आधुनिक भारत, ऐतिहासिक कहानियाँ

जम्मू-कश्मीर १९४७ : जरा याद करो कुर्बानी

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१९४७ के भारत पाक युद्ध के दौरान जवाहरलाल नेहरु के नेतृत्ववाले सरकार से सहायता नहीं मिल पाने के कारण और नेहरु के गलत नीतियों के कारण मुस्लिम आक्रमणकारियों से हिंदू-सिक्ख जनता की जान बचाने केलिए स्वेच्छा से आत्मसमर्पण कर मौत को गले लगाने वाले भारतीय सेना के बलिदान की अनसुनी कहानियों का संग्रह, लेफ्टिनेंट जेनरल के.के. नंदा की पुस्तक “निरंतर युद्ध के साए में” के आधार पर प्रस्तुत है, जिसे हर भारतियों को पढ़ना चाहिए ताकि भारत के इतिहास के पन्नों से गायब उन शहीदों की गाथा पढ़कर आप उनकी आत्मा की शांति केलिए भगवान से प्रार्थना कर सकें.

भारत-पाकिस्तान युद्ध की पृष्ठभूमि

१९४७ में जम्मू कश्मीर राज्य कि स्थिति

जूनागढ़, हैदराबाद और जम्मू-कश्मीर की रियासतों को छोड़कर १५ अगस्त १९४७ तक भारतवर्ष की सभी रियासतें नवविभाजित भारत के डोमिनियन पाकिस्तान या भारत में शामिल हो चुके थे. ७८% मुस्लिम आबादी होने के कारण मोहम्मद अली जिन्ना कश्मीर पर अपना स्वाभाविक हक जता रहे थे जबकि जम्मू-कश्मीर के महाराज हरिसिंह पाकिस्तान में हिन्दुओं-बौद्धों-सिक्खों के भयानक नरसंहार और उनके स्त्रियों के साथ बलात्कार और निर्वस्त्रकर कराए जा रहे परेड के कारण अपने हिन्दू-बौद्ध-सिक्ख प्रजा की सुरक्षा केलिए पाकिस्तान में शामिल होने को तैयार नहीं थे.

भारत में सम्मिलित होने में भी उनकी आशंकाएं कम नहीं थी क्योंकि जवाहरलाल नेहरु शेख अब्दुल्ला के कारण महाराज से खार खाए बैठे थे, माउन्टबेटन कश्मीर को पाकिस्तान को हवाले किये जाने के १९४५ से चली आ रही ब्रिटिश लीग षड्यंत्र में शामिल थे तो गाँधी १ अगस्त को कश्मीर जाकर घोषणा कर चुके थे कि जम्मू-कश्मीर भारत में मिलेगा या पाकिस्तान में यह निर्णय यहाँ की जनता प्लेबीसाईट के आधार पर आजादी के बाद तय करेगी. ७८% मुस्लिम आबादी वाले जम्मू-कश्मीर में प्लेबीसाईट का निर्णय भारत के पक्ष में जाने की उम्मीद बिल्कुल नहीं थी. इसलिए वे अपने हिन्दू-बौद्ध-सिक्ख प्रजा की भविष्य को लेकर चिंतित थे और विलय का निर्णय नहीं ले पा रहे थे.

मोहम्मद अली जिन्ना जम्मू-कश्मीर को किसी भी कीमत पर पाकिस्तान में शामिल करने केलिए वह महाराज पर दबाब डाल रहा था. महाराज हरिसिंह से अपेक्षित प्रतिक्रिया नहीं मिलने पर पाकिस्तान ने जिगरेवाले जनजातियों को आगे कर २२ अक्टूबर, १९४७ को कश्मीर पर हमला कर दिया. इतनी बड़ी घटना की जानकारी पाकिस्तान स्थित ब्रिटिश सैन्य अधिकारी अपने समकक्ष भारत स्थित ब्रिटिश सैन्य अधिकारी को नहीं दिया या भारत के ब्रिटिश सैन्य अधिकारी ने भारतीय रक्षा मंत्रालय को इसकी सूचना नहीं दिया यह आजतक स्पष्ट नहीं हुआ है.

