मध्यकालीन भारत

मध्य एशिया का तुर्की शैतान कुतुबुद्दीन ऐबक

qutubuddin
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मध्य एशिया के तुर्की हिन्दुओं, बौद्धों को जब तलवार के बल पर जबरन धर्मान्तरित किया जा रहा था और उन्हें भेड़, बकरियों की तरह गुलाम बनाया जा रहा था उन्ही गुलामों के झुण्ड में एक धर्मान्तरित गुलाम था कुतुबुद्दीन जिसे निमिषपुर में खरीदकर निमिषपुर के काजी फखरुद्दीन अब्दुल अजीज के हाथों औने पौने दाम पर बेच दिया गया था. काजी ने उसे कुरआन पढ़ाया और काफिरों के विरुद्ध जिहाद लड़ने और काफिरों का कत्लेआम करने की शिक्षा दी.

फिर काजी ने उस कुरूप कुतुबुद्दीन को एक सौदागर को बेच दिया. इस प्रकार वह कई बार खरीदा और बेचा गया. इसी दौरान किसी ने उसकी छोटी ऊँगली तोड़ दी थी जिसके कारण लोग उसके नाम के साथ विकलांगता सूचक शब्द ऐबक (ऐब अर्थात शारीरिक खामियां से ऐबक) जुड़ गया और वह कुतुबुद्दीन ऐबक हो गया. उम्र बढने के साथ उसके लूटने और काफिरों के कत्लेआम की क्षमता भी बढ़ रही थी इसलिए उसका मूल्य भी बढ़ रहा था.

मोहम्मद गोरी तक पहुँचते पहुँचते वह पूरी तरह जिन्दा शैतान बन चुका था और कितना ही नीच, हिंसक कार्य हो वह करने केलिए तैयार रहता था. मोहम्मद गोरी ने उसकी लूट, हिंसा और दुस्साहस को अच्छी तरह पहचाना और उसे घुड़सवार सेना के एक छोटे से दल का नायक बना कर कहराम का क्षेत्र उपहार में दे दिया.

इतिहासकार पुरुषोत्तम नागेश ओक लिखते हैं, “गोरी ने १६ वर्ष पूर्व ही भारत पर अपना नृशंस आक्रमण प्रारम्भ कर दिया था. उसके गुलाम कुतुबुद्दीन ने काफी उत्साह दिखाया. वह अपने स्वामी के रक्त-रंजित चरण-चिन्हों पर चलकर शांतिप्रिय, अर्द्धनिद्रित हिन्दू सभ्यता को ध्वस्त करने केलिए कमर कसकर तैयार था.

इतिहासकार हसन निजामी अपने ग्रन्थ ताजुल-मा-आसिर में कुतुबुद्दीन की प्रशंसा करते हुए लिखता है कि, “कुतुबुद्दीन ऐबक मुसलमान और इस्लाम का स्तम्भ है…काफिरों का विध्वंसक है, …उसने अपने आप को धर्म और राज्य के शत्रुओं (हिन्दुओं) को उखाड़ फेंकने में लगा दिया,.. उसने हिन्द की जमीन को उन लोगों के कलेजे के खून से इतना सराबोर कर दिया कि क़यामत के दिन मोमिनों को खून का दरिया नावों से ही पार करना होगा. ताजधारी रायों का सिर काट उसे सूलियों का ताज बना दिया. अपनी तलवार के दमदार पानी से मूर्तिपूजकों के सारे संसार को जहन्नुम की आग में झोंक दिया. प्रतिमाओं और मूर्तियों के स्थान पर मस्जिद और मदरसे की नींव रक्खी. उसकी लूट और कत्लेआम मुसलसल (लगातार) था. (पृष्ठ २२९, भाग-२, इलियट एवं डाउसन)

११९१ ईस्वी में कुतुबुद्दीन ने मेरठ पर हमला किया. इतिहासकार हसन निजामी लिखता है, “जब वह मेरठ पहुंचा, जो सागर जितनी चौड़ी और गहरी खायी, विशाल तथा नींव की मजबूती के लिए भारत भर में एक प्रसिद्ध दुर्ग था, वह दुर्ग ले लिया गया. दुर्ग में एक कोतवाल की नियुक्ति की गई और सभी मूर्ति-मन्दिरों को मस्जिद बना दिया गया.”

