित है. रोमन साम्राज्य में भी वर्षारम्भ की अन्नपूर्ण की पूजा को Ides of March अर्थात मार्च की पूजा कहा जाता है-पी अन ओक, वैदिक विश्वराष्ट्र का इतिहास

220.      अरबी में “बकर” का अर्थ है गाय. संस्कृत “ईड” का अर्थ है पूजा. अतः “बकर ईद” का मतलब है गौ पूजा. इस्लामिक काल के पूर्व अर्बस्थान में वैदिक संस्कृति थी इसलिए अरब के लोग भी बकर ईद उत्सव अर्थात गौ पूजा उत्सव मनाते थे परन्तु जबरन मुसलमान बना दिए जाने के कारन उनका बकर ईद उत्सव गौ पूजा से वैसे ही पथभ्रष्ट हो गया जैसे मूर्तिपूजक अरब लोग मुसलमान बनने से मूर्तिविध्वंसक बन गये. कुरान में भी बकर अर्थात गाय नाम से एक पूरा खंड है-पी एन ओक

221.      यहूदी की तरह इस्लामी परम्परा के अनुसार भी एडम (आदिम) स्वर्ग से भारत में ही उतरा. भारत में उतरते ही आदम को परमात्मा का प्रथम दिव्य संदेश भारत में ही पहुंचा. मुसलमानों की धारणा है कि आदम का ज्येष्ठ पुत्र शिथ अयोध्या में दफनाया हुआ है. सिजदा अर्थात प्रणिपात या साष्टांग प्रणाम, अहरम अर्थात हज यात्रा में सिलाई रहित शरीर ढंकने के धवल वस्त्र और तवायफ अर्थात मन्दिर की प्रदक्षिणा आदि मुसलमानों में इसलिए रूढ़ है क्योंकि इस्लाम के पूर्व अर्बस्थान में वैदिक संस्कृति ही थी. काबा मन्दिर के पुरोहित मोहम्मद के चाचा के महादेव और भारत की प्रशंसा में लिखी गयी कवितायेँ ताम्र पत्र में अभी भी सुरक्षित है ही मोहम्मद ने भी एकबार खुद कहा था, “भारत से ईश्वरीय सुगंध की वायु आती है.” (वैदिक विश्वराष्ट्र का इतिहास, लेखक-पी एन ओक)

222.      सूफी मंसूर की “अनल हक” अर्थात मैं ही सत्य हूँ घोषणा उपनिषदों की “सो अहम अस्मि” है. मंसूर का “हुलूल” यानि मानवी आत्मा परमात्मा का अंश है हिन्दू दर्शन है. वैदिक एकात्मता के सिद्धांत को अरबी में “वहदत उल वजूद” कहते हैं. आध्यात्मिक पंथ या मार्ग को “सुलूक” कहा जाता है. चार अवस्थाओं में से किसी भी अवस्था में परम सत्य का ज्ञान किया जा सकता है, ऐसी वैदिक धारणा है. वे अवस्थाएं हैं-जागृत, स्वप्न, सुप्त और तुरीय. अरबी में इन अवस्थाओं के नाम हैं-नासूत, जाबृत, मलकत और लुहुत. योग का अरबी शब्द “जिक्र” यानि शारीरिक नियमन है. प्राणायाम को कहते हैं– हब्त-ई-दम. इस्लामपूर्व काल में अर्बस्थान के लोग इन सारी वैदिक आध्यात्मिक परम्पराओं का पालन करते थे. (वैदिक विश्वराष्ट्र का इतिहास, लेखक-पी एन ओक)

223.      अफगानिस्तान में हिन्दू बड़ी संख्या में हैं. अर्बस्थान तक के प्रदेशों में और उत्तरी ईरान में भी हिन्दू बड़ी संख्या में पाए जाते हैं. ये लोग वहीँ के प्राचीन निवासियों के वंशज हैं. वे किन्हीं अन्य देशों से आकर यहाँ नहीं बसे. जब हजारों की संख्यां में स्थानीय जन मुसलमान बनाए जाने लगे तो उनमें जिन्होंने किसी भी दबाब व प्रलोभन में फंसकर इस्लाम धर्म स्वीकार नहीं किया, वे यह लोग हैं. (Memoirs of India, Writer-R.G. Wallace)

224.      प्राचीनकाल से भारत और समरकंद में लोगों का आना-जाना बड़े प्रमाण में बराबर होता रहा है. बलख और अन्य उत्तरी नगरों में अनादिकाल से हिन्दुओं की बस्तियां हैं. हिन्दुओं का यहाँ एक प्राचीन तीर्थस्थल भी है जिसका नाम ज्वालामुखी है. वह काश्यपीय  (Caspian) सागर तट पर स्थित है. (letters on India, Writer-Marie Grahams)

225.        इराक की राजधानी बगदाद के संग्रहालय में एक प्राचीन मूर्ति है. उसमे सिंह पर आरूढ़ तीन देवियाँ हैं. स्पष्टतया वे लक्ष्मी, दुर्गा और पार्वती होंगी-पी एन ओक

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