जम्मू-कश्मीर के मुस्लिम सैनिकों का विद्रोह

जम्मू-कश्मीर के महाराज हरिसिंह ने अपनी सेना का सन्गठन ५०-५० मुस्लिम-गैरमुस्लिम सेना के आधार पर किया था. आक्रमण से पहले अक्टूबर में सीमांत क्षेत्रों में सांप्रदायिक हलचल उत्पन्न कर दी गयी और वहाँ की मुसलमान आबादी ने पाकिस्तान की सहायता तथा प्रोत्साहन के कारण महाराजा के विरुद्ध विद्रोह कर दिया, फिर पाकिस्तान ने हमला किया.

महाराज की सेना आक्रमणकारियों से जमकर लोहा लेने केलिए लिए मैदान में उतरी ही थी कि जम्मू-कश्मीर के मुस्लिम सैनिक अपने अपने मुस्लिम कमांडर के नेतृत्व में एक एक कर महाराज हरिसिंह के विरुद्ध आक्रमणकारियों के साथ मिलने लगी जिससे जम्मू-कश्मीर के सेना की कमर टूट गयी और वह तेजी से पीछे हटने को बाध्य हो गयी. जम्मू-कश्मीर के हिन्दुओं, सिक्खों, बौद्धों का मुस्लिम आक्रमणकारियों और विद्रोही कश्मीरी सैनिकों द्वारा भयानक नरसंहार, बलात्कार, लूट और अपहरण प्रारम्भ हो गया.

ऐसी विषम परिस्थिति में जम्मू-कश्मीर के महाराज हरिसिंह ने भारत सरकार से सहायता मांगी पर जवाहरलाल नेहरु के अधीन भारत सरकार ने दो शर्त रख दिया कि महाराज पहले जम्मू-कश्मीर का भारत में विलय स्वीकार करें और भारत के समर्थकों का हत्याकर घाटी में आतंक और हिंसा फैलानेवाले जेल में बंद अपराधी शेख अब्दुल्ला को रिहा कर उसे जम्मू-कश्मीर का प्रधानमन्त्री बनायें.

२२ अक्टूबर १९४७ को लेफ्टिनेंट कर्नल नारायण सिंह ने श्रीनगर मुख्यालय को सूचित किया की डोगरा बटालियन के मुस्लिम सैनिकों के विद्रोहियों के साथ मिल जाने के कारण कश्मीर की सेना इस आक्रमण से निपटने में बिल्कुल असक्षम साबित हो रहा है और दोमेल आसानी से मुस्लिम आक्रमणकारियों के हाथों में आ गया है. उसके बाद अपने ही मुस्लिम सैनिकों द्वारा उनकी निर्मम हत्या कर दी गयी.

ब्रिगेडियर राजेंद्र सिंह, साभार न्यूज 18

महाराज हरिसिंह ने मुजफ्फराबाद में हिन्दुओं सिक्खों का नरसंहार रोकने केलिए ब्रिगेडियर राजेंद्र सिंह को सेना लेकर भेजा. उड़ी में ब्रिगेडियर राजेंद्र सिंह तथा उनके बहादुर सिपाहियों ने कमजोर स्थिति और गोला बारूद की कमी के बाबजूद आक्रमणकारियों को २४-२५ अक्टूबर तक इस उम्मीद के साथ रोके रखा की जल्द ही भारत सरकार से उन्हें सैन्य सहायता मिलेगी और बारामुला की ओर पीछे हटे परन्तु बारामुला से कुछ पहले ही ये वीर सैनिक बहादुरी से लड़ते हुए शहीद हो गए.