“मेरठ लेने के बाद कुतुबुद्दीन दिल्ली की ओर बढ़ा जो सम्पत्ति का स्रोत और ऐश्वर्य का आगार था. कुतुबुद्दीन ने उस शहर को विध्वंस कर नष्ट-भ्रष्ट कर दिया. शहर और इसके समीपवर्ती क्षेत्र को मूर्तियों और मूर्ति-पूजकों से मुक्त कर, देव स्थानों की जगह मस्जिदों का निर्माण किया.”

दिल्ली के मिहिरपुर (महरौली) क्षेत्र में सम्राट विक्रमादित्य द्वारा निर्मित प्राचीन मन्दिर स्थल जहाँ भगवान विष्णु के मन्दिर सहित एक नक्षत्र निरीक्षण स्तम्भ और नक्षत्रों के प्रतीक स्वरूप २७ मन्दिर थे उन्हें नष्ट कर विष्णुमन्दिर को कुव्वत उल इस्लाम (इस्लाम की ताकत) मस्जिद बना दिया. इसी दौरान उसने जब अपने आदमियों से उस ऊँचे स्तम्भ के बारे में पूछा की यह क्या है तो उसके सैनिकों ने पता कर बताया की यह ‘क़ुतुब मीनार’ अर्थात नक्षत्र निरीक्षण का स्तम्भ (या ध्रुव स्तम्भ) है.

ध्रुव स्तम्भ महरौली के विष्णु मन्दिर (कुव्वत उल इस्लाम मस्जिद) में स्थापित भगवान विष्णु की मूर्ति नेशनल म्यूजियम दिल्ली में असुरक्षित पड़ा है

कुतुबुद्दीन ने उस ध्रुव स्तम्भ को भी तोड़ डालने की कोशिश की परन्तु वह पूरी तरह सफल नहीं हुआ. ऊपरी मंजिल या शिखर पर जो ब्रह्म कमल था उसे तोड़ने में वह अवश्य सफल हुआ (पी एन ओक). जाने से पहले उसने लौह स्तम्भ की ओर जाने वाले एक वृत्त-खंड पर एक लेख खुदवा दिया है कि उसने पत्थर-स्तम्भ के चारों ओर स्थित २७ मंचों को नष्ट-भ्रष्ट कर बर्बाद किया है (अर्थात स्तम्भ नष्ट नहीं हुआ था जिसे आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया के रिपोर्ट में भी साबित किया गया है). बाद में इल्तुतमिश ने इसकी मरम्मत कर इसके उपर अरबी लिखावट चिपका दिया है (ASI रिपोर्ट) और सम्भवतः तुगलक शासकों के समय ध्रुव स्तम्भ के उपर के दो बेढंगे मंजिलों का निर्माण किया गया है.

महरौली का ध्रुव स्तम्भ परिसर और मन्दिर

क़ुतुब मीनार से सम्बन्धित आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया के रिपोर्ट पढ़ने के लिए निचे के लिंक पर क्लिक करें.

कुतुबुद्दीन जब अजयमेरु में था तब दिल्ली के शासक ने दिल्ली पर पुन: अधिकार कर हिन्दुओं को इकठ्ठा किया और कुतुबुद्दीन के विरुद्ध धावा बोला. घमासान लड़ाई हुई पर हिन्दू सेना हार गई. दिल्ली लौटते ही कुतुबुद्दीन ने फिर हिन्दुओं का भयानक कत्लेआम किया. ११९४ ईस्वी में उसने कोल एवं वाराणसी की ओर कूच किया. हसन निजामी के अनुसार, “कोल हिन्द का सर्वाधिक विख्यात दुर्ग था. वहाँ की रक्षक टुकड़ियों में “जो बुद्धिमान थे उनका इस्लाम में धर्म परिवर्तन हुआ, मगर जो अपने प्राचीन धर्म पर डटे रहे, उनको हलाल कर दिया. मुस्लिमों ने दुर्ग में प्रविष्ट होकर भरपूर खजाना और अनगनित लूट का माल जमा किया जिसमें एक हजार घोड़े भी थे.