जम्मू-कश्मीर का भारत में विलय

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जम्मू-कश्मीर के महाराज हरिसिंह ने भारत में विलय कर दिया

उसके बाद अपने हिन्दू-सिक्ख-बौद्ध प्रजा की जान माल और अस्मत की रक्षा केलिए महाराज हरिसिंह ने २७ अक्टूबर, १९४७ को जम्मू-कश्मीर का भारत में विलय-पत्र पर हस्ताक्षर कर दिया और शेख अब्दुल्ला को रिहा कर जम्मू-कश्मीर का प्रधानमन्त्री नियुक्त कर दिया. उसके बाद सरदार पटेल के दबाव में नेहरु सरकार ने उसी दिन पाकिस्तानी आक्रमणकारियों के विरुद्ध सैन्य सहायता भेजी.

२७ अक्टूबर को लेफ्टिनेंट कर्नल डी आर राय अपनी बटालियन लेकर बारामुला में मोर्चा सम्भाला. वे श्रीनगर को आक्रमणकारियों से बचाने के क्रम में गोली लगने से शहीद हो गए. संसद में उनके शौर्य और वीरता का गुणगान हुआ और उन्हें महावीर चक्र से सम्मानित किया गया.

बारामुला

मुस्लिम आक्रमणकारी २६ अक्टूबर को लूटमार और बलात्कार करते हुए बारामुला के समृद्ध शहर में प्रवेश किया. हिंदुओं और सिक्खों को ढूंड-ढूंडकर मारा गया और उनके घरों को लूटकर जला दिए गए. पेशावर और रावलपिंडी की गलियों में बेचने के लिए युवतियों का अपहरण किया गया. हिंदुओं सिक्खों को अपना भाई कहने वाला मुसलमान मकबूल शेरवानी की एक सार्वजानिक चौक पर हत्या कर दी गयी. बारामुला में मिशनरी अस्पताल चलाने वाला अंग्रेज कर्नल डायिक्स तथा उसके सहायकों की भी गोली मारकर हत्या कर दी गयी.

यहाँ के निवासी हिंदू, सिक्ख, मुसलमान सभी अपनी सम्पत्ति छोडकर पहाड़ों की ओर भाग गए. कई युवतियों और धन पाकर आक्रमणकारी अपने सौभाग्य पर प्रसन्न थे. कुछ पठानों का जेहाद बारामुला की सुंदर युवतियों के भोग एवं उनके अपने लालच में उलझकर रह गया. वे कुछ दिन वहीं रुके फिर धन और युवतियों को लूटकर घर वापस लौट गए.

गिलगित

ब्रिगेडियर गनसारा सिंह जामवाल सबसे आगे

१५ अगस्त, १९४७ से पूर्व गिलगित महाराज से एक समझौते के तहत ब्रिटिश सरकार के अधीन था. १५ अगस्त के बाद यह वापस महाराज के नियंत्रण में आ गया. महाराजा ने ब्रिगेडियर गनसारा सिंह को राज्यपाल नियुक्त कर गिलगित भेजा. ब्रिगेडियर गनसारा सिंह ने वहाँ पहुंचकर देखा की गिलगित स्काउट्स ने पहले ही मेजर ब्राउन की कमान में प्रशासन सम्भाल लिया था. सौ प्रतिशत मुस्लिम सैनिकवाले गिलगित स्काउट्स ने पाकिस्तान के पक्ष में विद्रोह कर दिया और १ नवम्बर को ब्रिगेडियर गनसारा सिंह को चेतावनी दी गयी की वह हथियार डाल दे, अन्यथा गिलगित के सारे हिंदू सिक्ख मार दिए जायेंगे.

१००% मुसलमान वाला गिलगिल स्काउट्स जिन्होंने पाकिस्तान के समर्थन में विद्रोह कर दिया

पाकिस्तानी आक्रमणकारियों से लड़ने आये ब्रिगेडियर गनसारा सिंह और उनके हिन्दू सिक्ख सैनिक अपने ही राज्य के मुस्लिम सैनिकों से घिर गये थे. आरम्भ में तो ब्रिगेडियर ने विरोध किया, परन्तु मुसलमानों द्वारा हिंदू सिक्ख जनता की लगातार निर्मम हत्या और बलात्कार रोकने केलिए अंततः सैनिकों सहित आत्मसमर्पण कर दिया, इस उम्मीद में कि इसके उपरांत वे हिन्दू-सिक्ख जनता का कत्ल और बलात्कार नहीं करेंगे.

परन्तु ऐसा नहीं हुआ, हिंदू सिक्ख जनता की रक्षा केलिए आत्म समर्पण करने वाले सैनिकों को बंदी बना लिया गया और फिर सारे सिक्ख और सैनिक मार डाले गए. जो आरम्भ में बच निकलने में सफल हो गए, उन्हें भी एक एक करके पकड़ लिया गया और मार डाला गया. तब से गिलगित पाकिस्तान के कब्जे में है.

स्कार्दू

मेजर शेरजंग थापा

गिलगित विद्रोह के समय जम्मू-कश्मीर सेना के १०० मुसलमान सैनिकों ने कप्तान नेक आलम के नेतृत्व में स्कार्दू को अपने कब्जे में ले रखा था. मेजर शेरजंग थापा वहाँ १०० सैनिकों के साथ ३ नवम्बर को स्कार्दू की रक्षा केलिए पहुंचे. ९-१० फरवरी की रात लगभग ६०० मुस्लिम आक्रमणकारियों ने सीमा की दो चौकियों पर आक्रमण कर दिया. तब यहाँ भी कप्तान नेक आलम अपने सैनिकों सहित आक्रमणकारियों से मिल गया और दूसरी चौकी नष्ट करने में मुस्लिम आक्रमणकारियों की सहायता की. इस विषम परिस्थिति में ७०-७० सैनिकों की सिर्फ दो टुकडियां ही सहायता के लिए आ सकी. इतने से ही मेजर थापा अदम्य साहस के साथ आक्रमणकारियों से लोहा लेते रहे.

जब जनरल थिमैय्या ने मई १९४८ में सैन्य दल को पीछे हटने का निर्देश दिया तो थापा ने निवेदन किया की वह अपने पीछे हजारों शरणार्थियों को आक्रमणकारियों द्वारा मारे जाने के लिए नहीं छोड़ सकता. इसलिए उसे वहीं रुकने की अनुमति दी जाये.

१७ जून को आक्रमणकारियों ने युद्ध विराम के लिए एक संदेशवाहक स्कार्दू भेजा. संदेश में कहा गया यदि रक्षक सेना आत्मसमर्पण कर दे तो उसके साथ अच्छा व्यावहार किया जायेगा. थापा ने प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया. १२ अगस्त की संध्या को आक्रमणकारियों ने पहले गोलाबारी की फिर जोरदार हमला बोल दिया. थापा के सिपाही बहादुरी से लड़े और उन्हें पीछे धकेल दिया. यह घेराव छः महीने तिन दिनों तक चला. बार बार सहायता मांगे जाने के बाबजूद नेहरु सरकार की ओर से कोई सहायता नहीं भेजा गया.

सब गोला बारूद समाप्त हो जाने पर मेजर थापा ने अपने आदमियों से चुपके से छोटे-छोटे दलों में किले से निकलकर मुख्य अड्डे तक पहुँच जाने को कहा. स्वयम एक जेसीओ और ३५ सिपाहियों के साथ वहीं रुके रहे. अंततः कोई और उपाय न देखकर उन्होंने १४ अगस्त, १९४८ को आत्मसमपर्ण कर दिया. थापा को बंदी बना लिया गया, परन्तु सभी सैनिकों और शरणार्थियों की नृशंसता पूर्वक हत्या कर दी गयी. महिलाओं को इससे भी बदतर हालात के लिए जीवित रखा गया.

अन्य ऐतिहासिक स्रोतों से पता चलता है कि स्कार्दू में करीबन ४० हजार हिन्दू सिक्ख आक्रमणकारियों के कब्जे में थे. भारतीय सेना के आत्मसमर्पण के बाद १४ अगस्त, १९४८ को पाकिस्तान से आदेश आया की शरिया कानून के तहत सभी हिंदू-सिक्ख पुरुषों का कत्ल कर दिया जाये और उनकी स्त्रियों को शरिया कानून के तहत सैनिकों में बाँट दिया जाये.