जयचंद के विरुद्ध अभियान

इसी बीच गोरी मुस्लिम लूटेरों का विशाल गिरोह लेकर भारत आया. उसने कुतुबुद्दीन के नियंत्रण में अपनी लुटेरी सेना की एक टुकड़ी आगे भेज दी जिनका काम था असुरक्षित नगरों और देहातों को लूटना, खलिहानों को जला देना, खड़ी फसल कुचल देना, जलाशयों में जहर घोल देना, हिन्दू स्त्रियों को मुस्लिम हरमों में घसीट लाना, हिन्दू मन्दिरों को अपवित्र कर देना और रुकावटों को उखड फेंकना. अपना काम पूरा कर कुतुबुद्दीन वापिस गोरी से आ मिला.

इतिहासकार पुरुषोत्तम नागेश ओक लिखते हैं, “पृथ्वीराज चौहान के विरुद्ध मोहम्मद गोरी का साथ देनेवाला जयचंद यह देखकर हक्का-बक्का रह गया की मुसलमान प्रत्येक हिन्दू का उत्कट-शत्रु हैं, जिसे एक एक करके नष्ट करना ही उनका पवित्र कर्तव्य है. विश्वासघाती मुस्लिम दोस्त की धोखेबाजी से कुपित हो जयचंद अपनी सेना ले उससे जा टकराया. विषाक्त मुस्लिम बाण से वह हौदे से निचे गिर गया.”

मुस्लिम इतिहासकार लिखता है, “भाले की नोक पर उसके सिर को उठाकर सेनापति के पास लाया गया, उसके शरीर को घृणा की धुल में मिला दिया गया….तलवार के पानी से बुत-परस्ती के पाप को उस जमीन से साफ किया गया और हिन्द देश को अधर्म और अन्धविश्वास से मुक्त किया गया. बेशुमार लूट मिली..दुर्ग पर अधिकार कर लिया गया.”

कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा नष्ट किये गये मन्दिर

इतिहासकार मुहम्मद हसन निजामी, जो खुरासान के निशापुर शहर से मंगोलों के डर से भागकर भारत आया था, की पुस्तक ताजुल-मा-आसिर लूटेरा मोहम्मद गोरी और उसके गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा भारत में निम्नलिखित मन्दिरों के नष्ट किये जाने या उन्हें मस्जिद बनाये जाने का विवरण देता है. वह लिखता है:

  1. अजमेर में सुल्तान मुहम्मद गोरी ने मन्दिरों के नींव और खम्भों को नष्ट कर वहाँ मस्जिद और मदरसे बना दिए और वहाँ इस्लाम की विचारधारा, रिवाज और नियम स्थापित हो गया.  
  2. पंजाब में कोहराम और समाना के किले की सरकार सुल्तान (गोरी) द्वारा कुतुबुद्दीन को सौंप दी गई थी. उन्होंने अपनी तलवार से हिंद की भूमि को मूर्तिपूजा और बुराई की गंदगी से शुद्ध किया, और इसे ईश्वर-बहुलता के कांटों से मुक्त किया, और मूर्ति-पूजा की अशुद्धता और अपनी शाही शक्ति और निडरता से, एक भी मंदिर खड़ा नहीं छोड़ा.
  3. “कुतुबुद्दीन ने कोहराम से प्रस्थान किया और जब वह मेरठ पहुंचा, जो इसकी नींव और अधिरचना की ताकत के लिए हिंद देश के प्रसिद्ध किलों में से एक है,  और इसकी खाई, जो समुद्र की तरह चौड़ी और अथाह थी, देश के आश्रित प्रमुखों द्वारा भेजी गई एक सेना उसके साथ शामिल हो गई. किले पर कब्जा कर लिया गया था, और एक कोतवाल को किले में अपना स्थान लेने के लिए नियुक्त किया गया था, और सभी मूर्ति मंदिरों को मस्जिदों में बदल दिया गया था.”
  4.  “फिर उन्होंने मार्च किया और दिल्ली के किले के नीचे डेरा डाला … शहर और इसके आसपास के इलाकों को मूर्तियों और मूर्ति-पूजा से मुक्त कर दिया गया, और देवताओं की छवियों के अभयारण्यों में अल्लाह के एक पुजारी द्वारा मस्जिदें बनबाई गईं. कुतुबुद्दीन ने दिल्ली में जामी मस्जिद का निर्माण किया और इसे मंदिरों से प्राप्त पत्थरों और सोने से सजाया, जिसे हाथियों ने तोड़ दिया था, और इसे तोगरा में शिलालेखों के साथ कवर किया, जिसमें दैवीय आदेश थे।”
  5. “उस स्थान (असनी) से शाही सेना बनारस की ओर बढ़ी जो हिंद देश का केंद्र है और यहां उन्होंने लगभग १००० मंदिरों को नष्ट कर दिया, और उनकी नींव पर मस्जिदें खड़ी कर दीं और कानून का ज्ञान प्रख्यापित हो गया, और धर्म की नींव स्थापित हुए. इस क्षेत्र को मूर्ति एवं मूर्ति-पूजकों से मुक्त किया गया और काफ़िरपन की नींव को नष्ट कर दिया गया,” अर्थात सभी मन्दिरों को नष्ट या अपवित्र कर हिन्दुओं को मुसलमान बना दिया गया.
  6. “(अलीगढ़) कोल के पड़ोस में एक जनजाति थी जिसने बहुत परेशानी का सामना किया था. यहाँ तीन गढ़ थे जिनके सिर स्वर्ग जितना ऊंचा किया गया था. उनके (हिन्दुओं के) शव शिकार के जानवरों का भोजन बन गए थे. उस पथ को मूर्तियों और मूर्ति-पूजा से मुक्त कर दिया गया था और मूर्तिपूजकों की बुनियाद नष्ट कर दी गई.”
  7. “जब कुतुबुद्दीन ने गजनी के सुल्तान के मार्च के बारे में सुना, तो वह बहुत खुश हुआ और उससे मिलने के लिए हांसी तक आगे बढ़ा. ईस्वी सन् ११९६ में, उन्होंने थंगर की ओर कूच किया, और (बयाना के) मूर्तिपूजा का नारकीय केंद्र महिमा और वैभव का निवास बन गया..”
  8. “(कालिंजर में) १२०२ ईस्वी में, कुतुबुद्दीन कालिंजर के लिए आगे बढ़े, जिस अभियान पर उनके साथ शम्सू-दीन अल्तमश भी थे…  वहाँ मंदिरों को मस्जिदों और पवित्र निवासों में बदल दिया गया था…और आजान के लिए बुलाने वालों की आवाज़ें उच्च स्वर्ग पर चढ़ गईं, और मूर्तिपूजा का नाम ही सत्यानाश कर दिया गया.” (Source: Hindu Temples what happened to them and Iliad and Dowson)

भारत पर कुतुबुद्दीन के अन्य हमले

११९२ में मोहम्मद गोरी और कुतुबुद्दीन ऐबक की संयुक्त सेना ने बयाना दुर्ग को घेर लिया और निर्दोष जनता पर वैसे ही अत्याचार, लूट और हिंसा करने लगे जैसे उपर कन्नौज के सन्दर्भ में किया गया है. अपनी संकटग्रस्त प्रजा को बलात्कार, हत्या, लूट, अपहरण और आगजनी से बचाने केलिए कुंवर पाल ने आत्मसमर्पण कर दिया.

फिर वे ग्वालियर की ओर बढ़े. ग्वालियर का शासक सुलक्षणपाल ने ऐसा विकट संग्राम किया की गौरी का सारा गर्व चूर हो गया और उसे वापिस भागना पड़ा. लुटा-पिटा गौरी गजनी लौट गया और कुतुबुद्दीन दिल्ली. इसी समय अनहिलवाड शासक के नेतृत्व में हिन्दुओं की सेना एकत्रित हो रही थी और कुतुबुद्दीन चारों ओर से घिर गया. उसने गजनी संदेश भेजा तो गोरी सेना लेकर भारत पहुंचा पर अनहिलवाड पर हमला करने की हिम्मत नहीं जुटा सके. तब हिन्दुओं की सेना पर्वतीय स्थानों को छोड़कर मुस्लिम सेना पर टूट पड़ी जिसके कारण आक्रमणकारियों को अजयमेरु में शरण लेनी पड़ी और वहाँ से दिल्ली लौट गयी.