द्राक्ष और कारगिल

इन्ही आक्रमणकारियों ने आगे बढ़कर कारगिल और द्राक्ष पर अधिकार कर लिया. द्राक्ष में भारतीय रक्षक सेना तो चार सप्ताह तक बिना राहत की आशा के ही डटी रहकर मोर्चा लेती रही परन्तु (नेहरु सरकार से) कोई सहायता नहीं मिल पाने के कारण अंतत उनमे से अधिकांश आक्रमणकारियों द्वारा बंदी बनाकर मार डाले गए.

जम्मू

आक्रमणकारी अक्टूबर के तीसरे सप्ताह में जलाओ, मारो, अपहरण करो तथा नष्ट करो के नारों के साथ जम्मू-झंगर मार्ग के पश्चिम में खूब विनाश किया. कश्मीर के कई और सीमांत गावों में धावे बोले गए; परन्तु प्रारम्भ में वे केवल लूटमार, पशु चुराने तथा औरतों के अपहरण में ही मस्त रहे. फिर भी वे राज्य का काफी क्षेत्र हथियाने और राज्य की रक्षक सेनाओं की राजौरी, झंगर, नौशेरा मीरपुर तथा भिंबर में घेराबंदी करने में सफल हो गए. जान और अस्मत बचाने में सफल रहे इन गावों के हिंदू सिक्ख रक्षक सेना के संरक्षण में शरणार्थी बन गए.

नेहरु सरकार का सेना के साथ विश्वासघात?

संचार व्यवस्था की रक्षा का दायित्व २६८ इन्फेंट्री ब्रिगेड पर था. ब्रिगेडियर परांजपे ने गति पकड़ी तथा १६ नवम्बर को बेरिपत्ता पर कब्जा कर लिया और १८ को नौशेरा पर. १९ नवम्बर को झंगर भी जीत लिया और २६ नवम्बर को कोटली पर भी अधिकार कर लिया. परन्तु पता नहीं क्यों उनके विजय अभियान के मध्य ही उनका स्थानान्तरण कर दिया गया जिसके कारण न केवल अभियान धीमी पड़ गयी बल्कि दुस्साहस की हद तक वीरता और आक्रमणकारियों को नुकसान पहुँचाने के बाबजूद झंगर फिर से आक्रमणकारियों के हाथ में चला गया जिसे वापस प्राप्त करने केलिए पुनः लम्बी लड़ाई लडनी पड़ी और उसे फिर महीनों बाद १७, मार्च १९४८ को वापस प्राप्त किया जा सका.

राजौरी

भिंबर तो २८ अक्टूबर को आक्रमणकारियों के हाथों में चला गया था, ३ नवम्बर को मेंधर और १० नवम्बर, १९४७ को बाग भी हाथ से चला गया. फिर राजौरी पर आक्रमणकारियों ने हमला कर ३०००० (official data) हिंदू-सिक्खों का कत्ल कर दिया और उनके स्त्रियों का अपहरण किया या बलात्कार के शिकार हुए.

झंगर प्राप्त करने में असफल आक्रमणकारी राजौरी तथा उसके आसपास के क्षत्रों में भयानक अत्याचार आरम्भ कर दिया. भारतीय सेना राजौरी के तरफ कूच करते हुए चिंगस पहुंची तो उसे आग की लपटों में घिरा पाया. भागता हुआ शत्रु सर्वक्षार नीति अर्थात लूट सके सो लूट लो बाकी सबकुछ नष्ट कर दो का पालन कर रहे थे. शत्रु के अत्याचारों के परिणामस्वरूप राजौरी में बड़े-बड़े गड्ढों में शव पाए गए. स्पष्ट था की आक्रमणकारियों ने शहर छोडने के पहले भयंकर जनसंहार किया था.

एक पत्रकार ने लिखा था, ”मनुष्यों और जानवरों के मृत शरीर कुत्तों और गिद्धों से घिरे दिखाई देते हैं. शहर आधा जला हुआ है और वहाँ एक भयानक सन्नाटा है; क्योंकि जनसंहार से बच निकलनेवाले लोग पहाड़ों की ओर भाग गए हैं. राजौरी मर रहे तथा मरे हुए लोगों का शहर है.”

बडगाम

फोटो साभार गूगल सर्च

चूँकि भारत से सेना और रशद के आगमन का माध्यम हवाई जहाज ही था इसलिए बडगाम वायुक्षेत्र की सुरक्षा केलिए मेजर सोमनाथ शर्मा के नेतृत्व में कुमायूं बटालियन को लगा दिया गया. शीघ्र ही उनपर पश्चिम से तोपों से आक्रमण हो गया. आक्रमणकारी मेजर शर्मा के कम्पनी पर भारी पड़े. उनको अग्रिम पलटन का स्थान तो छोडना पड़ा, परन्तु, तीसरी पलटन के साथ वे अंत तक डटे रहे. वायरलेस पर सेना मुख्यालय को उनका अंतिम संदेश था-“शत्रु हमसे केवल ५० गज की दुरी पर है. हम संख्या में उनसे बहुत कम हैं. मैं एक इंच भी पीछे नहीं हटूंगा और जबतक एक भी सैनिक है, मैं लड़ता रहूँगा.”

शीघ्र ही शत्रु की तोप के गोले ने उनके जीवन का अंत कर दिया, परन्तु तबतक वे बहुत कम सहयोगियों और संसाधनों से ही शत्रु को भारी क्षति पहुँचाने और उसके सैनिकों को हताहत करने में सफल रहे थे. (नेहरु सरकार ने इन्हें सैन्य सहायता तो नहीं भेजी पर) भारत सरकार ने इन्हें मरणोपरांत परमवीरचक्र से सम्मानित किया.

नेहरु सरकार का सेना के साथ एक और विश्वासघात?

ब्रिगेडियर एल पी सेन

इधर ब्रिगेडियर सेन ने शालातैंग की लड़ाई में ५०० पाकिस्तानी सैनिकों को मारकर बुरी तरह पराजित किया और श्रीनगर बचा लिया. फिर वे ८ नवम्बर को बारामुला पहुंचे. आक्रमणकारी हताश होकर भाग रहे थे. १३ नवम्बर को उन्होंने उड़ी पर भी विजय प्राप्त कर ली. इस बिंदु पर आकर ब्रिगेड के कमांडर ने और सेना की मांग की ताकि इसका लाभ उठाते हुए आगे बढ़ें और मुजफ्फराबाद तथा दोमेल को भी अधिकार में कर ले.

सेना के कमांडर जनरल रसेल का भी यही मत था, परन्तु नेहरु सरकार ने इसकी अनुमति नहीं दी. यह एक भारी भूल थी. आक्रमणकारियों को कश्मीर घाटी से भगाकर घाटी को उनसे मुक्त करने का सुनहला अवसर हाथ से चला गया. इतना ही नहीं जनरल कुलवंत सिंह ने पता नहीं क्यों एक बटालियन और वापस बुला लिया, जबकि वहाँ सफलता पक्की करने के लिए और सेना की आवश्यकता थी.

ब्रिगेडियर सेन का यह अनुमान सही था कि वे उड़ी की रक्षा व्यवस्था तथा संचार मार्ग में गडबडी फैलायेंगे और कमजोर सुरक्षा वाले स्थानों पर अधिकार पाने का प्रयास करेंगे परन्तु उनकी आशंकाओं को नेहरु सरकार में काल्पनिक माना गया. इसका परिणाम घातक हुआ. आक्रमणकारियों ने तैयारी कर घात लगाकर हमला किया. ब्रिगेडियर सेन को भारी जान माल के नुकसान के साथ पीछे हटना पड़ा. उड़ी तो किसी प्रकार सुरक्षित हो गया परन्तु पुंछ को मुक्त कराने में विफल रहे. इसका घातक प्रभाव सेना के मनोबल पर भी पड़ा. १६१ इन्फेंट्री ब्रिगेड बहुत घबरा गयी थी. आक्रामक ब्रिगेडियर सेन की सेना डिफेंसिव और प्रभावहीन होने को बाध्य हो गयी.