१२०२ ईस्वी में कुतुबुद्दीन ने कालिंजर दुर्ग पर घेरा डाला पर बुरी तरह परास्त हुआ. दूसरी बार ज्यादा विशाल सेना के साथ मुसलमानों ने हमला किया. मृत शासक के मुख्यमंत्री अजदेव ने बड़ी वीरता से दुर्ग की रक्षा की पर छल बल से मुस्लिम सेना दुर्ग पर कब्जा करने में सफल हो गई. फिर वहाँ भी “मन्दिरों को मस्जिद बनाया गया और देव प्रतिमाओं का नामोनिशान तक मिटा दिया गया. पचास हजार लोगों के गले में गुलामी का फंदा कसा गया और हिन्दुओं के रक्त से सारी जमीन रक्तरंजित हो गई.” (इलियट एवं डाउसन, भाग-२, पृष्ठ २३९)

उसके बाद कुतुबुद्दीन महोबा पर हमला किया और बुरी तरह परास्त हुआ. इसी प्रकार का एक प्रयास बदायूं पर भी किया गया जो नगरों की जननी और हिन्द देश के प्रमुख नगरों में से एक था.

सुल्तान कुतुबुद्दीन ऐबक

उधर वीर हिन्दू खोक्करों ने मोहम्मद गोरी को नाकों दम कर रखा था. लुटा पिटा गोरी लाहौर में डेरा डाला फिर वापिस गजनी की ओर चल दिया. वापसी में इन लोगों ने अपना पड़ाव दमयक के निकट एक बाग में डाला था. यहीं पर लूटेरा शैतान मोहम्मद गोरी वीर हिन्दू सेना की एक टुकड़ी, जो समीपवर्ती क्षेत्रों से मुस्लिम लुटेरों का सफाया कर रही थी, द्वारा मारकर समाप्त कर दिया गया.

गोरी के मारे जाने के बाद कुतुबुद्दीन ऐबक ने लाहौर में १२०६ ईस्वी में खुद को सुल्तान घोषित कर दिया जिसका गोरी का भतीजा और गजनी का शासक ताजुद्दीन ने विरोध किया पर सीधे संग्राम में वह कुतुबुद्दीन से हारकर भाग गया. २६ जून, १२०६ को उसने दिल्ली में विधि-विधान के साथ राजा का ताज पहना.

इतिहासकार पुरुषोत्तम नागेश ओक लिखते हैं, “भारत के इतिहास का वह दिन कलंक से काला हो गया क्योंकि उस दिन प्राचीन पवित्र हिन्दू राजसिंहासन को, जिसे पांडव, भगवान कृष्ण और विक्रमादित्य जैसे नररत्नों ने पवित्र और सुशोभित किया था, एक घृणित विदेशी मुस्लिम ने, जिसे कई बार पश्चिम एशिया के गुलामों के बाजारों में खरीदा और बेचा गया, अपवित्र और कलंकित कर दिया.” 

नवम्बर, १२१० ईस्वी के प्रारम्भिक दिनों में लाहौर में चौगान खेलते समय कुतुबुद्दीन ऐबक घोड़े से गिरकर मर गया. घोड़े के जीन के पायदान का नुकीला भाग उसकी छाती में धंस गया था.

आधार ग्रन्थ:

  1. भारत में मुस्लिम सुल्तान, लेखक-पुरुषोत्तम नागेश ओक
  2. ताजुल-मा-आसिर, लेखक-हसन निजामी
  3. इलियड एवं डाउसन, भाग-२
  4. Hindu Temples what happened to them, etc.

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27 thoughts on “मध्य एशिया का तुर्की शैतान कुतुबुद्दीन ऐबक

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