गुरुदत्त

गुरुदत्त ने १९४७ के भारत-पाकिस्तान युद्ध पर लिखी अपनी पुस्तक “युद्ध और शांति” में नेहरु की इसी अक्षम्य भूल जिसके कारण जीतने के करीब पहुंचकर भी कश्मीर का एक बड़ा हिस्सा पाकिस्तान के हवाले करना पड़ा पर कटाक्ष करते हुए लिखा था की जिन राजनीतिज्ञों को युद्धनीति का क ख ग भी पता नहीं हो वे सैनिकों को डिक्टेट कर राष्ट्र की सुरक्षा पर कुठाराघात करते हैं. सैनिकों को किस प्रकार लड़ना है कैसे लड़ना है उन्हें स्वतन्त्रतापूर्वक तय करने दे.

नेहरु सरकार का देश के साथ सबसे बड़ा विश्वासघात

शेखअब्दुल्ला के साथ जवाहरलाल नेहरु

ग्रीष्म ऋतू आरम्भ होते ही भारतीय सेना ने कार्यवाही तेज करते हुए गुरेज, कंजलवान पर अधिकार कर लिया. कर्नल राजेंद्र सिंह के नेतृत्व में नवम्बर में द्राक्ष पर भी अधिकार कर लिया गया. नवम्बर में ही गोरखा रेजिमेंट ने कारगिल भी कब्जे में ले लिया. इस पराजय के बाद आक्रमणकारी पीछे हटने लगे. १२ अप्रैल १९४८ को १९ इन्फेंट्री ब्रिगेड ने राम राघव राने के नेतृत्व में राजौरी वापस ले लिया.  एक साल की घेराबंदी के बाद पुंछ पर कब्जा करने में सफल हो गये. भारतीय सेना गिलगित में गिलगित स्काउट और पाकिस्तानी सेना को हराकर आगे बढ़ गयी और मुजफ्फराबाद, मीरपुर और स्कार्दू पर कब्जा करने के करीब थी कि….

भारतीय सेना अपने शौर्य और पराक्रम से पाक अधिकृत कश्मीर के अधिकांश क्षेत्रों पर कब्जा कर चुकी थी और तेजी से आगे बढ़ रही थी, परन्तु नेहरु ने अचानक युद्ध विराम की घोषणा कर दी. हद तो तब हुई जब युद्ध विराम पश्चात पिछली तारीख से यथास्थिति बहाली की घोषणा कर जानबूझकर विजित भारतीय क्षेत्र को पाकिस्तान के हवाले कर दिया गया.

केंद्रशासित प्रदेश बनने से पहले जम्मू-कश्मीर की राजनीतिक दु:स्थिति

इतना ही नहीं, नेहरु ने यूएनओ में जाकर चैप्टर सात जिसमे एक आक्रमणकारी देश द्वारा अपने सीमा पर दखल से सम्बन्धित शिकायत की व्यवस्था है कि जगह चैप्टर छः के तहत शिकायत दर्ज कराई जिसमें विवादित क्षेत्र की समस्या के समाधान की व्यवस्था है. नेहरु के इस गलती के कारण ही पाकिस्तान को अब कश्मीर पर हक जताने का अनर्थकारी अनावश्यक हक प्राप्त हो गया है. इस प्रकार उन्होंने सेना के सम्पूर्ण शौर्य और बलिदान पर पानी फेर दिया जिसके कारण भारतीय सेना कश्मीर में आजतक पाकिस्तान से रोज अप्रत्यक्ष युद्ध लड़ने को बाध्य है.

मुख्य स्रोत: कश्मीर निरंतर युद्ध के साए में, लेखक:लेफ्टिनेंट जेनरल के.के. नंदा

अन्य: सरदार पटेल’स कोर्रेस्पोंडेंस, संग्रहकर्ता दुर्गा दास, विकिपीडिया आदि

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6 thoughts on “जम्मू-कश्मीर १९४७ : जरा याद करो कुर्बानी

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